श्री शिव चालीसा

śrī śiva cālīsā

Shiv Chalisa (Jai Girija Pati Deen Dayala)

समय
8–10 मिनट
श्लोक/चौपाई
44
कठिनाई
सरल
शुभ दिन
सोमवार व प्रदोष; महाशिवरात्रि
उद्देश्य:शांति (Peace)संकट-निवारण (Relief from troubles)मोक्ष (Liberation)
✓ संपूर्ण (41/41 श्लोक)

श्री शिव चालीसा "जय गिरिजा पति दीन दयाला, सदा करत सन्तन प्रतिपाला" वाली भगवान शिव की स्तुति है। इसमें आरंभ में एक दोहा, 41 चौपाइयाँ और अंत में दो दोहे हैं। इसकी छाप अयोध्यादास की है, और अंतिम दोहा बताता है कि चालीसा मगसर की छठ, हेमंत ऋतु में पूरी हुई।

परिचय

महादेव शिव त्रिदेवों में संहारक और कल्याणकारी देव हैं — योग, ध्यान और मोक्ष के अधिपति।

स्रोत: "जय गिरिजा पति दीन दयाला" — परंपरागत शिव चालीसा; आरंभिक दोहे और चौपाई 41 में छाप "अयोध्यादास"

एक नज़र में

मंत्र / पाठश्री शिव चालीसा
IASTśrī śiva cālīsā
देवताश्री शिव
मूल स्रोत"जय गिरिजा पति दीन दयाला" — परंपरागत शिव चालीसा; आरंभिक दोहे और चौपाई 41 में छाप "अयोध्यादास"
शुभ दिनसोमवार व प्रदोष; महाशिवरात्रि
पाठ समय8–10 मिनट
कठिनाईसरल

उद्भव / पृष्ठभूमि

शिव चालीसा पहले भगवान शिव का रूप दिखाती है, फिर उनकी कथाएँ कहती है, और अंत में भक्त की पुकार बन जाती है।

रूप (चौपाई 2–9). "भाल चन्द्रमा सोहत नीके, कानन कुण्डल नागफनी के" — माथे पर चंद्रमा, कानों में नागफनी के कुंडल, सिर पर गंगा, बाघम्बर; बाईं ओर मैना की दुलारी पार्वती, और साथ में नंदी, गणेश और कार्तिकेय।

कथाएँ (चौपाई 11–24). तारकासुर को मारने के लिए षडानन (कार्तिकेय) को भेजना, जलंधर और त्रिपुरासुर का संहार, भागीरथ का तप, और समुद्र-मंथन का विष — "नीलकण्ठ तब नाम कहाई"। फिर श्रीराम की पूजा का प्रसंग: हज़ार कमलों में एक कमल छिपाया गया, तो राम ने अपना कमल-नयन (आँख) चढ़ाना चाहा, और शिव ने प्रसन्न होकर वर दिया।

भक्त की पुकार (चौपाई 26–32). "मात-पिता भ्राता सब होई, संकट में पूछत नहिं कोई" — संकट में कोई साथ नहीं देता, इसलिए भक्त एक शिव की आस रखता है।

पाठ का विधान (चौपाई 36–41). पाठ, त्रयोदशी का व्रत, धूप-दीप-नैवेद्य, और छाप — "कहैं अयोध्यादास आस तुम्हारी"। अंतिम दोहा रचना का समय बताता है: "मगसर छठि हेमन्त ॠतु, संवत चौसठ जान"।

संपूर्ण चालीसा

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जय गणेश गिरिजा सुवन, मंगल मूल सुजान। कहत अयोध्यादास तुम, देहु अभय वरदान॥

(दोहा) हे गिरिजा के पुत्र गणेश, आपकी जय हो — आप मंगल के मूल और सुजान हैं। अयोध्यादास कहते हैं — मुझे अभय का वरदान दीजिए।

जय गिरिजा पति दीन दयाला। सदा करत सन्तन प्रतिपाला॥

हे गिरिजापति (शिव), दीनों पर दया करने वाले, आपकी जय हो; आप सदा संतों का पालन करते हैं।

भाल चन्द्रमा सोहत नीके। कानन कुण्डल नागफनी के॥

आपके मस्तक पर चंद्रमा सुशोभित है और कानों में सर्प के फनों के कुण्डल शोभा देते हैं।

अंग गौर शिर गंग बहाये। मुण्डमाल तन क्षार लगाए॥

आपका गौर वर्ण शरीर है, सिर पर गंगा बहती है; गले में मुण्डमाला और शरीर पर भस्म लगाए हैं।

