महाशिवरात्रि व्रत कथा
पाठ
व्रत नियम
कौन रखे: कोई भी शिव भक्त स्त्री-पुरुष; अविवाहित कन्याएँ मनवांछित वर हेतु तथा विवाहित स्त्रियाँ पति की दीर्घायु व दांपत्य-सुख हेतु यह व्रत विशेष रूप से रखती हैं।
कब: फाल्गुन कृष्ण चतुर्दशी को; रात्रि जागरण सहित चारों प्रहर पूजन, तथा अगले दिन सूर्योदय पश्चात पारण-मुहूर्त में व्रत खोलें।
आहार नियम: दिनभर निराहार अथवा फलाहार (सामर्थ्यानुसार); कुछ व्रती केवल जल पर रहते हैं; अन्न, चावल व दाल का त्याग; फल, दूध व शिव-प्रसाद ग्रहण किया जा सकता है; प्याज-लहसुन, मांस-मदिरा तथा समस्त तामसिक भोजन पूर्णतः वर्जित; त्रयोदशी की संध्या से ही सात्त्विक आहार व ब्रह्मचर्य का पालन
पूजन सामग्री
शिवलिंग अथवा शिव-पार्वती का चित्र · बेलपत्र (चारों प्रहर हेतु पर्याप्त) · गंगाजल, कच्चा दूध, दही, घी, शहद, शर्करा · धतूरा, आक (मदार) व सफेद पुष्प · भाँग, चंदन, अक्षत, भस्म · घी के दीप, धूप, कर्पूर · बेर, गन्ना व ऋतुफल · रुद्राक्ष माला व आसन (जागरण हेतु)
पूजन विधि
- त्रयोदशी की संध्या से सात्त्विक आहार लें। चतुर्दशी प्रातः ब्रह्ममुहूर्त में स्नान कर स्वच्छ वस्त्र धारण करें और व्रत का संकल्प लें — रात्रि जागरण सहित।
- पूजा-स्थल शुद्ध कर उत्तर-पूर्व दिशा में शिवलिंग अथवा शिव-पार्वती का चित्र स्थापित करें।
- दिनभर निराहार अथवा फलाहार रहकर "ॐ नमः शिवाय" का जप व शिव-नाम का स्मरण करें।
- प्रथम प्रहर (संध्या): शिवलिंग का जल से अभिषेक करें, बेलपत्र व सफेद पुष्प अर्पित करें, दीप जलाएँ।
- द्वितीय प्रहर (रात्रि): कच्चे दूध व दही से अभिषेक करें, बेलपत्र, धतूरा व चंदन अर्पित करें।
- तृतीय प्रहर (निशीथ काल / मध्यरात्रि): घी व शहद से अभिषेक करें — यही सर्वाधिक फलदायी प्रहर है। महामृत्युंजय मंत्र का जप तथा शिव तांडव स्तोत्र व लिंगाष्टकम का पाठ करें।
- चतुर्थ प्रहर (उषाकाल): गंगाजल से अभिषेक कर बेर, गन्ना व ऋतुफल अर्पित करें और महाशिवरात्रि व्रत कथा का पाठ करें।
- चारों प्रहर के बीच रात्रि भर जागरण करते हुए भजन-कीर्तन व जप करें — निद्रा से बचें।
- प्रातः आरती कर प्रसाद वितरित करें और अगले दिन सूर्योदय पश्चात पारण-मुहूर्त में व्रत खोलें।
व्रत कथा
महाशिवरात्रि का माहात्म्य
शिव पुराण तथा ईशान संहिता की परंपरा में कहा गया है कि फाल्गुन मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी की रात्रि भगवान शिव को अत्यंत प्रिय है। इसे "शिव की महारात्रि" — महाशिवरात्रि कहा जाता है।
मान्यता है कि इसी रात्रि भगवान सदाशिव अपने अनादि-अनंत ज्योतिर्लिंग स्वरूप में प्रकट हुए थे — इस घटना को "लिंगोद्भव" कहा जाता है, और यहीं से शिवलिंग की उपासना की परंपरा आरंभ हुई।
