श्री गणेश चालीसा
śrī gaṇeśa cālīsā
Ganesh Chalisa
श्री गणेश चालीसा एक दोहे से आरंभ होकर अड़तीस चौपाइयों में चलती है और दो दोहों पर पूर्ण होती है। इसका आरंभ "जय गणपति सदगुण सदन, कविवर बदन कृपाल" से होता है। बीच की चौपाइयाँ गणेश जी के जन्म, शनि-दृष्टि और गजमुख धारण की पूरी कथा कहती हैं।
परिचय
विघ्नहर्ता श्री गणेश हर शुभ कार्य के प्रथम पूज्य देव हैं — बुद्धि, विवेक और समृद्धि के दाता।
स्रोत: परंपरागत गणेश चालीसा; चौपाई 37 में "रामसुन्दर" की छाप
एक नज़र में
| मंत्र / पाठ | श्री गणेश चालीसा |
|---|---|
| IAST | śrī gaṇeśa cālīsā |
| देवता | श्री गणेश |
| मूल स्रोत | परंपरागत गणेश चालीसा; चौपाई 37 में "रामसुन्दर" की छाप |
| शुभ दिन | गणेश चतुर्थी, बुधवार व किसी शुभ कार्य के आरंभ में |
| पाठ समय | 7–8 मिनट |
| कठिनाई | सरल |
उद्भव / पृष्ठभूमि
यह चालीसा केवल स्तुति नहीं, कथा है। चौपाई 9 में रचयिता स्वयं कहता है — "कहौ जन्म शुभ कथा तुम्हारी" — और वहीं से गणेश-जन्म का पूरा प्रसंग शुरू होता है।
माता पार्वती ने पुत्र के लिए कठिन तप किया (10)। यज्ञ पूर्ण होने पर स्वयं भगवान ब्राह्मण का रूप धरकर पधारे और वर दिया कि बिना गर्भ धारण किए ही बुद्धिमान पुत्र मिलेगा (11–14)। फिर वे अंतर्धान होकर पालने में बालक-रूप में प्रकट हो गए (16)।
आगे शनि-प्रसंग आता है — उत्सव में शनिदेव आए, पर अपने अवगुण जानकर बालक को देखना नहीं चाहते थे (20–21)। पार्वती जी के आग्रह पर जैसे ही उन्होंने दृष्टि डाली, बालक का सिर आकाश में उड़ गया (25)। कैलाश में हाहाकार मच गया (27), तब विष्णु जी गरुड़ पर सवार होकर गए और चक्र से गज का सिर ले आए (28)। शंकर जी ने उसे धड़ पर रखकर प्राण-मंत्र पढ़ा (29) और नाम रखा गणेश — प्रथम पूज्य और बुद्धि-निधि का वर देकर (30)।
फिर बुद्धि-परीक्षा: षडानन (कार्तिकेय) पृथ्वी की परिक्रमा करने निकल पड़े, पर गणेश जी ने माता-पिता के चरणों की सात परिक्रमा कर ली (31–33)।
चौपाई 37 में रचयिता की छाप है — "भजत रामसुन्दर प्रभुदासा, जग प्रयाग, ककरा, दुर्वासा" — यानी रचयिता का नाम रामसुन्दर था और वे प्रयाग के पास ककरा-दुर्वासा क्षेत्र के थे। इससे आगे कोई प्रामाणिक परिचय नहीं मिलता, इसलिए यहाँ कुछ गढ़ा नहीं गया।
संपूर्ण चालीसा
जय गणपति सदगुण सदन, कविवर बदन कृपाल। विघ्न हरण मंगल करण, जय जय गिरिजालाल॥
हे गणपति, आप सद्गुणों के धाम हैं और कवियों के मुख में बसने वाले कृपालु हैं। विघ्नों को हरने वाले और मंगल करने वाले, हे गिरिजा (पार्वती) के लाल — आपकी जय हो।
जय जय जय गणपति गणराजू। मंगल भरण करण शुभः काजू॥
हे गणों के राजा गणपति, आपकी जय हो; आप मंगल से भर देने वाले और शुभ कार्य सिद्ध करने वाले हैं।
जै गजबदन सदन सुखदाता। विश्व विनायका बुद्धि विधाता॥
हे गजमुख, हे सुख के धाम और सुख देने वाले; हे विश्व के विनायक और बुद्धि के विधाता — जय हो।
वक्र तुण्ड शुची शुण्ड सुहावना। तिलक त्रिपुण्ड भाल मन भावन॥
