श्री गंगा चालीसा

śrī gaṅgā cālīsā

Ganga Chalisa

समय
7–9 मिनट
श्लोक/चौपाई
43
कठिनाई
सरल
शुभ दिन
गंगा दशहरा, गंगा सप्तमी, पूर्णिमा व स्नान-पर्व
उद्देश्य:मुक्ति (Liberation)मन की शांति (Peace)आध्यात्मिक उन्नति (Spiritual Growth)
✓ संपूर्ण (40/40 श्लोक)

श्री गंगा चालीसा एक दोहे से आरंभ होकर चालीस चौपाइयों में चलती है। इसका आरंभ "जय जय जय जग पावनी, जयति देवसरि गंग" से होता है। चौपाइयाँ भगीरथ की तपस्या, शिव की जटा और गंगा की तीन धाराओं की पूरी कथा कहती हैं।

परिचय

स्रोत: परंपरागत गंगा चालीसा; चौपाई 39 में "सुन्दरदास" की छाप

एक नज़र में

मंत्र / पाठश्री गंगा चालीसा
IASTśrī gaṅgā cālīsā
मूल स्रोतपरंपरागत गंगा चालीसा; चौपाई 39 में "सुन्दरदास" की छाप
शुभ दिनगंगा दशहरा, गंगा सप्तमी, पूर्णिमा व स्नान-पर्व
पाठ समय7–9 मिनट
कठिनाईसरल

उद्भव / पृष्ठभूमि

यह चालीसा गंगा-अवतरण की कथा क्रम से कहती है, और उसी में इसकी उपयोगिता है।

पहले परिचय — भगीरथी, जह्नु-सुता और भीष्म की माता (चौपाई 2–3)। तीनों नाम तीन अलग कथाओं से आते हैं: भगीरथ के तप से उतरीं, जह्नु ऋषि ने पीकर फिर छोड़ा, और शांतनु से भीष्म को जन्म दिया।

फिर तीर्थों का क्रम — हरिद्वार, प्रयाग का अक्षयवट, काशी का करवट (चौपाई 11–12), और गंगासागर, जहाँ सगर के साठ हज़ार पुत्र तरे (10)।

अवतरण-कथा चौपाई 14–17 में है, और वह बहुत सुंदर ढंग से कही गई है: भगीरथ के तप पर ब्रह्मा ने धारा दी; गंगा वेग से चलीं तो शिव की जटा में समा गईं और वर्ष भर वहीं भूली रहीं; फिर भगीरथ ने शिव को मनाया तब जटा से एक बूँद मिली।

उसके बाद तीन धाराओं की बात आती है (18–20) — पाताल में प्रभावती, आकाश में मंदाकिनी, और मृत्युलोक में जाह्नवी।

अंत में फल-भाग है, जिसमें एक पंक्ति विशेष प्रसिद्ध है — "जई पगु सुरसरी हेतु उठावही, तई जगि अश्वमेघ फल पावहि" (25): गंगा की ओर उठाया हर क़दम अश्वमेध यज्ञ का फल देता है।

चौपाई 39 में रचयिता की छाप है — "ककरा ग्राम ऋषि दुर्वासा, सुन्दरदास गंगा कर दासा"।

संपूर्ण चालीसा

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जय जय जय जग पावनी, जयति देवसरि गंग। जय शिव जटा निवासिनी, अनुपम तुंग तरंग॥

हे जगत को पवित्र करने वाली, आपकी जय-जय-जय हो; हे देवनदी गंगा, जय हो। हे शिव की जटा में निवास करने वाली, अनुपम और ऊँची तरंगों वाली — जय हो।

जय जय जननी हरण अघखानी। आनंद करनी गंगा महारानी॥

हे जननी, आपकी जय हो; आप पापों की खान को हर लेने वाली और आनंद देने वाली गंगा महारानी हैं।

जय भगीरथी सुरसरि माता। कलिमल मूल दलिनी विख्याता॥

हे भगीरथी, हे देवनदी माता, जय हो; आप कलियुग के मल को जड़ से उखाड़ने वाली विख्यात हैं।

