श्री संतोषी माता चालीसा

śrī santoṣī mātā cālīsā

Santoshi Mata Chalisa

समय
7–9 मिनट
श्लोक/चौपाई
42
कठिनाई
सरल
शुभ दिन
शुक्रवार — विशेषकर सोलह शुक्रवार के व्रत में
उद्देश्य:मन की शांति (Peace)समृद्धि (Prosperity)शुभ आरंभ (Auspicious Start)
✓ संपूर्ण (40/40 श्लोक)

श्री संतोषी माता चालीसा एक दोहे से आरंभ होकर चालीस चौपाइयों में चलती है। इसका आरंभ "जय संतोषी माँ जग जननी, खल मति दुष्ट दैत्य दल हननी" से होता है। चौपाइयाँ माता को गणपति की पुत्री बताती हैं और शुक्रवार व्रत का पूरा फल-विधान कहती हैं।

परिचय

स्रोत: परंपरागत संतोषी माता चालीसा; रचयिता अज्ञात

एक नज़र में

मंत्र / पाठश्री संतोषी माता चालीसा
IASTśrī santoṣī mātā cālīsā
मूल स्रोतपरंपरागत संतोषी माता चालीसा; रचयिता अज्ञात
शुभ दिनशुक्रवार — विशेषकर सोलह शुक्रवार के व्रत में
पाठ समय7–9 मिनट
कठिनाईसरल

उद्भव / पृष्ठभूमि

चालीसा दूसरी ही चौपाई में वंश-परिचय दे देती है — "गणपति देव तुम्हारे ताता, रिद्धि सिद्धि कहलावहं माता": संतोषी माता गणेश जी की पुत्री हैं और ऋद्धि-सिद्धि उनकी माताएँ। यही परिचय उन्हें बाक़ी देवियों से अलग करता है।

आगे स्वरूप आता है — चतुर्भुज, गले में वनमाला, पास में गाय और मयूर की सवारी (चौपाई 6–7)। फिर वह भाव जो इस चालीसा की पहचान है: सब देवियाँ एक ही शक्ति के रूप हैं — ब्रह्मा के पास सरस्वती, विष्णु के पास लक्ष्मी, शिव के पास गिरिजा (11–12), और दुष्ट-दलन के लिए वही काली बनकर प्रकट हुईं (14–15)।

चौपाई 24 से व्रत-फल का हिस्सा शुरू होता है, और यह बहुत ठोस है — संतानहीन स्त्री, पति से बिछुड़ी नारी, विवाह-योग्य कन्या (25–27); फिर "गुड़ और चना भोग तोहि भावै" (29), उद्यापन (32), और "सात शुक्र जो व्रत मन धारे" (34)।

गुड़-चने का भोग और शुक्रवार का व्रत — ये दोनों बातें चालीसा में ही लिखी हैं, इसीलिए संतोषी माता का व्रत आज भी इसी रूप में किया जाता है।

रचयिता का नाम पाठ में कहीं नहीं आता, इसलिए कोई छाप नहीं जोड़ी गई।

संपूर्ण चालीसा

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श्री गणपति पद नाय सिर, धरि हिय शारदा ध्यान। सन्तोषी माँ की करुँ, कीरति सकल बखान॥

श्री गणपति के चरणों में सिर नवाकर और हृदय में शारदा का ध्यान धरकर, मैं संतोषी माता की समस्त कीर्ति का बखान करता हूँ।

जय संतोषी माँ जग जननी। खल मति दुष्ट दैत्य दल हननी॥

हे जगत की जननी संतोषी माता, आपकी जय हो; आप दुष्ट बुद्धि वालों और दैत्य-दल का नाश करने वाली हैं।

