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लिपि:
॥ श्री ॥

अहोई अष्टमी व्रत कथा

व्रत कथा · माँ दुर्गा

पाठ

व्रत नियम

कौन रखे: संतानवती माताएँ

कब: कार्तिक कृष्ण अष्टमी; सूर्योदय से तारों के दर्शन तक निर्जला

आहार नियम: पूरे दिन निर्जला व्रत; तारों को अर्घ्य देने के बाद व्रत खोलना; व्रत के दिन धरती न खोदना (परंपरा)

पूजन सामग्री

अहोई माता का चित्र (दीवार/पट) · करवा (जल पात्र) · दूध-भात · सींक व मोती की माला · दीप व रोली · फल व मिठाई

पूजन विधि

  1. प्रातः स्नान कर संतान की दीर्घायु हेतु निर्जला व्रत का संकल्प लें।
  2. दीवार पर अहोई माता व उनके सात पुत्रों का चित्र बनाएँ/स्थापित करें।
  3. संध्या को रोली, अक्षत, दूध-भात व पुष्प से माता का पूजन करें।
  4. अहोई अष्टमी व्रत कथा सुनें/पढ़ें व माता की आरती करें।
  5. रात्रि तारों (या चंद्र) को अर्घ्य देकर संतान का मुख देख व्रत खोलें।

व्रत कथा

साहूकारनी की कथा

एक साहूकार के सात पुत्र थे। दीपावली से पूर्व मिट्टी लेने गई साहूकारनी से अनजाने में खुरपी से स्याहू (साही) के बच्चे की हानि हो गई। इस अनिष्ट के कारण उसके पुत्र एक-एक कर संकट में पड़ने लगे।

दुखी साहूकारनी ने पश्चाताप कर अहोई माता (स्याहू माता) से क्षमा माँगी और संतान की रक्षा हेतु व्रत व पूजन का संकल्प लिया। माता की कृपा से उसके पुत्र सुरक्षित व सुखी हो गए।

कथा का सार यह है कि श्रद्धा से अहोई अष्टमी व्रत करने पर माता संतान की रक्षा करती हैं और उन्हें दीर्घायु, सुख व समृद्धि प्रदान करती हैं।

लाभ

  • संतान की दीर्घायु व आरोग्य।
  • संतान-सुख व पारिवारिक मंगल।
  • संकटों से रक्षा।

स्रोत

रचयिता: पारंपरिक. पारंपरिक लोक-परंपरा

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