नारायण कवच
पाठ
ॐ हरिर्विदध्यान्मम सर्वरक्षां न्यस्ताङ्घ्रिपद्मः पतगेन्द्र पृष्ठे। दरारिचर्मासिगदेषुचापपाशान्दधानोऽष्टगुणोऽष्टबाहुः॥
जलेषु मां रक्षतु मत्स्यमूर्तिर्यादोगणेभ्यो वरुणस्य पाशात्। स्थलेषु मायावटुवामनोऽव्यात्त्रिविक्रमः खेऽवतु विश्वरूपः॥
दुर्गेष्वटव्याजिमुखादिषु प्रभुः पायान्नृसिंहोऽसुरयूथपारिः। विमुञ्चतो यस्य महाट्टहासं दिशो विनेदुर्न्यपतंश्च गर्भाः॥
रक्षत्वसौ माध्वनि यज्ञकल्पः स्वदंष्ट्रयोन्नीतधरो वराहः। रामोऽद्रिकूटेष्वथ विप्रवासे सलक्ष्मणोऽव्याद्भरताग्रजोऽस्मान्॥
मामुग्रधर्मादखिलात्प्रमादान्नारायणः पातु नरश्च हासात्। दत्तस्त्वयोगादथ योगनाथः पायाद्गुणेशः कपिलः कर्मबन्धात्॥
सनत्कुमारोऽवतु कामदेवाद्धयाननो मां पथि देवहेलनात्। देवर्षिवर्यः पुरुषार्चनान्तरात्कूर्मो हरिर्मां निरयादशेषात्॥
धन्वन्तरिर्भगवान्पात्वपथ्याद्द्वन्द्वाद्भयादृषभो निर्जितात्मा। यज्ञश्च लोकादवताज्जनान्ताद्बलो गणात्क्रोधवशादहीन्द्रः॥
द्वैपायनो भगवानप्रबोधाद्बुद्धस्तु पाषण्डगणात्प्रमादात्। कल्किः कलेः कालमलात्प्रपातु धर्मावनायोरुकृतावतारः॥
मां केशवो गदया प्रातरव्याद्गोविन्द आसङ्गवमात्तवेणुः। नारायणः प्राह्ण उदात्तशक्तिर्मध्यन्दिने विष्णुररीन्द्रपाणिः॥
देवोऽपराह्णे मधुहोग्रधन्वा सायं त्रिधामावतु माधवो माम्। दोषे हृषीकेश उतार्धरात्रे निशीथ एकोऽवतु पद्मनाभः॥
श्रीवत्सधामारात्र ईशः प्रत्युष ईशोऽसिधरो जनार्दनः। दामोदरोऽव्यादनुसन्ध्यं प्रभाते विश्वेश्वरो भगवान्कालमूर्तिः॥
चक्रं युगान्तानलतिग्मनेमि भ्रमत्समन्ताद्भगवत्प्रयुक्तम्। दन्दग्धि दन्दग्ध्यरिसैन्यमाशु कक्षं यथा वातसखो हुताशः॥
गदेऽशनिस्पर्शनविस्फुलिङ्गे निष्पिण्ढि निष्पिण्ढ्यजितप्रियासि। कूष्माण्डवैनायकयक्षरक्षो भूतग्रहांश्चूर्णय चूर्णयारीन्॥
त्वं यातुधानप्रमथप्रेतमातृपिशाचविप्रग्रहघोरदृष्टीन्। दरेन्द्र विद्रावय कृष्णपूरितो भीमस्वनोऽरेर्हृदयानि कम्पयन्॥
त्वं तिग्मधारासिवरारिसैन्यमीशप्रयुक्तो मम छिन्धि छिन्धि। चक्षूंषि चर्मन् शतचन्द्र छादय द्विषामघोनां हर पापचक्षुषाम्॥
यन्नो भयं ग्रहेभ्योऽभूत्केतुभ्यो नृभ्य एव च। सरीसृपेभ्यो दंष्ट्रिभ्यो भूतेभ्योऽघेभ्य एव च॥
सर्वाण्येतानि भगवन्नामरूपास्त्रकीर्तनात्। प्रयान्तु सङ्क्षयं सद्यो ये नः श्रेयःप्रतीपकाः॥
गरुडो भगवान् स्तोत्रस्तोमश्छन्दोमयः प्रभुः। रक्षत्वशेषकृच्छ्रेभ्यो विष्वक्सेनः स्वनामभिः॥
सर्वापद्भ्यो हरेर्नामरूपयानायुधानि नः। बुद्धीन्द्रियमनःप्राणान्पान्तु पार्षदभूषणाः॥
यथा हि भगवानेव वस्तुतः सदसच्च यत्। सत्येनानेन नः सर्वे यान्तु नाशमुपद्रवाः॥
यथैकात्म्यानुभावानां विकल्परहितः स्वयम्। भूषणायुधलिङ्गाख्या धत्ते शक्तीः स्वमायया॥
तेनैव सत्यमानेन सर्वज्ञो भगवान् हरिः। पातु सर्वैः स्वरूपैर्नः सदा सर्वत्र सर्वगः॥
