श्री बजरंग बाण

śrī bajaraṃga bāṇa

Bajrang Baan

समय
10–12 मिनट
श्लोक
37
कठिनाई
मध्यम
शुभ दिन
मंगलवार व शनिवार
✓ संपूर्ण

परिचय

पवनपुत्र हनुमान भक्ति, बल और निर्भयता के प्रतीक हैं — श्रीराम के परम भक्त और संकटमोचन।

स्रोत: तुलसीदास परंपरा — हनुमान भक्ति साहित्य (अवधी)

उद्भव / पृष्ठभूमि

बजरंग बाण हनुमान जी को समर्पित एक तीव्र आराधना-स्तोत्र है। "बाण" अर्थात् तीर — परंपरा में माना जाता है कि यह पाठ भक्त की पुकार को सीधे हनुमान जी तक तीर की भाँति पहुँचाता है। इसकी रचना गोस्वामी तुलसीदास जी से जोड़ी जाती है और यह अवधी भाषा में है। हनुमान चालीसा जहाँ शांत स्तुति और गुणगान है, वहीं बजरंग बाण एक आर्त पुकार है — जिसमें भक्त संकट के समय हनुमान जी से शीघ्र सहायता की प्रार्थना करता है। इसमें आरंभ व अंत में एक-एक दोहा तथा बीच में चौपाइयाँ हैं, जिनमें हनुमान जी के लंका-प्रसंग के पराक्रम का स्मरण कर उनसे भय, बाधा व नकारात्मकता दूर करने की विनती की जाती है। परंपरा में इसे श्रद्धा, संयम व स्वच्छता के साथ पढ़ने का विधान कहा गया है।

संपूर्ण स्तोत्र

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निश्चय प्रेम प्रतीति ते, विनय करैं सनमान। तेहि के कारज सकल शुभ, सिद्ध करैं हनुमान॥

जो सच्चे प्रेम और अटूट विश्वास के साथ, आदरपूर्वक विनती करता है — हनुमान जी उसके सभी शुभ कार्य सिद्ध कर देते हैं।

जय हनुमंत संत हितकारी। सुनि लीजै प्रभु अरज हमारी॥

हे संतों का हित करने वाले हनुमान जी, आपकी जय हो! हे प्रभु, हमारी विनती सुन लीजिए।

जन के काज बिलंब न कीजै। आतुर दौरि महा सुख दीजै॥

अपने भक्त के काम में देर मत कीजिए; शीघ्र दौड़कर आइए और महान सुख दीजिए।

जैसे कूदि सिंधु के पारा। सुरसा बदन पैठि बिस्तारा॥

जैसे आपने छलाँग लगाकर समुद्र पार किया और सुरसा के मुख में प्रवेश कर अपना रूप बढ़ा लिया।

आगे जाय लंकिनी रोका। मारेहु लात गई सुरलोका॥

आगे बढ़ने पर लंकिनी ने रोका; आपके प्रहार से उसका उद्धार हुआ और वह देवलोक को चली गई।

जाय बिभीषन को सुख दीन्हा। सीता निरखि परमपद लीन्हा॥

वहाँ जाकर आपने विभीषण को सुख दिया और माता सीता के दर्शन कर परम पद प्राप्त किया।

बाग उजारि सिंधु महँ बोरा। अति आतुर जमकातर तोरा॥

आपने अशोक वाटिका उजाड़ी और शत्रुओं को समुद्र में डुबो दिया; अत्यंत वेग से आपने काल के समान भय को तोड़ दिया।

