कृष्ण जन्माष्टमी व्रत कथा
पाठ
व्रत नियम
कौन रखे: कोई भी कृष्ण भक्त स्त्री-पुरुष यह व्रत रख सकते हैं। संतान-सुख, आरोग्य तथा गृह-शांति की कामना से यह विशेष रूप से रखा जाता है। रोगी, गर्भवती स्त्रियाँ व बालक सामर्थ्यानुसार फलाहार पर व्रत रख सकते हैं — शास्त्र में कहीं भी असमर्थ व्यक्ति के लिए निर्जल व्रत का आग्रह नहीं है।
कब: भाद्रपद कृष्ण अष्टमी को। स्मार्त परंपरा उस दिन व्रत रखती है जिस दिन निशीथ (हिंदू मध्यरात्रि) के समय अष्टमी तिथि हो; वैष्णव परंपरा अष्टमी के साथ रोहिणी नक्षत्र को प्रधानता देती है और सप्तमी युक्त दिन कभी नहीं लेती — इसीलिए वैष्णव तिथि प्रायः एक दिन बाद पड़ती है। दोनों ही अपनी-अपनी परंपरा में शुद्ध हैं।
आहार नियम: दिनभर निराहार अथवा फलाहार (सामर्थ्यानुसार); कुछ व्रती मध्यरात्रि पूजन तक निर्जल रहते हैं; अन्न पूर्णतः वर्जित — गेहूँ, चावल, बाजरा तथा समस्त धान्य व दालें; फलाहार में फल, दूध, दही, मखाना, सिंघाड़े व कुट्टू का आटा, सेंधा नमक ग्रहण किया जा सकता है; प्याज-लहसुन, मांस-मदिरा तथा समस्त तामसिक भोजन पूर्णतः वर्जित; सप्तमी की संध्या से ही हल्का सात्त्विक आहार तथा ब्रह्मचर्य का पालन
पूजन सामग्री
बाल गोपाल का विग्रह अथवा देवकी-बाल कृष्ण का चित्र · झूला अथवा पालना, तथा उसकी सज्जा हेतु पुष्प व वस्त्र · पंचामृत — कच्चा दूध, दही, घी, शहद व शर्करा · माखन व मिश्री (श्रीकृष्ण का प्रिय भोग) · तुलसीदल — भोग तुलसी के बिना अपूर्ण माना जाता है · मोरपंख, वंशी तथा पीत (पीले) वस्त्र · गंगाजल, चंदन, अक्षत, कुमकुम, मोली · धनिया पंजीरी, ऋतुफल तथा मेवा · घी के दीप, धूप, कर्पूर तथा शंख व घंटा
पूजन विधि
- सप्तमी की संध्या से हल्का सात्त्विक भोजन लें तथा ब्रह्मचर्य का पालन करें।
- अष्टमी को प्रातः स्नानादि से निवृत्त होकर पूर्व अथवा उत्तर की ओर मुख करके संकल्प लें — "ममाखिलपापप्रशमनपूर्वक सर्वाभीष्ट सिद्धये श्रीकृष्ण जन्माष्टमी व्रतमहं करिष्ये"।
- पूजा स्थल पर देवकी जी का "सूतिका गृह" (प्रसव कक्ष) भाव से सज्जित करें अथवा बाल गोपाल का झूला स्थापित करें।
- बाल कृष्ण का विग्रह अथवा बालक कृष्ण को गोद में लिए देवकी का चित्र स्थापित करें।
- मध्यरात्रि से पूर्व विग्रह का पंचामृत से अभिषेक करें, फिर शुद्ध जल से स्नान कराएँ।
- पीत वस्त्र, मोरपंख-मुकुट, वंशी तथा आभूषणों से श्रृंगार करें; चंदन व तुलसीदल अर्पित करें।
- षोडशोपचार से पूजन करें — ध्यान, आवाहन, आसन, पाद्य, अर्घ्य, आचमन, स्नान, वस्त्र, यज्ञोपवीत, गंध, आभूषण, पुष्प, अंगपूजा, धूप, दीप तथा नैवेद्य।
- श्रीकृष्ण के साथ देवकी, वसुदेव, नंद, यशोदा, बलदेव तथा देवी लक्ष्मी का भी पूजन करें — व्रत-परंपरा में इन सभी का पूजन विहित है।
- निशीथ काल (हिंदू मध्यरात्रि) में शंख व घंटा बजाकर जन्मोत्सव मनाएँ; बाल गोपाल को झूला झुलाएँ।
- माखन-मिश्री, धनिया पंजीरी, पंचामृत तथा ऋतुफल का भोग लगाएँ — भोग में तुलसीदल अवश्य रखें।
