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॥ श्री ॥

श्री राधिका अष्टोत्तर-शत-नाम स्तोत्र

नामावली · श्री राधा

पाठ

अवीक्ष्यात्मेश्वरीं काचिद् वृन्दावन-महेश्वरीम्। तत्-पदाम्भोज-मात्रैक-गतिर् दास्य् अति-कातरा॥ पतिता तत्-सरस्-तीरे रुदत्य् आर्त-रवाकुलम्। तच्-छ्री-वक्त्रेक्षणावाप्त्यै नामान्य् एतानि संजगौ॥

1

राधा गान्धर्विका गोष्ठ-युव-राजैक-कामिता। गान्धर्वा राधिका चन्द्र-कान्तिर् माधव-सङ्गिनी॥

2

दामोदराद्वैत-सखी कार्त्तिकोत्कीर्तिदेश्वरी। मुकुन्द-दयिता-वृन्द-धम्मिल्ल-मणि-मञ्जरी॥

3

भास्करोपासिका वार्ष-भानवी वृषभानुजा। अनङ्ग-मञ्जरी-ज्येष्ठा श्रीदामा-वरजोत्तमा॥

4

कीर्तिदा-कन्यका मातृ-स्नेह-पीयूष-पुत्रिका। विशाखा-सवयः प्रेष्ठ-विशाखा-जीविताधिका॥

5

प्राणाद्वितीय-ललिता वृन्दावन-विहारिणी। ललिता-प्राण-लक्षैक-रक्षा वृन्दावनेश्वरी॥

6

व्रजेन्द्र-गृहिणी-कृष्ण-प्राय-स्नेह-निकेतनम्। व्रज-गो-गोप-गोपाली-जीव-मात्रैक-जीवनम्॥

7

स्नेहलाभीर-राजेन्द्र-वत्सलाच्युत-पूर्वजा। गोविन्द-प्रणयाधार-सुरभि-सेवनोत्सुका॥

8

धृत-नन्दीश्वर-क्षेम-गमनोत्कण्ठि-मानसा। स्व-देहाद्वैतता-दृष्टि-धनिष्ठा-ध्येय-दर्शना॥

9

गोपेन्द्र-महिषी-पाक-शाल-वेदि-प्रकाशिका। आयुर्-वर्धक-राद्धान्ना रोहिणी-घ्रात-मस्तका॥

10

सुबल-न्यस्त-सारूप्या सुबल-प्रीति-तोषिता। मुखरा-दृक्-सुधा-नप्त्री जटिला-दृष्टि-भीषिता॥

11

मधुमङ्गल-नर्मोक्ति-जनित-स्मित-चन्द्रिका। पौर्णमासी-बहिः-खेलत्-प्राण-पञ्जर-शारिका॥

12

स्व-गणाद्वैत-जीवातुः स्वीयाहङ्कार-वर्धिनी। स्व-गणोपेन्द्र-पादाब्ज-स्पर्श-लम्भन-हर्षिणी॥

13

स्वीय-वृन्दावनोद्यान-पालिकी-कृत-वृन्दका। ज्ञात-वृन्दाटवी-सर्व-लता-तरु-मृग-द्विजा॥

14

ईषच्-चन्दन-सङ्घृष्ट-नव-काश्मीर-देह-भाः। जवा-पुष्प-प्रभा-हारि-पट्ट-चीनारुणाम्बरा॥

15

चरणाब्ज-तल-ज्योतिर्-अरुणी-कृत-भू-तला। हरि-चित्त-चमत्कारी चारु-नूपुर-निःस्वना॥

16

कृष्ण-श्रान्ति-हर-श्रोणी-पीठ-वल्गित-घण्टिका। कृष्ण-सर्वस्व-पीनोद्यत्-कुचाञ्चन्-मणि-मालिका॥

17

नाना-रत्नोल्लसच्-छङ्ख-चूडा-चारु-भुज-द्वया। स्यमन्तक-मणि-भ्राजन्-मणि-बन्धाति-बन्धुरा॥