विदिक्षु दिक्षूर्ध्वमधः समन्तादन्तर्बहिर्भगवान्नारसिंहः। प्रहापयँल्लोकभयं स्वनेन स्वतेजसा ग्रस्तसमस्ततेजाः॥
मघवन्निदमाख्यातं वर्म नारायणात्मकम्। विजेष्यस्यञ्जसा येन दंशितोऽसुरयूथपान्॥
एतद्धारयमाणस्तु यं यं पश्यति चक्षुषा। पदा वा संस्पृशेत्सद्यः साध्वसात्स विमुच्यते॥
न कुतश्चिद्भयं तस्य विद्यां धारयतो भवेत्। राजदस्युग्रहादिभ्यो व्याध्यादिभ्यश्च कर्हिचित्॥
अर्थ (हिन्दी)
- गरुड़ की पीठ पर चरण-कमल रखे, आठों सिद्धियों से युक्त, आठ भुजाओं में शंख, चक्र, ढाल, तलवार, गदा, बाण, धनुष और पाश धारण किए श्रीहरि हर प्रकार से मेरी रक्षा करें।
- मत्स्य-रूप भगवान जल में जलजंतुओं से और वरुण के पाश से मेरी रक्षा करें; माया से ब्रह्मचारी बने वामन भगवान स्थल पर, और विश्वरूप त्रिविक्रम आकाश में मेरी रक्षा करें।
- जिनके भयंकर अट्टहास से दिशाएँ गूँज उठीं और (दैत्य-पत्नियों के) गर्भ गिर गए, असुर-सेना के शत्रु वे नृसिंह भगवान किलों, जंगलों, रणभूमि और ऐसे विकट स्थानों में मेरी रक्षा करें।
- अपनी दाढ़ पर पृथ्वी उठाने वाले यज्ञ-रूप वराह भगवान मार्ग में; (परशु)राम पर्वत-शिखरों पर; और लक्ष्मण सहित भरत के बड़े भाई श्रीराम परदेस में हमारी रक्षा करें।
- नारायण मुझे उग्र (अभिचार) कर्मों और हर प्रकार की असावधानी से बचाएँ; नर अहंकार से; योगनाथ दत्तात्रेय योग के विघ्नों से; और गुणों के स्वामी कपिल कर्म-बंधन से मेरी रक्षा करें।
- सनत्कुमार काम से; हयग्रीव मार्ग में देवताओं का अनादर होने (के दोष) से; देवर्षि नारद पूजा में होने वाली चूक से; और कूर्म-रूप हरि सब प्रकार के नरकों से मेरी रक्षा करें।
- भगवान धन्वंतरि अपथ्य (गलत खान-पान) से; जितेंद्रिय ऋषभदेव सुख-दुख जैसे द्वंद्वों के भय से; यज्ञ भगवान लोक-निंदा से; बलराम मनुष्यों से होने वाले कष्ट से; और शेषनाग क्रोधी सर्पों से मेरी रक्षा करें।
- भगवान वेदव्यास अज्ञान से; बुद्ध पाखंडियों और असावधानी से; और धर्म की रक्षा के लिए अवतार लेने वाले कल्कि कलियुग के मैल से मेरी रक्षा करें।
- प्रातःकाल गदाधारी केशव, थोड़ा दिन चढ़ने पर बाँसुरी लिए गोविंद, दोपहर से पहले तीक्ष्ण शक्ति लिए नारायण, और दोपहर में चक्रधारी विष्णु मेरी रक्षा करें।
- तीसरे पहर प्रचंड धनुष वाले मधुसूदन, संध्या को त्रिधामा माधव, रात के पहले पहर में हृषीकेश, और आधी रात तथा उसके बाद अकेले पद्मनाभ मेरी रक्षा करें।
- रात के पिछले पहर में श्रीवत्स-धारी ईश्वर, भोर में तलवार-धारी जनार्दन, सूर्योदय के समय दामोदर, और सब संध्याओं में काल-रूप विश्वेश्वर मेरी रक्षा करें।
- प्रलय की आग जैसी तीखी धार वाला, भगवान का चलाया हुआ, चारों ओर घूमता सुदर्शन चक्र शत्रु-सेना को वैसे ही जल्दी जला डाले, जैसे हवा के साथ आग सूखी घास को।
