श्री सन्तोषी माता आरती

śrī santoṣī mātā āratī

Santoshi Mata Aarti (Jai Santoshi Mata)

समय
5 मिनट
श्लोक/चौपाई
12
कठिनाई
सरल
शुभ दिन
शुक्रवार; सन्तोषी माता व्रत
उद्देश्य:संतोष व शांति (Contentment)समृद्धि (Prosperity)मनोकामना (Wish fulfilment)
✓ संपूर्ण

"जय सन्तोषी माता, मैया जय सन्तोषी माता" शुक्रवार के व्रत में गाई जाने वाली आरती है। इसके ग्यारह पद और एक फलश्रुति हैं। आरती माता के नाम का कारण स्वयं बताती है — "गुड़ अरु चना परमप्रिय, तामे संतोष कियो; सन्तोषी कहलाई": गुड़-चने जैसे सादे भोग में संतोष किया, इसलिए सन्तोषी कहलाईं।

परिचय

माँ दुर्गा आदिशक्ति का स्वरूप हैं — दुष्टों का संहार करने वाली और भक्तों की रक्षक।

स्रोत: "जय सन्तोषी माता" — शुक्रवार-व्रत की परंपरागत आरती

एक नज़र में

मंत्र / पाठश्री सन्तोषी माता आरती
IASTśrī santoṣī mātā āratī
देवतामाँ दुर्गा
मूल स्रोत"जय सन्तोषी माता" — शुक्रवार-व्रत की परंपरागत आरती
शुभ दिनशुक्रवार; सन्तोषी माता व्रत
पाठ समय5 मिनट
कठिनाईसरल

उद्भव / पृष्ठभूमि

यह आरती शुक्रवार के व्रत-दिवस का पूरा दृश्य है — शृंगार, सिंहासन, भोग, कथा और अंत में माँग।

रूप (पद 2–4). सुनहरी चुनरी, हीरे-पन्ने का शृंगार, गेरुए-लाल रंग की छटा, कमल-सा मुख और मंद-मंद करुणामयी मुस्कान; सोने के सिंहासन पर बैठी माता पर चँवर डुल रहे हैं और धूप-दीप-मधु-मेवा का भोग सजा है।

नाम का कारण (पद 5). "गुड़ अरु चना परमप्रिय, तामे संतोष कियो; सन्तोषी कहलाई, भक्तन वैभव दियो" — इतने सादे भोग में संतोष कर लेना ही उनका स्वभाव है, और इसी से वे भक्तों को वैभव देती हैं।

व्रत का दिन (पद 6–7). "शुक्रवार प्रिय मानत, आज दिवस सोही" — शुक्रवार उन्हें प्रिय है, और आज वही दिन है; भक्तों की मंडली कथा सुन रही है, मंदिर में ज्योति जगमगा रही है।

फल (पद 9–10). दुखी, दरिद्र और रोगी संकट से छूटे, घर धन-धान्य से भर गए; और जिसने ध्यान किया, पूजा-कथा सुनी, उसके घर आनंद आया।

आरती (लिरिक्स)

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जय सन्तोषी माता, मैया जय सन्तोषी माता। अपने सेवक जन को, सुख सम्पत्ति दाता॥

हे सन्तोषी माता, हे मैया, आपकी जय हो! आप अपने सेवकों को सुख और संपत्ति देने वाली हैं।

सुन्दर चीर सुनहरी माँ धारण कीन्हों। हीरा पन्ना दमके, तन श्रृंगार कीन्हों॥

माँ ने सुंदर सुनहरी चुनरी धारण की है; हीरे और पन्ने दमक रहे हैं — (इनसे) तन का शृंगार किया है।

गेरू लाल छटा छवि, बदन कमल सोहे। मन्द हंसत करुणामयी, त्रिभुवन मन मोहे॥

गेरुए-लाल रंग की छटा है, कमल-सा मुख शोभा पाता है; करुणामयी माँ मंद-मंद मुस्कुराती हैं और तीनों लोकों का मन मोह लेती हैं।

स्वर्ण सिंहासन बैठी, चंवर ढुरें प्यारे। धूप दीप मधुमेवा, भोग धरें न्यारे॥

आप सोने के सिंहासन पर बैठी हैं, सुंदर चँवर डुल रहे हैं; धूप, दीप, मधु, मेवा — अनोखे भोग रखे गए हैं।

गुड़ अरु चना परमप्रिय, तामे संतोष कियो। सन्तोषी कहलाई, भक्तन वैभव दियो॥

गुड़ और चना आपको परम प्रिय हैं, उन्हीं में आपने संतोष किया; (इसीलिए) सन्तोषी कहलाईं, और भक्तों को वैभव दिया।

शुक्रवार प्रिय मानत, आज दिवस सोही। भक्त मण्डली छाई, कथा सुनत मोही॥

आप शुक्रवार को प्रिय मानती हैं, और आज वही दिन है; भक्तों की मंडली जुटी है और कथा सुनकर मोहित है।

मन्दिर जगमग ज्योति, मंगल ध्वनि छाई। विनय करें हम बालक, चरनन सिर नाई॥

मंदिर में ज्योति जगमगा रही है, मंगल-ध्वनि छाई है; हम बालक चरणों में सिर नवाकर विनती करते हैं।

भक्ति भावमय पूजा, अंगीकृत कीजै। जो मन बसै हमारे, इच्छा फल दीजै॥

भक्ति-भाव से भरी यह पूजा स्वीकार कीजिए; जो हमारे मन में बसा है, वह इच्छित फल दीजिए।

