पिंडदान क्या है
"पिंड" का अर्थ है गोला। पिंडदान में पके चावल के गोले बनाकर पितरों को अर्पित किए जाते हैं।
पिंड बनाने में चावल के साथ घी और काले तिल मिलाए जाते हैं। कुछ परंपराओं में जौ का आटा भी लिया जाता है, और कहीं थोड़ा शहद भी।
यह श्राद्ध का एक अंग है, पूरा श्राद्ध नहीं। श्राद्ध में तर्पण, पिंडदान और भोजन — तीनों आते हैं।
पिंड किसके लिए अर्पित होते हैं
परंपरा में पिंड तीन पीढ़ियों को अर्पित किए जाते हैं — पिता, दादा और परदादा, तथा उनके साथ की स्त्रियाँ।
तीन ही क्यों? क्योंकि पिंड-अर्पण की पूरी व्यवस्था इन्हीं तीन पीढ़ियों के इर्द-गिर्द बनी है। इसी कारण जब किसी नए दिवंगत को पितरों में सम्मिलित किया जाता है, तो उस संस्कार में चार पिंड बनते हैं — एक उनका, और तीन इन पीढ़ियों के।
उस संस्कार को सपिंडीकरण कहते हैं। नाम का अर्थ ही है — पिंड के साथ जोड़ना।
पिंड क्या दर्शाता है
पिंड केवल भोजन का प्रतीक नहीं है। विद्वानों के अनुसार यह दिवंगत के लिए एक प्रतीकात्मक शरीर माना गया है।
यानी अर्पण करने वाला यह भाव रखता है कि जो चले गए, उनकी हर ज़रूरत का ध्यान रखा जा रहा है। यह विदा देने का, और साथ ही जोड़े रखने का तरीक़ा है।
इसीलिए पिंड बनाते समय हाथ की सफ़ाई और मन की शांति — दोनों का ध्यान रखा जाता है। भाव यहाँ भी मुख्य है।
पिंडदान कहाँ किया जाता है
पिंड पत्तों पर या सीधे भूमि पर रखे जाते हैं, और यह जल के पास किया जाता है — नदी-तट या घाट पर।
घर पर भी किया जा सकता है। पर कुछ स्थान इसके लिए विशेष माने गए हैं।
- गया (बिहार) — पिंडदान के लिए सबसे प्रमुख स्थान माना जाता है।
- हरिद्वार
- प्रयागराज
- वाराणसी
- कुशीनगर
परंपरा में अर्पण के बाद बचे पिंड बहते जल में प्रवाहित किए जाते हैं। यह चलन व्यापक है, पर इसे हमने नियम की तरह नहीं लिखा — अपने परिवार या पुरोहित से पूछ लेना बेहतर है।
पिंडदान और तर्पण में अंतर
दोनों पितरों के लिए ही हैं, पर एक जैसे नहीं।
| तर्पण | पिंडदान | |
|---|---|---|
| क्या अर्पित होता है | जल, जिसमें काले तिल, जौ व कुश | चावल के पिंड, घी व काले तिल सहित |
| रूप | जल-अर्पण | अन्न-अर्पण |
| कब | प्रायः श्राद्ध के अंत में | श्राद्ध के दौरान |
| किसे | देव, ऋषि और पितर — तीनों को | मुख्यतः पितरों को, तीन पीढ़ियों तक |
श्राद्ध में प्रायः दोनों होते हैं। एक दूसरे का विकल्प नहीं हैं।
पिंडदान का समय
श्राद्ध की तरह पिंडदान भी दोपहर में किया जाता है। अपराह्न काल इसके लिए निर्धारित समय बताया गया है।
पितृ पक्ष में हर दिन का अपराह्न काल अलग होता है, क्योंकि वह सूर्योदय और सूर्यास्त से बनता है। इस वर्ष हर दिन का समय मुख्य पृष्ठ की तालिका में दिया है।
