समय
3–4 मिनट
श्लोक
8
कठिनाई
सरल (Beginner)
शुभ दिन
बुधवार; चतुर्थी; गणेश चतुर्थी
उद्देश्य:विघ्न-नाश (Removal of Obstacles)विद्या (Knowledge)सिद्धि (Accomplishment)
✓ संपूर्ण (8/8 श्लोक)
संकटनाशन गणेश स्तोत्र नारद पुराण का आठ-श्लोकीय स्तोत्र है, जिसे स्वयं नारद जी ने कहा। इसका केंद्र श्रीगणेश के बारह नाम हैं, जिन्हें श्लोक क्रम से गिनाते हैं। परंपरा में इसे विघ्न व संकट के नाश हेतु त्रिकाल पढ़ा जाता है।
FAQ
संकटनाशन गणेश स्तोत्र — सामान्य प्रश्न
नारद पुराण का, और इसे स्वयं देवर्षि नारद ने कहा है। पुष्पिका यही बताती है — "इति श्रीनारदपुराणे संकष्टनाशनं गणेशस्तोत्रं सम्पूर्णम्"।
क्रम से — वक्रतुण्ड, एकदन्त, कृष्णपिङ्गाक्ष, गजवक्त्र, लम्बोदर, विकट, विघ्नराज, धूम्रवर्ण, भालचन्द्र, विनायक, गणपति तथा गजानन। श्लोक 2 से 4 इन्हें गिनती के साथ बताते हैं ("प्रथमं… द्वितीयकम्… तृतीयं…"), और श्लोक 5 स्वयं कहता है "द्वादशैतानि नामानि" — ये बारह नाम।
वस्तुतः यह द्वादश-नाम सूची है, जिसे प्रणाम और फलश्रुति के बीच रखा गया है। पहला श्लोक प्रणाम है, श्लोक 2–4 बारह नाम गिनाते हैं, और श्लोक 5–8 फलश्रुति हैं। अधिकांश पृष्ठ इसे सामान्य स्तुति की तरह छापते हैं और यह संरचना नहीं बताते।
स्तोत्र स्वयं त्रिसन्ध्य का विधान देता है — प्रातः, मध्याह्न तथा सायं, तीनों संध्याओं में। इसके अतिरिक्त चतुर्थी, बुधवार तथा गणेश चतुर्थी पर इसका विशेष महत्व है।
सातवाँ श्लोक इसमें असामान्य रूप से स्पष्ट है — छह मास में फल तथा एक वर्ष में सिद्धि, "नात्र संशयः" (इसमें कोई संशय नहीं)। इतनी निश्चित समय-सीमा बहुत कम स्तोत्रों में दी गई है। ये परंपरागत मान्यताएँ हैं।
यह एक असामान्य विधान है — जो इस स्तोत्र को लिखकर आठ ब्राह्मणों को समर्पित करता है, उसे गणेश की कृपा से समस्त विद्या प्राप्त होती है। यह उस काल की परंपरा दर्शाता है जब ग्रंथ हाथ से लिखकर बाँटे जाते थे, और लेखन स्वयं एक पुण्य-कर्म माना जाता था।
हाँ, दो जगह। तीसरे श्लोक में कुछ संस्करण "विघ्नराजं" तो कुछ "विघ्नराजेन्द्रं" छापते हैं; दोनों अनुष्टुप् छंद में ठीक बैठते हैं, इसलिए यह वास्तविक पाठ-भेद है और यहाँ आधार-स्रोत का "विघ्नराजं" लिया गया है। उसी श्लोक में "तथाष्टमम्" (आठवाँ) लिया गया है, "तथाष्टकम्" नहीं — क्योंकि पूरा समूह क्रमवाचक है (प्रथमं… सप्तमं… अष्टमम्… द्वादशं), और "अष्टकम्" उस क्रम को तोड़ देता है।
पुष्पिका में "संकष्टनाशन" है, किंतु प्रचलन में "संकटनाशन" कहा जाता है — और यही नाम अधिक जाना-पहचाना है। अर्थ दोनों का एक ही है: संकट अथवा संकष्ट (कष्ट) का नाश करने वाला।
पर्व