18

सुवर्ण-दर्पण-ज्योतिर्-उल्लङ्घि-मुख-मण्डला। पक्व-दाडिम-बीजाभ-दन्ताकृष्टाघभिच्-छुका॥

19

अब्ज-रागादि-सृष्टाब्ज-कलिका-कर्ण-भूषणा। सौभाग्य-कज्जलाङ्काक्त-नेत्र-निन्दित-खञ्जना॥

20

सु-वृत्त-मौक्तिक-मुक्ता-नासिका-तिल-पुष्पिका। सु-चारु-नव-कस्तूरी-तिलकाञ्चित-भालका॥

21

दिव्य-वेणी-विनिर्धूत-केकि-पिञ्छा-वर-स्तुतिः। नेत्रान्त-शर-विध्वंसि-कृत-चाणूरजिद्-धरिः॥

22

स्फुरत्-कैशोर-तारुण्य-सन्धि-बन्धुर-विग्रहा। माधवोल्लासकोन्मत्ता पिकोरु-मधुर-स्वरा॥

23

प्राणायुत-शत-प्रेष्ठ-माधवोत्कीर्ति-लम्पटा। कृष्णापाङ्ग-तरङ्गोद्यत्-स्मित-पीयूष-बुद्बुदा॥

24

पुञ्जी-भूत-जगल्-लज्जा-वैदग्धी-दिग्ध-विग्रहा। करुण-विद्रवद्-देहा मूर्तिमन्-माधुरी-घटा॥

25

जगद्-गुणवती-वर्ग-गीयमान-गुणोच्चया। शच्य्-आदि-सुभग-वृन्द-वन्द्यमानोरु-सौभगा॥

26

वीणा-वादन-सङ्गीत-रास-लास्य-विशारदा। नारद-प्रमुखोद्गीत-जगद्-आनन्द-सद्-यशः॥

27

गोवर्धन-गुहा-गेह-गृहिणी कुञ्ज-मण्डना। चण्डांशु-नन्दिनी-बद्ध-भागिनी-भाव-विभ्रमा॥

28

दिव्य-कुन्दलता-नर्म-सख्य-दाम-विभूषिता। गोवर्धन-धराह्लादि-शृङ्गार-रस-पण्डिता॥

29

गिरीन्द्रधर-वक्षः-श्री-शङ्खचूडारि-जीवनम्। गोकुलेन्द्रसुत-प्रेम-काम-भूपेन्द्र-पट्टनम्॥

30

वृष-विध्वंस-नर्मोक्ति-स्व-निर्मित-सरोवरा। निज-कुण्ड-जल-क्रीडा-जित-सङ्कर्षणानुजा॥

31

मुरमर्दन-मत्तेभ-विहारामृत-दीर्घिका। गिरीन्द्रधर-पारीन्द्र-रति-युद्धोरु-सिंहिका॥

32

स्व-तनु-सौरभोन्मत्ती-कृत-मोहन-माधवा। दोर्-मूलोच्चलन-क्रीडा-व्याकुली-कृत-केशवा॥

33

निज-कुण्ड-तटी-कुञ्ज-क्लृप्त-केलि-कलोद्यमा। दिव्य-मल्लि-कुलोल्लासि-शय्या-कल्पित-विग्रहा॥

34

कृष्ण-वाम-भुजान्यस्त-चारु-दक्षिण-गण्डका। सव्य-बाहु-लता-बद्ध-कृष्ण-दक्षिण-सद्-भुजा॥

35

कृष्ण-दक्षिण-चारूरु-श्लिष्ट-वामोरु-रम्भिका। गिरीन्द्रधर-धृग्-वक्षो-मर्दि-सु-स्तन-पर्वता॥