टेढ़ी सूँड वाले, जिनकी पवित्र सूँड अत्यंत सुहावनी है; भाल पर त्रिपुण्ड तिलक मन को भाता है।
राजत मणि मुक्तन उर माला। स्वर्ण मुकुट शिर नयन विशाला॥
वक्ष पर मणि-मोतियों की माला सुशोभित है; सिर पर स्वर्ण मुकुट और नेत्र विशाल हैं।
पुस्तक पाणि कुठार त्रिशूलं। मोदक भोग सुगन्धित फूलं॥
हाथों में पुस्तक, कुठार (फरसा) और त्रिशूल हैं; भोग में मोदक और सुगंधित पुष्प अर्पित हैं।
सुन्दर पीताम्बर तन साजित। चरण पादुका मुनि मन राजित॥
शरीर पर सुंदर पीताम्बर सजा है; चरणों की पादुकाएँ मुनियों के मन में विराजती हैं।
धनि शिव सुवन षडानन भ्राता। गौरी लालन विश्व-विख्याता॥
धन्य हैं शिव के पुत्र, षडानन (कार्तिकेय) के भाई; गौरी के दुलारे और विश्व में विख्यात।
ऋद्धि-सिद्धि तव चंवर सुधारे। मुषक वाहन सोहत द्वारे॥
ऋद्धि और सिद्धि आपको चँवर डुलाती हैं; द्वार पर मूषक वाहन सुशोभित है।
कहौ जन्म शुभ कथा तुम्हारी। अति शुची पावन मंगलकारी॥
अब मैं आपके शुभ जन्म की कथा कहता हूँ, जो अत्यंत पवित्र और मंगलकारी है।
एक समय गिरिराज कुमारी। पुत्र हेतु तप कीन्हा भारी॥
एक समय गिरिराज की पुत्री (पार्वती) ने पुत्र-प्राप्ति के लिए कठिन तप किया।
भयो यज्ञ जब पूर्ण अनूपा। तब पहुंच्यो तुम धरी द्विज रूपा॥
जब वह अनुपम यज्ञ पूर्ण हुआ, तब आप ब्राह्मण का रूप धारण करके वहाँ पधारे।
अतिथि जानी के गौरी सुखारी। बहुविधि सेवा करी तुम्हारी॥
अतिथि जानकर गौरी प्रसन्न हुईं और उन्होंने अनेक प्रकार से आपकी सेवा की।
अति प्रसन्न हवै तुम वर दीन्हा। मातु पुत्र हित जो तप कीन्हा॥
अत्यंत प्रसन्न होकर आपने वर दिया — माता ने जो पुत्र के लिए तप किया, वह सफल होगा।
मिलहि पुत्र तुहि, बुद्धि विशाला। बिना गर्भ धारण यहि काला॥
"तुम्हें विशाल बुद्धि वाला पुत्र मिलेगा — और इसी समय, बिना गर्भ धारण किए।"
गणनायक गुण ज्ञान निधाना। पूजित प्रथम रूप भगवाना॥
वह गणों का नायक, गुण और ज्ञान का भंडार होगा; भगवान के रूप में सबसे पहले पूजा जाएगा।
अस कही अन्तर्धान रूप हवै। पालना पर बालक स्वरूप हवै॥
इतना कहकर वे अंतर्धान हो गए और पालने में बालक के रूप में प्रकट हो गए।
बनि शिशु रुदन जबहिं तुम ठाना। लखि मुख सुख नहिं गौरी समाना॥
जब आपने शिशु बनकर रुदन किया, तब आपका मुख देखकर गौरी का सुख समाता न था।
सकल मगन, सुखमंगल गावहिं। नाभ ते सुरन, सुमन वर्षावहिं॥
सब मगन होकर सुख-मंगल के गीत गाने लगे; आकाश से देवता पुष्प-वर्षा करने लगे।
शम्भु, उमा, बहुदान लुटावहिं। सुर मुनिजन, सुत देखन आवहिं॥
शिव और उमा बहुत दान लुटाने लगे; देवता और मुनिजन पुत्र को देखने आने लगे।
लखि अति आनन्द मंगल साजा। देखन भी आये शनि राजा॥
इस आनंद और मंगल-सज्जा को देखकर शनि महाराज भी दर्शन करने आए।
निज अवगुण गुनि शनि मन माहीं। बालक, देखन चाहत नाहीं॥
अपने दोष (क्रूर दृष्टि) को मन में जानकर शनि बालक को देखना नहीं चाहते थे।
गिरिजा कछु मन भेद बढायो। उत्सव मोर, न शनि तुही भायो॥
गिरिजा के मन में कुछ भेद बढ़ा — "मेरा उत्सव क्या तुम्हें अच्छा नहीं लगा?"
