समय
3–4 मिनट
श्लोक
6
कठिनाई
मध्यम (Intermediate) — छंद तीव्र है, श्लोक 5 उच्चारण में कठिन
शुभ दिन
प्रातःकाल प्रतिदिन; बुधवार; चतुर्थी; गणेश चतुर्थी
उद्देश्य:विघ्न-नाश (Removal of Obstacles)आरोग्य (Health)बुद्धि (Intellect)
✓ संपूर्ण (6/6 श्लोक)
गणेश पंचरत्न स्तोत्रम् आदि शंकराचार्य विरचित छह-श्लोकीय स्तोत्र है — पाँच "रत्न" अर्थात स्तुति-श्लोक तथा एक फलश्रुति। यह पञ्चचामर छंद में है, जिसकी लघु-गुरु आवर्तन वाली लय इसे गज की चाल जैसी गति देती है। फलश्रुति के अनुसार इसका पाठ प्रातःकाल विहित है।
FAQ
श्री गणेश पंचरत्न स्तोत्रम् — सामान्य प्रश्न
पंचरत्न का अर्थ है "पाँच रत्न", और यहाँ रत्न से तात्पर्य श्लोकों से है — गणेश जी की स्तुति के पाँच श्लोक। इनके साथ छठा श्लोक फलश्रुति का जुड़ जाता है, अतः कुल छह श्लोक होते हैं। इसीलिए कहीं "पाँच" तो कहीं "छह" की संख्या मिलती है; दोनों एक ही पाठ की बात कर रहे हैं।
आदि शंकराचार्य ने। पुष्पिका यही बताती है — "इति श्री शंकरभगवतः कृतौ श्री गणेशपंचरत्नस्तोत्रं संपूर्णम्"।
यह पञ्चचामर छंद में है — प्रत्येक चरण में सोलह अक्षर, और उनमें पूर्ण लघु-गुरु आवर्तन। पहली पंक्ति पर स्वयं गिनकर देखिए: मु(लघु) दा(गुरु) क(लघु) रात्(गुरु) त(लघु) मो(गुरु) द(लघु) कं(गुरु) — यह क्रम सोलहों अक्षर तक नहीं टूटता।
यही निरंतर आवर्तन उस तीव्र, थिरकती चाल का कारण है जिसके लिए यह स्तोत्र प्रसिद्ध है। परंपरा में इसकी तुलना गज की गति से की जाती है — जो गणपति के स्तोत्र के लिए विशेष रूप से उपयुक्त है।
प्रातःकाल। यह उन थोड़े स्तोत्रों में है जो अपना समय स्वयं बताते हैं — छठा श्लोक कहता है "प्रजल्पति प्रभातके", अर्थात जो इसे प्रातःकाल पढ़ता है। साथ ही "अन्वहं" (प्रतिदिन) तथा "आदरेण" (आदरपूर्वक) का भी निर्देश है।
छठा श्लोक पाँच फल गिनाता है — आरोग्य (अरोगताम्), निर्दोषता (अदोषताम्), उत्तम वाणी-कौशल (सुसाहितीम्), सुपुत्र (सुपुत्रताम्) तथा पूर्ण आयु सहित अष्ट-ऐश्वर्य (समाहितायुरष्टभूतिम्) — और यह सब "सोऽचिरात्", अर्थात शीघ्र। ये परंपरागत मान्यताएँ हैं।
यह इसकी पहली पंक्ति है — "मुदाकरात्तमोदकं सदा विमुक्तिसाधकं"। संस्कृत परंपरा में स्तोत्रों को प्रायः उनके आरंभिक शब्दों से पहचाना जाता है, इसलिए यह स्तोत्र इसी नाम से भी जाना जाता है। इसका अर्थ है — "जिनके हाथ में प्रसन्नतापूर्वक लिया हुआ मोदक है"।
पाँचवाँ — "नितान्तकान्तदन्तकान्तिमन्तकान्तकात्मजं"। इसमें "अन्त" की ध्वनि बार-बार लौटती है, जिससे यह उच्चारण में जीभ फिसलाने वाला बन जाता है। इसी श्लोक में एक सुंदर श्लेष भी है — "अन्तकान्तक-आत्मज" अर्थात अन्तक (यम) के भी अन्तक, यानी शिव, के पुत्र।
हाँ। श्लोक 2 तथा 4 समास-बहुल हैं और प्रकाशित अनुवाद आपस में भिन्न हैं — विशेषतः "नमत्सुरारिनिर्जरं" तथा "धनंजयादिभूषणम्" के समास-विच्छेद पर। यहाँ अर्थ रूढ़ रूप में रखे गए हैं, गढ़ी हुई निश्चितता के साथ नहीं।
एक जगह सुधार भी आवश्यक है: एक प्रचलित अनुवाद "पुराणवारणम्" का अर्थ "पुराणों से बहता रस" करता है, जो भ्रामक है। वारण का अर्थ हाथी है, अतः "कपोलदानवारणं भजे पुराणवारणम्" का सीधा अर्थ बनता है — "जिनके कपोलों से मद झरता है, उस पुरातन गज को मैं भजता हूँ"।
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