36

गोविन्दाधर-पीयूष-वासिताधर-पल्लवा। सुधा-सञ्चय-चारूक्ति-शीतली-कृत-माधवा॥

37

गोविन्दोद्गीर्ण-ताम्बूल-राग-राज्यत्-कपोलिका। कृष्ण-सम्भोग-सफली-कृत-मन्मथ-सम्भवा॥

38

गोविन्द-मार्जितोद्दाम-रति-प्रस्विन्न-सन्-मुखा। विशाखा-वीजित-क्रीडा-श्रान्ति-निद्रालु-विग्रहा॥

39

गोविन्द-चरण-न्यस्त-काय-मानस-जीवना। स्व-प्राणार्बुद-निर्मञ्छ्य-हरि-पाद-रजः-कणा॥

40

अणु-मात्राच्युतादर्श-शप्यमानात्म-लोचना। नित्य-नूतन-गोविन्द-वक्त्र-शुभ्रांशु-दर्शना॥

41

निःसीम-हरि-माधुर्य-सौन्दर्याद्य्-एक-भोगिनी। सापत्न्य-धाम-मुरली-मात्रा-भाग्य-कटाक्षिणी॥

42

गाढ-बुद्धि-बल-क्रीडा-जित-वंशी-विकर्षिणी। नर्मोक्ति-चन्द्रिकोत्फुल्ल-कृष्ण-कामाब्धि-वर्धिनी॥

43

व्रज-चन्द्रेन्द्रिय-ग्राम-विश्राम-विधु-शालिका। कृष्ण-सर्वेन्द्रियोन्मादि-राधेत्य्-अक्षर-युग्मका॥

इदं श्री-राधिका-नाम्नाम् अष्टोत्तर-शतोज्ज्वलम्। श्री-राधा-लम्भकं नाम स्तोत्रं चारु रसायनम्॥ योऽधीते परम-प्रीत्या दीनः कातर-मानसः। स नाथम् अचिरेणैव स-नाथम् ईक्षते ध्रुवम्॥

अर्थ (हिन्दी)