अक्षय कुमार मारि संहारा। लूम लपेटि लंक को जारा॥

आपने अक्षय कुमार का संहार किया और अपनी पूँछ लपेटकर लंका को जला दिया।

लाह समान लंक जरि गई। जय जय धुनि सुरपुर नभ भई॥

लंका लाख के समान जल उठी; देवलोक और आकाश में जय-जयकार की ध्वनि गूँज उठी।

अब बिलंब केहि कारन स्वामी। कृपा करहु उर अंतरयामी॥

हे स्वामी, अब देर किस कारण? हे हृदय के अंतर्यामी, कृपा कीजिए।

जय जय लखन प्रान के दाता। आतुर ह्वै दुख करहु निपाता॥

हे लक्ष्मण को प्राण देने वाले, आपकी जय हो! शीघ्रता कर हमारे दुखों का नाश कीजिए।

जै हनुमान जयति बल-सागर। सुर-समूह-समरथ भट-नागर॥

हे बल के सागर हनुमान, आपकी जय हो! आप देव-समूह में समर्थ और वीरों में श्रेष्ठ हैं।

ॐ हनु हनु हनु हनुमंत हठीले। बैरिहि मारु बज्र की कीले॥

ॐ हनु-हनु-हनु, हे दृढ़ प्रतिज्ञ हनुमान! वज्र की कीलों से बाधाओं और बुरी शक्तियों को दूर कीजिए।

गदा बज्र लै बैरिहि मारो। महाराज प्रभु दास उबारो॥

गदा और वज्र लेकर विरोधी शक्तियों का निवारण कीजिए; हे महाराज प्रभु, अपने दास की रक्षा कीजिए।

सुनि पुकार हुंकार देय धावो। बज्र गदा हनु बिलंब न लावो॥

हमारी पुकार सुनकर हुंकार भरते हुए दौड़ आइए; वज्र-गदा लेकर, हे हनुमान, देर मत कीजिए।

ॐ ह्रीं ह्रीं ह्रीं हनुमंत कपीसा। ॐ हुं हुं हुं हनु अरि उर सीसा॥

ॐ ह्रीं-ह्रीं-ह्रीं, हे वानरों के स्वामी हनुमंत! ॐ हुं-हुं-हुं — विरोधी शक्तियों का बल क्षीण कीजिए।

सत्य होहु हरि सपथ पाइ कै। राम दूत धरु मारु धाइ कै॥

हे रामदूत, श्रीहरि की शपथ पाकर सत्य कीजिए; शीघ्र आकर बाधाओं को दूर कीजिए।

जय जय जय हनुमंत अगाधा। दुख पावत जन केहि अपराधा॥

हे अथाह सामर्थ्य वाले हनुमान, आपकी तीन बार जय हो! आपका भक्त किस अपराध के कारण दुख पा रहा है?

पूजा जप तप नेम अचारा। नहिं जानत कछु दास तुम्हारा॥

पूजा, जप, तप, नियम और आचार — आपका यह दास इनमें से कुछ भी नहीं जानता; बस आपका सहारा है।

वन उपवन मग गिरि गृह माहीं। तुम्हरे बल हम डरपत नाहीं॥

वन हो या उपवन, मार्ग हो, पर्वत हो या घर — आपके बल के भरोसे हम कहीं भी नहीं डरते।

पाँय परौं कर जोरि मनावौं। यहि औसर अब केहि गोहरावौं॥

मैं आपके चरणों में पड़कर, हाथ जोड़कर मनाता हूँ; इस समय आपके सिवा और किसे पुकारूँ?

जय अंजनि कुमार बलवंता। शंकरसुवन बीर हनुमंता॥

हे बलवान अंजनिपुत्र, आपकी जय हो! हे शिव के अंश, वीर हनुमान!

बदन कराल काल-कुल-घालक। राम सहाय सदा प्रतिपालक॥

आपका स्वरूप विकराल है और आप काल के कुल तक का नाश करने वाले हैं; आप श्रीराम के सहायक और भक्तों के सदा रक्षक हैं।

भूत, प्रेत, पिसाच निसाचर। अगिन बेताल काल मारी मर॥

भूत, प्रेत, पिशाच और निशाचर — सभी नकारात्मक शक्तियाँ आपके प्रभाव से नष्ट हो जाती हैं।

