परिवार व समृद्धि साधना
1. आरंभिक प्रार्थना — ॐ गं गणपतये नमः
11 बार — गणेश वंदना।
ॐ गं गणपतये नमः॥
2. मंत्र — ॐ श्रीं महालक्ष्म्यै नमः
समृद्धि हेतु — 21 बार।
ॐ श्रीं महालक्ष्म्यै नमः॥
3. चालीसा — श्री लक्ष्मी चालीसा
माँ लक्ष्मी की स्तुति।
मातु लक्ष्मी करि कृपा, करो हृदय में वास। मनोकामना सिद्ध कर, पुरवहु मेरी आस॥
जय जय श्री महालक्ष्मी माता। तुम ही जग की पालनहाता॥
सिन्धु सुता विष्णुप्रिया कहलाई। नाम लेत सब विपदा जाई॥
कमल आसना कमल कर धारी। सुख-सम्पत्ति दात्री सुखकारी॥
जिस घर थारो वास हो माता। रिद्धि-सिद्धि सब सुख की दाता॥
क्षीरसागर में तुम आई। विष्णु संग तुम सदा सुहाई॥
समुद्र मंथन में प्रगटाईं। देव दानव मन हरषाईं॥
गज राज शुंड सों नित न्हाई। श्वेत वस्त्र शोभा अधिकाई॥
श्री विष्णु के वक्षस्थल वासी। जय महालक्ष्मी मोद-प्रकाशी॥
जय लक्ष्मी माता तेरे पूजन से। मन-वांछित फल मिले पूजन से॥
तुम ही कुबेर-संपत्ति आधार। तुम से सब जग का व्यवहार॥
रात्रि रूप में तुम काली। दिन रूप में लक्ष्मी उजाली॥
श्वेत पद्म पर विराजमाना। हाथ में वर मुद्रा सुहाना॥
तव प्रताप उग्र नहिं होई। भक्त की आशा पूरे सोई॥
नरनारी नित तुम्हें मनावें। सेवत धन-धान्य-सुख पावें॥
इन्द्र सदा तुम्हें सुमिरत है। कुबेर निज धन तुमहिं अरपत है॥
धन्वन्तरि और सुरेश तुम हो। त्रिभुवन की विभव-धन-श्री तुम हो॥
जो नर तुमको भज लेत हैं। वे तुमसे सब वर मांगत हैं॥
तुमसे सुख-सम्पत्ति नित पावे। नाम तुम्हारो नित-नित गावे॥
सोने-चाँदी तुम ही हो माता। हीरा-पन्ना मोती दाता॥
तुमसे मिलत अन्न-धन भारी। मंगल करत लक्ष्मी महतारी॥
दीपावली माँ की जग मनाई। रात-रात दीपक जग जगाई॥
जो नर शुक्रवार को ध्यावें। लक्ष्मी कृपा वे नित पावें॥
कमला कमल-वासिनी देवी। विष्णु-वल्लभा पद-सेवी॥
जगत-जननी जगत-अधारी। श्री लक्ष्मी जय जगत-सहारी॥
तुम्हारो यश नित-नित गाते। दुःख दारिद्र सब भाग जाते॥
पद्म-पुराण में तव महिमा। श्रुति-शास्त्र में अपरिमिमा॥
धन तेरस को तुम्हें मनावें। धनवान सब तुमको पावें॥
सरोवर में कमल-विहारी। जय लक्ष्मी जय गृह-पालनहारी॥
ईश्वर के साथ नित रहती। भक्त की सब इच्छा पूर करती॥
तुम बिन यज्ञ न पूरण होई। तुम बिन धन न मिले कोई॥
तुम बिन जगत असार लगे। तुम्हीं शक्ति सार-सार जगे॥
उमा-रमा-ब्रह्माणी तुम हो। त्रिभुवन की शक्ति सुगम तुम हो॥
तुम्हारे भजन से दीन का उद्धार। मिटे दारिद्र का हो जगत-प्रसार॥
चालीसा पाठ मन से जो करे। लक्ष्मी कृपा सदा ताके परे॥
धूप-दीप-नैवेद्य चढ़ाई। कमल-पुष्प से पूजन गाई॥
तुम्हारी शरण में जो कोई आवें। धन-धान्य-समृद्धि सब पावें॥
जय लक्ष्मी सुखदा वरदायिनी। तुम ही परमेश्वरी हितकारिणी॥
नवधा-भक्ति से जो पूजे। लक्ष्मी-कृपा तुरंत ही ऊजे॥
यह चालीसा भक्ति से गावें। सम्पत्ति-सुख-वैभव नित पावें॥
जय लक्ष्मी महालक्ष्मी माता। सदा करो जगत का पालन-त्राता॥
मातु लक्ष्मी करि कृपा, करो हृदय में वास। मनोकामना सिद्ध कर, पुरवहु मेरी आस॥
4. आरती — श्री लक्ष्मी आरती
दीप जलाकर आरती करें।
ॐ जय लक्ष्मी माता, मैया जय लक्ष्मी माता। तुमको निशदिन सेवत, हर विष्णु विधाता॥
उमा रमा ब्रह्माणी, तुम ही जग माता। सूर्य चंद्रमा ध्यावत, नारद ऋषि गाता॥
