वापस
लिपि:
॥ श्री ॥
मोहिनी एकादशी
व्रत कथा · श्री विष्णु
पाठ
व्रत कथा
धृष्टबुद्धि का पतन
भद्रावती नगर में धनपाल नामक धनी वैश्य रहता था, जो दानशील व विष्णुभक्त था। उसका बड़ा पुत्र धृष्टबुद्धि दुर्व्यसनों में पड़ गया — जुआ, मद्यपान व कुसंगति में उसने पिता का धन नष्ट कर दिया।
परिवार द्वारा त्याग दिए जाने पर वह दरिद्र होकर चोरी करने लगा और अंततः वन में व्याध (बहेलिया) बनकर जीवन बिताने लगा।
ऋषि कौण्डिन्य व व्रत से उद्धार
भोजन की खोज में भटकते हुए वह महर्षि कौण्डिन्य के आश्रम पहुँचा। संयोगवश ऋषि के भीगे वस्त्र का स्पर्श उसे हो गया, जिससे उसके मन में सद्बुद्धि जागी और उसने ऋषि से उद्धार का उपाय पूछा।
ऋषि ने उसे वैशाख शुक्ल की मोहिनी एकादशी का व्रत करने की प्रेरणा दी। व्रत के प्रभाव से धृष्टबुद्धि के समस्त पाप नष्ट हो गए और वह मोह-बंधन से मुक्त होकर अंत में विष्णुलोक को प्राप्त हुआ।
लाभ
- मोह-माया व दुर्व्यसनों के बंधन से मुक्ति
- समस्त पापों व दुखों का नाश
- कथा-श्रवण से सहस्र गोदान तुल्य पुण्य; अंत में विष्णुलोक
स्रोत
मोहिनी एकादशी माहात्म्य — धनपाल-पुत्र व ऋषि कौण्डिन्य प्रसंग · एकादशी माहात्म्य परंपरा