इन्हें मारु, तोहि सपथ राम की। राखु नाथ मरजाद नाम की॥

आपको श्रीराम की शपथ — इन बाधाओं का निवारण कीजिए; हे नाथ, अपने नाम की मर्यादा रखिए।

जनकसुता हरि दास कहावौ। ताकी सपथ बिलंब न लावौ॥

आप माता जानकी और श्रीहरि के दास कहलाते हैं; उन्हीं की शपथ है — अब देर मत कीजिए।

जै जै जै धुनि होत अकासा। सुमिरत होय दुसह दुख नासा॥

आकाश में जय-जय-जय की ध्वनि होती है; आपका स्मरण करते ही असहनीय दुख भी नष्ट हो जाते हैं।

चरन पकरि, कर जोरि मनावौं। यहि औसर अब केहि गोहरावौं॥

आपके चरण पकड़कर, हाथ जोड़कर मनाता हूँ; इस समय आपके अतिरिक्त और किसे पुकारूँ?

उठु उठु चलु तोहि राम दुहाई। पाँय परौं कर जोरि मनाई॥

उठिए, उठिए, चलिए — आपको श्रीराम की दुहाई है; मैं चरणों में पड़कर, हाथ जोड़कर विनती करता हूँ।

ॐ चं चं चं चं चपल चलंता। ॐ हनु हनु हनु हनु हनुमंता॥

ॐ चं-चं-चं-चं — हे चपल गति से चलने वाले! ॐ हनु-हनु-हनु-हनु — हे हनुमंत!

ॐ हं हं हाँक देत कपि चंचल। ॐ सं सं सहमि पराने खल-दल॥

ॐ हं-हं — चंचल कपि जब ललकारते हैं, तो ॐ सं-सं — दुष्ट शक्तियों का समूह सहमकर भाग जाता है।

अपने जन को तुरत उबारौ। सुमिरत होय आनंद हमारौ॥

अपने भक्त की तुरंत रक्षा कीजिए; आपका स्मरण करते ही हमारे मन में आनंद भर जाता है।

यह बजरंग बाण जेहि मारै। ताहि कहौ फिरि कौन उबारै॥

यह बजरंग बाण जिस बाधा पर चलता है, कहिए फिर उसे कौन बचा सकता है?

पाठ करै बजरंग बाण की। हनुमत रक्षा करै प्रान की॥

जो बजरंग बाण का पाठ करता है, हनुमान जी उसके प्राणों की रक्षा करते हैं।

यह बजरंग बाण जो जापैं। तासों भूत-प्रेत सब कापैं॥

जो इस बजरंग बाण का जप करता है, उससे समस्त नकारात्मक शक्तियाँ काँप उठती हैं।

धूप देय अरु जपै हमेसा। ताके तन नहिं रहै कलेसा॥

जो धूप अर्पित कर नित्य इसका जप करता है, उसके शरीर व मन में क्लेश नहीं रहते।

उर प्रतीति दृढ़, सरन ह्वै, पाठ करै धरि ध्यान। बाधा सब हर, करैं सब काम सफल हनुमान॥

जो हृदय में दृढ़ विश्वास रखकर, शरण में आकर, ध्यानपूर्वक इस पाठ को करता है — हनुमान जी उसकी सब बाधाएँ हर लेते हैं और उसके सभी कार्य सफल कर देते हैं।

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अर्थ (हिन्दी)