परंपरा में यह भी कहा जाता है कि इसी रात्रि भगवान शिव व माता पार्वती का विवाह संपन्न हुआ, तथा इसी रात्रि शिव ने अपना तांडव नृत्य किया। इसीलिए यह रात्रि शिव-शक्ति के मिलन तथा आध्यात्मिक जागरण की रात्रि मानी जाती है।
शास्त्रों में वर्णित है कि इस रात्रि जो भक्त जागकर चारों प्रहर शिव का पूजन करता है, वह जन्म-जन्मांतर के पापों से मुक्त होकर शिवलोक को प्राप्त होता है। इसी विषय में एक शिकारी की अत्यंत प्रसिद्ध कथा है — जो दर्शाती है कि अनजाने में हुआ शिव-पूजन भी निष्फल नहीं जाता।
निर्दय शिकारी चित्रभानु
प्राचीन काल में चित्रभानु नाम का एक शिकारी रहता था। वन में पशु-पक्षियों का वध करके ही वह अपने परिवार का भरण-पोषण करता था। हिंसा उसका नित्य कर्म थी और उसके हृदय में किसी प्राणी के लिए करुणा का भाव न था।
उसने एक साहूकार से ऋण लिया था, जिसे वह नियत समय पर चुका न सका। साहूकार ने बार-बार तकाज़ा किया, किंतु शिकारी के पास देने को कुछ न था।
क्रुद्ध होकर साहूकार ने उसे पकड़वाकर एक शिव मंदिर के परिसर में बंदी बना लिया। संयोग से वह दिन शिवरात्रि का था।
बंदी अवस्था में दिनभर शिकारी ने मंदिर में होते शिव-कीर्तन, शिवरात्रि की कथा व पूजन के मंत्र सुने। उसे इनका अर्थ तो पूरी तरह समझ न आया, किंतु ये शब्द उसके कानों में पड़ते रहे।
संध्या को साहूकार ने उसे बुलाकर ऋण-चुकाने की बात की। शिकारी ने वचन दिया — "कल प्रातः ही मैं आपका सारा ऋण चुका दूँगा।" साहूकार ने विश्वास कर उसे छोड़ दिया।
बेल-वृक्ष पर अनजाने में हुआ पूजन
मुक्त होकर शिकारी शिकार की खोज में वन की ओर निकल पड़ा। दिनभर बंदी रहने के कारण वह भूखा-प्यासा था और उसे कुछ भी शिकार न मिला। सूर्य ढल गया और घना अंधकार छा गया।
रात्रि में शिकार की प्रतीक्षा हेतु उसने एक जलाशय के किनारे खड़े विशाल बेल-वृक्ष को चुना और उस पर चढ़ गया। उसे तनिक भी ज्ञान न था कि उस बेल-वृक्ष के नीचे एक शिवलिंग विराजमान है।
वृक्ष पर बैठने के लिए मचान बनाते समय उसने जो टहनियाँ व पत्ते तोड़े, वे संयोगवश नीचे उसी शिवलिंग पर गिरते चले गए। इस प्रकार अनजाने में ही शिवलिंग पर बेलपत्र चढ़ गए।
और दिनभर भूखा-प्यासा रहने से उसका उपवास भी हो गया; शिकार की प्रतीक्षा में रातभर जागते रहने से जागरण भी हो गया। इस प्रकार शिवरात्रि व्रत के तीनों अंग — उपवास, बेलपत्र-अर्पण तथा रात्रि जागरण — उससे बिना जाने ही पूर्ण होते चले गए।
प्रथम प्रहर — गर्भिणी मृगी