- हे अजित की प्रिय गदा! तुम्हारी चिनगारियाँ वज्र-सी चोट करती हैं; कूष्मांड, विनायक, यक्ष, राक्षस, भूत और ग्रहों को कुचल डालो, (मेरे) शत्रुओं को चूर-चूर कर दो।
- हे श्रेष्ठ शंख! श्रीकृष्ण के फूँकने से भयंकर गर्जना करते हुए शत्रुओं के हृदय कँपा दो, और यातुधान, प्रमथ, प्रेत, मातृका, पिशाच, ब्रह्मराक्षस जैसे भयानक दृष्टि वालों को भगा दो।
- हे तीखी धार वाली श्रेष्ठ तलवार! भगवान की प्रेरणा से मेरे शत्रुओं की सेना को काट डालो। हे सौ चंद्र-चिह्नों वाली ढाल! पापी शत्रुओं की आँखें ढक दो।
- ग्रहों से, केतुओं से, (दुष्ट) मनुष्यों से, साँपों से, दाढ़ वाले हिंसक पशुओं से, भूतों से और पापों से हमें जो भी भय हुआ हो —
- और जो हमारे कल्याण में बाधक हैं — वे सब भगवान के नाम, रूप और आयुधों के कीर्तन से तुरंत नष्ट हो जाएँ।
- वेद-मंत्रों से जिनकी स्तुति होती है, वे वेद-रूप भगवान गरुड़ और विष्वक्सेन अपने नामों के प्रभाव से हमें सब संकटों से बचाएँ।
- श्रीहरि के नाम, रूप, वाहन, आयुध और श्रेष्ठ पार्षद हमारी बुद्धि, इंद्रियों, मन और प्राणों की सब आपत्तियों से रक्षा करें।
- जैसे सचमुच जो कुछ भी कार्य-कारण (सत्-असत्) है, वह सब भगवान ही हैं — इस सत्य के बल से हमारे सब उपद्रव नष्ट हो जाएँ।
- एकता का अनुभव करने वालों के लिए भगवान भेद-रहित हैं, फिर भी अपनी माया से भूषण, आयुध और रूप नाम की शक्तियाँ धारण करते हैं —
- उसी सत्य के प्रमाण से सर्वज्ञ, सर्वव्यापी भगवान हरि अपने सब रूपों से सदा, सब जगह हमारी रक्षा करें।
- अपनी गर्जना से संसार का भय मिटाने वाले और अपने तेज से सब तेजों को ढक लेने वाले भगवान नृसिंह दिशाओं-विदिशाओं में, ऊपर-नीचे, भीतर-बाहर — हर ओर से (हमारी रक्षा करें)।
- (विश्वरूप इंद्र से कहते हैं —) हे मघवन् (इंद्र), मैंने तुम्हें यह नारायण-रूप कवच बता दिया; इससे सुरक्षित होकर तुम असुर-सेनापतियों को सहज ही जीत लोगे।
- इस (कवच) को धारण करने वाला जिसे भी आँख से देख ले या पैर से छू दे, वह तुरंत भय से छूट जाता है।
- इस विद्या को धारण करने वाले को कहीं से भी — राजा, डाकू, ग्रहों या रोग आदि से — कभी भय नहीं होता।
लाभ
- भय से मुक्ति — "न कुतश्चिद्भयं तस्य विद्यां धारयतो भवेत्" (श्लोक 26)।
- संकट और उपद्रवों का नाश — भगवान के नाम, रूप और आयुधों के कीर्तन से (श्लोक 16–17)।
- हर दिशा और हर समय की रक्षा का भाव — अवतारों और पहरों के नामों से (श्लोक 2–11)।
कब करें पाठ
गुरुवार व एकादशी को · प्रातः स्नान के बाद · यात्रा या संकट से पूर्व
स्रोत
रचयिता: विश्वरूप ऋषि (श्रीमद्भागवत). श्रीमद्भागवत 6.8.12–37 · vignanam.org — नारायण कवचम् (आधार-पाठ) · hindunidhi.com — श्री नारायण कवच अर्थ सहित · srikubereshwardham.com — नारायण कवच अर्थ सहित