दुर्गा रूप निरंजनि, सुख सम्पत्ति दाता। जो कोई तुमको ध्यावत, ऋद्धि-सिद्धि धन पाता॥
तुम पाताल निवासिनि, तुम ही शुभदाता। कर्म प्रभाव प्रकाशिनि, भवनिधि की त्राता॥
जिस घर में तुम रहती, सब सद्गुण आता। सब सम्भव हो जाता, मन नहीं घबराता॥
तुम बिन यज्ञ न होते, वस्त्र न कोई पाता। खान-पान का वैभव, सब तुमसे आता॥
शुभगुण मंदिर सुंदर, क्षीरोदधि राजत। रत्न चतुर्दश निकसे, जग ललचावत॥
श्री लक्ष्मी जी की आरती, जो कोई जन गावे। उर आनंद समावे, पाप उतर जावे॥
5. स्तोत्र — कनकधारा स्तोत्रम्
समृद्धि हेतु कनकधारा पाठ।
अङ्गं हरेः पुलकभूषणमाश्रयन्ती भृङ्गाङ्गनेव मुकुलाभरणं तमालम्। अङ्गीकृताखिलविभूतिरपाङ्गलीला माङ्गल्यदास्तु मम मङ्गलदेवतायाः॥
मुग्धा मुहुर्विदधती वदने मुरारेः प्रेमत्रपाप्रणिहितानि गतागतानि। माला दृशोर्मधुकरीव महोत्पले या सा मे श्रियं दिशतु सागरसम्भवायाः॥
विश्वामरेन्द्रपदविभ्रमदानदक्षम् आनन्दहेतुरधिकं मुरविद्विषोऽपि। ईषन्निषीदतु मयि क्षणमीक्षणार्धम् इन्दीवरोदरसहोदरमिन्दिरायाः॥
आमीलिताक्षमधिगम्य मुदा मुकुन्दम् आनन्दकन्दमनिमेषमनङ्गतन्त्रम्। आकेकरस्थितकनीनिकपक्ष्मनेत्रं भूत्यै भवेन्मम भुजङ्गशयाङ्गनायाः॥
बाह्वन्तरे मधुजितः श्रितकौस्तुभे या हारावलीव हरिनीलमयी विभाति। कामप्रदा भगवतोऽपि कटाक्षमाला कल्याणमावहतु मे कमलालयायाः॥
कालाम्बुदालिललितोरसि कैटभारेर् धाराधरे स्फुरति या रमणीयरत्नम्। श्रद्धाभिशेकतिलकोज्ज्वलनीलकण्ठ श्रेणीवलेव सदसद्विभवाय मे स्यात्॥
दद्याद्दयानुपवनो द्रविणाम्बुधारां अस्मिन्नकिञ्चनविहङ्गशिशौ विषण्णे। दुष्कर्मघर्ममपनीय चिराय दूरं नारायणप्रणयिनीनयनाम्बुवाहः॥
इष्टाविशिष्टमतयोऽपि यया दयार्द्र- दृष्ट्या त्रिविष्टपगुणाः दधतीर्दयां ये। दृष्टिः प्रहृष्टकमलोदरदीप्तिरिष्टां पुष्टिं कृषीष्ट मम पुष्करविष्टरायाः॥
गीर्देवते गिरिशवल्लभचेलखेला- मर्यादयाहरमनन्तपदोन्नमन्ताम्। किं त्वत्परं न विदुषां प्रतिभाति लक्ष्मि कस्त्वां स्तुवन्निह न लब्धनिजाभिलाषः॥
कन्दर्पकोटिकमनीयतराश्रुतीनां किञ्चित्कलावधिकमाश्रितपुण्डरीकम्। विष्णोस्तुतिः सकलभक्तिभरप्रभूत- प्रेमाम्बुपूरपरिपूरितचित्तवृत्तिः॥
लक्ष्मीपदं तेऽखिलकारणस्य लक्ष्म्यास्तु तत्पादमहत्त्वमूहे। सद्भक्तिभावावलिभिर्विशुद्धैः सदा स्तुवन्तं मम पाहि देवि॥
स्तुवन्ति ये स्तुतिभिरमूभिरन्वहं त्रयीमयीं त्रिभुवनमातरं रमाम्। गुणाधिका गुरुतरभाग्यभागिनो भवन्ति ते भुवि बुधभाविताशयाः॥
क्षणं क्षणं यत्करणे न सिध्यति स्मरामि लक्ष्मीं प्रतिदिनं मनोहराम्। मनोगतं पूर्णमनोरथं दिश प्रसीद माता जगदम्बिके शुभे॥
सरोजपत्रे सरसी तु या स्थिता प्रसन्नवक्त्रा जगतां प्रसन्नदा। प्रसाधनार्था जगदम्बिके शुभे प्रसीद माता जगदम्बिके शुभे॥
धनं देहि कुलं देहि भाग्यं देहि सुखं देहि। रूपं देहि जयं देहि वैरिनाशं च देहि मे॥
पद्मानने पद्मविपद्मपत्रे पद्मप्रिये पद्मदलायताक्षि। विश्वप्रिये विश्वमनोनुकूले त्वत्पादपद्मं मयि सन्निधत्स्व॥
यत्कटाक्षसमुपासनाविधिः सेवकस्य सकलार्थसम्पदः। संतनोति वचनाङ्गमानसैः त्वां मुरारिहृदयेश्वरीं भजे॥
सरसिजनिलये सरोजहस्ते धवलतमांशुकगन्धमाल्यशोभे। भगवति हरिवल्लभे मनोज्ञे त्रिभुवनभूतिकरि प्रसीद मह्यम्॥
6. समापन चिंतन
परिवार के कल्याण व समृद्धि की प्रार्थना करें और जो प्राप्त है उसके प्रति कृतज्ञ रहें।