वस्त्र खाल बाघम्बर सोहे। छवि को देखि नाग मन मोहे॥

वस्त्र रूप में व्याघ्रचर्म सुशोभित है; आपकी छवि देखकर सर्प भी मोहित हो जाते हैं।

मैना मातु की हवे दुलारी। बाम अंग सोहत छवि न्यारी॥

मैना माता की दुलारी पार्वती आपके वाम अंग में विराजमान हैं — यह निराली छवि शोभा देती है।

कर त्रिशूल सोहत छवि भारी। करत सदा शत्रुन क्षयकारी॥

हाथ में त्रिशूल अति शोभायमान है, जिससे आप सदा शत्रुओं का नाश करते हैं।

नन्दि गणेश सोहै तहँ कैसे। सागर मध्य कमल हैं जैसे॥

वहाँ नंदी और गणेश ऐसे सुशोभित हैं जैसे सागर के मध्य कमल शोभा देता है।

कार्तिक श्याम और गणराऊ। या छवि को कहि जात न काऊ॥

कार्तिकेय, श्याम-वर्ण और गणेश — इस दिव्य परिवार की छवि का वर्णन कोई नहीं कर सकता।

देवन जबहीं जाय पुकारा। तब ही दुख प्रभु आप निवारा॥

जब-जब देवताओं ने पुकारा, तब-तब हे प्रभु, आपने उनके दुःख का निवारण किया।

किया उपद्रव तारक भारी। देवन सब मिलि तुमहिं जुहारी॥

तारकासुर ने भारी उत्पात मचाया; तब सब देवताओं ने मिलकर आपको नमन किया।

तुरत षडानन आप पठायउ। लवनिमेष महँ मारि गिरायउ॥

आपने तुरंत षडानन (कार्तिकेय) को भेजा, जिन्होंने पल भर में ही तारक को मार गिराया।

आप जलंधर असुर संहारा। सुयश तुम्हार विदित संसारा॥

आपने जलंधर असुर का संहार किया; आपका यश समस्त संसार में विदित है।

त्रिपुरासुर सन युद्ध मचाई। सबहिं कृपा कर लीन बचाई॥

त्रिपुरासुर से युद्ध छेड़कर आपने कृपापूर्वक सबको बचाया।

किया तपहिं भागीरथ भारी। पुरब प्रतिज्ञा तासु पुरारी॥

भागीरथ ने भारी तप किया और उनकी पूर्व प्रतिज्ञा आपने (पुरारी — शिव) पूर्ण की।

दानिन महँ तुम सम कोउ नाहीं। सेवक स्तुति करत सदाहीं॥

दाताओं में आप जैसा दानी कोई नहीं; आपके सेवक सदा आपकी स्तुति करते रहते हैं।

वेद नाम महिमा तव गाई। अकथ अनादि भेद नहिं पाई॥

वेदों ने आपकी महिमा गाई है; किंतु आपके अनादि रहस्य का भेद कोई नहीं पा सका।

प्रकटी उदधि मंथन में ज्वाला। जरत सुरासुर भए विहाला॥

समुद्र-मंथन में ज्वाला (हलाहल विष) प्रकट हुई, जिससे देवता और असुर जलकर व्याकुल हो गए।

कीन्ही दया तहं करी सहाई। नीलकण्ठ तब नाम कहाई॥

वहाँ आपने दया करके हलाहल पी लिया; तभी से आप नीलकंठ नाम से जाने जाते हैं।

पूजन रामचन्द्र जब कीन्हा। जीत के लंक विभीषण दीन्हा॥

जब श्रीरामचंद्र ने आपका पूजन किया, तब उन्होंने लंका को जीतकर विभीषण को दे दिया।

सहस कमल में हो रहे धारी। कीन्ह परीक्षा तबहिं पुरारी॥

सहस्र कमल से पूजन हो रहा था; तभी पुरारी (शिव) ने परीक्षा ली।

एक कमल प्रभु राखेउ जोई। कमल नयन पूजन चहं सोई॥

प्रभु ने एक कमल छिपाया; तब कमलनयन (राम) ने उसके स्थान पर अपना नेत्र-कमल अर्पित करना चाहा।

