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लिपि:
॥ श्री ॥

श्री संतोषी माता आरती

आरती

पाठ

1

जय सन्तोषी माता, मैया जय सन्तोषी माता। अपने सेवक जन की, सुख सम्पति दाता॥

2

सुन्दर चीर सुनहरी, माँ धारण कीन्हो। हीरा पन्ना दमके, तन शृंगार कीन्हो॥

3

गुड़ अरु चना परम प्रिय, ता में सन्तोष कियो। सन्तोषी कहलाई, भक्तन वैभव दियो॥

4

शुक्रवार प्रिय तुमको, व्रत से तुम रीझो। भक्तन के दुख हरती, सब बिगड़े सीझो॥

5

सन्तोषी माँ की आरती, जो कोई जन गावे। ऋद्धि-सिद्धि सुख-सम्पति, सहज ही पावे॥

अर्थ (हिन्दी)

  1. हे संतोषी माता, आपकी जय हो! आप अपने सेवक भक्तों को सुख व सम्पत्ति प्रदान करने वाली हैं।
  2. हे माँ, आपने सुन्दर सुनहरे वस्त्र धारण किए हैं; हीरे-पन्ने दमक रहे हैं तथा आपने तन का सुन्दर शृंगार किया है।
  3. आपको गुड़ व चना अत्यंत प्रिय है, उसी में आपने संतोष किया; इसी कारण "संतोषी" कहलाईं और भक्तों को वैभव प्रदान किया।
  4. आपको शुक्रवार प्रिय है तथा व्रत से आप प्रसन्न होती हैं; आप भक्तों के दुःख हरती हैं और सब बिगड़े कार्य संवार देती हैं।
  5. संतोषी माँ की यह आरती जो भी भक्त गाता है, वह ऋद्धि-सिद्धि व सुख-सम्पत्ति सहज ही प्राप्त कर लेता है।

लाभ

  • मन में संतोष व शांति का भाव बढ़ता है।
  • घर में सुख-समृद्धि व सौहार्द बना रहता है।
  • श्रद्धापूर्वक व्रत-आरती से मनोकामना पूर्ण होती है।

कब करें पाठ

शुक्रवार को · संतोषी माता व्रत में · प्रातः व संध्या पूजा में

स्रोत

रचयिता: पारंपरिक. पारंपरिक हिन्दू आरती संग्रह

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