श्री कार्तिकेय चालीसा
śrī kārtikeya cālīsā
Kartikeya Chalisa (Murugan)
परिचय
स्रोत: पारंपरिक कार्तिकेय (मुरुगन) चालीसा
संपूर्ण चालीसा
गणपति-गिरिजा-सुत सुमिर, करूँ प्रभु गुणगान। कार्तिकेय की वंदना, देहु अभय वरदान॥
गिरिजा-पुत्र गणपति का स्मरण कर मैं प्रभु का गुणगान करता हूँ; हे कार्तिकेय, वंदना स्वीकार कर अभय वरदान दीजिए।
जय जय कार्तिकेय बलधारी। शिव-पार्वती के सुत प्यारी॥
हे बलधारी कार्तिकेय, आपकी जय हो; आप शिव-पार्वती के प्यारे पुत्र हैं।
षण्मुख रूप विराजत न्यारा। मयूर-वाहन शोभा भारा॥
षण्मुख (छह मुख) रूप में अद्वितीय विराजमान; मयूर-वाहन पर अति शोभा है।
कर में शक्ति-वेल अति सोहे। रूप निरख त्रिभुवन मन मोहे॥
हाथ में शक्ति-वेल (भाला) अति सुशोभित है; आपका रूप निरखकर तीनों लोक मोहित हो जाते हैं।
स्कन्द मुरुगन नाम तुम्हारा। सुब्रह्मण्य जग में अति प्यारा॥
स्कन्द, मुरुगन व सुब्रह्मण्य — आपके नाम हैं, जो जगत में अति प्यारे हैं।
देव-सेनापति तुम कहलाते। देवन के भय दूर भगाते॥
आप देव-सेनापति कहलाते हैं और देवताओं का भय दूर भगाते हैं।
तारकासुर का नाश कराया। जग को विजय-पथ दिखलाया॥
आपने तारकासुर का नाश कराया और जगत को विजय का मार्ग दिखाया।
जो जन तुमको नित ही ध्यावै। विजय-साहस सहज वह पावै॥
जो जन नित्य आपका ध्यान करता है, वह सहज ही विजय व साहस पाता है।
शत्रु-संकट सब टारन हारे। भक्तन के तुम सदा सहारे॥
आप शत्रु व संकट सब दूर करने वाले हैं; आप भक्तों के सदा सहारे हैं।
ब्रह्म-ज्ञान का दिया उपदेशा। शिव को भी समझाया भेषा॥
आपने ब्रह्म-ज्ञान का उपदेश दिया और (प्रणव का अर्थ) स्वयं शिव को भी समझाया।
दक्षिण में धाम तुम्हारे। पलनी-तिरुचेंदूर जग प्यारे॥
दक्षिण भारत में आपके धाम हैं — पलनी व तिरुचेंदूर, जो जगत में प्रिय हैं।
जो नर श्रद्धा से तुम्हें ध्यावै। रोग-शोक भय निकट न आवै॥
जो मनुष्य श्रद्धा से आपका ध्यान करता है, उसके निकट रोग, शोक व भय नहीं आते।
षष्ठी व्रत जो जन धारे। सकल मनोरथ प्रभु ते सारे॥
जो षष्ठी का व्रत धारण करता है, प्रभु उसके समस्त मनोरथ पूर्ण करते हैं।
विद्या-बुद्धि के तुम दाता। वीर-शिरोमणि जग-विख्याता॥
आप विद्या व बुद्धि के दाता तथा वीर-शिरोमणि व जगत-विख्यात हैं।
जो जन तुमको शीश नवावै। भय-संकट से मुक्ति पावै॥
जो जन आपको शीश नवाता है, वह भय व संकट से मुक्ति पाता है।
रोग-दोष सब दूर भगाते। सुख-समृद्धि घर में लाते॥
आप समस्त रोग-दोष दूर भगाते हैं और घर में सुख-समृद्धि लाते हैं।
दीन-दुखी की सुनत पुकारा। पल में करते बेड़ा पारा॥
