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लिपि:
॥ श्री ॥

श्री रंगनाथ चालीसा

चालीसा · श्री विष्णु

पाठ

गणपति-गुरु-पद वंदना, सुमिर हृदय हरि-नाम। रंगनाथ चालीसा कहूँ, करहु भक्त सुखधाम॥

1

जय रंगनाथ हरि भगवाना। शेष-शय्या पर तुम विराजमाना॥

2

विष्णु-स्वरूप शयन-मुद्रा धारी। श्रीरंगम में छवि अति प्यारी॥

3

कावेरी-तट धाम सुहाये। भक्त-गण नित दरस को धाये॥

4

भू-वैकुण्ठ श्रीरंगम कहाये। सप्त-प्राकार दरस सुहाये॥

5

रामचंद्र-कुल का धन माना। विभीषण को वर तुम दाना॥

6

जो जन तुमको नित ही ध्यावै। भय-संकट से मुक्ति पावै॥

7

वैष्णव-धाम में प्रमुख कहाये। रंग-दरस जो जन पाये॥

8

रंग-धाम सुहावन तेरा। भक्त-गण नित दरस को घेरा॥

9

जो नर श्रद्धा से तुम्हें ध्यावै। रोग-शोक भय निकट न आवै॥

10

वैकुण्ठ-एकादशी व्रत जो धारे। सकल मनोरथ प्रभु ते सारे॥

11

दीन-दुखी की सुनत पुकारा। पल में करते बेड़ा पारा॥

12

जो जन तुमको शीश नवावै। भय-संकट से मुक्ति पावै॥

13

तुलसी-चरणामृत जो लेते। हरि-कृपा वे सब घर भरते॥

14

रोग-दोष सब दूर भगाते। सुख-समृद्धि घर में लाते॥

15

जो नर निशदिन ध्यान लगावै। रंग-कृपा सहज वह पावै॥

16

मंगल-कारी विघ्न-विनाशन। भय-हारी तुम सुख-साधन॥

17

आण्डाल-रामानुज ने ध्याया। भक्ति-मार्ग जग को सिखलाया॥

18

जो श्रद्धा से तुम्हें ध्यावै। ता के सब बिगड़े बन जावै॥

19

जो यह रंग चालीसा गावै। भय-संकट सब दूर नसावै॥

20

नित प्रति पाठ करे जो कोई। ता पर कृपा रंगनाथ की होई॥

21

मन-इच्छित फल सब जन पावैं। सुख-समृद्धि घर में लावैं॥

22

रंग-कृपा जिन पर होई। ता को कष्ट सतावे न कोई॥

23

भगवान विष्णु तुम जग-पालक। भव-सागर से तुम तारक॥

24

जो सत भाव करे यह सेवा। रीझत तुरत रंगनाथ देवा॥

25

संकट-मोचन नाम तुम्हारा। भक्त-हृदय में नित्य निवारा॥

26

महिमा तुम्हरी अति अपारा। वेद-पुराण करत विस्तारा॥

27

कलियुग में तुम सुलभ कहाये। जो जन शरण तुम्हारी आये॥

28

घर-घर ज्योति तुम्हारी जागै। नर-नारी सब तुमको पागै॥

29

दुःख-संकट जो जन पीड़े। तुम्हें सुमिर कर सब दुख छीड़े॥

30

रंग-स्तुति जो जन गावै। रोग-शोक सब दूर भगावै॥

31

रंग-धाम की महिमा भारी। भव-तारण तुम जग-हितकारी॥

32

मोक्ष-मार्ग जग को दिखलाते। शरणागत को पार लगाते॥

33

जग-पालक तुम परम कल्याणी। भव-तारण तुम सुख-दानी॥

34

जो जन रंगनाथ गुण गावै। पाप-ताप सब दूर भगावै॥

35

रंग-वंदन जो जन गावै। इहलोक-परलोक सुख पावै॥

36

सुख-शान्ति-समृद्धि घर में आवै। भक्ति-श्रद्धा-संतोष बढ़ावै॥

37

भय-संकट सब दूर हटावै। रंगनाथ जो जन नित ध्यावै॥

38

मोक्ष-मार्ग वह सहज वह पावै। रंग-नाम जो जन गावै॥

39

हरि-कृपा-सुख घर में लावै। भक्ति-शान्ति सब बढ़ावै॥

40

जय जय जय रंगनाथ भयहारी। रक्षा करो प्रभु शरण हमारी॥

रंग चालीसा सरल यह, पढ़े प्रेम मन लाय। भय-संकट सब दूर हो, हरि-कृपा घर आय॥

अर्थ (हिन्दी)

