गया ही क्यों
पिंडदान वैसे तो कहीं भी किया जा सकता है, घर पर भी। पर परंपरा में गया को इसका सबसे प्रमुख स्थान माना गया है।
इसके पीछे एक बड़ा कारण यह है कि कथा के अनुसार भगवान राम ने, सीता और लक्ष्मण के साथ, अपने पिता दशरथ का पिंडदान यहीं किया था।
शहर का नाम भी एक कथा से जुड़ा है — गयासुर नामक असुर से। कहा जाता है कि उसी का शरीर गया की पथरीली पहाड़ियाँ बन गया।
विष्णुपद मंदिर
फल्गु नदी के तट पर बना यह मंदिर गया का केंद्र है। इसके भीतर ठोस चट्टान पर चालीस सेंटीमीटर लंबा चरण-चिह्न है, जिसे धर्मशिला कहा जाता है। उसके चारों ओर चाँदी जड़ा हुआ कुंड है।
परंपरा में इसे भगवान विष्णु का चरण-चिह्न माना जाता है — वह स्थान जहाँ गयासुर को शांत करते समय उनका चरण पृथ्वी पर पड़ा।
आज जो मंदिर खड़ा है, उसे 1787 में इंदौर की रानी अहिल्याबाई होल्कर ने बनवाया था। मूल मंदिर कब बना, यह ज्ञात नहीं।
फल्गु नदी — जो ऊपर से सूखी दिखती है
गया पहुँचने वाले कई लोग चौंक जाते हैं। फल्गु नदी ऊपर से प्रायः रेत का विस्तार दिखती है, जिसमें कहीं-कहीं पतली धार बहती है। पानी नीचे, ज़मीन के भीतर बहता है।
इसके पीछे एक कथा है। कहा जाता है कि जब सीता जी ने यहाँ पिंडदान किया, तो उसके गवाहों में से कई मुकर गए। तब सीता जी ने फल्गु को शाप दिया कि गया में उसमें जल नहीं रहेगा।
उस कथा में एक ही गवाह सच्चा निकला था — अक्षयवट। इसीलिए उसे आज भी विशेष माना जाता है।
जल भीतर होने पर भी कर्म रुकता नहीं। तर्पण, पिंड बनाने और स्नान के लिए जल नीचे से निकाल लिया जाता है।
अक्षयवट
विष्णुपद मंदिर के भीतर ही वह वट वृक्ष है जिसे अक्षयवट कहते हैं। अक्षय का अर्थ है जिसका क्षय न हो — जो सदा बना रहे।
परंपरा में यहीं दिवंगत के लिए अंतिम कर्म किए जाते हैं। गया की पूरी पिंडदान-यात्रा प्रायः यहीं पूरी होती है।
और यही वह वृक्ष है जो सीता जी की कथा में सच्चा गवाह बना था। कथा और परंपरा — दोनों उसे एक ही जगह लाकर जोड़ देते हैं।
गया में क्या किया जाता है
गया कोई एक स्थान नहीं, एक पूरा क्षेत्र है। यहाँ अनेक वेदियाँ हैं — कर्म के लिए बने नियत स्थान — और परंपरागत यात्रा उनमें से कई को छूती हुई चलती है।
- फल्गु के तट पर स्नान और तर्पण।
- पिंड बनाकर नियत वेदियों पर अर्पण।
- विष्णुपद मंदिर में पूजन — जिसे स्थानीय पुरोहित, गयावाल पंडा, कराते हैं।
- अक्षयवट पर अंतिम कर्म।
वेदियों की कुल संख्या पर स्रोत एकमत नहीं हैं, इसलिए हमने कोई गिनती नहीं लिखी। वहाँ जाने से पहले अपने पुरोहित से यात्रा-क्रम पूछ लेना सबसे अच्छा है।
पितृपक्ष मेला
पितृ पक्ष के इन दिनों में गया में मेला लगता है, जो पूरे पक्ष चलता है।
इसमें देश और विदेश से लाखों लोग आते हैं। ज़िला प्रशासन विष्णुपद मंदिर के पास तंबुओं की अस्थायी बस्ती बसाता है, और रेलवे विशेष गाड़ियाँ तथा अतिरिक्त ठहराव देता है।
यानी अगर आप इन दिनों गया जाने की सोच रहे हैं, तो भीड़ और ठहरने की व्यवस्था — दोनों पहले से देख लीजिए।