- कृष्ण आरती करें, तत्पश्चात कृष्ण चालीसा व मधुराष्टकम् का पाठ करें।
- रात्रि जागरण करते हुए भजन-कीर्तन करें तथा प्रसाद वितरित करें।
- अगले दिन सूर्योदय पश्चात, अष्टमी तिथि व रोहिणी नक्षत्र की समाप्ति पर, ब्राह्मण-भोजन व दान कराकर पारण करें।
व्रत कथा
कंस को मिली भविष्यवाणी
द्वापर युग में मथुरा नगरी पर उग्रसेन का राज्य था, किंतु वास्तविक सत्ता उनके अत्याचारी पुत्र कंस के हाथ में थी। कंस ने अपने ही पिता को बंदी बनाकर सिंहासन हथिया लिया था और उसके अत्याचार से प्रजा त्राहि-त्राहि कर रही थी।
कंस की बहन देवकी का विवाह यदुवंशी वसुदेव के साथ हुआ। कंस स्वयं अपनी प्रिय बहन का रथ हाँकते हुए उसे विदा करने चला। मार्ग में ही उसे भविष्यवाणी सुनाई दी कि देवकी के गर्भ से उत्पन्न होने वाला आठवाँ पुत्र, जो इस संसार में "कृष्ण" नाम से विख्यात होगा, उसका वध करेगा।
यह सुनते ही कंस क्रोध से भर उठा और उसने वहीं देवकी का वध करना चाहा। वसुदेव ने उसे रोका और वचन दिया कि वे देवकी की प्रत्येक संतान स्वयं लाकर उसे सौंप देंगे। कंस मान गया, किंतु दोनों को कारागार में डाल दिया।
कारागार और छह पुत्रों का वध
वसुदेव ने अपना वचन निभाया। देवकी की जो भी संतान जन्म लेती, वे उसे स्वयं कंस को सौंप देते, और निर्दयी कंस उस नवजात शिशु को पत्थर पर पटककर मार डालता। इस प्रकार उसने देवकी के छह पुत्रों का वध कर दिया।
कारागार की उन अंधेरी कोठरियों में देवकी और वसुदेव वर्षों तक अपने पुत्रों के वियोग में तड़पते रहे। किंतु उनकी भक्ति डिगी नहीं — यही धैर्य आगे चलकर स्वयं भगवान के अवतरण का पात्र बना।
सातवाँ गर्भ — बलराम का अवतरण
सातवें गर्भ में स्वयं शेषनाग पधारे। भगवान की आज्ञा से योगमाया ने उस गर्भ को देवकी के गर्भ से निकालकर वसुदेव की दूसरी पत्नी रोहिणी के गर्भ में स्थानांतरित कर दिया, जो उस समय गोकुल में नंद के यहाँ निवास कर रही थीं।
लोक में यह प्रचारित हुआ कि देवकी का गर्भ नष्ट हो गया। इसी कारण उस बालक का एक नाम "संकर्षण" पड़ा — जो खींचकर लाया गया हो। यही बालक आगे चलकर बलराम कहलाए।
भाद्रपद कृष्ण अष्टमी — अर्धरात्रि में प्राकट्य
अंततः वह क्षण आया। भाद्रपद मास की कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि, रोहिणी नक्षत्र, और ठीक अर्धरात्रि का समय — मथुरा के कारागार में भगवान श्रीकृष्ण प्रकट हुए।
श्रीमद्भागवत के अनुसार वे पहले चतुर्भुज रूप में — शंख, चक्र, गदा व पद्म धारण किए — देवकी और वसुदेव के समक्ष प्रकट हुए। माता-पिता की स्तुति के पश्चात उन्होंने साधारण शिशु का रूप धारण कर लिया।
उसी क्षण सृष्टि में अद्भुत शांति छा गई। कारागार के प्रहरी गहन निद्रा में चले गए, वसुदेव की बेड़ियाँ स्वयं खुल गईं, और कारागार के द्वार अपने आप खुल गए।
यमुना पार — गोकुल की यात्रा
भगवान की प्रेरणा से वसुदेव नवजात शिशु को एक सूप में रखकर कारागार से बाहर निकले और वर्षा की उस काली रात में यमुना की ओर चल पड़े।
