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लिपि:
॥ श्री ॥

कामदा एकादशी

व्रत कथा · श्री विष्णु

पाठ

व्रत कथा

ललित को श्राप

भोगीपुर नगर के राजा पुंडरीक की सभा में ललित नामक गंधर्व गायन करता था। उसकी पत्नी ललिता अत्यंत सुंदर गंधर्वी थी। एक दिन राजा के समक्ष गाते समय ललित का मन पत्नी के ध्यान में खो गया और उसका स्वर बिगड़ गया।

इस पर क्रोधित होकर उसे राक्षस बन जाने का श्राप मिला। ललित विकराल राक्षस-रूप में वन-वन भटकने लगा और उसकी पत्नी ललिता अत्यंत दुखी हुई।

ललिता का व्रत व श्राप-मुक्ति

दुखी ललिता ऋषि शृंगी के आश्रम पहुँची और उपाय पूछा। ऋषि ने उसे चैत्र शुक्ल की कामदा एकादशी का व्रत करने और उसका पुण्य पति को अर्पित करने की सलाह दी।

ललिता ने श्रद्धापूर्वक व्रत किया और द्वादशी को उसका समस्त पुण्य ललित को अर्पित कर दिया। इस पुण्य के प्रभाव से ललित राक्षस-योनि से मुक्त होकर पुनः अपने दिव्य गंधर्व-रूप में आ गया, और अंत में दोनों विष्णुलोक को प्राप्त हुए।

लाभ

  • मनोकामनाओं की पूर्ति
  • ब्रह्महत्या आदि महापापों का नाश
  • श्राप व दोषों से मुक्ति; अंत में विष्णुलोक

स्रोत

वराह पुराण — कामदा एकादशी माहात्म्य · ललित-ललिता व राजा पुंडरीक की कथा (एकादशी माहात्म्य परंपरा)

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