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लिपि:
॥ श्री ॥

श्री अन्नपूर्णा चालीसा

चालीसा · माँ दुर्गा

पाठ

गणपति-गिरिजा-सुत सुमिर, करूँ मातु गुणगान। अन्नपूर्णा की वंदना, देहु अन्न-धन-दान॥

1

जय अन्नपूर्णा जगदम्बा। जग-पालिनि तुम बिन न अवलम्बा॥

2

गौर-वरण तन शोभा भारी। कर में कनक कलश सुखकारी॥

3

एक कर अन्न-थाली शोभे। भूखे को अन्न दे मन मोहे॥

4

काशी पुरी विराजति माता। शिव-संग शोभा अति पाता॥

5

शिव को भिक्षा तुम्हीं दीन्ही। जग की क्षुधा शांत तुम कीन्ही॥

6

जो जन तुमको नित ही ध्यावै। अन्न-धन की कमी न पावै॥

7

धन-धान्य भर देती घर-घर। खुशहाली बरसाती हर पल॥

8

रसोई में बरकत तुम लाती। भूखे को तुम तृप्त कराती॥

9

जो नर श्रद्धा से तुम्हें ध्यावै। रोग-शोक भय निकट न आवै॥

10

अन्नपूर्णा जयंती जो धारे। सुख-समृद्धि माँ ता पर वारे॥

11

दीन-दुखी की सुनत पुकारा। पल में करती बेड़ा पारा॥

12

जो जन तुमको शीश नवावै। अन्न-धन-सुख सहज वह पावै॥

13

भोजन-पूर्व जो तुम्हें ध्यावै। भोजन में बरकत वह पावै॥

14

अन्न का अनादर जो न करते। माँ की कृपा से सुख वे भरते॥

15

भूखे को जो भोजन कराते। माँ-कृपा से वे सुख पाते॥

16

जो नर निशदिन ध्यान लगावै। मातु-कृपा सहज वह पावै॥

17

मंगल-कारी विघ्न-विनाशिनि। भय-हारिणि तुम सुख-प्रदायिनि॥

18

जो श्रद्धा से भोग चढ़ावै। ता के सब बिगड़े बन जावै॥

19

व्यापार-धंधे में बरकत आवै। धन-धान्य घर में भर जावै॥

20

जो यह अन्नपूर्णा चालीसा गावै। अन्न-धन-सुख सहज वह पावै॥

21

नित प्रति पाठ करे जो कोई। ता पर कृपा माता की होई॥

22

मन-इच्छित फल सब जन पावैं। अन्न-धन-समृद्धि लावैं॥

23

माता-कृपा जिन पर होई। भूखा-दरिद्र रहे न कोई॥

24

रसोई-पूजन जो जन करते। गृह में सुख-समृद्धि भरते॥

25

अन्न-दान का बड़ा बखाना। इससे बढ़कर पुण्य न आना॥

26

जो सत भाव करे यह सेवा। रीझत तुरत अन्नपूर्णा देवा॥

27

संकट-मोचनि नाम तुम्हारा। भक्त-हृदय में नित्य निवारा॥

28

महिमा तुम्हरी अति अपारा। वेद-पुराण करत विस्तारा॥

29

पार्वती-स्वरूपा कल्याणी। जग की पालक तुम महारानी॥

30

घर-घर ज्योति तुम्हारी जागै। नर-नारी सब तुमको पागै॥

31

जो भूखे को न दुत्कारे। माँ ता के सब काज सँवारे॥

32

अन्न व्यर्थ जो जन न गँवावै। माँ-कृपा से बरकत पावै॥

33

सेवा-भाव जो जन अपनावै। माँ-कृपा सहज वह पावै॥

34

भंडारा जो श्रद्धा से करते। माँ की कृपा से सुख वे भरते॥

35

जो जन माता गुण गावै। पाप-ताप सब दूर भगावै॥

36

अन्नपूर्णा-वंदन जो गावै। इहलोक-परलोक सुख पावै॥

37

ऋद्धि-सिद्धि घर में आवै। अन्न-धन-समृद्धि बढ़ावै॥

38

भय-संकट सब दूर हटावै। अन्नपूर्णा जो जन ध्यावै॥

39

सुख-समृद्धि-संतोष बढ़ावै। माँ-कृपा से जग सुख पावै॥

40

जय जय जय अन्नपूर्णा माता। अन्न-धन-सुख-समृद्धि दाता॥

अन्नपूर्णा चालीसा सरल, पढ़े प्रेम मन लाय। अन्न-धन-सुख-समृद्धि सब, घर में बसैं सदाय॥

अर्थ (हिन्दी)

