करचरणकृतं — शिव क्षमा प्रार्थना

karacaraṇakṛtaṃ — śiva kṣamā prārthanā

Karacharan Kritam (Shiva Kshama Prarthana)

समय
1 मिनट
श्लोक
1
जप संख्या
1
कठिनाई
मध्यम
शुभ दिन
प्रतिदिन — पूजा के समापन पर
उद्देश्य:क्षमा याचना (Forgiveness)मन की शांति (Peace)आध्यात्मिक उन्नति (Spiritual Growth)
✓ संपूर्ण

करचरणकृतं आदि शंकराचार्य कृत शिवापराधक्षमापन स्तोत्रम् का क्षमा-प्रार्थना श्लोक है, जो पूजा के अंत में पढ़ा जाता है। इसमें साधक हाथ-पैर, वाणी, कर्म, इंद्रिय या मन से हुए सभी अपराधों — विहित व अविहित — की क्षमा माँगता है। यह जप-मंत्र नहीं, मन्दाक्रान्ता छंद का श्लोक है।

परिचय

महादेव शिव त्रिदेवों में संहारक और कल्याणकारी देव हैं — योग, ध्यान और मोक्ष के अधिपति।

स्रोत: शिवापराधक्षमापन स्तोत्रम् (आदि शंकराचार्य) — क्षमा प्रार्थना श्लोक

एक नज़र में

मंत्र / पाठकरचरणकृतं — शिव क्षमा प्रार्थना
IASTkaracaraṇakṛtaṃ — śiva kṣamā prārthanā
देवताश्री शिव
मूल स्रोतशिवापराधक्षमापन स्तोत्रम् (आदि शंकराचार्य) — क्षमा प्रार्थना श्लोक
जप संख्या1
शुभ दिनप्रतिदिन — पूजा के समापन पर
पाठ समय1 मिनट
कठिनाईमध्यम

उद्भव / पृष्ठभूमि

यह श्लोक पूजा के अंत में पढ़ी जाने वाली क्षमा-प्रार्थना है। भाव सीधा और मार्मिक है — साधक कहता है कि हाथ-पैर से, वाणी से, शरीर से, कर्म से, कानों-आँखों से या मन से मुझसे जो भी अपराध हुए हों; जो विहित (शास्त्र-सम्मत) हो और जो अविहित (शास्त्र-विरुद्ध) हो — हे करुणा के सागर महादेव, वह सब क्षमा कीजिए।

परंपरा में यह मान्यता है कि पूजा-पाठ में विधि की त्रुटि रह जाना स्वाभाविक है — मंत्र में स्खलन, क्रम में भूल, सामग्री में कमी। इसीलिए हर पूजा के अंत में यह प्रार्थना पढ़ने का विधान बताया जाता है, ताकि जो छूट गया या ग़लत हो गया, वह भाव से पूरा हो जाए। यह श्लोक आदि शंकराचार्य कृत "शिवापराधक्षमापन स्तोत्रम्" से आता है और आज सबसे अधिक स्वतंत्र रूप से ही पढ़ा जाता है।

छंद की दृष्टि से यह मन्दाक्रान्ता है — वही धीमी, गंभीर चाल वाला छंद जिसमें कालिदास का मेघदूत रचा गया। यही चाल इस प्रार्थना को उसका विनम्र, ठहरा हुआ स्वर देती है।

संपूर्ण स्तोत्र

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करचरणकृतं वाक्कायजं कर्मजं वा श्रवणनयनजं वा मानसं वापराधम्। विहितमविहितं वा सर्वमेतत्क्षमस्व जय जय करुणाब्धे श्रीमहादेव शम्भो॥

हाथ-पैर से किया गया, वाणी व शरीर से हुआ, कर्म से हुआ, अथवा कानों-आँखों या मन से हुआ — मुझसे जो भी अपराध हुआ हो; विहित हो या अविहित — हे करुणा के सागर, श्री महादेव शम्भो, यह सब क्षमा कीजिए। आपकी जय हो, जय हो।

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शब्द-अर्थ (Word-by-Word)

करचरणकृतंहाथ व पैर से किया गया
वाक्कायजंवाणी व शरीर से उत्पन्न
कर्मजंकर्म से उत्पन्न
श्रवणनयनजंकान व नेत्र से उत्पन्न
मानसंमन से किया गया
अपराधम्अपराध, त्रुटि
विहितम्शास्त्र-सम्मत, विधि-पूर्वक
अविहितम्शास्त्र-विरुद्ध, विधि के बिना
क्षमस्वक्षमा कीजिए
करुणाब्धेहे करुणा के सागर
श्रीमहादेव शम्भोहे श्री महादेव शम्भु

अर्थ (हिन्दी)

  1. हाथ-पैर से किया गया, वाणी व शरीर से हुआ, कर्म से हुआ, अथवा कानों-आँखों या मन से हुआ — मुझसे जो भी अपराध हुआ हो; विहित हो या अविहित — हे करुणा के सागर, श्री महादेव शम्भो, यह सब क्षमा कीजिए। आपकी जय हो, जय हो।

लाभ

  • पूजा-पाठ में रह गई विधि-त्रुटियों की क्षमा-याचना का पारंपरिक श्लोक है।
  • मन से अपराध-बोध व ग्लानि का भार हल्का होने की मान्यता है।
  • विनम्रता व समर्पण-भाव जगाने वाला माना जाता है।
  • किसी भी शिव-पूजा, व्रत या पाठ के समापन पर उपयुक्त कहा गया है।

अनुशंसित जप संख्या

जप संख्या: प्रतिदिन 1 बार (एक माला)।

माला: —

उत्तम समय: पूजा के समापन पर

कब करें पाठ

किसी भी पूजा, व्रत या पाठ के अंत मेंप्रातः-संध्या नित्य वंदन के समापन परमहाशिवरात्रि व सोमवार व्रत के अंत मेंभूल या अपराध-बोध के समय

पाठ विधि

पूजा पूर्ण होने के बाद, शिवलिंग या शिव-चित्र के समक्ष हाथ जोड़कर खड़े या बैठे होकर एक बार धीमी व स्पष्ट चाल में इस श्लोक का पाठ करें, फिर प्रणाम करें। परंपरा में इसे जप की तरह बार-बार दोहराने की बात नहीं कही जाती — यह प्रार्थना है, जप-मंत्र नहीं; एक बार भाव-सहित पढ़ना ही विधान है। कुछ परंपराओं में इसे तीन बार पढ़ा जाता है।

प्रामाणिकता व स्रोत

स्थिति✓ संपूर्ण
मूल ग्रंथशिवापराधक्षमापन स्तोत्रम् — आदि शंकराचार्य
स्रोत परंपराशिवापराधक्षमापन स्तोत्रम् — आदि शंकराचार्य · पारंपरिक पूजा-समापन क्षमा प्रार्थना परंपरा
रचयिताआदि शंकराचार्य
अंतिम अद्यतनजून 2026

देव परिचय

श्री शिव

Lord Shiva

महादेव शिव त्रिदेवों में संहारक और कल्याणकारी देव हैं — योग, ध्यान और मोक्ष के अधिपति।

देवता वर्गसंहार · योग · ध्यान · कल्याण · मोक्ष
वाहननंदी (वृषभ)
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मुख्य मंत्रॐ नमः शिवाय
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