  1. कोई दासी अपनी स्वामिनी, वृंदावन की महेश्वरी को न पाकर अत्यंत व्याकुल हो गई। जिनके चरण-कमल ही उसका एकमात्र सहारा हैं, उन्हें न देख पाने पर वह राधाकुंड के तट पर गिर पड़ी और आर्त स्वर में रोने लगी। उनके श्रीमुख के दर्शन फिर से पाने के लिए उसने ये नाम गाए। — यही इस स्तोत्र की भूमिका है।
  2. 1. राधा। 2. गान्धर्विका — गान-नृत्य में निपुण। 3. गोष्ठ-युवराजैक-कामिता — ब्रज के युवराज (कृष्ण) की एकमात्र अभिलषिता। 4. गान्धर्वा राधिका — गंधर्वों से भी पूजित। 5. चन्द्र-कान्ति — जिनकी कांति चंद्रमा-सी है। 6. माधव-सङ्गिनी — माधव की नित्य संगिनी।
  3. 7. दामोदराद्वैत-सखी — दामोदर की अद्वितीय सखी। 8. कार्त्तिकोत्कीर्तिदेश्वरी — कार्तिक मास को कीर्ति देने वाली स्वामिनी। 9. मुकुन्द-दयिता-वृन्द-धम्मिल्ल-मणि-मञ्जरी — मुकुंद की प्रियाओं के केश-पाश की मणि-मञ्जरी, अर्थात् उन सबमें शिरोमणि।
  4. 10. भास्करोपासिका — सूर्य की उपासिका। 11. वार्षभानवी — वृषभानु के कुल की। 12. वृषभानुजा — वृषभानु की पुत्री। 13. अनङ्ग-मञ्जरी-ज्येष्ठा — अनंगमञ्जरी की बड़ी बहन। 14. श्रीदामा-वरजा — श्रीदामा की छोटी बहन। 15. उत्तमा — सबमें श्रेष्ठ।
  5. 16. कीर्तिदा-कन्यका — माता कीर्तिदा की पुत्री। 17. मातृ-स्नेह-पीयूष-पुत्रिका — माता के स्नेह-अमृत की पुत्री। 18. विशाखा-सवयाः — विशाखा की समवयस्का। 19. प्रेष्ठ-विशाखा-जीविताधिका — प्रिय सखी विशाखा को प्राणों से भी अधिक प्रिय।
  6. 20. प्राणाद्वितीय-ललिता — जो ललिता के प्राणों से अभिन्न हैं। 21. वृन्दावन-विहारिणी — वृंदावन में विहार करने वाली। 22. ललिता-प्राण-लक्षैक-रक्षा — जो लाखों बार ललिता के प्राणों की रक्षा करती हैं। 23. वृन्दावनेश्वरी — वृंदावन की स्वामिनी।
  7. 24. व्रजेन्द्र-गृहिणी-कृष्ण-प्राय-स्नेह-निकेतन — माता यशोदा को कृष्ण जितनी ही प्रिय। 25. व्रज-गो-गोप-गोपाली-जीव-मात्रैक-जीवन — ब्रज की गायों, गोपों और गोपियों — सबके प्राणों का प्राण।
  8. 26. स्नेहल-आभीर-राजेन्द्र — गोपराज नंद के स्नेह की पात्र। 27. वत्सल-अच्युत-पूर्वजा — बलराम जी का वात्सल्य पाने वाली। 28. गोविन्द-प्रणयाधार-सुरभि-सेवनोत्सुका — गोविन्द को प्रिय सुरभि गायों की सेवा के लिए उत्सुक।
  9. 29. धृत-नन्दीश्वर-क्षेम-गमनोत्कण्ठि-मानसा — कृष्ण की सेवा के लिए नन्दीश्वर (नंदगाँव) जाने को उत्कंठित मन वाली। 30. स्व-देहाद्वैतता-दृष्टि-धनिष्ठा-ध्येय-दर्शना — सखी धनिष्ठा जिन्हें अपने ही शरीर से अभिन्न देखती हैं और ध्यान में उन्हीं का दर्शन करती हैं।
  10. 31. गोपेन्द्र-महिषी-पाक-शाल-वेदि-प्रकाशिका — माता यशोदा की रसोई को अपनी उपस्थिति से प्रकाशित करने वाली। 32. आयुर्-वर्धक-राद्धान्ना — जिनका बनाया अन्न कृष्ण की आयु बढ़ाता है। 33. रोहिणी-घ्रात-मस्तका — रोहिणी जी जिनका मस्तक सूँघकर स्नेह जताती हैं।
  11. 34. सुबल-न्यस्त-सारूप्या — जिन्होंने सखा सुबल को अपने जैसा रूप दिया। 35. सुबल-प्रीति-तोषिता — सुबल के प्रेम से प्रसन्न होने वाली। 36. मुखरा-दृक्-सुधा-नप्त्री — वृद्धा मुखरा की आँखों के लिए अमृत-सी नातिन। 37. जटिला-दृष्टि-भीषिता — सास जटिला की दृष्टि से भयभीत रहने वाली।
