श्री शिव आरती

śrī śiva āratī

Shiv Aarti (Om Jai Shiv Omkara)

समय
5–6 मिनट
श्लोक/चौपाई
12
कठिनाई
सरल
शुभ दिन
सोमवार, प्रदोष, महाशिवरात्रि; नित्य संध्या
उद्देश्य:भक्ति (Devotion)मन की शांति (Peace)मोक्ष (Liberation)
✓ संपूर्ण

"ॐ जय शिव ओंकारा" भगवान शिव की सबसे प्रचलित आरती है। इसके बारह पद एक ही बात को अलग-अलग ढंग से कहते हैं — ब्रह्मा, विष्णु और सदाशिव तीन नहीं, एक हैं: "प्रणवाक्षर में शोभित ये तीनों एका"। फलश्रुति में छाप "शिवानंद स्वामी" की है।

परिचय

महादेव शिव त्रिदेवों में संहारक और कल्याणकारी देव हैं — योग, ध्यान और मोक्ष के अधिपति।

स्रोत: "ॐ जय शिव ओंकारा" — परंपरागत आरती; फलश्रुति में छाप "शिवानंद स्वामी"

एक नज़र में

मंत्र / पाठश्री शिव आरती
IASTśrī śiva āratī
देवताश्री शिव
मूल स्रोत"ॐ जय शिव ओंकारा" — परंपरागत आरती; फलश्रुति में छाप "शिवानंद स्वामी"
शुभ दिनसोमवार, प्रदोष, महाशिवरात्रि; नित्य संध्या
पाठ समय5–6 मिनट
कठिनाईसरल

उद्भव / पृष्ठभूमि

इस आरती की बनावट अनोखी है — इसके पहले सात पद शिव की अकेले स्तुति नहीं करते, बल्कि त्रिमूर्ति को एक साथ गाते हैं, और हर पंक्ति में तीन चीज़ें गिनाते हैं।

तीन-तीन की गिनती (पद 2–6). "एकानन चतुरानन पंचानन राजे" — एक मुख, चार मुख (ब्रह्मा), पाँच मुख (शिव); "हंसासन गरूड़ासन वृषवाहन साजे" — हंस (ब्रह्मा), गरुड़ (विष्णु), बैल (शिव)। इसी तरह माला (अक्ष, वन, मुंड), वस्त्र (श्वेत, पीत, बाघम्बर), संगी (सनकादि, गरुड़ादि, भूतादि), और हाथ के आयुध (कमंडलु, चक्र, त्रिशूल)। हर पंक्ति ब्रह्मा-विष्णु-शिव के क्रम में चलती है।

निष्कर्ष (पद 7). फिर आरती अपना सिद्धांत कहती है — "ब्रह्मा विष्णु सदाशिव जानत अविवेका, प्रणवाक्षर में शोभित ये तीनों एका": जो इन्हें अलग-अलग जानते हैं, वे अविवेकी हैं; ॐ (प्रणव) के अक्षर में ये तीनों एक हैं। यही बात पहले पद की टेक "ॐ जय शिव ओंकारा" में छिपी है।

कैलास और काशी (पद 8–11). फलश्रुति के बाद के चार पद शिव-परिवार और शिव-धाम के हैं — लक्ष्मी, सावित्री और पार्वती का संग; "पर्वत सोहैं पार्वती, शंकर कैलासा; भांग धतूर का भोजन, भस्मी में वासा"; जटा में गंगा, गले में मुंडमाला, शेषनाग और मृगछाला; और अंत में "काशी में विराजे विश्वनाथ, नंदी ब्रह्मचारी"।

आरती (लिरिक्स)

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ॐ जय शिव ओंकारा, स्वामी जय शिव ओंकारा। ब्रह्मा, विष्णु, सदाशिव, अर्द्धांगी धारा॥

हे ओंकार-स्वरूप शिव, हे स्वामी, आपकी जय हो! ब्रह्मा, विष्णु और सदाशिव (आपके ही रूप हैं), और आप (पार्वती को) अर्धांगिनी रूप में धारण करते हैं।