कठिन भक्ति देखी प्रभु शंकर। भए प्रसन्न दिए इच्छित वर॥

श्रीराम की कठिन भक्ति देखकर भगवान शंकर प्रसन्न हुए और उन्हें मनोवांछित वर दिया।

जय जय जय अनन्त अविनाशी। करत कृपा सब के घटवासी॥

हे अनंत, अविनाशी प्रभु, आपकी जय हो; आप सबके हृदय में वास कर सबकी कृपा करते हैं।

दुष्ट सकल नित मोहि सतावै। भ्रमत रहौं मोहि चैन न आवै॥

सब दुष्ट नित्य मुझे सताते रहते हैं; भटकता रहता हूँ, मुझे चैन नहीं मिलता।

त्राहि त्राहि मैं नाथ पुकारो। येहि अवसर मोहि आन उबारो॥

त्राहि-त्राहि कहकर मैं नाथ को पुकारता हूँ; इस अवसर पर आकर मुझे उबारिए।

लै त्रिशूल शत्रुन को मारो। संकट से मोहि आन उबारो॥

त्रिशूल लेकर (मेरे) शत्रुओं को मारिए और आकर मुझे संकट से उबारिए।

मात-पिता भ्राता सब होई। संकट में पूछत नहिं कोई॥

माता-पिता, भाई — सब (रिश्ते) होते हैं, पर संकट में कोई नहीं पूछता।

स्वामी एक है आस तुम्हारी। आय हरहु मम संकट भारी॥

हे स्वामी, एक आपकी ही आशा है; आकर मेरे भारी संकट हर लीजिए।

धन निर्धन को देत सदा हीं। जो कोई जांचे सो फल पाहीं॥

आप निर्धन को सदा धन देते हैं; जो कोई (आपसे) माँगता है, वह फल पाता है।

अस्तुति केहि विधि करैं तुम्हारी। क्षमहु नाथ अब चूक हमारी॥

आपकी स्तुति मैं किस विधि से करूँ? हे नाथ, अब हमारी भूल क्षमा कीजिए।

शंकर हो संकट के नाशन। मंगल कारण विघ्न विनाशन॥

हे शंकर, आप संकटों के नाशक हैं; आप मंगल के कारण और विघ्नों के विनाशक हैं।

योगी यति मुनि ध्यान लगावैं। शारद नारद शीश नवावैं॥

योगी, यति और मुनि आपका ध्यान लगाते हैं; सरस्वती और नारद भी शीश नवाते हैं।

नमो नमो जय नमः शिवाय। सुर ब्रह्मादिक पार न पाय॥

नमः शिवाय — आपको बार-बार नमस्कार, आपकी जय हो; ब्रह्मा आदि देवता भी आपका पार नहीं पा सके।

जो यह पाठ करे मन लाई। ता पर होत है शम्भु सहाई॥

जो मन लगाकर इस चालीसा का पाठ करता है, उस पर शम्भु सदा सहायक होते हैं।

ॠनियां जो कोई हो अधिकारी। पाठ करे सो पावन हारी॥

जो भी कर्ज में हो या किसी भार से दबा हो — यह पाठ करने से वह शुद्ध और भार-मुक्त होता है।

पुत्र हीन कर इच्छा जोई। निश्चय शिव प्रसाद तेहि होई॥

जो पुत्र-रहित व्यक्ति इच्छा रखे और यह पाठ करे, उसे निश्चय शिव प्रसाद की प्राप्ति होती है।

पण्डित त्रयोदशी को लावे। ध्यान पूर्वक होम करावे॥

त्रयोदशी को विद्वान पंडित को बुलाएँ और ध्यानपूर्वक होम करवाएँ।

त्रयोदशी व्रत करै हमेशा। ताके तन नहीं रहै कलेशा॥

जो हमेशा त्रयोदशी का व्रत करे, उसके शरीर में कोई कलेश नहीं रहता।

धूप दीप नैवेद्य चढ़ावे। शंकर सम्मुख पाठ सुनावे॥

धूप, दीप और नैवेद्य चढ़ाएँ और शंकर जी के सम्मुख चालीसा का पाठ सुनाएँ।

जन्म जन्म के पाप नसावे। अन्त धाम शिवपुर में पावे॥

जन्म-जन्मांतर के पाप नष्ट होते हैं और अंत में शिवपुर (कैलाश) में स्थान मिलता है।

कहैं अयोध्यादास आस तुम्हारी। जानि सकल दुःख हरहु हमारी॥

अयोध्यादास आपसे आशा रखते हैं; हमारे सब दुःखों को जानकर हर लीजिए।

नित्त नेम कर प्रातः ही, पाठ करौं चालीसा। तुम मेरी मनोकामना, पूर्ण करो जगदीश॥

(दोहा) नित्य नियम से प्रातःकाल मैं चालीसा का पाठ करता हूँ; हे जगदीश, मेरी मनोकामना पूरी कीजिए।

