1जय जय कार्तिकेय स्वामी, जय देव-सेनापति।
शिव-पार्वती के नंदन, हरते भक्तन विपति॥
हे कार्तिकेय स्वामी, देव-सेनापति, आपकी जय हो! आप शिव-पार्वती के पुत्र हैं और भक्तों की विपत्ति हरते हैं।
2षण्मुख रूप विराजे, मयूर पर सवारी।
कर में शक्ति-वेल धारे, शोभा अति न्यारी॥
षण्मुख (छह मुख वाले) रूप में विराजमान, मयूर पर सवारी करते हुए; हाथ में शक्ति-वेल (भाला) धारण किए — आपकी शोभा अति अनुपम है।
3तारकासुर संहारी, देवन भय टारा।
वीर साहस के दाता, जग-रक्षा-कारा॥
आपने तारकासुर का संहार कर देवताओं का भय दूर किया; आप वीरता व साहस के दाता तथा जगत की रक्षा करने वाले हैं।
4भक्तन के संकट हरते, विजय सदा दिलाते।
रोग-शोक भय मिटते, जो तुमको ध्याते॥
आप भक्तों के संकट हरते हैं और सदा विजय दिलाते हैं; जो आपका ध्यान करते हैं, उनके रोग-शोक व भय मिट जाते हैं।
5कार्तिकेय जी की आरती, जो जन श्रद्धा गावे।
विजय साहस बल पावे, संकट सब मिट जावे॥
जो भक्त श्रद्धा से कार्तिकेय जी की यह आरती गाता है, वह विजय, साहस व बल पाता है और उसके समस्त संकट मिट जाते हैं।