जय जय जहानु सुता अघ हननी। भीष्म की माता जग जननी॥

हे जह्नु ऋषि की पुत्री, पाप नाश करने वाली, जय हो; आप भीष्म की माता और जगत की जननी हैं।

धवल कमल दल मम तनु साजे। लखी शत शरद चंद्र छवि लाजै॥

श्वेत कमल-दल जैसा आपका शरीर सुशोभित है; उसे देखकर सौ शरद-चंद्रमाओं की छवि भी लजा जाती है।

वाहन मकर विमल शुची सोहें। अमिया कलश कर लखी मन मोहें॥

वहाँ निर्मल और पवित्र मकर सुशोभित है; हाथ में अमृत-कलश देखकर मन मोहित हो जाता है।

जडित रत्न कंचन आभूषण। हिय मणि हार, हरानितम दूषण॥

रत्नजड़ित स्वर्ण-आभूषण हैं; हृदय पर मणियों का हार है, जो अंधकार और दोष हर लेता है।

जग पावनी त्रय ताप नसावनी। तरल तरंग तुंग मन भावनी॥

आप जगत को पवित्र करने वाली और तीनों तापों को नष्ट करने वाली हैं; आपकी चंचल और ऊँची तरंगें मन को भाती हैं।

जो गणपति अति पूज्य प्रधान। तिहूँ ते प्रथम गंगा अस्नाना॥

गणपति यद्यपि सबसे पहले पूज्य हैं, फिर भी उनसे भी पहले गंगा-स्नान किया जाता है।

ब्रम्हा कमंडल वासिनी देवी। श्री प्रभु पद पंकज सुख सेवि॥

आप ब्रह्मा के कमंडल में निवास करने वाली देवी हैं; प्रभु के चरण-कमलों की सुखपूर्वक सेवा करने वाली।

साठी सहस्त्र सागर सुत तारयो। गंगा सागर तीरथ धारयो॥

आपने सगर के साठ हज़ार पुत्रों को तार दिया; वहीं गंगासागर तीर्थ स्थापित हुआ।

अगम तरंग उठ्यो मन भावन। लखी तीरथ हरिद्वार सुहावन॥

अगम तरंगें मन को भाती हुई उठीं; और हरिद्वार तीर्थ सुहावना दिखाई दिया।

तीरथ राज प्रयाग अक्षयवट। धरयो मातु पुनि काशी करवट॥

तीर्थराज प्रयाग का अक्षयवट, और फिर हे माता, आपने काशी में करवट ली।

धनी धनी सुरसरि स्वर्ग की सीढ़ी। तारनी अमित पितर पद पीढ़ी॥

धन्य हैं आप, देवनदी — स्वर्ग की सीढ़ी; अनगिनत पितरों की पीढ़ियों को तारने वाली।

भागीरथ तप कियो उपारा। दियो ब्रह्मा तव सुरसरि धारा॥

भगीरथ ने अपार तप किया; तब ब्रह्मा ने आपकी देवनदी-धारा प्रदान की।

जब जग जननी चल्यो हहराई। शम्भु जटा महं रह्यो समाई॥

जब जगजननी वेग से हहराती हुई चलीं, तब वे शिव की जटा में समा गईं।

वर्ष पर्यंत गंगा महारानी। रहीं शम्भू के जटा भुलानी॥

वर्ष भर गंगा महारानी शिव की जटा में भूली-सी रहीं।

मुनि भागीरथ शम्भुहीं ध्यायो। तब इक बूंद जटा से पायो॥

फिर भगीरथ ने शिव का ध्यान किया, तब जटा से एक बूँद प्राप्त हुई।

ताते मातु भई त्रय धारा। मृत्यु लोक नभ अरु पातारा॥

उसी से, हे माता, आप तीन धाराओं में बँट गईं — मृत्युलोक, आकाश और पाताल।

गईं पाताल प्रभावती नामा। मन्दाकिनी गई गगन ललामा॥

पाताल में जाकर आप "प्रभावती" कहलाईं; आकाश में शोभायमान "मंदाकिनी" हुईं।

मृत्यु लोक जाह्नवी सुहावनी। कलिमल हरनी अगम जग पावनि॥

मृत्युलोक में आप सुहावनी "जाह्नवी" हैं — कलियुग का मल हरने वाली और जगत को पवित्र करने वाली।