दुखी दरिद्री, रोग, संकट मुक्त किये। बहु धन-धान्य भरे घर, सुख सौभाग्य दिये॥

आपने दुखी, दरिद्र और रोगी को संकट से मुक्त किया; घरों को बहुत धन-धान्य से भर दिया और सुख-सौभाग्य दिया।

ध्यान धर्यो जिस जन ने, मनवांछित फल पायो। पूजा कथा श्रवण कर, घर आनन्द आयो॥

जिस जन ने आपका ध्यान किया, उसने मनचाहा फल पाया; पूजा और कथा सुनकर उसके घर आनंद आया।

शरण गहे की लज्जा, राखियो जगदम्बे। संकट तू ही निवारे, दयामयी अम्बे॥

हे जगदम्बे, जिसने आपकी शरण ली है, उसकी लाज रखिए; हे दयामयी अम्बे, संकट आप ही दूर करती हैं।

सन्तोषी माता की आरती, जो कोई जन गावे। ऋद्धि-सिद्धि, सुख-सम्पत्ति, जी भरकर पावे॥

(फलश्रुति) जो कोई सन्तोषी माता की यह आरती गाता है, वह ऋद्धि-सिद्धि और सुख-संपत्ति जी भरकर पाता है।

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अर्थ (हिन्दी)

  1. हे सन्तोषी माता, हे मैया, आपकी जय हो! आप अपने सेवकों को सुख और संपत्ति देने वाली हैं।
  2. माँ ने सुंदर सुनहरी चुनरी धारण की है; हीरे और पन्ने दमक रहे हैं — (इनसे) तन का शृंगार किया है।
  3. गेरुए-लाल रंग की छटा है, कमल-सा मुख शोभा पाता है; करुणामयी माँ मंद-मंद मुस्कुराती हैं और तीनों लोकों का मन मोह लेती हैं।
  4. आप सोने के सिंहासन पर बैठी हैं, सुंदर चँवर डुल रहे हैं; धूप, दीप, मधु, मेवा — अनोखे भोग रखे गए हैं।
  5. गुड़ और चना आपको परम प्रिय हैं, उन्हीं में आपने संतोष किया; (इसीलिए) सन्तोषी कहलाईं, और भक्तों को वैभव दिया।
  6. आप शुक्रवार को प्रिय मानती हैं, और आज वही दिन है; भक्तों की मंडली जुटी है और कथा सुनकर मोहित है।
  7. मंदिर में ज्योति जगमगा रही है, मंगल-ध्वनि छाई है; हम बालक चरणों में सिर नवाकर विनती करते हैं।
  8. भक्ति-भाव से भरी यह पूजा स्वीकार कीजिए; जो हमारे मन में बसा है, वह इच्छित फल दीजिए।
  9. आपने दुखी, दरिद्र और रोगी को संकट से मुक्त किया; घरों को बहुत धन-धान्य से भर दिया और सुख-सौभाग्य दिया।
  10. जिस जन ने आपका ध्यान किया, उसने मनचाहा फल पाया; पूजा और कथा सुनकर उसके घर आनंद आया।
  11. हे जगदम्बे, जिसने आपकी शरण ली है, उसकी लाज रखिए; हे दयामयी अम्बे, संकट आप ही दूर करती हैं।
  12. (फलश्रुति) जो कोई सन्तोषी माता की यह आरती गाता है, वह ऋद्धि-सिद्धि और सुख-संपत्ति जी भरकर पाता है।

लाभ

  • शुक्रवार-व्रत का समापन — आरती स्वयं "शुक्रवार प्रिय मानत, आज दिवस सोही" कहती है।
  • संतोष का भाव — माता का नाम ही सादे भोग में संतोष से पड़ा (पद 5)।
  • पद 9 — दुख, दरिद्रता, रोग और संकट से मुक्ति का भाव।
  • फलश्रुति: ऋद्धि-सिद्धि और सुख-संपत्ति जी भरकर।

कब करें पाठ

शुक्रवार कोसन्तोषी माता व्रत-कथा के बादप्रातः व संध्या पूजा में

पाठ विधि

शुक्रवार को सन्तोषी माता के समक्ष दीप और धूप जलाएँ और गुड़-चने का भोग रखें — आरती का पाँचवाँ पद यही भोग बताता है। व्रत-कथा सुनने के बाद आरती गाएँ; टेक "जय सन्तोषी माता" हर पद के बाद दोहराएँ।

प्रामाणिकता व स्रोत

स्थिति✓ संपूर्ण
स्रोत परंपराdrikpanchang.com — आरती श्री सन्तोषी माँ (आधार-पाठ) · bhaktibharat.com — आरती: जय सन्तोषी माता
रचयिताअज्ञात (किसी प्रति में छाप नहीं)
अंतिम अद्यतनसितंबर 2026

यह भी देखें

देव परिचय

माँ दुर्गा

Goddess Durga

माँ दुर्गा आदिशक्ति का स्वरूप हैं — दुष्टों का संहार करने वाली और भक्तों की रक्षक।

देवता वर्गशक्ति · रक्षा · विजय · साहस
वाहनसिंह
मुख्य मंत्रॐ दुं दुर्गायै नमः
सभी पाठ देखें

श्री सन्तोषी माता आरती — सामान्य प्रश्न

संबंधित पर्व व व्रत

माँ दुर्गा भक्ति संग्रह

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