गणपति देव तुम्हारे ताता। रिद्धि सिद्धि कहलावहं माता॥

गणपति देव आपके पिता हैं, और ऋद्धि तथा सिद्धि आपकी माताएँ कहलाती हैं।

माता-पिता की रहौ दुलारी। कीरति केहि विधि कहुँ तुम्हारी॥

आप माता-पिता की दुलारी हैं; आपकी कीर्ति किस प्रकार कहूँ।

क्रीट मुकुट सिर अनुपम भारी। कानन कुण्डल को छवि न्यारी॥

सिर पर अनुपम और भारी किरीट मुकुट है; कानों के कुंडलों की छवि निराली है।

सोहत अंग छटा छवि प्यारी। सुन्दर चीर सुनहरी धारी॥

अंगों की छटा और छवि प्यारी लगती है; आपने सुंदर सुनहरा वस्त्र धारण किया है।

आप चतुर्भुज सुघड़ विशाला। धारण करहु गले वन माला॥

आप चतुर्भुज, सुघड़ और विशाल हैं; गले में वनमाला धारण करती हैं।

निकट है गौ अमित दुलारी। करहु मयूर आप असवारी॥

आपके निकट अत्यंत दुलारी गाय रहती है; आप मयूर की सवारी करती हैं।

जानत सबही आप प्रभुताई। सुर नर मुनि सब करहिं बड़ाई॥

आपकी प्रभुता सब जानते हैं; देवता, मनुष्य और मुनि — सब आपकी बड़ाई करते हैं।

तुम्हरे दरश करत क्षण माई। दुख दरिद्र सब जाय नसाई॥

हे माई, आपके दर्शन करते ही क्षण भर में दुःख और दरिद्रता नष्ट हो जाते हैं।

वेद पुराण रहे यश गाई। करहु भक्त की आप सहाई॥

वेद और पुराण आपका यश गाते रहे हैं; आप भक्तों की सहायता करती हैं।

ब्रह्मा ढिंग सरस्वती कहाई। लक्ष्मी रूप विष्णु ढिंग आई॥

ब्रह्मा के पास आप सरस्वती कहलाईं; विष्णु के पास लक्ष्मी रूप में आईं।

शिव ढिंग गिरजा रूप बिराजी। महिमा तीनों लोक में गाजी॥

शिव के पास गिरिजा रूप में विराजीं; आपकी महिमा तीनों लोकों में गूँजती है।

शक्ति रूप प्रगटी जन जानी। रुद्र रूप भई मात भवानी॥

शक्ति रूप में प्रकट हुईं, यह सब जानते हैं; रुद्र-रूप में आप माता भवानी बनीं।

दुष्टदलन हित प्रगटी काली। जगमग ज्योति प्रचंड निराली॥

दुष्टों के दलन के लिए काली बनकर प्रकट हुईं; आपकी प्रचंड ज्योति निराली जगमगाती है।

चण्ड मुण्ड महिषासुर मारे। शुम्भ निशुम्भ असुर हनि डारे॥

चंड, मुंड और महिषासुर का वध किया; शुंभ और निशुंभ असुरों को भी मार डाला।

महिमा वेद पुरनान बरनी। निज भक्तन के संकट हरनी॥

वेदों और पुराणों ने आपकी महिमा का वर्णन किया; आप अपने भक्तों के संकट हरती हैं।

रूप शारदा हंस मोहिनी। निरंकार साकार दाहिनी॥

शारदा रूप में हंस पर मोहिनी लगती हैं; आप निराकार भी हैं और साकार भी — सदा अनुकूल।

प्रगटाई चहुँदिश निज माया। कण कण में है तेज समाया॥

आपने चारों दिशाओं में अपनी माया प्रकट की; कण-कण में आपका तेज समाया है।

पृथ्वी सूर्य चन्द्र अरु तारे। तव इंगित क्रमबद्ध हैं सारे॥

पृथ्वी, सूर्य, चंद्र और तारे — सब आपके संकेत से ही क्रमबद्ध चलते हैं।

पालन पोषण तुमहीं करता। क्षण भंगुर में प्राण हरता॥

पालन-पोषण आप ही करती हैं, और क्षण भर में प्राण भी आप ही हरती हैं।

ब्रह्मा विष्णु तुम्हें नित ध्यावैं। शेष महेश सदा मन लावे॥

ब्रह्मा और विष्णु नित्य आपका ध्यान करते हैं; शेष और महेश सदा मन लगाते हैं।

मनोकामना पूरण करनी। पाप काटनी भव भय तरनी॥

आप मनोकामनाएँ पूर्ण करने वाली हैं; पाप काटने वाली और भव-भय से तारने वाली।

चित्त लगाय तुम्हें जो ध्याता। सो नर सुख सम्पत्ति है पाता॥

जो चित्त लगाकर आपका ध्यान करता है, वह मनुष्य सुख और सम्पत्ति पाता है।

बन्ध्या नारि तुमहिं जो ध्यावैं। पुत्र पुष्प लता सम वह पावैं॥

संतानहीन नारी यदि आपका ध्यान करे, तो उसे लता पर खिले पुष्प की तरह संतान प्राप्त होती है।