रात्रि के प्रथम प्रहर में एक गर्भिणी मृगी जल पीने के लिए उस जलाशय पर आई। शिकारी ने तत्काल धनुष पर बाण चढ़ाया और निशाना साधा। बाण चढ़ाते समय भी कुछ बेलपत्र नीचे शिवलिंग पर गिरे।
मृगी ने शिकारी को देख लिया और भयभीत होकर बोली — "हे शिकारी! ठहरो। मैं गर्भवती हूँ; मेरे उदर में शिशु है। मुझे मारोगे तो एक के स्थान पर दो हत्याएँ होंगी — यह महापाप है।"
"मुझे इतना समय दो कि मैं अपने शिशु को जन्म दे दूँ। तत्पश्चात मैं स्वयं तुम्हारे पास लौट आऊँगी — यह मेरा वचन है।"
उसकी करुण प्रार्थना सुनकर शिकारी के कठोर हृदय में पहली बार कुछ पिघला। उसने प्रत्यंचा ढीली कर दी और उसे जाने दिया। धनुष ढीला करते समय पुनः कुछ बेलपत्र नीचे शिवलिंग पर गिर पड़े — और इस प्रकार प्रथम प्रहर का पूजन अनजाने में पूर्ण हो गया।
द्वितीय व तृतीय प्रहर — दो और मृगियाँ
कुछ समय पश्चात, द्वितीय प्रहर में एक अन्य मृगी वहाँ आई। यह विरहिणी थी — अपने प्रिय की खोज में भटक रही थी। शिकारी ने फिर धनुष उठाया और बेलपत्र फिर शिवलिंग पर गिरे।
मृगी ने विनती की — "हे शिकारी! मैं अपने पति से बिछुड़ गई हूँ और उसे खोज रही हूँ। मुझे इतनी छूट दो कि मैं उससे मिल लूँ; फिर मैं अवश्य लौट आऊँगी।" शिकारी ने उसे भी जाने दिया — और द्वितीय प्रहर का पूजन भी पूर्ण हो गया।
तृतीय प्रहर में एक तीसरी मृगी आई, जिसके साथ उसके छोटे बच्चे थे। शिकारी ने पुनः निशाना साधा और बेलपत्र पुनः शिवलिंग पर गिरे।
वह मृगी बोली — "हे शिकारी! तुम मुझे मार सकते हो, किंतु पहले मुझे इतना समय दो कि मैं इन बच्चों को उनके पिता तक पहुँचा दूँ। इन्हें अनाथ छोड़कर मैं मर नहीं सकती। मैं इन्हें सौंपकर स्वयं लौट आऊँगी।"
शिकारी ने कहा — "पहले भी दो मृगियाँ यही कहकर गईं और लौटी नहीं। मैं तुम्हारा विश्वास कैसे करूँ?"
मृगी ने उत्तर दिया — "जैसे तुम्हें अपने बच्चों की ममता सता रही है और तुम उनके लिए ही शिकार कर रहे हो, ठीक वैसे ही मुझे भी इनकी फिक्र है। एक माता का हृदय दूसरी माता का हृदय पहचान लेता है।"
यह उत्तर शिकारी के हृदय में सीधे उतर गया। उसने उसे भी जाने दिया — और तृतीय प्रहर का पूजन भी पूर्ण हो गया।
चतुर्थ प्रहर — मृग का आना और हृदय-परिवर्तन
रात्रि के चतुर्थ प्रहर में एक हृष्ट-पुष्ट नर मृग वहाँ आया। शिकारी ने प्रसन्न होकर धनुष उठाया — बेलपत्र पुनः शिवलिंग पर गिरे।
मृग ने शांत भाव से पूछा — "हे शिकारी! यदि तुमने इससे पूर्व तीन मृगियों का वध किया है, तो मुझे भी मार दो; क्योंकि वे तीनों मेरी ही पत्नियाँ थीं। उनके बिना मेरा जीवन निरर्थक है।"