मगसर छठि हेमन्त ॠतु, संवत चौसठ जान। अस्तुति चालीसा शिवहि, पूर्ण कीन कल्याण॥

(दोहा) मार्गशीर्ष (अगहन) की षष्ठी, हेमंत ऋतु और संवत चौंसठ — इस समय शिव की यह स्तुति-चालीसा कल्याण के लिए पूरी हुई।

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अर्थ (हिन्दी)

  1. (दोहा) हे गिरिजा के पुत्र गणेश, आपकी जय हो — आप मंगल के मूल और सुजान हैं। अयोध्यादास कहते हैं — मुझे अभय का वरदान दीजिए।
  2. हे गिरिजापति (शिव), दीनों पर दया करने वाले, आपकी जय हो; आप सदा संतों का पालन करते हैं।
  3. आपके मस्तक पर चंद्रमा सुशोभित है और कानों में सर्प के फनों के कुण्डल शोभा देते हैं।
  4. आपका गौर वर्ण शरीर है, सिर पर गंगा बहती है; गले में मुण्डमाला और शरीर पर भस्म लगाए हैं।
  5. वस्त्र रूप में व्याघ्रचर्म सुशोभित है; आपकी छवि देखकर सर्प भी मोहित हो जाते हैं।
  6. मैना माता की दुलारी पार्वती आपके वाम अंग में विराजमान हैं — यह निराली छवि शोभा देती है।
  7. हाथ में त्रिशूल अति शोभायमान है, जिससे आप सदा शत्रुओं का नाश करते हैं।
  8. वहाँ नंदी और गणेश ऐसे सुशोभित हैं जैसे सागर के मध्य कमल शोभा देता है।
  9. कार्तिकेय, श्याम-वर्ण और गणेश — इस दिव्य परिवार की छवि का वर्णन कोई नहीं कर सकता।
  10. जब-जब देवताओं ने पुकारा, तब-तब हे प्रभु, आपने उनके दुःख का निवारण किया।
  11. तारकासुर ने भारी उत्पात मचाया; तब सब देवताओं ने मिलकर आपको नमन किया।
  12. आपने तुरंत षडानन (कार्तिकेय) को भेजा, जिन्होंने पल भर में ही तारक को मार गिराया।
  13. आपने जलंधर असुर का संहार किया; आपका यश समस्त संसार में विदित है।
  14. त्रिपुरासुर से युद्ध छेड़कर आपने कृपापूर्वक सबको बचाया।
  15. भागीरथ ने भारी तप किया और उनकी पूर्व प्रतिज्ञा आपने (पुरारी — शिव) पूर्ण की।
  16. दाताओं में आप जैसा दानी कोई नहीं; आपके सेवक सदा आपकी स्तुति करते रहते हैं।
  17. वेदों ने आपकी महिमा गाई है; किंतु आपके अनादि रहस्य का भेद कोई नहीं पा सका।
  18. समुद्र-मंथन में ज्वाला (हलाहल विष) प्रकट हुई, जिससे देवता और असुर जलकर व्याकुल हो गए।
  19. वहाँ आपने दया करके हलाहल पी लिया; तभी से आप नीलकंठ नाम से जाने जाते हैं।
  20. जब श्रीरामचंद्र ने आपका पूजन किया, तब उन्होंने लंका को जीतकर विभीषण को दे दिया।
  21. सहस्र कमल से पूजन हो रहा था; तभी पुरारी (शिव) ने परीक्षा ली।
  22. प्रभु ने एक कमल छिपाया; तब कमलनयन (राम) ने उसके स्थान पर अपना नेत्र-कमल अर्पित करना चाहा।
  23. श्रीराम की कठिन भक्ति देखकर भगवान शंकर प्रसन्न हुए और उन्हें मनोवांछित वर दिया।
  24. हे अनंत, अविनाशी प्रभु, आपकी जय हो; आप सबके हृदय में वास कर सबकी कृपा करते हैं।
  25. सब दुष्ट नित्य मुझे सताते रहते हैं; भटकता रहता हूँ, मुझे चैन नहीं मिलता।
  26. त्राहि-त्राहि कहकर मैं नाथ को पुकारता हूँ; इस अवसर पर आकर मुझे उबारिए।
  27. त्रिशूल लेकर (मेरे) शत्रुओं को मारिए और आकर मुझे संकट से उबारिए।
  28. माता-पिता, भाई — सब (रिश्ते) होते हैं, पर संकट में कोई नहीं पूछता।
  29. हे स्वामी, एक आपकी ही आशा है; आकर मेरे भारी संकट हर लीजिए।
  30. आप निर्धन को सदा धन देते हैं; जो कोई (आपसे) माँगता है, वह फल पाता है।
  31. आपकी स्तुति मैं किस विधि से करूँ? हे नाथ, अब हमारी भूल क्षमा कीजिए।
  32. हे शंकर, आप संकटों के नाशक हैं; आप मंगल के कारण और विघ्नों के विनाशक हैं।
  33. योगी, यति और मुनि आपका ध्यान लगाते हैं; सरस्वती और नारद भी शीश नवाते हैं।
  34. नमः शिवाय — आपको बार-बार नमस्कार, आपकी जय हो; ब्रह्मा आदि देवता भी आपका पार नहीं पा सके।
  35. जो मन लगाकर इस चालीसा का पाठ करता है, उस पर शम्भु सदा सहायक होते हैं।
  36. जो भी कर्ज में हो या किसी भार से दबा हो — यह पाठ करने से वह शुद्ध और भार-मुक्त होता है।
  37. जो पुत्र-रहित व्यक्ति इच्छा रखे और यह पाठ करे, उसे निश्चय शिव प्रसाद की प्राप्ति होती है।
  38. त्रयोदशी को विद्वान पंडित को बुलाएँ और ध्यानपूर्वक होम करवाएँ।
  39. जो हमेशा त्रयोदशी का व्रत करे, उसके शरीर में कोई कलेश नहीं रहता।
  40. धूप, दीप और नैवेद्य चढ़ाएँ और शंकर जी के सम्मुख चालीसा का पाठ सुनाएँ।
  41. जन्म-जन्मांतर के पाप नष्ट होते हैं और अंत में शिवपुर (कैलाश) में स्थान मिलता है।
  42. अयोध्यादास आपसे आशा रखते हैं; हमारे सब दुःखों को जानकर हर लीजिए।
  43. (दोहा) नित्य नियम से प्रातःकाल मैं चालीसा का पाठ करता हूँ; हे जगदीश, मेरी मनोकामना पूरी कीजिए।
  44. (दोहा) मार्गशीर्ष (अगहन) की षष्ठी, हेमंत ऋतु और संवत चौंसठ — इस समय शिव की यह स्तुति-चालीसा कल्याण के लिए पूरी हुई।

