श्री अन्नपूर्णा चालीसा
पाठ
गणपति-गिरिजा-सुत सुमिर, करूँ मातु गुणगान। अन्नपूर्णा की वंदना, देहु अन्न-धन-दान॥
जय अन्नपूर्णा जगदम्बा। जग-पालिनि तुम बिन न अवलम्बा॥
गौर-वरण तन शोभा भारी। कर में कनक कलश सुखकारी॥
एक कर अन्न-थाली शोभे। भूखे को अन्न दे मन मोहे॥
काशी पुरी विराजति माता। शिव-संग शोभा अति पाता॥
शिव को भिक्षा तुम्हीं दीन्ही। जग की क्षुधा शांत तुम कीन्ही॥
जो जन तुमको नित ही ध्यावै। अन्न-धन की कमी न पावै॥
धन-धान्य भर देती घर-घर। खुशहाली बरसाती हर पल॥
रसोई में बरकत तुम लाती। भूखे को तुम तृप्त कराती॥
जो नर श्रद्धा से तुम्हें ध्यावै। रोग-शोक भय निकट न आवै॥
अन्नपूर्णा जयंती जो धारे। सुख-समृद्धि माँ ता पर वारे॥
दीन-दुखी की सुनत पुकारा। पल में करती बेड़ा पारा॥
जो जन तुमको शीश नवावै। अन्न-धन-सुख सहज वह पावै॥
भोजन-पूर्व जो तुम्हें ध्यावै। भोजन में बरकत वह पावै॥
अन्न का अनादर जो न करते। माँ की कृपा से सुख वे भरते॥
भूखे को जो भोजन कराते। माँ-कृपा से वे सुख पाते॥
जो नर निशदिन ध्यान लगावै। मातु-कृपा सहज वह पावै॥
मंगल-कारी विघ्न-विनाशिनि। भय-हारिणि तुम सुख-प्रदायिनि॥
जो श्रद्धा से भोग चढ़ावै। ता के सब बिगड़े बन जावै॥
व्यापार-धंधे में बरकत आवै। धन-धान्य घर में भर जावै॥
जो यह अन्नपूर्णा चालीसा गावै। अन्न-धन-सुख सहज वह पावै॥
नित प्रति पाठ करे जो कोई। ता पर कृपा माता की होई॥
मन-इच्छित फल सब जन पावैं। अन्न-धन-समृद्धि लावैं॥
माता-कृपा जिन पर होई। भूखा-दरिद्र रहे न कोई॥
रसोई-पूजन जो जन करते। गृह में सुख-समृद्धि भरते॥
अन्न-दान का बड़ा बखाना। इससे बढ़कर पुण्य न आना॥
जो सत भाव करे यह सेवा। रीझत तुरत अन्नपूर्णा देवा॥
संकट-मोचनि नाम तुम्हारा। भक्त-हृदय में नित्य निवारा॥
महिमा तुम्हरी अति अपारा। वेद-पुराण करत विस्तारा॥
पार्वती-स्वरूपा कल्याणी। जग की पालक तुम महारानी॥
घर-घर ज्योति तुम्हारी जागै। नर-नारी सब तुमको पागै॥
जो भूखे को न दुत्कारे। माँ ता के सब काज सँवारे॥
अन्न व्यर्थ जो जन न गँवावै। माँ-कृपा से बरकत पावै॥
सेवा-भाव जो जन अपनावै। माँ-कृपा सहज वह पावै॥
भंडारा जो श्रद्धा से करते। माँ की कृपा से सुख वे भरते॥
जो जन माता गुण गावै। पाप-ताप सब दूर भगावै॥
अन्नपूर्णा-वंदन जो गावै। इहलोक-परलोक सुख पावै॥
ऋद्धि-सिद्धि घर में आवै। अन्न-धन-समृद्धि बढ़ावै॥
भय-संकट सब दूर हटावै। अन्नपूर्णा जो जन ध्यावै॥
सुख-समृद्धि-संतोष बढ़ावै। माँ-कृपा से जग सुख पावै॥
जय जय जय अन्नपूर्णा माता। अन्न-धन-सुख-समृद्धि दाता॥
अन्नपूर्णा चालीसा सरल, पढ़े प्रेम मन लाय। अन्न-धन-सुख-समृद्धि सब, घर में बसैं सदाय॥
अर्थ (हिन्दी)
- गिरिजा-पुत्र गणपति का स्मरण कर मैं माता का गुणगान करता हूँ; हे अन्नपूर्णा माता, अन्न-धन का दान दीजिए।
- हे अन्नपूर्णा जगदम्बा, आपकी जय हो; आप जगत का पालन करने वाली हैं, आपके बिना कोई अवलम्ब नहीं।
- गौर वर्ण तन की अति शोभा है; हाथ में सुखकारी स्वर्ण-कलश सुशोभित है।
- एक हाथ में अन्न की थाली सुशोभित है; भूखों को अन्न देकर आप मन मोह लेती हैं।
- हे माता, आप काशी पुरी में विराजती हैं और शिव के संग अति शोभा पाती हैं।
- आपने स्वयं शिव को भिक्षा दी और समस्त जगत की भूख शांत की।
- जो जन नित्य आपका ध्यान करता है, उसे अन्न-धन की कमी नहीं रहती।
