भाद्रपद या आश्विन — नाम दो, दिन एक
यहाँ एक बात अक्सर उलझाती है। कोई कहता है पितृ पक्ष भाद्रपद में आता है, कोई कहता है आश्विन में। सच यह है कि दोनों सही हैं।
फ़र्क़ महीने की गिनती का है, दिनों का नहीं। अमान्त गणना में — जो दक्षिण भारत में चलती है — यह भाद्रपद कृष्ण पक्ष कहलाता है। पूर्णिमान्त गणना में, जो उत्तर भारत में चलती है, यही आश्विन कृष्ण पक्ष है।
दिन दोनों में वही के वही रहते हैं। तो अगर आपके पंचांग में दूसरा नाम लिखा हो, घबराइए मत — तारीख़ एक ही है।
सोलह तिथियाँ, पर दिन प्रायः पंद्रह
परंपरा में इसे "सोलह दिन" कहा जाता है। ठीक-ठीक कहें तो सोलह तिथियाँ होती हैं — पूर्णिमा, और उसके बाद कृष्ण पक्ष की पंद्रह तिथियाँ।
पर कैलेंडर पर दिन अक्सर पंद्रह ही निकलते हैं। कारण सीधा है। कभी कोई तिथि इतनी छोटी पड़ जाती है कि उसका अपना दिन नहीं बनता। तब उसका श्राद्ध पिछले दिन के साथ ही आ जाता है, और उस दिन दो श्राद्ध होते हैं।
इसीलिए नीचे की तालिका में आपको कुछ दिनों पर दो नाम दिखेंगे। यह चूक नहीं है — यही सही गणना है।
किस तिथि को किसका श्राद्ध
नियम एक ही है, और आसान है। श्राद्ध उस तिथि को होता है जिस तिथि पर मृत्यु हुई थी — अंग्रेज़ी तारीख़ पर नहीं।
मान लीजिए किसी का देहांत कृष्ण पक्ष की सप्तमी को हुआ था। तो उनका श्राद्ध हर साल पितृ पक्ष की सप्तमी को होगा, अंग्रेज़ी तारीख़ चाहे कोई भी पड़े।
और अगर तिथि याद ही न हो? तो सर्वपितृ अमावस्या है। यह आख़िरी दिन सबके लिए है — जिनकी तिथि मालूम नहीं, और जिनका कोई दिन छूट गया। इस बात की चिंता मत कीजिए, रास्ता खुला रखा गया है।
श्राद्ध का समय — कुतुप, रोहिण और अपराह्न
श्राद्ध दोपहर में किया जाता है, सुबह नहीं। इसके लिए दिन के तीन हिस्से बताए गए हैं, और वे एक के बाद एक आते हैं — कुतुप मुहूर्त, रोहिण मुहूर्त और अपराह्न काल।
इनमें अपराह्न काल सबसे लंबा है। श्राद्ध का मुख्य समय यही माना जाता है, और तर्पण प्रायः अंत में किया जाता है।
नीचे आपको हर दिन के तीनों समय मिलेंगे। ये सूर्योदय और सूर्यास्त से बनते हैं, इसलिए शहर बदलने पर थोड़े आगे-पीछे हो जाते हैं।
पितृ मंत्र व स्तोत्र
श्राद्ध और तर्पण में पढ़े जाने वाले शास्त्रीय मंत्र — हर एक मूल ग्रंथ से मिलाया हुआ, अर्थ सहित।