पति वियोगी अति व्याकुल नारी। तुम वियोग अति व्याकुल यारी॥

पति से बिछुड़ी नारी अत्यंत व्याकुल रहती है; आपके वियोग में भी भक्त उतना ही व्याकुल होता है। (यह पंक्ति दोनों प्रकाशित स्रोतों में इसी रूप में छपती है।)

कन्या जो कोइ तुमको ध्यावै। अपना मन वांछित वर पावै॥

जो कन्या आपका ध्यान करती है, उसे अपना मनचाहा वर प्राप्त होता है।

शीलवान गुणवान हो मैया। अपने जन की नाव खिवैया॥

हे मैया, आप शीलवान और गुणवान हैं; अपने जनों की नाव खेने वाली हैं।

विधि पूर्वक व्रत जो कोई करहीं। ताहि अमित सुख संपत्ति भरहीं॥

जो विधिपूर्वक व्रत करता है, उसे अपार सुख और सम्पत्ति से भर दिया जाता है।

गुड़ और चना भोग तोहि भावै। सेवा करै सो आनंद पावै॥

गुड़ और चने का भोग आपको भाता है; जो सेवा करता है वह आनंद पाता है।

श्रद्धा युक्त ध्यान जो धरहीं। सो नर निश्चय भव सों तरहीं॥

जो श्रद्धा के साथ ध्यान धरता है, वह मनुष्य निश्चय ही संसार से तर जाता है।

उद्यापन जो करहि तुम्हारा। ताको सहज करहु निस्तारा॥

जो आपके व्रत का उद्यापन करता है, आप सहज ही उसका उद्धार कर देती हैं।

नारि सुहागिन व्रत जो करती। सुख सम्पत्ति सों गोदी भरती॥

जो सुहागिन नारी यह व्रत करती है, उसकी गोद सुख और सम्पत्ति से भर जाती है।

जो सुमिरत जैसी मन भावा। सो नर वैसो ही फल पावा॥

जो जैसे भाव से स्मरण करता है, उसे वैसा ही फल मिलता है।

सात शुक्र जो व्रत मन धारे। ताके पूर्ण मनोरथ सारे॥

जो मन से सात शुक्रवार का व्रत धारण करता है, उसके सारे मनोरथ पूर्ण होते हैं।

सेवा करहि भक्ति युत जोई। ताको दूर दरिद्र दुख होई॥

जो भक्ति के साथ सेवा करता है, उसकी दरिद्रता और दुःख दूर हो जाते हैं।

जो जन शरण माता तेरी आवै। ताके क्षण में काज बनावै॥

हे माता, जो आपकी शरण में आता है, उसका काम आप क्षण भर में बना देती हैं।

जय जय जय अम्बे कल्यानी। कृपा करौ मोरी महारानी॥

हे कल्याणी अम्बे, आपकी जय-जय-जय हो; हे महारानी, मुझ पर कृपा कीजिए।

जो कोई पढ़ै मात चालीसा। तापे करहिं कृपा जगदीशा॥

जो कोई माता का यह चालीसा पढ़ता है, उस पर जगदीश्वर कृपा करते हैं।

नित प्रति पाठ करै इक बारा। सो नर रहै तुम्हारा प्यारा॥

जो प्रतिदिन एक बार पाठ करता है, वह मनुष्य आपका प्यारा बना रहता है।

नाम लेत ब्याधा सब भागे। रोग दोष कबहूँ नहीं लागे॥

आपका नाम लेते ही सब बाधाएँ भाग जाती हैं; रोग और दोष कभी नहीं लगते।

सन्तोषी माँ के सदा, बन्दहुँ पग निश वास। पूर्ण मनोरथ हों सकल, मात हरौ भव त्रास॥

फलश्रुति: मैं सदा संतोषी माता के चरणों की वंदना करता हूँ। मेरे सारे मनोरथ पूर्ण हों; हे माता, संसार का भय हर लीजिए।