- आप घर-घर को धन-धान्य से भर देती हैं और हर पल खुशहाली बरसाती हैं।
- आप रसोई में बरकत लाती हैं और भूखे को तृप्त कराती हैं।
- जो मनुष्य श्रद्धा से आपका ध्यान करता है, उसके निकट रोग, शोक व भय नहीं आते।
- जो अन्नपूर्णा जयंती का व्रत धारण करता है, हे माँ, आप उस पर सुख-समृद्धि न्योछावर करती हैं।
- आप दीन-दुखियों की पुकार सुनते ही पल भर में उनका बेड़ा पार कर देती हैं।
- जो जन आपको शीश नवाता है, वह सहज ही अन्न, धन व सुख पाता है।
- जो भोजन से पूर्व आपका ध्यान करता है, उसके भोजन में बरकत आती है।
- जो अन्न का अनादर नहीं करते, वे माँ की कृपा से सुख से भर जाते हैं।
- जो भूखे को भोजन कराते हैं, वे माँ की कृपा से सुख पाते हैं।
- जो मनुष्य दिन-रात ध्यान लगाता है, वह सहज ही माता की कृपा पाता है।
- आप मंगलकारी व विघ्नों की विनाशिनी हैं; भय हरकर सुख प्रदान करती हैं।
- जो श्रद्धा से भोग चढ़ाता है, उसके सब बिगड़े कार्य बन जाते हैं।
- आपकी कृपा से व्यापार-धंधे में बरकत आती है और घर धन-धान्य से भर जाता है।
- जो यह अन्नपूर्णा चालीसा गाता है, वह सहज ही अन्न, धन व सुख पाता है।
- जो कोई नित्य पाठ करता है, उस पर माता की कृपा होती है।
- सब जन मन-इच्छित फल पाते हैं और घर में अन्न-धन व समृद्धि लाते हैं।
- जिन पर माता की कृपा होती है, उनमें कोई भूखा-दरिद्र नहीं रहता।
- जो जन रसोई-पूजन करते हैं, वे घर में सुख-समृद्धि भरते हैं।
- अन्न-दान की बड़ी महिमा है; इससे बढ़कर कोई पुण्य नहीं माना गया।
- जो सच्चे भाव से यह सेवा करता है, उस पर अन्नपूर्णा माता तुरंत रीझ (प्रसन्न हो) जाती हैं।
- आपका नाम संकट-मोचनी है; आप भक्तों के हृदय में नित्य निवास कर कष्ट दूर करती हैं।
- आपकी महिमा अति अपार है, जिसका विस्तार वेद-पुराण करते हैं।
- आप पार्वती-स्वरूपा कल्याणी हैं; हे महारानी, आप जगत की पालक हैं।
- घर-घर में आपकी ज्योति जगती है; नर-नारी सब आपमें अनुरक्त हो जाते हैं।
- जो भूखे को नहीं दुत्कारता, हे माँ, आप उसके सब काज सँवार देती हैं।
- जो जन अन्न व्यर्थ नहीं गँवाता, वह माँ की कृपा से बरकत पाता है।
- जो जन सेवा-भाव अपनाता है, वह सहज ही माँ की कृपा पाता है।
- जो श्रद्धा से भंडारा (अन्न-दान) करते हैं, वे माँ की कृपा से सुख से भर जाते हैं।
- जो जन माता के गुण गाता है, वह समस्त पाप-ताप दूर भगा देता है।
- जो जन अन्नपूर्णा-वंदना गाता है, वह इस लोक व परलोक दोनों में सुख पाता है।
- घर में ऋद्धि-सिद्धि आती है और अन्न, धन व समृद्धि बढ़ती है।
- जो जन अन्नपूर्णा का ध्यान करता है, वह भय व संकट सब दूर हटा देता है।
- सुख, समृद्धि व संतोष बढ़ता है; माँ की कृपा से जगत सुख पाता है।
- हे अन्नपूर्णा माता, आपकी जय हो; आप अन्न, धन, सुख व समृद्धि देने वाली हैं।
- जो प्रेमपूर्वक मन लगाकर यह सरल अन्नपूर्णा चालीसा पढ़ता है, उसके घर में अन्न, धन, सुख व समृद्धि सदा बसती है।
लाभ
- घर में अन्न, धन व समृद्धि की कमी नहीं रहती।
- रसोई व भोजन में बरकत बनी रहती है।
- परिवार में सुख-शांति व संतोष आता है।
- व्यापार व आय में वृद्धि होती है।
कब करें पाठ
अन्नपूर्णा जयंती (मार्गशीर्ष पूर्णिमा) पर · शुक्रवार को · रसोई-पूजन व भोजन-आरंभ में
स्रोत
रचयिता: पारंपरिक. पारंपरिक अन्नपूर्णा चालीसा · गीता प्रेस, गोरखपुर — चालीसा संग्रह