आप दीन-दुखियों की पुकार सुनते ही पल भर में उनका बेड़ा पार कर देते हैं।
साहस-बल तुम भक्तन देते। निर्भयता का वर तुम देते॥
आप भक्तों को साहस व बल देते हैं तथा निर्भयता का वरदान देते हैं।
जो नर निशदिन ध्यान लगावै। स्कन्द-कृपा सहज वह पावै॥
जो मनुष्य दिन-रात ध्यान लगाता है, वह सहज ही स्कन्द-कृपा प्राप्त करता है।
मंगल-कारी विघ्न-विनाशन। भय-हारी तुम सुख-साधन॥
आप मंगलकारी व विघ्नों के विनाशक हैं; भय हरकर सुख देने वाले हैं।
जो श्रद्धा से भोग चढ़ावै। ता के सब बिगड़े बन जावै॥
जो श्रद्धा से भोग चढ़ाता है, उसके सब बिगड़े कार्य बन जाते हैं।
जो यह कार्तिकेय चालीसा गावै। भय-संकट सब दूर नसावै॥
जो यह कार्तिकेय चालीसा गाता है, उसके भय व संकट सब दूर नष्ट हो जाते हैं।
नित प्रति पाठ करे जो कोई। ता पर कृपा स्कन्द की होई॥
जो कोई नित्य पाठ करता है, उस पर स्कन्द (कार्तिकेय) की कृपा होती है।
मन-इच्छित फल सब जन पावैं। विजय-सुख घर में लावैं॥
सब जन मन-इच्छित फल पाते हैं और घर में विजय व सुख लाते हैं।
स्कन्द-कृपा जिन पर होई। ता को कष्ट सतावे न कोई॥
जिन पर स्कन्द की कृपा होती है, उन्हें कोई कष्ट नहीं सताता।
स्कन्द षष्ठी पूजन कीजै। कावड़ी ले कर दर्शन लीजै॥
स्कन्द षष्ठी पर पूजन कीजिए तथा कावड़ी लेकर दर्शन कीजिए।
वेल-शक्ति की महिमा भारी। दुष्ट-दलन भक्तन हितकारी॥
आपकी वेल-शक्ति (भाले) की महिमा अति महान है, जो दुष्टों का दमन व भक्तों का हित करती है।
जो सत भाव करे यह सेवा। रीझत तुरत स्कन्द देवा॥
जो सच्चे भाव से यह सेवा करता है, उस पर स्कन्द देव तुरंत रीझ (प्रसन्न हो) जाते हैं।
संकट-मोचन नाम तुम्हारा। भक्त-हृदय में नित्य निवारा॥
आपका नाम संकट-मोचन है; आप भक्तों के हृदय में नित्य निवास कर कष्ट दूर करते हैं।
महिमा तुम्हरी अति अपारा। वेद-पुराण करत विस्तारा॥
आपकी महिमा अति अपार है, जिसका विस्तार वेद-पुराण करते हैं।
जो जन कार्तिक गुण गावै। पाप-ताप सब दूर भगावै॥
जो जन कार्तिकेय के गुण गाता है, वह समस्त पाप-ताप दूर भगा देता है।
विद्यार्थी जो तुम्हें मनावैं। परीक्षा में सफलता पावैं॥
जो विद्यार्थी आपको मनाते हैं, वे परीक्षा में सफलता पाते हैं।
युद्ध-क्षेत्र में विजय दिलाते। साहसी जन तुम्हें ध्याते॥
आप युद्ध-क्षेत्र में विजय दिलाते हैं; साहसी जन आपका ध्यान करते हैं।
घर-घर ज्योति तुम्हारी जागै। नर-नारी सब तुमको पागै॥
घर-घर में आपकी ज्योति जगती है; नर-नारी सब आपमें अनुरक्त हो जाते हैं।
जो रात्रि-काल पाठ करावै। भय-बाधा सब दूर भगावै॥
जो रात्रि-काल में पाठ करता है, वह भय व बाधा सब दूर भगा देता है।