लाभ

  • संकट में सहारा — "स्वामी एक है आस तुम्हारी, आय हरहु मम संकट भारी" (चौपाई 30)।
  • पाप-नाश और शिवधाम — "जन्म जन्म के पाप नसावे, अन्त धाम शिवपुर में पावे" (चौपाई 40)।
  • फलश्रुति: "जो यह पाठ करे मन लाई, ता पर होत है शम्भु सहाई" (चौपाई 36)।

कब करें पाठ

सोमवार कोप्रदोष (त्रयोदशी) कोमहाशिवरात्रि पर

पाठ विधि

शिवलिंग पर जल, बेलपत्र व पुष्प अर्पित करें। चालीसा स्वयं विधि बताती है — "धूप दीप नैवेद्य चढ़ावे, शंकर सम्मुख पाठ सुनावे" (चौपाई 39)। अंतिम दोहे के अनुसार पाठ नित्य नियम से प्रातःकाल करें।

प्रामाणिकता व स्रोत

स्थिति✓ संपूर्ण (41/41 श्लोक)
स्रोत परंपराbhaktibharat.com — शिव चालीसा (आधार-पाठ) · hindunidhi.com — शिव चालीसा · dharmsaar.com — शिव चालीसा · bhaktvatsal.com — शिव चालीसा · aartichalisa.com — शिव चालीसा
रचयिताअयोध्यादास (दोहे और चौपाई 41 की छाप)
अंतिम अद्यतनसितंबर 2026

यह भी देखें

देव परिचय

श्री शिव

Lord Shiva

महादेव शिव त्रिदेवों में संहारक और कल्याणकारी देव हैं — योग, ध्यान और मोक्ष के अधिपति।

देवता वर्गसंहार · योग · ध्यान · कल्याण · मोक्ष
वाहननंदी (वृषभ)
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मुख्य मंत्रॐ नमः शिवाय
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