समय
15 सेकंड
जप संख्या
3
कठिनाई
सरल
शुभ दिन
श्राद्ध, पितृ पक्ष, अमावस्या व नित्य स्मरण
उद्देश्य:पितृ स्मरण (Remembering Ancestors)श्राद्ध कर्म (Shraddha Rites)कृतज्ञता (Gratitude)
✓ संपूर्ण मूल मंत्र
पितरों का सबसे प्रचलित शास्त्रीय मंत्र है — "देवताभ्यः पितृभ्यश्च महायोगिभ्य एव च। नमः स्वधायै स्वाहायै नित्यमेव नमो नमः॥" यह वायु, गरुड, अग्नि और स्कन्द पुराण समेत कई ग्रंथों में मिलता है। अर्थ: देवताओं, पितरों, महायोगियों, स्वधा और स्वाहा को सदा नमस्कार। श्राद्ध के आरंभ और अंत में इसे तीन बार पढ़ा जाता है।
FAQ
पितृ मंत्र — देवताभ्यः पितृभ्यश्च — सामान्य प्रश्न
"देवताभ्यः पितृभ्यश्च महायोगिभ्य एव च। नमः स्वधायै स्वाहायै नित्यमेव नमो नमः॥" — यह वायु, गरुड, अग्नि, ब्रह्म, स्कन्द और विष्णुधर्मोत्तर पुराण में मिलता है। पितरों के लिए यह सबसे अधिक ग्रंथों में आने वाला मंत्र है।
रोज़ के पितृ-स्मरण के लिए भी शास्त्र यही मंत्र देते हैं। मिताक्षरा के अनुसार कुछ लोग पाँच महायज्ञों में इसे नमस्कार-मंत्र के रूप में रोज़ पढ़ते हैं, और संस्काररत्नमाला कहती है कि श्राद्ध में यदि वेद-पाठ न हो सके, तो यही मंत्र पढ़ा जाए।
वायु पुराण (12.17) और विष्णुधर्मोत्तर पुराण के अनुसार श्राद्ध के आरंभ और अंत में तीन बार, और पिंडदान के समय भी। रोज़ के स्मरण में एक या तीन बार पढ़ना पर्याप्त है।
इंटरनेट पर "पितृगणाय विद्महे…" रूप का एक मंत्र "पितृ गायत्री" नाम से फैला है, पर वह हमें किसी वेद, पुराण या स्मृति में नहीं मिला। इसलिए हम उसे यहाँ नहीं दे रहे। पितरों के लिए शास्त्र में जो मंत्र मिलते हैं, वे यही पितृ मंत्र, ऋग्वेद का पितृ सूक्त और तर्पण के मंत्र हैं।
दोनों अर्पण के शब्द हैं। "स्वाहा" से देवताओं को आहुति दी जाती है और "स्वधा" से पितरों को। इस मंत्र में दोनों को नमस्कार है, क्योंकि इसमें देवता और पितर — दोनों का स्मरण है।
ग्रंथों में चौथा चरण थोड़ा बदलता है — वायु पुराण में "नित्यमेव भवन्त्युत", विष्णुधर्मोत्तर में "भवत्विह", गरुड में "भवन्तु ते"। यहाँ "नित्यमेव नमो नमः" दिया है, जो सात ग्रंथों में मिलता है। भाव सबमें एक ही है।
पर्व