यमुना उस रात उफान पर थीं। किंतु जैसे ही वसुदेव ने जल में चरण रखा, यमुना ने भगवान के चरण-स्पर्श की अभिलाषा से बढ़कर मार्ग दे दिया। परंपरा कहती है कि शेषनाग ने अपने फणों का छत्र बनाकर शिशु को वर्षा से बचाया।
वसुदेव गोकुल पहुँचे, जहाँ नंदरानी यशोदा को उसी रात एक कन्या उत्पन्न हुई थी और वे गहरी निद्रा में थीं। वसुदेव ने श्रीकृष्ण को वहाँ सुला दिया और उस कन्या को लेकर लौट आए। कारागार के द्वार पुनः बंद हो गए और बेड़ियाँ यथावत जुड़ गईं।
योगमाया की आकाशवाणी
शिशु के रुदन से जागकर कंस दौड़ा आया और उसने वह कन्या देवकी के हाथों से छीन ली। वह उसे भी पत्थर पर पटकने ही वाला था कि वह कन्या उसके हाथ से छूटकर आकाश में जा पहुँची — वह स्वयं योगमाया थीं।
आकाश में स्थित होकर उन्होंने कंस से कहा कि उसका वध करने वाला जन्म ले चुका है और अन्यत्र सुरक्षित है। यह सुनकर कंस भय से काँप उठा।
तत्पश्चात कंस ने पूतना, तृणावर्त, केशी तथा अरिष्टासुर जैसे अनेक दैत्यों को बालक कृष्ण के वध हेतु भेजा, किंतु सभी उन्हीं के हाथों मारे गए। अंततः श्रीकृष्ण ने मथुरा आकर चाणूर व मुष्टिक को परास्त किया, कंस का वध किया और अपने माता-पिता देवकी-वसुदेव तथा नाना उग्रसेन को कारागार से मुक्त कराया।
व्रत का माहात्म्य
व्रत-परंपरा में स्वयं भगवान श्रीकृष्ण ने युधिष्ठिर को बताया कि कंस-वध के पश्चात जब मथुरावासियों ने उनसे उनके जन्मदिन की जानकारी माँगी, तब उन्होंने भाद्रपद कृष्ण अष्टमी की अर्धरात्रि का वह क्षण बताया। यही तिथि "जन्माष्टमी" के नाम से पहले मथुरा में और फिर समस्त लोकों में प्रसिद्ध हुई।
शास्त्र कहते हैं कि जो व्यक्ति श्रद्धापूर्वक यह व्रत रखता है और इस प्राकट्य कथा का श्रवण अथवा पाठ करता है, वह ऐश्वर्य तथा मुक्ति दोनों प्राप्त करता है — इसी जन्म में आयु, कीर्ति, यश तथा संतान-सुख भोगकर अंत में मोक्ष को प्राप्त होता है।
लाभ
- परंपरा में कहा गया है कि इस एक ही व्रत से सात जन्मों के पाप नष्ट हो जाते हैं।
- संतान-सुख, आरोग्य, धन-धान्य तथा दीर्घायु की प्राप्ति की मान्यता है।
- मान्यता है कि जिस घर में यह व्रत होता है, वहाँ अकाल मृत्यु, गर्भपात, वैधव्य तथा कलह नहीं होते।
- कथा-श्रवण से मन में भक्ति, धैर्य व निर्भयता का संचार होता है — कारागार में भी न डिगने वाली देवकी-वसुदेव की श्रद्धा इसी का पाठ है।
- अंततः वैकुंठ धाम अथवा मोक्ष की प्राप्ति का फल बताया गया है।
कब करें पाठ
भाद्रपद कृष्ण अष्टमी (जन्माष्टमी) को · मध्यरात्रि जन्मोत्सव से पूर्व अथवा पश्चात · रात्रि जागरण के समय
स्रोत
रचयिता: भागवत व भविष्य पुराण परंपरा. श्रीमद्भागवत महापुराण — दशम स्कंध, अध्याय 1–5 (वसुदेव-देवकी विवाह, गर्भ प्रवेश, श्रीकृष्ण प्राकट्य, योगमाया की आकाशवाणी, गोकुल में जन्म महोत्सव) · भविष्य पुराण परंपरा की जन्माष्टमी व्रत कथा — संकल्प वाक्य व सूतिका गृह विधान सहित · drikpanchang.com — कृष्ण जन्माष्टमी पूजा विधि (षोडशोपचार) तथा तिथि-निर्धारण व पारण नियम (स्मार्त व वैष्णव)