कहत लगे शनि, मन सकुचाई। का करिहौ, शिशु मोहि दिखाई॥
शनि संकोच से कहने लगे — "क्या करूँगा, यदि मुझे शिशु दिखाया गया तो…"
नहिं विश्वास, उमा उर भयऊ। शनि सों बालक देखन कहयऊ॥
उमा के हृदय में विश्वास नहीं हुआ, और उन्होंने शनि से बालक देखने को कह दिया।
पदतहिं शनि दृग कोण प्रकाशा। बालक सिर उड़ि गयो अकाशा॥
शनि की दृष्टि का कोण पड़ते ही बालक का सिर आकाश में उड़ गया।
गिरिजा गिरी विकल हवै धरणी। सो दुःख दशा गयो नहीं वरणी॥
गिरिजा व्याकुल होकर धरती पर गिर पड़ीं; उस दुःख की दशा वर्णन नहीं की जा सकती।
हाहाकार मच्यौ कैलाशा। शनि कीन्हों लखि सुत को नाशा॥
कैलाश पर हाहाकार मच गया — शनि की दृष्टि से पुत्र का नाश देखकर।
तुरत गरुड़ चढ़ि विष्णु सिधायो। काटी चक्र सो गज सिर लाये॥
तुरंत विष्णु जी गरुड़ पर सवार होकर गए और चक्र से काटकर गज का सिर ले आए।
बालक के धड़ ऊपर धारयो। प्राण मन्त्र पढ़ि शंकर डारयो॥
उसे बालक के धड़ पर रखा और शंकर जी ने प्राण-मंत्र पढ़कर प्राण डाल दिए।
नाम गणेश शम्भु तब कीन्हे। प्रथम पूज्य बुद्धि निधि, वर दीन्हे॥
तब शिव जी ने नाम रखा "गणेश" और वर दिया कि वे प्रथम पूज्य तथा बुद्धि के भंडार होंगे।
बुद्धि परीक्षा जब शिव कीन्हा। पृथ्वी कर प्रदक्षिणा लीन्हा॥
जब शिव जी ने बुद्धि की परीक्षा ली और पृथ्वी की परिक्रमा की शर्त रखी।
चले षडानन, भरमि भुलाई। रचे बैठ तुम बुद्धि उपाई॥
षडानन (कार्तिकेय) चल पड़े और भटकते रह गए; आपने बैठे-बैठे ही बुद्धि से उपाय रच लिया।
चरण मातु-पितु के धर लीन्हें। तिनके सात प्रदक्षिण कीन्हें॥
आपने माता-पिता के चरण पकड़े और उन्हीं की सात परिक्रमा कर लीं।
धनि गणेश कही शिव हिये हरषे। नभ ते सुरन सुमन बहु बरसे॥
"धन्य गणेश" कहकर शिव जी हृदय से हर्षित हुए; आकाश से देवताओं ने बहुत पुष्प बरसाए।
तुम्हरी महिमा बुद्धि बड़ाई। शेष सहसमुख सके न गाई॥
आपकी महिमा और बुद्धि की बड़ाई सहस्रमुख वाले शेषनाग भी नहीं गा सके।
मैं मतिहीन मलीन दुखारी। करहूं कौन विधि विनय तुम्हारी॥
मैं मतिहीन, मलिन और दुखी हूँ — किस विधि से आपकी विनती करूँ।
भजत रामसुन्दर प्रभुदासा। जग प्रयाग, ककरा, दुर्वासा॥
प्रभु का दास रामसुन्दर आपको भजता है — प्रयाग के निकट ककरा, दुर्वासा क्षेत्र का निवासी। (यही रचयिता की छाप है।)
अब प्रभु दया दीना पर कीजै। अपनी शक्ति भक्ति कुछ दीजै॥
अब हे प्रभु, इस दीन पर दया कीजिए और अपनी शक्ति तथा भक्ति में से कुछ दीजिए।
श्री गणेश यह चालीसा, पाठ करै कर ध्यान। नित नव मंगल गृह बसै, लहे जगत सन्मान॥
फलश्रुति: जो ध्यान लगाकर यह श्री गणेश चालीसा पढ़ता है, उसके घर में नित्य नया मंगल बसता है और उसे संसार में सम्मान मिलता है।
सम्बन्ध अपने सहस्त्र दश, ऋषि पंचमी दिनेश। पूरण चालीसा भयो, मंगल मूर्ती गणेश॥
रचना-काल का संकेत देता समापन दोहा — ऋषि पंचमी के दिन यह चालीसा पूर्ण हुआ। हे मंगलमूर्ति गणेश!