शिकारी ने बताया कि उसने किसी का वध नहीं किया — तीनों वचन देकर गई हैं। मृग बोला — "तो मुझे भी जाने दो। मैं अपने परिवार सहित लौट आऊँगा। यदि हम सब मारे जाएँ तो हमारा धर्म पूरा नहीं होगा — और यदि वचन तोड़ें तो वह भी अधर्म होगा। मैं वचन देता हूँ, हम सब आएँगे।"
शिकारी ने उसे भी जाने दिया — और चतुर्थ प्रहर का पूजन भी अनजाने में पूर्ण हो गया।
कुछ ही समय पश्चात वह मृग अपनी तीनों मृगियों तथा बच्चों सहित लौट आया और शिकारी के सम्मुख खड़ा हो गया — सब वचन निभाने आए थे, अपनी मृत्यु स्वीकार करने के लिए।
इन मूक पशुओं की सत्यनिष्ठा, पारस्परिक प्रेम व वचन-पालन देखकर शिकारी का हृदय द्रवित हो उठा। उसे अपने जीवन भर की हिंसा पर गहरा पश्चात्ताप हुआ। उसने धनुष-बाण फेंक दिए और फूट-फूटकर रोने लगा — "धिक्कार है मुझे! ये पशु मुझसे कहीं अधिक धर्मनिष्ठ हैं।"
भगवान शिव की कृपा
दिनभर के उपवास, रातभर के जागरण, चारों प्रहर शिवलिंग पर गिरे बेलपत्रों तथा अंत में उस करुणा व पश्चात्ताप ने शिकारी के हिंसक हृदय को पूर्णतः निर्मल कर दिया।
देवलोक से यह सारी घटना देख रहे भगवान शंकर अत्यंत प्रसन्न हुए। वे उसके सम्मुख प्रकट हुए और उसे अपने दिव्य स्वरूप का दर्शन कराया।
शिकारी उनके चरणों में गिर पड़ा। भगवान शिव ने उसे सुख-समृद्धि का वरदान दिया और कहा — "तूने अनजाने में ही मेरा व्रत, पूजन व जागरण पूर्ण किया, और अंत में करुणा को अपनाया। आज से तेरा जीवन पवित्र हुआ।"
उस मृग-परिवार को भी शिव-कृपा प्राप्त हुई और उन्हें सद्गति मिली। शिकारी ने शेष जीवन हिंसा त्यागकर शिव-भक्ति व सेवा में व्यतीत किया और अंत में शिवलोक को प्राप्त हुआ।
कथा का सार यह है कि महाशिवरात्रि का व्रत, बेलपत्र-अर्पण व रात्रि जागरण इतने प्रभावशाली हैं कि अनजाने में किए जाने पर भी वे एक निर्दय शिकारी को पशु-प्रवृत्ति से उबारकर शिव-कृपा का पात्र बना देते हैं। तो जो भक्त इसे जानकर, श्रद्धा व विधिपूर्वक करे — उसके फल का वर्णन ही क्या!
लाभ
- जन्म-जन्मांतर के पापों का नाश
- अकाल-मृत्यु से रक्षा, आरोग्य व दीर्घायु
- अविवाहित कन्याओं को मनवांछित वर; दांपत्य-सुख व पति की दीर्घायु
- भय, शत्रु-बाधा व ग्रह-दोषों का शमन
- हिंसक व तामसिक वृत्तियों का शमन और हृदय की निर्मलता
- शिव की साक्षात् कृपा; अंत में शिवलोक की प्राप्ति
स्रोत
रचयिता: शिव पुराण परंपरा. शिव पुराण / ईशान संहिता परंपरा — महाशिवरात्रि माहात्म्य (लिंगोद्भव व शिव-पार्वती विवाह) · शिकारी चित्रभानु, बेल-वृक्ष व चारों प्रहर के मृग-प्रसंग की व्रत कथा · नोट: शिकारी का नाम स्रोतों में भिन्न मिलता है — कहीं चित्रभानु, कहीं गुरुद्रुह अथवा गुह; यहाँ सर्वाधिक प्रचलित "चित्रभानु" रखा गया है
