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लिपि:
॥ श्री ॥

श्री अयप्पा चालीसा

चालीसा

पाठ

हरि-हर के सुत प्रभु अयप्पा, करूँ चरण में ध्यान। स्वामिये शरणम् कह करूँ, चालीसा गुणगान॥

1

जय जय अयप्पा स्वामी। हरिहरपुत्र तुम अन्तर्यामी॥

2

हरि-हर के तुम नंदन प्यारे। ब्रह्मचारी रूप जग-न्यारे॥

3

योग-मुद्रा में बैठे शोभा। तेज अनूप त्रिभुवन लोभा॥

4

सबरीमला धाम तुम्हारा। भक्त-गण नित दरस को धारा॥

5

महिषी-वध कर जग तारा। धर्म-रक्षा का कर्म सँवारा॥

6

जो जन तुमको नित ही ध्यावै। भय-संकट से मुक्ति पावै॥

7

अठारह सीढ़ी चढ़ दरस पाते। "स्वामिये शरणम्" कह हर्षाते॥

8

शत्रु-संकट सब टारन हारे। भक्तन के तुम सदा सहारे॥

9

जो नर श्रद्धा से तुम्हें ध्यावै। रोग-शोक भय निकट न आवै॥

10

मण्डल-व्रत जो जन धारे। सकल मनोरथ प्रभु ते सारे॥

11

दीन-दुखी की सुनत पुकारा। पल में करते बेड़ा पारा॥

12

जो जन तुमको शीश नवावै। संयम-भक्ति सहज वह पावै॥

13

इरुमुडी सिर धर भक्त चलते। पैदल चढ़ कानन-पथ पर ढलते॥

14

जो नर निशदिन ध्यान लगावै। अयप्पा-कृपा सहज वह पावै॥

15

मंगल-कारी विघ्न-विनाशन। भय-हारी तुम सुख-साधन॥

16

जो श्रद्धा से भोग चढ़ावै। ता के सब बिगड़े बन जावै॥

17

समता-भाव जग को सिखलाते। सब भक्तन को एक बताते॥

18

जो यह अयप्पा चालीसा गावै। भय-संकट सब दूर नसावै॥

19

नित प्रति पाठ करे जो कोई। ता पर कृपा अयप्पा की होई॥

20

मन-इच्छित फल सब जन पावैं। संयम-भक्ति-सुख लावैं॥

21

अयप्पा-कृपा जिन पर होई। ता को कष्ट सतावे न कोई॥

22

मकर संक्रांति ज्योति जागै। मकरविलक्कु दरस को धावै॥

23

जो सत भाव करे यह सेवा। रीझत तुरत अयप्पा देवा॥

24

संकट-मोचन नाम तुम्हारा। भक्त-हृदय में नित्य निवारा॥

25

महिमा तुम्हरी अति अपारा। वेद-पुराण करत विस्तारा॥

26

व्रत-नियम जो जन पालते। तन-मन-शुद्धि वे सब भरते॥

27

घर-घर ज्योति तुम्हारी जागै। नर-नारी सब तुमको पागै॥

28

संयम-त्याग का मार्ग दिखाते। भक्ति-शुद्धि जग को भाते॥

29

दुःख-संकट जो जन पीड़े। तुम्हें सुमिर कर सब दुख छीड़े॥

30

अयप्पा-स्तुति जो जन गावै। रोग-शोक सब दूर भगावै॥

31

सबरीमला की महिमा भारी। भव-तारण तुम जग-हितकारी॥

32

संयम-शुद्धि का मार्ग बताते। भक्ति-त्याग जग को सिखलाते॥

33

जो जन अयप्पा गुण गावै। पाप-ताप सब दूर भगावै॥

34

अयप्पा-वंदन जो जन गावै। इहलोक-परलोक सुख पावै॥

35

संयम-भक्ति-सुख घर में आवै। शुद्धि-शान्ति-संतोष बढ़ावै॥

36

भय-संकट सब दूर हटावै। अयप्पा जो जन नित ध्यावै॥

37

मोक्ष-मार्ग वह सहज वह पावै। अयप्पा-नाम जो जन गावै॥

38

सुख-शान्ति-शुद्धि घर में लावै। भक्ति-संयम सब बढ़ावै॥

39

सब भक्तन को सम तुम जानो। भेद नहीं कोई तुम मानो॥

40

जय जय जय अयप्पा स्वामी। हरिहरपुत्र तुम अन्तर्यामी॥

अयप्पा चालीसा सरल यह, पढ़े प्रेम मन लाय। संयम-भक्ति-सुख-शान्ति सब, सहज मिलैं सदाय॥

अर्थ (हिन्दी)