वीरता-तेज जो जन चाहै। कार्तिकेय को नित ही ध्यावै॥
जो जन वीरता व तेज चाहता है, वह नित्य कार्तिकेय का ध्यान करे।
कार्तिक-वंदन जो जन गावै। इहलोक-परलोक सुख पावै॥
जो जन कार्तिकेय-वंदना गाता है, वह इस लोक व परलोक दोनों में सुख पाता है।
मातु-पिता शिव-गौरी प्यारे। भ्राता गणपति जग-रखवारे॥
आपके माता-पिता प्यारे शिव-गौरी हैं और भ्राता गणपति जगत के रक्षक हैं।
ऐसे दिव्य परिवार तुम्हारे। जग में पूजे जन सब प्यारे॥
ऐसा आपका दिव्य परिवार है, जिसे जगत में सब प्यारे भक्त पूजते हैं।
विजय-साहस-तेज बढ़ावै। भक्तन के सब संकट टावै॥
आप विजय, साहस व तेज बढ़ाते हैं और भक्तों के सब संकट टालते हैं।
जय जय जय कार्तिकेय स्वामी। विजय-साहस के तुम दानी॥
हे कार्तिकेय स्वामी, आपकी जय हो; आप विजय व साहस के दानी हैं।
कार्तिकेय चालीसा सरल, पढ़े प्रेम मन लाय। विजय-साहस-तेज सब, सहज मिलैं सदाय॥
जो प्रेमपूर्वक मन लगाकर यह सरल कार्तिकेय चालीसा पढ़ता है, उसे विजय, साहस व तेज सब सहज ही सदा प्राप्त होते हैं।
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अर्थ (हिन्दी)
- गिरिजा-पुत्र गणपति का स्मरण कर मैं प्रभु का गुणगान करता हूँ; हे कार्तिकेय, वंदना स्वीकार कर अभय वरदान दीजिए।
- हे बलधारी कार्तिकेय, आपकी जय हो; आप शिव-पार्वती के प्यारे पुत्र हैं।
- षण्मुख (छह मुख) रूप में अद्वितीय विराजमान; मयूर-वाहन पर अति शोभा है।
- हाथ में शक्ति-वेल (भाला) अति सुशोभित है; आपका रूप निरखकर तीनों लोक मोहित हो जाते हैं।
- स्कन्द, मुरुगन व सुब्रह्मण्य — आपके नाम हैं, जो जगत में अति प्यारे हैं।
- आप देव-सेनापति कहलाते हैं और देवताओं का भय दूर भगाते हैं।
- आपने तारकासुर का नाश कराया और जगत को विजय का मार्ग दिखाया।
- जो जन नित्य आपका ध्यान करता है, वह सहज ही विजय व साहस पाता है।
- आप शत्रु व संकट सब दूर करने वाले हैं; आप भक्तों के सदा सहारे हैं।
- आपने ब्रह्म-ज्ञान का उपदेश दिया और (प्रणव का अर्थ) स्वयं शिव को भी समझाया।
- दक्षिण भारत में आपके धाम हैं — पलनी व तिरुचेंदूर, जो जगत में प्रिय हैं।
- जो मनुष्य श्रद्धा से आपका ध्यान करता है, उसके निकट रोग, शोक व भय नहीं आते।
- जो षष्ठी का व्रत धारण करता है, प्रभु उसके समस्त मनोरथ पूर्ण करते हैं।
- आप विद्या व बुद्धि के दाता तथा वीर-शिरोमणि व जगत-विख्यात हैं।
- जो जन आपको शीश नवाता है, वह भय व संकट से मुक्ति पाता है।
- आप समस्त रोग-दोष दूर भगाते हैं और घर में सुख-समृद्धि लाते हैं।
- आप दीन-दुखियों की पुकार सुनते ही पल भर में उनका बेड़ा पार कर देते हैं।