एकानन चतुरानन पंचानन राजे। हंसासन गरूड़ासन वृषवाहन साजे॥

एक मुख वाले, चार मुख वाले (ब्रह्मा) और पाँच मुख वाले (शिव) रूप में आप विराजते हैं; हंस (ब्रह्मा), गरुड़ (विष्णु) और बैल (शिव) — ये आपके वाहन हैं।

दो भुज चार चतुर्भुज दसभुज अति सोहे। त्रिगुण रूप निरखते त्रिभुवन जन मोहे॥

दो भुजाओं, चार भुजाओं और दस भुजाओं वाले रूप अत्यंत शोभा पाते हैं; (सत्व, रज, तम के) तीनों गुणों वाले रूप को देखकर तीनों लोकों के लोग मोहित हो जाते हैं।

अक्षमाला वनमाला, मुण्डमाला धारी। चंदन मृगमद सोहै, भाले शशिधारी॥

आप अक्षमाला (रुद्राक्ष), वनमाला और मुंडमाला धारण करते हैं; चंदन और कस्तूरी शोभा पाते हैं, और मस्तक पर चंद्रमा धारण किए हैं।

श्वेताम्बर पीताम्बर बाघम्बर अंगे। सनकादिक गरुणादिक भूतादिक संगे॥

अंगों पर श्वेत वस्त्र, पीताम्बर और बाघम्बर (बाघ की खाल) हैं; सनक आदि ऋषि, गरुड़ आदि और भूत-गण आपके संग रहते हैं।

कर के मध्य कमंडल, चक्र त्रिशूलधारी। सुखकारी दुखहारी जगपालन कारी॥

हाथों में कमंडलु, चक्र और त्रिशूल धारण किए हैं; आप सुख देने वाले, दुख हरने वाले और जगत का पालन करने वाले हैं।

ब्रह्मा विष्णु सदाशिव जानत अविवेका। प्रणवाक्षर में शोभित ये तीनों एका॥

अविवेकी लोग ब्रह्मा, विष्णु और सदाशिव को (अलग-अलग) जानते हैं; पर प्रणव-अक्षर (ॐ) में शोभित ये तीनों एक ही हैं।

त्रिगुणस्वामी जी की आरति जो कोइ नर गावे। कहत शिवानंद स्वामी सुख संपति पावे॥

(फलश्रुति) तीनों गुणों के स्वामी की यह आरती जो कोई मनुष्य गाता है — स्वामी शिवानंद कहते हैं — वह सुख और संपत्ति पाता है।

लक्ष्मी व सावित्री पार्वती संगा। पार्वती अर्द्धांगी, शिवलहरी गंगा॥

लक्ष्मी, सावित्री और पार्वती संग हैं; पार्वती अर्धांगिनी हैं, और गंगा शिव की लहर हैं।

पर्वत सोहैं पार्वती, शंकर कैलासा। भांग धतूर का भोजन, भस्मी में वासा॥

पर्वत पर पार्वती शोभा पाती हैं और शंकर कैलास पर; भांग-धतूरा उनका भोजन है और भस्म में उनका वास है।

जटा में गंग बहत है, गल मुण्डन माला। शेष नाग लिपटावत, ओढ़त मृगछाला॥

जटाओं में गंगा बहती हैं, गले में मुंडों की माला है; शेषनाग लिपटे रहते हैं और वे मृगछाला ओढ़ते हैं।

काशी में विराजे विश्वनाथ, नंदी ब्रह्मचारी। नित उठ दर्शन पावत, महिमा अति भारी॥

काशी में विश्वनाथ विराजते हैं, और (द्वार पर) ब्रह्मचारी नंदी; जो नित्य उठकर दर्शन पाते हैं, (उनके लिए) इसकी महिमा अत्यंत भारी है।

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अर्थ (हिन्दी)