  1. गणपति व गुरु के चरणों की वंदना कर, हृदय में हरि-नाम का स्मरण कर मैं रंगनाथ चालीसा कहता हूँ; हे प्रभु, भक्तों को सुख-धाम दीजिए।
  2. हे रंगनाथ हरि भगवान, आपकी जय हो; आप शेषनाग की शय्या पर विराजमान हैं।
  3. आप विष्णु-स्वरूप शयन-मुद्रा धारण किए हैं; श्रीरंगम में आपकी छवि अति प्यारी है।
  4. कावेरी नदी के तट पर आपका धाम सुहावना है; भक्तगण नित्य दर्शन को दौड़े आते हैं।
  5. श्रीरंगम भू-वैकुण्ठ कहलाता है; सात प्राकारों (परकोटों) से युक्त इसका दर्शन सुहावना है।
  6. आप रामचंद्र के कुल का आराध्य धन माने जाते हैं; विभीषण को आपने वर रूप में दिया (यही रंगनाथ विग्रह)।
  7. जो जन नित्य आपका ध्यान करता है, वह भय व संकट से मुक्ति पाता है।
  8. आप वैष्णव-धामों में प्रमुख कहलाते हैं; जो जन रंगनाथ-दर्शन पाता है, वह धन्य हो जाता है।
  9. रंग-धाम आपका सुहावना स्थान है; भक्तगण नित्य दर्शन को आते हैं।
  10. जो मनुष्य श्रद्धा से आपका ध्यान करता है, उसके निकट रोग, शोक व भय नहीं आते।
  11. जो वैकुण्ठ-एकादशी का व्रत धारण करता है, प्रभु उसके समस्त मनोरथ पूर्ण करते हैं।
  12. आप दीन-दुखियों की पुकार सुनते ही पल भर में उनका बेड़ा पार कर देते हैं।
  13. जो जन आपको शीश नवाता है, वह भय व संकट से मुक्ति पाता है।
  14. जो तुलसी व चरणामृत ग्रहण करते हैं, वे हरि-कृपा से घर भरते हैं।
  15. आप समस्त रोग-दोष दूर भगाते हैं और घर में सुख-समृद्धि लाते हैं।
  16. जो मनुष्य दिन-रात ध्यान लगाता है, वह सहज ही रंगनाथ-कृपा प्राप्त करता है।
  17. आप मंगलकारी व विघ्नों के विनाशक हैं; भय हरकर सुख देने वाले हैं।
  18. आण्डाल व रामानुजाचार्य ने आपका ध्यान किया और जगत को भक्ति-मार्ग सिखलाया।
  19. जो श्रद्धा से आपका ध्यान करता है, उसके सब बिगड़े कार्य बन जाते हैं।
  20. जो यह रंगनाथ चालीसा गाता है, उसके भय व संकट सब दूर नष्ट हो जाते हैं।
  21. जो कोई नित्य पाठ करता है, उस पर रंगनाथ की कृपा होती है।
  22. सब जन मन-इच्छित फल पाते हैं और घर में सुख-समृद्धि लाते हैं।
  23. जिन पर रंगनाथ की कृपा होती है, उन्हें कोई कष्ट नहीं सताता।
  24. आप भगवान विष्णु जगत के पालक हैं; भव-सागर से तारने वाले हैं।
  25. जो सच्चे भाव से यह सेवा करता है, उस पर रंगनाथ देव तुरंत रीझ (प्रसन्न हो) जाते हैं।
  26. आपका नाम संकट-मोचन है; आप भक्तों के हृदय में नित्य निवास कर कष्ट दूर करते हैं।
  27. आपकी महिमा अति अपार है, जिसका विस्तार वेद-पुराण करते हैं।
  28. कलियुग में आप सुलभ कहलाते हैं; जो जन आपकी शरण में आता है, वह तर जाता है।
  29. घर-घर में आपकी ज्योति जगती है; नर-नारी सब आपमें अनुरक्त हो जाते हैं।
  30. जो जन दुःख-संकट से पीड़ित हैं, वे आपका स्मरण कर समस्त दुःख दूर कर लेते हैं।
  31. जो जन रंगनाथ-स्तुति गाता है, वह समस्त रोग-शोक दूर भगा देता है।
  32. रंग-धाम की महिमा अति महान है; आप भव-तारण व जगत-हितकारी हैं।
  33. आप जगत को मोक्ष का मार्ग दिखलाते हैं और शरणागत को पार लगाते हैं।
  34. आप जगत के पालक व परम कल्याणकारी हैं; भव-तारण व सुख देने वाले हैं।
  35. जो जन रंगनाथ के गुण गाता है, वह समस्त पाप-ताप दूर भगा देता है।
  36. जो जन रंगनाथ-वंदना गाता है, वह इस लोक व परलोक दोनों में सुख पाता है।
  37. घर में सुख, शांति व समृद्धि आती है और भक्ति, श्रद्धा व संतोष बढ़ता है।
  38. जो जन रंगनाथ का नित्य ध्यान करता है, वह भय व संकट सब दूर हटा देता है।
  39. जो जन रंगनाथ-नाम गाता है, वह सहज ही मोक्ष-मार्ग पा लेता है।
  40. घर में हरि-कृपा व सुख आता है और भक्ति व शांति बढ़ती है।
  41. हे भय हरने वाले रंगनाथ, आपकी जय हो; हे प्रभु, शरण में आए हम सबकी रक्षा कीजिए।
  42. जो प्रेमपूर्वक मन लगाकर यह सरल रंगनाथ चालीसा पढ़ता है, उसके भय-संकट दूर होते हैं और घर में हरि-कृपा आती है।

लाभ

  • पापों का नाश होकर मोक्ष का मार्ग प्रशस्त होता है।
  • भय, रोग व संकट से रक्षा होती है।
  • विष्णु-भक्ति, सुख-शांति व समृद्धि की प्राप्ति होती है।
  • मन को शरणागति व भक्ति का भाव मिलता है।

कब करें पाठ

एकादशी व गुरुवार को · वैकुण्ठ एकादशी पर · प्रातः व संध्या पूजा में

स्रोत

रचयिता: पारंपरिक. पारंपरिक रंगनाथ चालीसा · गीता प्रेस, गोरखपुर — चालीसा संग्रह

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