- आप भक्तों को साहस व बल देते हैं तथा निर्भयता का वरदान देते हैं।
- जो मनुष्य दिन-रात ध्यान लगाता है, वह सहज ही स्कन्द-कृपा प्राप्त करता है।
- आप मंगलकारी व विघ्नों के विनाशक हैं; भय हरकर सुख देने वाले हैं।
- जो श्रद्धा से भोग चढ़ाता है, उसके सब बिगड़े कार्य बन जाते हैं।
- जो यह कार्तिकेय चालीसा गाता है, उसके भय व संकट सब दूर नष्ट हो जाते हैं।
- जो कोई नित्य पाठ करता है, उस पर स्कन्द (कार्तिकेय) की कृपा होती है।
- सब जन मन-इच्छित फल पाते हैं और घर में विजय व सुख लाते हैं।
- जिन पर स्कन्द की कृपा होती है, उन्हें कोई कष्ट नहीं सताता।
- स्कन्द षष्ठी पर पूजन कीजिए तथा कावड़ी लेकर दर्शन कीजिए।
- आपकी वेल-शक्ति (भाले) की महिमा अति महान है, जो दुष्टों का दमन व भक्तों का हित करती है।
- जो सच्चे भाव से यह सेवा करता है, उस पर स्कन्द देव तुरंत रीझ (प्रसन्न हो) जाते हैं।
- आपका नाम संकट-मोचन है; आप भक्तों के हृदय में नित्य निवास कर कष्ट दूर करते हैं।
- आपकी महिमा अति अपार है, जिसका विस्तार वेद-पुराण करते हैं।
- जो जन कार्तिकेय के गुण गाता है, वह समस्त पाप-ताप दूर भगा देता है।
- जो विद्यार्थी आपको मनाते हैं, वे परीक्षा में सफलता पाते हैं।
- आप युद्ध-क्षेत्र में विजय दिलाते हैं; साहसी जन आपका ध्यान करते हैं।
- घर-घर में आपकी ज्योति जगती है; नर-नारी सब आपमें अनुरक्त हो जाते हैं।
- जो रात्रि-काल में पाठ करता है, वह भय व बाधा सब दूर भगा देता है।
- जो जन वीरता व तेज चाहता है, वह नित्य कार्तिकेय का ध्यान करे।
- जो जन कार्तिकेय-वंदना गाता है, वह इस लोक व परलोक दोनों में सुख पाता है।
- आपके माता-पिता प्यारे शिव-गौरी हैं और भ्राता गणपति जगत के रक्षक हैं।
- ऐसा आपका दिव्य परिवार है, जिसे जगत में सब प्यारे भक्त पूजते हैं।
- आप विजय, साहस व तेज बढ़ाते हैं और भक्तों के सब संकट टालते हैं।
- हे कार्तिकेय स्वामी, आपकी जय हो; आप विजय व साहस के दानी हैं।
- जो प्रेमपूर्वक मन लगाकर यह सरल कार्तिकेय चालीसा पढ़ता है, उसे विजय, साहस व तेज सब सहज ही सदा प्राप्त होते हैं।
लाभ
- विजय, साहस व आत्मबल में वृद्धि होती है।
- शत्रु-बाधा, भय व संकट का नाश होता है।
- विद्या-बुद्धि व परीक्षा में सफलता मिलती है।
- रोग-शोक दूर होकर मन को शक्ति मिलती है।
कब करें पाठ
पाठ विधि
भगवान कार्तिकेय के समक्ष पुष्प व दीप अर्पित करें, "ॐ शरवणभव" अथवा "ॐ स्कन्दाय नमः" का स्मरण करते हुए चालीसा का पाठ करें। स्कन्द षष्ठी पर पाठ विशेष फलदायी है।