  12. 38. मधुमङ्गल-नर्मोक्ति-जनित-स्मित-चन्द्रिका — मधुमंगल के विनोद पर जिनकी मुस्कान चाँदनी-सी खिल उठती है। 39. पौर्णमासी-बहिः-खेलत्-प्राण-पञ्जर-शारिका — पौर्णमासी के हृदय-पिंजर में खेलती हुई मैना।
  13. 40. स्व-गणाद्वैत-जीवातुः — अपनी सखियों के प्राणों से अभिन्न जीवन। 41. स्वीयाहङ्कार-वर्धिनी — अपनों का गौरव बढ़ाने वाली। 42. स्व-गणोपेन्द्र-पादाब्ज-स्पर्श-लम्भन-हर्षिणी — जो अपनी सखियों को कृष्ण के चरण-कमलों का स्पर्श दिलाकर हर्षित होती हैं।
  14. 43. स्वीय-वृन्दावनोद्यान-पालिकी-कृत-वृन्दका — जिन्होंने वृंदा देवी को अपने वृंदावन-उद्यान की रखवाली सौंपी। 44. ज्ञात-वृन्दाटवी-सर्व-लता-तरु-मृग-द्विजा — वृंदावन की सारी लताएँ, वृक्ष, हिरण और पक्षी जिन्हें पहचानते हैं।
  15. 45. ईषच्-चन्दन-सङ्घृष्ट-नव-काश्मीर-देह-भाः — जिनके अंगों की आभा थोड़े चंदन में घुले नए केसर जैसी है। 46. जवा-पुष्प-प्रभा-हारि-पट्ट-चीनारुणाम्बरा — जिनका रेशमी अरुण वस्त्र जवा-पुष्प की लालिमा को भी मात देता है।
  16. 47. चरणाब्ज-तल-ज्योतिर्-अरुणी-कृत-भू-तला — जिनके चरण-कमलों की आभा से धरती अरुण हो उठती है। 48. हरि-चित्त-चमत्कारी चारु-नूपुर-निःस्वना — जिनके नूपुरों की मधुर ध्वनि हरि के चित्त को चमत्कृत कर देती है।
  17. 49. कृष्ण-श्रान्ति-हर-श्रोणी-पीठ-वल्गित-घण्टिका — जिनकी करधनी की घंटियों की ध्वनि कृष्ण की थकान हर लेती है। 50. कृष्ण-सर्वस्व-पीनोद्यत्-कुचाञ्चन्-मणि-मालिका — जिनके वक्ष पर सुशोभित मणि-माला कृष्ण के लिए सर्वस्व है।
  18. 51. नाना-रत्नोल्लसच्-छङ्ख-चूडा-चारु-भुज-द्वया — जिनकी दोनों सुंदर भुजाएँ रत्नजड़ित शंख-चूड़ियों से सजी हैं। 52. स्यमन्तक-मणि-भ्राजन्-मणि-बन्धाति-बन्धुरा — जिनकी कलाई पर स्यमंतक मणि दमकती है।
  19. 53. सुवर्ण-दर्पण-ज्योतिर्-उल्लङ्घि-मुख-मण्डला — जिनके मुख की आभा स्वर्ण-दर्पण की चमक को भी लाँघ जाती है। 54. पक्व-दाडिम-बीजाभ-दन्ताकृष्टाघभिच्-छुका — जिनके पके अनार के दानों जैसे दाँत अघ-नाशक कृष्ण रूपी शुक को खींच लेते हैं।
  20. 55. अब्ज-रागादि-सृष्टाब्ज-कलिका-कर्ण-भूषणा — जिनके कानों के आभूषण पद्मराग मणियों से बनी कमल-कलियों जैसे हैं। 56. सौभाग्य-कज्जलाङ्काक्त-नेत्र-निन्दित-खञ्जना — काजल से सजे जिनके नेत्र खंजन पक्षी की चंचलता को भी नीचा दिखाते हैं।
  21. 57. सु-वृत्त-मौक्तिक-मुक्ता-नासिका-तिल-पुष्पिका — तिल-पुष्प जैसी सुंदर नासिका पर गोल मोती धारण करने वाली। 58. सु-चारु-नव-कस्तूरी-तिलकाञ्चित-भालका — जिनके भाल पर ताज़ी कस्तूरी का सुंदर तिलक सजा है।
  22. 59. दिव्य-वेणी-विनिर्धूत-केकि-पिञ्छा-वर-स्तुतिः — जिनकी दिव्य वेणी के आगे मोरपंख की शोभा भी फीकी पड़ जाती है। 60. नेत्रान्त-शर-विध्वंसि-कृत-चाणूरजिद्-हरिः — जिनके कटाक्ष-बाण चाणूर को हराने वाले हरि के धैर्य को भी भेद देते हैं।
