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FAQ
अहोई अष्टमी व्रत कथा — सामान्य प्रश्न
यह व्रत कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी को रखा जाता है, जो दीपावली से लगभग आठ दिन पूर्व पड़ता है। सटीक तिथि प्रतिवर्ष पंचांग के अनुसार बदलती है।
अहोई माता को देवी पार्वती का ही एक स्वरूप माना जाता है। माताएँ अपनी संतान की दीर्घायु, सुख व समृद्धि की कामना से उनका पूजन करती हैं।
यह निर्जला व्रत है। संध्या को अहोई माता का पूजन कर, आकाश में तारों के दर्शन कर उन्हें अर्घ्य देने के पश्चात व्रत खोला जाता है।
यह व्रत मुख्यतः संतानवती माताएँ अपने बच्चों की दीर्घायु व सुख-समृद्धि हेतु रखती हैं।
रात्रि में तारों (या कहीं-कहीं चंद्र) को अर्घ्य देकर, संतान का मुख देखकर व्रत खोला जाता है।
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