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शब्द-अर्थ (Word-by-Word)

तातापिता
क्रीट मुकुटकिरीट मुकुट — ऊँचा राजसी मुकुट
काननकान
चीरवस्त्र
ढिंगपास, निकट
बिराजीविराजमान हुईं
पुरनानपुराणों ने
बन्ध्यासंतानहीन स्त्री
खिवैयानाव खेने वाली
उद्यापनव्रत के पूर्ण होने पर किया जाने वाला समापन-विधान
सात शुक्रसात शुक्रवार का व्रत
ब्याधाबाधा, कष्ट

अर्थ (हिन्दी)

  1. श्री गणपति के चरणों में सिर नवाकर और हृदय में शारदा का ध्यान धरकर, मैं संतोषी माता की समस्त कीर्ति का बखान करता हूँ।
  2. हे जगत की जननी संतोषी माता, आपकी जय हो; आप दुष्ट बुद्धि वालों और दैत्य-दल का नाश करने वाली हैं।
  3. गणपति देव आपके पिता हैं, और ऋद्धि तथा सिद्धि आपकी माताएँ कहलाती हैं।
  4. आप माता-पिता की दुलारी हैं; आपकी कीर्ति किस प्रकार कहूँ।
  5. सिर पर अनुपम और भारी किरीट मुकुट है; कानों के कुंडलों की छवि निराली है।
  6. अंगों की छटा और छवि प्यारी लगती है; आपने सुंदर सुनहरा वस्त्र धारण किया है।
  7. आप चतुर्भुज, सुघड़ और विशाल हैं; गले में वनमाला धारण करती हैं।
  8. आपके निकट अत्यंत दुलारी गाय रहती है; आप मयूर की सवारी करती हैं।
  9. आपकी प्रभुता सब जानते हैं; देवता, मनुष्य और मुनि — सब आपकी बड़ाई करते हैं।
  10. हे माई, आपके दर्शन करते ही क्षण भर में दुःख और दरिद्रता नष्ट हो जाते हैं।
  11. वेद और पुराण आपका यश गाते रहे हैं; आप भक्तों की सहायता करती हैं।
  12. ब्रह्मा के पास आप सरस्वती कहलाईं; विष्णु के पास लक्ष्मी रूप में आईं।
  13. शिव के पास गिरिजा रूप में विराजीं; आपकी महिमा तीनों लोकों में गूँजती है।
  14. शक्ति रूप में प्रकट हुईं, यह सब जानते हैं; रुद्र-रूप में आप माता भवानी बनीं।
  15. दुष्टों के दलन के लिए काली बनकर प्रकट हुईं; आपकी प्रचंड ज्योति निराली जगमगाती है।
  16. चंड, मुंड और महिषासुर का वध किया; शुंभ और निशुंभ असुरों को भी मार डाला।
  17. वेदों और पुराणों ने आपकी महिमा का वर्णन किया; आप अपने भक्तों के संकट हरती हैं।
  18. शारदा रूप में हंस पर मोहिनी लगती हैं; आप निराकार भी हैं और साकार भी — सदा अनुकूल।
  19. आपने चारों दिशाओं में अपनी माया प्रकट की; कण-कण में आपका तेज समाया है।
  20. पृथ्वी, सूर्य, चंद्र और तारे — सब आपके संकेत से ही क्रमबद्ध चलते हैं।
  21. पालन-पोषण आप ही करती हैं, और क्षण भर में प्राण भी आप ही हरती हैं।
  22. ब्रह्मा और विष्णु नित्य आपका ध्यान करते हैं; शेष और महेश सदा मन लगाते हैं।
  23. आप मनोकामनाएँ पूर्ण करने वाली हैं; पाप काटने वाली और भव-भय से तारने वाली।
  24. जो चित्त लगाकर आपका ध्यान करता है, वह मनुष्य सुख और सम्पत्ति पाता है।
  25. संतानहीन नारी यदि आपका ध्यान करे, तो उसे लता पर खिले पुष्प की तरह संतान प्राप्त होती है।
  26. पति से बिछुड़ी नारी अत्यंत व्याकुल रहती है; आपके वियोग में भी भक्त उतना ही व्याकुल होता है। (यह पंक्ति दोनों प्रकाशित स्रोतों में इसी रूप में छपती है।)
  27. जो कन्या आपका ध्यान करती है, उसे अपना मनचाहा वर प्राप्त होता है।
  28. हे मैया, आप शीलवान और गुणवान हैं; अपने जनों की नाव खेने वाली हैं।
  29. जो विधिपूर्वक व्रत करता है, उसे अपार सुख और सम्पत्ति से भर दिया जाता है।
  30. गुड़ और चने का भोग आपको भाता है; जो सेवा करता है वह आनंद पाता है।
  31. जो श्रद्धा के साथ ध्यान धरता है, वह मनुष्य निश्चय ही संसार से तर जाता है।
  32. जो आपके व्रत का उद्यापन करता है, आप सहज ही उसका उद्धार कर देती हैं।
  33. जो सुहागिन नारी यह व्रत करती है, उसकी गोद सुख और सम्पत्ति से भर जाती है।
  34. जो जैसे भाव से स्मरण करता है, उसे वैसा ही फल मिलता है।
  35. जो मन से सात शुक्रवार का व्रत धारण करता है, उसके सारे मनोरथ पूर्ण होते हैं।
  36. जो भक्ति के साथ सेवा करता है, उसकी दरिद्रता और दुःख दूर हो जाते हैं।
  37. हे माता, जो आपकी शरण में आता है, उसका काम आप क्षण भर में बना देती हैं।
  38. हे कल्याणी अम्बे, आपकी जय-जय-जय हो; हे महारानी, मुझ पर कृपा कीजिए।
  39. जो कोई माता का यह चालीसा पढ़ता है, उस पर जगदीश्वर कृपा करते हैं।
  40. जो प्रतिदिन एक बार पाठ करता है, वह मनुष्य आपका प्यारा बना रहता है।
  41. आपका नाम लेते ही सब बाधाएँ भाग जाती हैं; रोग और दोष कभी नहीं लगते।
  42. फलश्रुति: मैं सदा संतोषी माता के चरणों की वंदना करता हूँ। मेरे सारे मनोरथ पूर्ण हों; हे माता, संसार का भय हर लीजिए।

