समय
2–3 मिनट
श्लोक
10
जप संख्या
1
कठिनाई
मध्यम
शुभ दिन
श्राद्ध, पितृ पक्ष व अमावस्या
उद्देश्य:पितृ स्मरण (Remembering Ancestors)श्राद्ध कर्म (Shraddha Rites)कृतज्ञता (Gratitude)
✓ संपूर्ण
पितृ स्तोत्र रुचि प्रजापति की पितरों के प्रति प्रार्थना है, जो मार्कण्डेय पुराण (अध्याय 94) और गरुड पुराण (आचारकाण्ड 89) में मिलती है। दस श्लोकों में रुचि उन सब पितरों को नमस्कार करते हैं जो अमूर्त और मूर्त हैं, देवताओं, ऋषियों और ग्रह-नक्षत्रों के भी पितर हैं। श्राद्ध में इसका पाठ पुराण स्वयं बताता है।
FAQ
पितृ स्तोत्र (रुचि कृत) — सामान्य प्रश्न
मार्कण्डेय पुराण (अध्याय 94) और गरुड पुराण (आचारकाण्ड 89) के अनुसार यह स्तुति रुचि प्रजापति ने की थी, जब पितरों की पूजा करते समय आकाश में तेज का पुंज प्रकट हुआ। इसी स्तुति से प्रसन्न होकर पितरों ने उन्हें वर दिया।
मार्कण्डेय पुराण (94.23–37) में पितर स्वयं कहते हैं कि जो भक्ति से इससे उनकी स्तुति करेगा, उसे वे भोग, आत्मज्ञान, आरोग्य, धन और संतान देंगे, और श्राद्ध में इसका पाठ हो तो पितरों की तृप्ति अक्षय होती है। यह पुराण का कथन है, जिसे परंपरा श्रद्धा से मानती है।
पुराण के अनुसार श्राद्ध में, ब्राह्मण-भोजन के समय उनके सामने। पितृ पक्ष, अमावस्या और पूर्वजों की पुण्यतिथि पर भी इसका पाठ किया जाता है।
दोनों शास्त्र में मिलते हैं। मार्कण्डेय, वायु, विष्णुधर्मोत्तर और स्कन्द पुराण "अमूर्तानां च मूर्तानां" (निराकार और साकार) पढ़ते हैं; गरुड पुराण "अर्चितानाममूर्तानां" (पूजित और निराकार)। यहाँ अधिक ग्रंथों वाला पाठ दिया है, और दूसरा रूप पाठ-भेद में।
मार्कण्डेय पुराण के कुछ संस्करणों में श्लोक 4 के बाद "देवर्षीणां…" से शुरू होने वाला एक श्लोक और है। गरुड पुराण और शब्दकल्पद्रुम (जो इसे मार्कण्डेय से ही उद्धृत करता है) — दोनों में वह नहीं है, इसलिए यहाँ दस श्लोक दिए हैं।
वायु पुराण, विष्णुधर्मोत्तर और स्कन्द पुराण की श्राद्ध-विधि में इसी स्तोत्र के पहले छह-सात श्लोक "सप्तार्चिष" नाम से आते हैं। यानी सप्तार्चिष इसी पितृ स्तोत्र का छोटा रूप है।
पर्व