  1. हे ओंकार-स्वरूप शिव, हे स्वामी, आपकी जय हो! ब्रह्मा, विष्णु और सदाशिव (आपके ही रूप हैं), और आप (पार्वती को) अर्धांगिनी रूप में धारण करते हैं।
  2. एक मुख वाले, चार मुख वाले (ब्रह्मा) और पाँच मुख वाले (शिव) रूप में आप विराजते हैं; हंस (ब्रह्मा), गरुड़ (विष्णु) और बैल (शिव) — ये आपके वाहन हैं।
  3. दो भुजाओं, चार भुजाओं और दस भुजाओं वाले रूप अत्यंत शोभा पाते हैं; (सत्व, रज, तम के) तीनों गुणों वाले रूप को देखकर तीनों लोकों के लोग मोहित हो जाते हैं।
  4. आप अक्षमाला (रुद्राक्ष), वनमाला और मुंडमाला धारण करते हैं; चंदन और कस्तूरी शोभा पाते हैं, और मस्तक पर चंद्रमा धारण किए हैं।
  5. अंगों पर श्वेत वस्त्र, पीताम्बर और बाघम्बर (बाघ की खाल) हैं; सनक आदि ऋषि, गरुड़ आदि और भूत-गण आपके संग रहते हैं।
  6. हाथों में कमंडलु, चक्र और त्रिशूल धारण किए हैं; आप सुख देने वाले, दुख हरने वाले और जगत का पालन करने वाले हैं।
  7. अविवेकी लोग ब्रह्मा, विष्णु और सदाशिव को (अलग-अलग) जानते हैं; पर प्रणव-अक्षर (ॐ) में शोभित ये तीनों एक ही हैं।
  8. (फलश्रुति) तीनों गुणों के स्वामी की यह आरती जो कोई मनुष्य गाता है — स्वामी शिवानंद कहते हैं — वह सुख और संपत्ति पाता है।
  9. लक्ष्मी, सावित्री और पार्वती संग हैं; पार्वती अर्धांगिनी हैं, और गंगा शिव की लहर हैं।
  10. पर्वत पर पार्वती शोभा पाती हैं और शंकर कैलास पर; भांग-धतूरा उनका भोजन है और भस्म में उनका वास है।
  11. जटाओं में गंगा बहती हैं, गले में मुंडों की माला है; शेषनाग लिपटे रहते हैं और वे मृगछाला ओढ़ते हैं।
  12. काशी में विश्वनाथ विराजते हैं, और (द्वार पर) ब्रह्मचारी नंदी; जो नित्य उठकर दर्शन पाते हैं, (उनके लिए) इसकी महिमा अत्यंत भारी है।

लाभ

  • त्रिमूर्ति की एकता का भाव — "प्रणवाक्षर में शोभित ये तीनों एका" (7)।
  • फलश्रुति: आरती गाने वाला सुख और संपत्ति पाता है।
  • सोमवार और प्रदोष की पूजा का समापन इसी आरती से होता है।
  • शिव-धाम काशी और कैलास का स्मरण — पद 9 और 11।

कब करें पाठ

सोमवार कोप्रदोष काल मेंमहाशिवरात्रि परप्रातः व संध्या पूजा के अंत में

पाठ विधि

शिवलिंग पर जल, बेलपत्र, धतूरा और सफ़ेद पुष्प अर्पित करें; दीप या कपूर जलाकर आरती गाएँ। पहली टेक "ॐ जय शिव ओंकारा, स्वामी जय शिव ओंकारा" हर पद के बाद दोहराई जाती है। अंत में आरती की लौ पर हाथ घुमाकर माथे से लगाएँ और "हर हर महादेव" का उद्घोष करें।

प्रामाणिकता व स्रोत

स्थिति✓ संपूर्ण
स्रोत परंपराbhaktibharat.com — आरती: श्री शिव, शंकर, भोलेनाथ (आधार-पाठ) · bhaktisandhya.com — ॐ जय शिव ओंकारा · hinduismfaq.com — शिव आरती - ॐ जय शिव ओंकारा · drikpanchang.com — शिवजी की आरती · sampurnchalisa.com — शिवजी की आरती
रचयिताशिवानंद स्वामी (फलश्रुति की छाप)
अंतिम अद्यतनसितंबर 2026

यह भी देखें

देव परिचय

श्री शिव

Lord Shiva

महादेव शिव त्रिदेवों में संहारक और कल्याणकारी देव हैं — योग, ध्यान और मोक्ष के अधिपति।

देवता वर्गसंहार · योग · ध्यान · कल्याण · मोक्ष
वाहननंदी (वृषभ)
संबंधित वारसोमवार
मुख्य मंत्रॐ नमः शिवाय
सभी पाठ देखें

श्री शिव आरती — सामान्य प्रश्न

श्री शिव भक्ति संग्रह

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