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लिपि:
॥ श्री ॥
पितृ मंत्र — देवताभ्यः पितृभ्यश्च
मंत्र
पाठ
1
देवताभ्यः पितृभ्यश्च महायोगिभ्य एव च । नमः स्वधायै स्वाहायै नित्यमेव नमो नमः ॥
अर्थ (हिन्दी)
- देवताओं को, पितरों को और महायोगियों को, स्वधा को और स्वाहा को — सदा नमस्कार है, बार-बार नमस्कार है।
लाभ
- श्राद्ध के आरंभ व अंत में पढ़ने का विधान वायु व विष्णुधर्मोत्तर पुराण में है।
- इन पुराणों के अनुसार इसके पाठ से पितर श्राद्ध में शीघ्र आते हैं।
- छोटा व सरल है — जो लंबे पाठ न कर सकें, उनके लिए भी पितृ-स्मरण का शास्त्रीय साधन।
- पितरों के साथ देवताओं व योगियों को भी नमस्कार — कृतज्ञता का पूरा भाव।
कब करें पाठ
श्राद्ध के आरंभ और अंत में — तीन बार (वायु पुराण 12.17) · पिंडदान के समय · पितृ पक्ष के श्राद्धों में · रोज़ के स्मरण में (मिताक्षरा — पंच महायज्ञ)
स्रोत
वायु पुराण उत्तरार्ध 12.15–19 · विष्णुधर्मोत्तर पुराण 1.140.68–73 · अग्नि पुराण 117.20 · गरुड पुराण आचार 218 · ब्रह्म पुराण 220.143 · स्कन्द पुराण प्रभास 206.114 · मिताक्षरा (याज्ञवल्क्य स्मृति) · संस्काररत्नमाला · वीरमित्रोदय श्राद्धप्रकाश