  1. गिरिजा-पुत्र गणपति का स्मरण कर मैं माता का गुणगान करता हूँ; हे अन्नपूर्णा माता, अन्न-धन का दान दीजिए।
  2. हे अन्नपूर्णा जगदम्बा, आपकी जय हो; आप जगत का पालन करने वाली हैं, आपके बिना कोई अवलम्ब नहीं।
  3. गौर वर्ण तन की अति शोभा है; हाथ में सुखकारी स्वर्ण-कलश सुशोभित है।
  4. एक हाथ में अन्न की थाली सुशोभित है; भूखों को अन्न देकर आप मन मोह लेती हैं।
  5. हे माता, आप काशी पुरी में विराजती हैं और शिव के संग अति शोभा पाती हैं।
  6. आपने स्वयं शिव को भिक्षा दी और समस्त जगत की भूख शांत की।
  7. जो जन नित्य आपका ध्यान करता है, उसे अन्न-धन की कमी नहीं रहती।
  8. आप घर-घर को धन-धान्य से भर देती हैं और हर पल खुशहाली बरसाती हैं।
  9. आप रसोई में बरकत लाती हैं और भूखे को तृप्त कराती हैं।
  10. जो मनुष्य श्रद्धा से आपका ध्यान करता है, उसके निकट रोग, शोक व भय नहीं आते।
  11. जो अन्नपूर्णा जयंती का व्रत धारण करता है, हे माँ, आप उस पर सुख-समृद्धि न्योछावर करती हैं।
  12. आप दीन-दुखियों की पुकार सुनते ही पल भर में उनका बेड़ा पार कर देती हैं।
  13. जो जन आपको शीश नवाता है, वह सहज ही अन्न, धन व सुख पाता है।
  14. जो भोजन से पूर्व आपका ध्यान करता है, उसके भोजन में बरकत आती है।
  15. जो अन्न का अनादर नहीं करते, वे माँ की कृपा से सुख से भर जाते हैं।
  16. जो भूखे को भोजन कराते हैं, वे माँ की कृपा से सुख पाते हैं।
  17. जो मनुष्य दिन-रात ध्यान लगाता है, वह सहज ही माता की कृपा पाता है।
  18. आप मंगलकारी व विघ्नों की विनाशिनी हैं; भय हरकर सुख प्रदान करती हैं।
  19. जो श्रद्धा से भोग चढ़ाता है, उसके सब बिगड़े कार्य बन जाते हैं।
  20. आपकी कृपा से व्यापार-धंधे में बरकत आती है और घर धन-धान्य से भर जाता है।
  21. जो यह अन्नपूर्णा चालीसा गाता है, वह सहज ही अन्न, धन व सुख पाता है।
  22. जो कोई नित्य पाठ करता है, उस पर माता की कृपा होती है।
  23. सब जन मन-इच्छित फल पाते हैं और घर में अन्न-धन व समृद्धि लाते हैं।
  24. जिन पर माता की कृपा होती है, उनमें कोई भूखा-दरिद्र नहीं रहता।
  25. जो जन रसोई-पूजन करते हैं, वे घर में सुख-समृद्धि भरते हैं।
  26. अन्न-दान की बड़ी महिमा है; इससे बढ़कर कोई पुण्य नहीं माना गया।
  27. जो सच्चे भाव से यह सेवा करता है, उस पर अन्नपूर्णा माता तुरंत रीझ (प्रसन्न हो) जाती हैं।
  28. आपका नाम संकट-मोचनी है; आप भक्तों के हृदय में नित्य निवास कर कष्ट दूर करती हैं।
  29. आपकी महिमा अति अपार है, जिसका विस्तार वेद-पुराण करते हैं।
  30. आप पार्वती-स्वरूपा कल्याणी हैं; हे महारानी, आप जगत की पालक हैं।
  31. घर-घर में आपकी ज्योति जगती है; नर-नारी सब आपमें अनुरक्त हो जाते हैं।
  32. जो भूखे को नहीं दुत्कारता, हे माँ, आप उसके सब काज सँवार देती हैं।
  33. जो जन अन्न व्यर्थ नहीं गँवाता, वह माँ की कृपा से बरकत पाता है।
  34. जो जन सेवा-भाव अपनाता है, वह सहज ही माँ की कृपा पाता है।
  35. जो श्रद्धा से भंडारा (अन्न-दान) करते हैं, वे माँ की कृपा से सुख से भर जाते हैं।
  36. जो जन माता के गुण गाता है, वह समस्त पाप-ताप दूर भगा देता है।
  37. जो जन अन्नपूर्णा-वंदना गाता है, वह इस लोक व परलोक दोनों में सुख पाता है।
  38. घर में ऋद्धि-सिद्धि आती है और अन्न, धन व समृद्धि बढ़ती है।
  39. जो जन अन्नपूर्णा का ध्यान करता है, वह भय व संकट सब दूर हटा देता है।
  40. सुख, समृद्धि व संतोष बढ़ता है; माँ की कृपा से जगत सुख पाता है।
  41. हे अन्नपूर्णा माता, आपकी जय हो; आप अन्न, धन, सुख व समृद्धि देने वाली हैं।
  42. जो प्रेमपूर्वक मन लगाकर यह सरल अन्नपूर्णा चालीसा पढ़ता है, उसके घर में अन्न, धन, सुख व समृद्धि सदा बसती है।

लाभ

  • घर में अन्न, धन व समृद्धि की कमी नहीं रहती।
  • रसोई व भोजन में बरकत बनी रहती है।
  • परिवार में सुख-शांति व संतोष आता है।
  • व्यापार व आय में वृद्धि होती है।

कब करें पाठ

अन्नपूर्णा जयंती (मार्गशीर्ष पूर्णिमा) पर · शुक्रवार को · रसोई-पूजन व भोजन-आरंभ में

स्रोत

रचयिता: पारंपरिक. पारंपरिक अन्नपूर्णा चालीसा · गीता प्रेस, गोरखपुर — चालीसा संग्रह

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