  23. 61. स्फुरत्-कैशोर-तारुण्य-सन्धि-बन्धुर-विग्रहा — किशोरावस्था और यौवन की संधि पर खिली हुई मनोहर देह वाली। 62. माधवोल्लासका — माधव को आह्लादित करने वाली। 63. उन्मत्ता पिकोरु-मधुर-स्वरा — जिनका कोयल-सा मधुर स्वर माधव को उन्मत्त कर देता है।
  24. 64. प्राणायुत-शत-प्रेष्ठ-माधवोत्कीर्ति-लम्पटा — जिन्हें माधव का यश करोड़ों प्राणों से भी प्रिय है। 65. कृष्णापाङ्ग-तरङ्गोद्यत्-स्मित-पीयूष-बुद्बुदा — कृष्ण के कटाक्ष की लहरों पर जिनकी मुस्कान अमृत-बुलबुलों-सी उठती है।
  25. 66. पुञ्जी-भूत-जगल्-लज्जा-वैदग्धी-दिग्ध-विग्रहा — जिनकी देह चातुर्य में पगी है और संसार भर की लज्जा जिनमें सिमट आई है। 67. करुण-विद्रवद्-देहा — करुणा से जिनका शरीर द्रवित हो उठता है। 68. मूर्तिमन्-माधुरी-घटा — साक्षात् माधुर्य की मूर्ति।
  26. 69. जगद्-गुणवती-वर्ग-गीयमान-गुणोच्चया — संसार की सभी गुणवती स्त्रियाँ जिनके गुण गाती हैं। 70. शच्य्-आदि-सुभग-वृन्द-वन्द्यमानोरु-सौभगा — शची आदि सौभाग्यवती देवियाँ भी जिनके सौभाग्य की वंदना करती हैं।
  27. 71. वीणा-वादन-सङ्गीत-रास-लास्य-विशारदा — वीणा-वादन, संगीत और रास-नृत्य में निपुण। 72. नारद-प्रमुखोद्गीत-जगद्-आनन्द-सद्-यशः — नारद आदि मुनि जिनका यश गाते हैं, जिससे जगत आनंदित होता है।
  28. 73. गोवर्धन-गुहा-गेह-गृहिणी — गोवर्धन की गुफा-गृहों की गृहिणी। 74. कुञ्ज-मण्डना — कुंजों को सजाने वाली। 75. चण्डांशु-नन्दिनी-बद्ध-भागिनी-भाव-विभ्रमा — सूर्य-पुत्री यमुना से जिनका बहन का नाता है।
  29. 76. दिव्य-कुन्दलता-नर्म-सख्य-दाम-विभूषिता — सखी कुन्दलता की विनोदपूर्ण मैत्री की माला से सजी। 77. गोवर्धन-धराह्लादि-शृङ्गार-रस-पण्डिता — शृंगार-रस की पंडिता, जो गिरिधारी को आह्लादित करती हैं।
  30. 78. गिरीन्द्रधर-वक्षः-श्री — गिरिधारी के वक्ष की शोभा, उनकी लक्ष्मी। 79. शङ्खचूडारि-जीवनम् — शंखचूड़ के शत्रु (कृष्ण) का जीवन। 80. गोकुलेन्द्रसुत-प्रेम-काम-भूपेन्द्र-पट्टनम् — गोकुलेन्द्र-पुत्र के प्रेम-राज्य की राजधानी।
  31. 81. वृष-विध्वंस-नर्मोक्ति-स्व-निर्मित-सरोवरा — अरिष्टासुर-वध के बाद कृष्ण की विनोद-भरी बात पर जिन्होंने अपना कुंड (राधाकुंड) बनाया। 82. निज-कुण्ड-जल-क्रीडा-जित-सङ्कर्षणानुजा — अपने कुंड की जल-क्रीड़ा में जो बलराम के अनुज (कृष्ण) को हरा देती हैं।
  32. 83. मुरमर्दन-मत्तेभ-विहारामृत-दीर्घिका — मुर-मर्दन कृष्ण रूपी मत्त गज के विहार की अमृत-वापी। 84. गिरीन्द्रधर-पारीन्द्र-रति-युद्धोरु-सिंहिका — गिरिधारी रूपी सिंह के साथ प्रेम-क्रीड़ा में सिंहनी-सी।
  33. 85. स्व-तनु-सौरभोन्मत्ती-कृत-मोहन-माधवा — जिनकी देह की सुगंध माधव को मोहित कर देती है। 86. दोर्-मूलोच्चलन-क्रीडा-व्याकुली-कृत-केशवा — जो भुजा उठाने की चपल क्रीड़ा से केशव को व्याकुल कर देती हैं।
  34. 87. निज-कुण्ड-तटी-कुञ्ज-क्लृप्त-केलि-कलोद्यमा — अपने कुंड के तट की कुंज में कलापूर्ण लीला रचाने वाली। 88. दिव्य-मल्लि-कुलोल्लासि-शय्या-कल्पित-विग्रहा — वहीं दिव्य मल्लिका-पुष्पों की शय्या पर विराजने वाली।