  1. जो सच्चे प्रेम और अटूट विश्वास के साथ, आदरपूर्वक विनती करता है — हनुमान जी उसके सभी शुभ कार्य सिद्ध कर देते हैं।
  2. हे संतों का हित करने वाले हनुमान जी, आपकी जय हो! हे प्रभु, हमारी विनती सुन लीजिए।
  3. अपने भक्त के काम में देर मत कीजिए; शीघ्र दौड़कर आइए और महान सुख दीजिए।
  4. जैसे आपने छलाँग लगाकर समुद्र पार किया और सुरसा के मुख में प्रवेश कर अपना रूप बढ़ा लिया।
  5. आगे बढ़ने पर लंकिनी ने रोका; आपके प्रहार से उसका उद्धार हुआ और वह देवलोक को चली गई।
  6. वहाँ जाकर आपने विभीषण को सुख दिया और माता सीता के दर्शन कर परम पद प्राप्त किया।
  7. आपने अशोक वाटिका उजाड़ी और शत्रुओं को समुद्र में डुबो दिया; अत्यंत वेग से आपने काल के समान भय को तोड़ दिया।
  8. आपने अक्षय कुमार का संहार किया और अपनी पूँछ लपेटकर लंका को जला दिया।
  9. लंका लाख के समान जल उठी; देवलोक और आकाश में जय-जयकार की ध्वनि गूँज उठी।
  10. हे स्वामी, अब देर किस कारण? हे हृदय के अंतर्यामी, कृपा कीजिए।
  11. हे लक्ष्मण को प्राण देने वाले, आपकी जय हो! शीघ्रता कर हमारे दुखों का नाश कीजिए।
  12. हे बल के सागर हनुमान, आपकी जय हो! आप देव-समूह में समर्थ और वीरों में श्रेष्ठ हैं।
  13. ॐ हनु-हनु-हनु, हे दृढ़ प्रतिज्ञ हनुमान! वज्र की कीलों से बाधाओं और बुरी शक्तियों को दूर कीजिए।
  14. गदा और वज्र लेकर विरोधी शक्तियों का निवारण कीजिए; हे महाराज प्रभु, अपने दास की रक्षा कीजिए।
  15. हमारी पुकार सुनकर हुंकार भरते हुए दौड़ आइए; वज्र-गदा लेकर, हे हनुमान, देर मत कीजिए।
  16. ॐ ह्रीं-ह्रीं-ह्रीं, हे वानरों के स्वामी हनुमंत! ॐ हुं-हुं-हुं — विरोधी शक्तियों का बल क्षीण कीजिए।
  17. हे रामदूत, श्रीहरि की शपथ पाकर सत्य कीजिए; शीघ्र आकर बाधाओं को दूर कीजिए।
  18. हे अथाह सामर्थ्य वाले हनुमान, आपकी तीन बार जय हो! आपका भक्त किस अपराध के कारण दुख पा रहा है?
  19. पूजा, जप, तप, नियम और आचार — आपका यह दास इनमें से कुछ भी नहीं जानता; बस आपका सहारा है।
  20. वन हो या उपवन, मार्ग हो, पर्वत हो या घर — आपके बल के भरोसे हम कहीं भी नहीं डरते।
  21. मैं आपके चरणों में पड़कर, हाथ जोड़कर मनाता हूँ; इस समय आपके सिवा और किसे पुकारूँ?
  22. हे बलवान अंजनिपुत्र, आपकी जय हो! हे शिव के अंश, वीर हनुमान!
  23. आपका स्वरूप विकराल है और आप काल के कुल तक का नाश करने वाले हैं; आप श्रीराम के सहायक और भक्तों के सदा रक्षक हैं।
  24. भूत, प्रेत, पिशाच और निशाचर — सभी नकारात्मक शक्तियाँ आपके प्रभाव से नष्ट हो जाती हैं।
  25. आपको श्रीराम की शपथ — इन बाधाओं का निवारण कीजिए; हे नाथ, अपने नाम की मर्यादा रखिए।
  26. आप माता जानकी और श्रीहरि के दास कहलाते हैं; उन्हीं की शपथ है — अब देर मत कीजिए।
  27. आकाश में जय-जय-जय की ध्वनि होती है; आपका स्मरण करते ही असहनीय दुख भी नष्ट हो जाते हैं।
  28. आपके चरण पकड़कर, हाथ जोड़कर मनाता हूँ; इस समय आपके अतिरिक्त और किसे पुकारूँ?
  29. उठिए, उठिए, चलिए — आपको श्रीराम की दुहाई है; मैं चरणों में पड़कर, हाथ जोड़कर विनती करता हूँ।
  30. ॐ चं-चं-चं-चं — हे चपल गति से चलने वाले! ॐ हनु-हनु-हनु-हनु — हे हनुमंत!
  31. ॐ हं-हं — चंचल कपि जब ललकारते हैं, तो ॐ सं-सं — दुष्ट शक्तियों का समूह सहमकर भाग जाता है।
  32. अपने भक्त की तुरंत रक्षा कीजिए; आपका स्मरण करते ही हमारे मन में आनंद भर जाता है।
  33. यह बजरंग बाण जिस बाधा पर चलता है, कहिए फिर उसे कौन बचा सकता है?
  34. जो बजरंग बाण का पाठ करता है, हनुमान जी उसके प्राणों की रक्षा करते हैं।
  35. जो इस बजरंग बाण का जप करता है, उससे समस्त नकारात्मक शक्तियाँ काँप उठती हैं।
  36. जो धूप अर्पित कर नित्य इसका जप करता है, उसके शरीर व मन में क्लेश नहीं रहते।
  37. जो हृदय में दृढ़ विश्वास रखकर, शरण में आकर, ध्यानपूर्वक इस पाठ को करता है — हनुमान जी उसकी सब बाधाएँ हर लेते हैं और उसके सभी कार्य सफल कर देते हैं।