लाभ

  • संतोषी माता का परिचय स्पष्ट — गणेश जी की पुत्री, ऋद्धि-सिद्धि की संतान (चौपाई 2)।
  • शुक्रवार व्रत का पूरा विधान चालीसा में ही है — गुड़-चने का भोग (29) और सात शुक्रवार का संकल्प (34)।
  • उद्यापन का उल्लेख भी पाठ में है (31), इसलिए व्रत करने वालों के लिए यह मार्गदर्शक भी है।
  • भाषा सरल और चाल हनुमान चालीसा जैसी — कंठस्थ करना आसान।

कब करें पाठ

शुक्रवार को — विशेषकर सोलह या सात शुक्रवार के व्रत मेंव्रत के उद्यापन के दिननित्य प्रातः पूजा मेंकिसी मनोकामना के संकल्प के साथ

पाठ विधि

शुक्रवार को स्नान कर माता के चित्र के समक्ष दीप जलाएँ और गुड़-चने का भोग अर्पित करें — चालीसा स्वयं यही भोग बताती है (चौपाई 29)। पहले दोहा पढ़ें, फिर चालीस चौपाइयाँ, और अंत में समापन दोहा। व्रत के दिन खटाई से परहेज़ की परंपरा है। संकल्प पूरा होने पर उद्यापन किया जाता है।

प्रामाणिकता व स्रोत

स्थिति✓ संपूर्ण (40/40 श्लोक)
स्रोत परंपराdrikpanchang.com — सन्तोषी माता चालीसा (आधार-पाठ) · hindunidhi.com — संतोषी माता चालीसा (स्वतंत्र पुष्टि; शब्द-मिलान 81.8%) · ℹ️ चौपाई 25 दोनों स्रोतों में एक जैसी विचित्र छपती है ("पति वियोगी… तुम वियोग अति व्याकुल यारी") — बदली नहीं गई।
रचयिताअज्ञात (परंपरा से प्रचलित)
अंतिम अद्यतनसितंबर 2026

श्री संतोषी माता चालीसा — सामान्य प्रश्न