  35. 89. कृष्ण-वाम-भुजान्यस्त-चारु-दक्षिण-गण्डका — जो अपना सुंदर दायाँ कपोल कृष्ण की बाईं भुजा पर टिका देती हैं। 90. सव्य-बाहु-लता-बद्ध-कृष्ण-दक्षिण-सद्-भुजा — जो अपनी लता-सी बाईं भुजा से कृष्ण की दाहिनी भुजा बाँध लेती हैं।
  36. 91. कृष्ण-दक्षिण-चारूरु-श्लिष्ट-वामोरु-रम्भिका — जिनकी कदली-सी वाम जंघा कृष्ण की दक्षिण जंघा से सटी है। 92. गिरीन्द्रधर-धृग्-वक्षो-मर्दि-सु-स्तन-पर्वता — जिनका पर्वत-सा वक्ष गिरिधारी के आलिंगन में समाया है।
  37. 93. गोविन्दाधर-पीयूष-वासिताधर-पल्लवा — जिनके पल्लव-से अधर गोविन्द के अधरामृत से सुवासित हैं। 94. सुधा-सञ्चय-चारूक्ति-शीतली-कृत-माधवा — जिनके अमृत-भरे मधुर वचन माधव को शीतल कर देते हैं।
  38. 95. गोविन्दोद्गीर्ण-ताम्बूल-राग-राज्यत्-कपोलिका — गोविन्द के दिए ताम्बूल की लाली से जिनके कपोल दमक उठते हैं। 96. कृष्ण-सम्भोग-सफली-कृत-मन्मथ-सम्भवा — जो कृष्ण के प्रेम-मिलन की कामना को सार्थक करती हैं।
  39. 97. गोविन्द-मार्जितोद्दाम-रति-प्रस्विन्न-सन्-मुखा — प्रेम-श्रम से आए जिनके मुख के स्वेद को गोविन्द स्वयं पोंछते हैं। 98. विशाखा-वीजित-क्रीडा-श्रान्ति-निद्रालु-विग्रहा — क्रीड़ा की थकान से जब वे सो जाती हैं, तब विशाखा उन्हें पंखा झलती हैं।
  40. 99. गोविन्द-चरण-न्यस्त-काय-मानस-जीवना — जिन्होंने अपना शरीर, मन और प्राण गोविन्द के चरणों में रख दिए। 100. स्व-प्राणार्बुद-निर्मञ्छ्य-हरि-पाद-रजः-कणा — जो अपने करोड़ों प्राणों से हरि की चरण-रज के एक कण की आरती उतारती हैं।
  41. 101. अणु-मात्राच्युतादर्श-शप्यमानात्म-लोचना — जो क्षण भर भी अच्युत को न देख पाने पर अपने ही नेत्रों को कोसती हैं। 102. नित्य-नूतन-गोविन्द-वक्त्र-शुभ्रांशु-दर्शना — जो गोविन्द के नित्य-नवीन चंद्र-मुख का दर्शन करती रहती हैं।
  42. 103. निःसीम-हरि-माधुर्य-सौन्दर्याद्य्-एक-भोगिनी — हरि के असीम माधुर्य और सौंदर्य की एकमात्र भोक्ता। 104. सापत्न्य-धाम-मुरली-मात्रा-भाग्य-कटाक्षिणी — जो अपनी सौत बनी मुरली के भाग्य को केवल कटाक्ष से देखती हैं।
  43. 105. गाढ-बुद्धि-बल-क्रीडा-जित-वंशी-विकर्षिणी — जो बुद्धि-बल की क्रीड़ा में कृष्ण को हराकर उनकी बाँसुरी छीन लेती हैं। 106. नर्मोक्ति-चन्द्रिकोत्फुल्ल-कृष्ण-कामाब्धि-वर्धिनी — जिनके विनोद-वचनों की चाँदनी कृष्ण के प्रेम-सागर को बढ़ा देती है।
  44. 107. व्रज-चन्द्रेन्द्रिय-ग्राम-विश्राम-विधु-शालिका — ब्रज-चंद्र कृष्ण की सारी इन्द्रियों का विश्राम-स्थल, चंद्रमा-सा भवन। 108. कृष्ण-सर्वेन्द्रियोन्मादि-राधेत्य्-अक्षर-युग्मका — जिनके नाम के दो ही अक्षर — "रा" और "धा" — कृष्ण की सारी इन्द्रियों को उन्मत्त कर देते हैं।
  45. फलश्रुति: श्री राधिका के इन 108 उज्ज्वल नामों का यह स्तोत्र "श्री-राधा-लम्भक" कहलाता है — अर्थात् जो राधा जी को प्राप्त कराता है; यह सुंदर रसायन है। जो दीन और व्याकुल हृदय से, परम प्रेमपूर्वक इसका पाठ करता है, वह शीघ्र ही अपने स्वामी (श्री कृष्ण) को उनकी स्वामिनी के संग देख पाता है।