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शब्द-अर्थ (Word-by-Word)
अर्थ (हिन्दी)
- हे गणपति, आप सद्गुणों के धाम हैं और कवियों के मुख में बसने वाले कृपालु हैं। विघ्नों को हरने वाले और मंगल करने वाले, हे गिरिजा (पार्वती) के लाल — आपकी जय हो।
- हे गणों के राजा गणपति, आपकी जय हो; आप मंगल से भर देने वाले और शुभ कार्य सिद्ध करने वाले हैं।
- हे गजमुख, हे सुख के धाम और सुख देने वाले; हे विश्व के विनायक और बुद्धि के विधाता — जय हो।
- टेढ़ी सूँड वाले, जिनकी पवित्र सूँड अत्यंत सुहावनी है; भाल पर त्रिपुण्ड तिलक मन को भाता है।
- वक्ष पर मणि-मोतियों की माला सुशोभित है; सिर पर स्वर्ण मुकुट और नेत्र विशाल हैं।
- हाथों में पुस्तक, कुठार (फरसा) और त्रिशूल हैं; भोग में मोदक और सुगंधित पुष्प अर्पित हैं।
- शरीर पर सुंदर पीताम्बर सजा है; चरणों की पादुकाएँ मुनियों के मन में विराजती हैं।
- धन्य हैं शिव के पुत्र, षडानन (कार्तिकेय) के भाई; गौरी के दुलारे और विश्व में विख्यात।
- ऋद्धि और सिद्धि आपको चँवर डुलाती हैं; द्वार पर मूषक वाहन सुशोभित है।
- अब मैं आपके शुभ जन्म की कथा कहता हूँ, जो अत्यंत पवित्र और मंगलकारी है।
- एक समय गिरिराज की पुत्री (पार्वती) ने पुत्र-प्राप्ति के लिए कठिन तप किया।
- जब वह अनुपम यज्ञ पूर्ण हुआ, तब आप ब्राह्मण का रूप धारण करके वहाँ पधारे।
- अतिथि जानकर गौरी प्रसन्न हुईं और उन्होंने अनेक प्रकार से आपकी सेवा की।
- अत्यंत प्रसन्न होकर आपने वर दिया — माता ने जो पुत्र के लिए तप किया, वह सफल होगा।
- "तुम्हें विशाल बुद्धि वाला पुत्र मिलेगा — और इसी समय, बिना गर्भ धारण किए।"
- वह गणों का नायक, गुण और ज्ञान का भंडार होगा; भगवान के रूप में सबसे पहले पूजा जाएगा।
- इतना कहकर वे अंतर्धान हो गए और पालने में बालक के रूप में प्रकट हो गए।
- जब आपने शिशु बनकर रुदन किया, तब आपका मुख देखकर गौरी का सुख समाता न था।
- सब मगन होकर सुख-मंगल के गीत गाने लगे; आकाश से देवता पुष्प-वर्षा करने लगे।
- शिव और उमा बहुत दान लुटाने लगे; देवता और मुनिजन पुत्र को देखने आने लगे।
- इस आनंद और मंगल-सज्जा को देखकर शनि महाराज भी दर्शन करने आए।
- अपने दोष (क्रूर दृष्टि) को मन में जानकर शनि बालक को देखना नहीं चाहते थे।
- गिरिजा के मन में कुछ भेद बढ़ा — "मेरा उत्सव क्या तुम्हें अच्छा नहीं लगा?"
