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लिपि:
॥ श्री ॥

श्री कार्तिकेय आरती

आरती

पाठ

1

जय जय कार्तिकेय स्वामी, जय देव-सेनापति। शिव-पार्वती के नंदन, हरते भक्तन विपति॥

2

षण्मुख रूप विराजे, मयूर पर सवारी। कर में शक्ति-वेल धारे, शोभा अति न्यारी॥

3

तारकासुर संहारी, देवन भय टारा। वीर साहस के दाता, जग-रक्षा-कारा॥

4

भक्तन के संकट हरते, विजय सदा दिलाते। रोग-शोक भय मिटते, जो तुमको ध्याते॥

5

कार्तिकेय जी की आरती, जो जन श्रद्धा गावे। विजय साहस बल पावे, संकट सब मिट जावे॥

अर्थ (हिन्दी)

  1. हे कार्तिकेय स्वामी, देव-सेनापति, आपकी जय हो! आप शिव-पार्वती के पुत्र हैं और भक्तों की विपत्ति हरते हैं।
  2. षण्मुख (छह मुख वाले) रूप में विराजमान, मयूर पर सवारी करते हुए; हाथ में शक्ति-वेल (भाला) धारण किए — आपकी शोभा अति अनुपम है।
  3. आपने तारकासुर का संहार कर देवताओं का भय दूर किया; आप वीरता व साहस के दाता तथा जगत की रक्षा करने वाले हैं।
  4. आप भक्तों के संकट हरते हैं और सदा विजय दिलाते हैं; जो आपका ध्यान करते हैं, उनके रोग-शोक व भय मिट जाते हैं।
  5. जो भक्त श्रद्धा से कार्तिकेय जी की यह आरती गाता है, वह विजय, साहस व बल पाता है और उसके समस्त संकट मिट जाते हैं।

लाभ

  • विजय, साहस व आत्मबल में वृद्धि होती है।
  • शत्रु-बाधा, भय व संकट का नाश होता है।
  • रोग-शोक दूर होकर मन को शक्ति मिलती है।

कब करें पाठ

मंगलवार व षष्ठी तिथि को · स्कन्द षष्ठी पर · प्रातः व संध्या पूजा में

स्रोत

रचयिता: पारंपरिक. पारंपरिक हिन्दू आरती संग्रह

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