लाभ

  • राधा जी के 108 नामों का एकमात्र पाठ जिसका रचयिता, ग्रंथ और कोलोफ़न — तीनों ज्ञात हैं।
  • नामों में राधा जी का पूरा परिवार, सखी-मंडल और ब्रज-जीवन आ जाता है — केवल स्तुति नहीं, परिचय भी।
  • राधाष्टमी तथा कार्तिक मास में पाठ की परंपरा; कार्तिक को स्तोत्र स्वयं राधा जी से जोड़ता है (नाम 8)।
  • फलश्रुति कहती है कि दीन व व्याकुल हृदय से पाठ करने वाला शीघ्र युगल-दर्शन पाता है।

कब करें पाठ

राधाष्टमी पर (भाद्रपद शुक्ल अष्टमी) · कार्तिक मास में — विशेषकर दामोदर-व्रत के दिनों में · एकादशी व नित्य संध्या में · राधाकुंड व वृंदावन की यात्रा में

स्रोत

रचयिता: श्रील रघुनाथदास गोस्वामी. स्तवावली — श्रील रघुनाथदास गोस्वामी; कोलोफ़न: "इति श्रीमद्-रघुनाथ-दास-गोस्वामि-विरचित-स्तवावल्यां श्री-राधिकाष्टोत्तर-शत-नाम-स्तोत्रं सम्पूर्णम्" · wisdomlib.org — देवनागरी, IAST व नामवार अर्थ (मुख्य आधार) · thegaudiyatreasuresofbengal.com — वही पाठ, 108 नाम अर्थ-सहित (स्वतंत्र पुष्टि) · vaishnavsongs.iskcondesiretree.com — वही पाठ, रोमन में (तीसरा साक्ष्य) · देवनागरी की स्पष्ट टंकण-त्रुटियाँ IAST व दूसरे स्रोत से मिलाकर सुधारी गईं (सूची record की टिप्पणी में)

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