  1. हरि व हर के पुत्र प्रभु अयप्पा के चरणों में ध्यान धरकर, "स्वामिये शरणम्" कहकर मैं चालीसा का गुणगान करता हूँ।
  2. हे अयप्पा स्वामी, आपकी जय हो; आप हरिहरपुत्र व सबके अन्तर्यामी हैं।
  3. आप हरि व हर के प्यारे पुत्र हैं; ब्रह्मचारी रूप में जगत से निराले हैं।
  4. योग-मुद्रा में विराजमान आप शोभा पाते हैं; आपका अनुपम तेज तीनों लोकों को मोहता है।
  5. सबरीमला आपका धाम है; भक्तगण नित्य दर्शन की लालसा रखते हैं।
  6. आपने महिषी का वध कर जगत को तारा और धर्म-रक्षा का कार्य सँवारा।
  7. जो जन नित्य आपका ध्यान करता है, वह भय व संकट से मुक्ति पाता है।
  8. अठारह पवित्र सीढ़ियाँ चढ़कर भक्त दर्शन पाते हैं और "स्वामिये शरणम्" कहकर हर्षित होते हैं।
  9. आप शत्रु व संकट सब दूर करने वाले हैं; आप भक्तों के सदा सहारे हैं।
  10. जो मनुष्य श्रद्धा से आपका ध्यान करता है, उसके निकट रोग, शोक व भय नहीं आते।
  11. जो मण्डल-व्रत (41 दिन) धारण करता है, प्रभु उसके समस्त मनोरथ पूर्ण करते हैं।
  12. आप दीन-दुखियों की पुकार सुनते ही पल भर में उनका बेड़ा पार कर देते हैं।
  13. जो जन आपको शीश नवाता है, वह सहज ही संयम व भक्ति पाता है।
  14. इरुमुडी (पवित्र पोटली) सिर पर रखकर भक्त चलते हैं और पैदल वन-पथ पर चढ़ते हैं।
  15. जो मनुष्य दिन-रात ध्यान लगाता है, वह सहज ही अयप्पा-कृपा प्राप्त करता है।
  16. आप मंगलकारी व विघ्नों के विनाशक हैं; भय हरकर सुख देने वाले हैं।
  17. जो श्रद्धा से भोग चढ़ाता है, उसके सब बिगड़े कार्य बन जाते हैं।
  18. आप जगत को समता-भाव सिखाते हैं और सब भक्तों को एक (समान) बताते हैं।
  19. जो यह अयप्पा चालीसा गाता है, उसके भय व संकट सब दूर नष्ट हो जाते हैं।
  20. जो कोई नित्य पाठ करता है, उस पर अयप्पा स्वामी की कृपा होती है।
  21. सब जन मन-इच्छित फल पाते हैं और संयम, भक्ति व सुख लाते हैं।
  22. जिन पर अयप्पा की कृपा होती है, उन्हें कोई कष्ट नहीं सताता।
  23. मकर संक्रांति को (पवित्र) ज्योति जगती है; मकरविलक्कु के दर्शन को भक्त दौड़े आते हैं।
  24. जो सच्चे भाव से यह सेवा करता है, उस पर अयप्पा देव तुरंत रीझ (प्रसन्न हो) जाते हैं।
  25. आपका नाम संकट-मोचन है; आप भक्तों के हृदय में नित्य निवास कर कष्ट दूर करते हैं।
  26. आपकी महिमा अति अपार है, जिसका विस्तार वेद-पुराण करते हैं।
  27. जो जन व्रत-नियमों का पालन करते हैं, वे तन-मन की शुद्धि से भर जाते हैं।
  28. घर-घर में आपकी ज्योति जगती है; नर-नारी सब आपमें अनुरक्त हो जाते हैं।
  29. आप संयम व त्याग का मार्ग दिखाते हैं; भक्ति व शुद्धि जगत को भाते हैं।
  30. जो जन दुःख-संकट से पीड़ित हैं, वे आपका स्मरण कर समस्त दुःख दूर कर लेते हैं।
  31. जो जन अयप्पा-स्तुति गाता है, वह समस्त रोग-शोक दूर भगा देता है।
  32. सबरीमला की महिमा अति महान है; आप भव-तारण व जगत-हितकारी हैं।
  33. आप संयम व शुद्धि का मार्ग बताते हैं और जगत को भक्ति व त्याग सिखलाते हैं।
  34. जो जन अयप्पा के गुण गाता है, वह समस्त पाप-ताप दूर भगा देता है।
  35. जो जन अयप्पा-वंदना गाता है, वह इस लोक व परलोक दोनों में सुख पाता है।
  36. घर में संयम, भक्ति व सुख आता है और शुद्धि, शांति व संतोष बढ़ता है।
  37. जो जन अयप्पा का नित्य ध्यान करता है, वह भय व संकट सब दूर हटा देता है।
  38. जो जन अयप्पा-नाम गाता है, वह सहज ही मोक्ष-मार्ग पा लेता है।
  39. घर में सुख, शांति व शुद्धि आती है और भक्ति व संयम बढ़ता है।
  40. आप सब भक्तों को समान जानते हैं और किसी में कोई भेद नहीं मानते।
  41. हे अयप्पा स्वामी, आपकी जय हो; आप हरिहरपुत्र व सबके अन्तर्यामी हैं।
  42. जो प्रेमपूर्वक मन लगाकर यह सरल अयप्पा चालीसा पढ़ता है, उसे संयम, भक्ति, सुख व शांति सब सहज ही सदा प्राप्त होते हैं।

लाभ

  • भय, संकट व नकारात्मक शक्तियों से रक्षा होती है।
  • मन में संयम, भक्ति व आत्मबल बढ़ता है।
  • मनोकामना पूर्ण होकर सुख-शांति प्राप्त होती है।
  • तन-मन की शुद्धि व समता-भाव का संचार होता है।

कब करें पाठ

मण्डल काल (व्रत के 41 दिन) में · मकर संक्रांति (मकरविलक्कु) पर · शनिवार व नित्य संध्या में

स्रोत

रचयिता: पारंपरिक. पारंपरिक अयप्पा स्वामी चालीसा · सबरीमला परंपरा

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