- शनि संकोच से कहने लगे — "क्या करूँगा, यदि मुझे शिशु दिखाया गया तो…"
- उमा के हृदय में विश्वास नहीं हुआ, और उन्होंने शनि से बालक देखने को कह दिया।
- शनि की दृष्टि का कोण पड़ते ही बालक का सिर आकाश में उड़ गया।
- गिरिजा व्याकुल होकर धरती पर गिर पड़ीं; उस दुःख की दशा वर्णन नहीं की जा सकती।
- कैलाश पर हाहाकार मच गया — शनि की दृष्टि से पुत्र का नाश देखकर।
- तुरंत विष्णु जी गरुड़ पर सवार होकर गए और चक्र से काटकर गज का सिर ले आए।
- उसे बालक के धड़ पर रखा और शंकर जी ने प्राण-मंत्र पढ़कर प्राण डाल दिए।
- तब शिव जी ने नाम रखा "गणेश" और वर दिया कि वे प्रथम पूज्य तथा बुद्धि के भंडार होंगे।
- जब शिव जी ने बुद्धि की परीक्षा ली और पृथ्वी की परिक्रमा की शर्त रखी।
- षडानन (कार्तिकेय) चल पड़े और भटकते रह गए; आपने बैठे-बैठे ही बुद्धि से उपाय रच लिया।
- आपने माता-पिता के चरण पकड़े और उन्हीं की सात परिक्रमा कर लीं।
- "धन्य गणेश" कहकर शिव जी हृदय से हर्षित हुए; आकाश से देवताओं ने बहुत पुष्प बरसाए।
- आपकी महिमा और बुद्धि की बड़ाई सहस्रमुख वाले शेषनाग भी नहीं गा सके।
- मैं मतिहीन, मलिन और दुखी हूँ — किस विधि से आपकी विनती करूँ।
- प्रभु का दास रामसुन्दर आपको भजता है — प्रयाग के निकट ककरा, दुर्वासा क्षेत्र का निवासी। (यही रचयिता की छाप है।)
- अब हे प्रभु, इस दीन पर दया कीजिए और अपनी शक्ति तथा भक्ति में से कुछ दीजिए।
- फलश्रुति: जो ध्यान लगाकर यह श्री गणेश चालीसा पढ़ता है, उसके घर में नित्य नया मंगल बसता है और उसे संसार में सम्मान मिलता है।
- रचना-काल का संकेत देता समापन दोहा — ऋषि पंचमी के दिन यह चालीसा पूर्ण हुआ। हे मंगलमूर्ति गणेश!
लाभ
- गणेश-जन्म की पूरी कथा एक ही पाठ में — तप, वरदान, शनि-दृष्टि, गजमुख और बुद्धि-परीक्षा।
- गणेश चतुर्थी की पूजा का प्रमुख पाठ; बुधवार को भी पढ़ा जाता है।
- किसी नए कार्य के आरंभ में पढ़ने की परंपरा — विघ्न-नाश का भाव।
- भाषा सरल और चाल हनुमान चालीसा जैसी — कंठस्थ करना आसान।
कब करें पाठ
पाठ विधि
गणेश जी के समक्ष दीप-धूप जलाकर दूर्वा, लाल पुष्प और मोदक अर्पित करें। पहले आरंभिक दोहा पढ़ें, फिर अड़तीस चौपाइयाँ, और अंत में दोनों समापन दोहे। पाठ के बाद आरती कर मोदक का प्रसाद बाँटें। गणेश चतुर्थी पर मध्याह्न का पाठ विशेष कहा जाता है।
प्रामाणिकता व स्रोत
यह भी देखें
देव परिचय
श्री गणेश
Lord Ganesha
विघ्नहर्ता श्री गणेश हर शुभ कार्य के प्रथम पूज्य देव हैं — बुद्धि, विवेक और समृद्धि के दाता।