लाभ

  • भय, चिंता और नकारात्मक प्रभावों से रक्षा का भाव मिलता है।
  • संकट के समय मन को साहस, संबल और भरोसा मिलता है।
  • शनि की साढ़ेसाती व कठिन दौर में मानसिक शांति का सहारा माना जाता है।
  • नियमित पाठ से एकाग्रता और आत्मबल बढ़ता है।

कब करें पाठ

मंगलवार व शनिवार कोसंकट, भय या कठिन समय मेंरात्रि में शयन से पूर्वहनुमान जयंती पर

पाठ विधि

स्नान कर स्वच्छ वस्त्र धारण करें और हनुमान जी के समक्ष चमेली के तेल का दीपक तथा धूप जलाएँ। परंपरा में बजरंग बाण का पाठ हनुमान चालीसा के बाद करने का विधान कहा गया है। पूर्व या उत्तर दिशा की ओर मुख कर, शांत मन से, शुद्ध उच्चारण के साथ पाठ करें। मंगलवार-शनिवार को गुड़-चने या बूँदी का भोग लगाएँ। इसे श्रद्धा, संयम व स्वच्छता के साथ पढ़ने की परंपरा है; पाठ के अंत में हनुमान जी से क्षमा-प्रार्थना कर आशीर्वाद माँगें।

प्रामाणिकता व स्रोत

स्थिति✓ संपूर्ण
स्रोत परंपरागोस्वामी तुलसीदास — बजरंग बाण (अवधी मूल, परंपरागत पाठ) · प्रचलित प्रकाशित पाठों से मिलान — पाठभेद संभव
रचयितागोस्वामी तुलसीदास (परंपरागत मान्यता)
अंतिम अद्यतनजून 2026

संपादकीय टिप्पणी: यह पाठ व्यापक रूप से प्रचलित परंपरागत रूप पर आधारित है और कई प्रकाशित स्रोतों से मिलान किया गया है। बजरंग बाण के विभिन्न प्रकाशित संस्करणों में कुछ शब्द-भेद (पाठभेद) मिलते हैं — जैसे "विनय/बिनय" व "सनमान/सन्मान"। पाठ करते समय अपने परिवार या गुरु-परंपरा में प्रचलित रूप का अनुसरण करना भी उचित है।

देव परिचय

श्री हनुमान

Lord Hanuman

पवनपुत्र हनुमान भक्ति, बल और निर्भयता के प्रतीक हैं — श्रीराम के परम भक्त और संकटमोचन।

देवता वर्गशक्ति · भक्ति · रक्षा · साहस · संकटमोचन
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