धनि मइया तब महिमा भारी। धर्मं धुरी कलि कलुष कुठारी॥

हे मैया, आप धन्य हैं; आपकी महिमा बड़ी है। आप धर्म की धुरी और कलियुग के कलुष पर कुल्हाड़ी हैं।

मातु प्रभवति धनि मन्दाकिनी। धनि सुर सरित सकल भयनासिनी॥

हे माता प्रभावती, हे मंदाकिनी, आप धन्य हैं; हे देवनदी, आप समस्त भय नष्ट करने वाली हैं।

पान करत निर्मल गंगा जल। पावत मन इच्छित अनंत फल॥

निर्मल गंगाजल का पान करने से मन-इच्छित अनंत फल प्राप्त होते हैं।

पुरव जन्म पुण्य जब जागत। तबहीं ध्यान गंगा महँ लागत॥

जब पूर्वजन्म का पुण्य जागता है, तभी मन गंगा के ध्यान में लगता है।

जई पगु सुरसरी हेतु उठावही। तई जगि अश्वमेघ फल पावहि॥

जो भी क़दम गंगा की ओर उठाया जाता है, उससे संसार में अश्वमेध यज्ञ का फल प्राप्त होता है।

महा पतित जिन कहू न तारे। तिन तारे इक नाम तिहारे॥

जिन महा-पतितों को कहीं किसी ने नहीं तारा, उन्हें आपके एक नाम ने तार दिया।

शत योजन हूँ से जो ध्यावहिं। निशचाई विष्णु लोक पद पावहीं॥

जो सौ योजन दूर से भी आपका ध्यान करते हैं, वे निश्चय ही विष्णुलोक का पद पाते हैं।

नाम भजत अगणित अघ नाशै। विमल ज्ञान बल बुद्धि प्रकाशे॥

आपका नाम भजने से अनगिनत पाप नष्ट होते हैं; निर्मल ज्ञान, बल और बुद्धि प्रकाशित होती है।

जिमी धन मूल धर्मं अरु दाना। धर्मं मूल गँगाजल पाना॥

जैसे धन का मूल धर्म और दान है, वैसे ही धर्म का मूल गंगाजल का पान है।

तब गुन गुणन करत दुःख भाजत। गृह गृह सम्पति सुमति विराजत॥

आपके गुणों का गुणगान करने से दुःख भाग जाते हैं; घर-घर में सम्पत्ति और सुमति विराजती है।

गंगहि नेम सहित नित ध्यावत। दुर्जनहूँ सज्जन पद पावत॥

जो नियम सहित नित्य गंगा का ध्यान करता है, वह दुर्जन होकर भी सज्जन का पद पा लेता है।

बुद्धिहीन विद्या बल पावै। रोगी रोग मुक्त हवे जावै॥

बुद्धिहीन को विद्या का बल मिलता है; रोगी रोग से मुक्त हो जाता है।

गंगा गंगा जो नर कहहीं। भूखा नंगा कबँहु न रहहि॥

जो मनुष्य "गंगा-गंगा" कहता रहता है, वह कभी भूखा-नंगा नहीं रहता।

निकसत ही मुख गंगा माई। श्रवण दाबी यम चलहिं पराई॥

मुख से "गंगा माई" निकलते ही यमदूत कान दबाकर भाग जाते हैं।

महं अघिन अधमन कहं तारे। भए नरका के बंद किवारें॥

बड़े-बड़े अधमों को भी आपने तार दिया; इससे नरक के किवाड़ ही बंद हो गए।

जो नर जपी गंग शत नामा। सकल सिद्धि पूरण ह्वै कामा॥

जो मनुष्य गंगा के सौ नाम जपता है, उसकी सब सिद्धियाँ और कामनाएँ पूर्ण हो जाती हैं।

सब सुख भोग परम पद पावहीं। आवागमन रहित ह्वै जावहीं॥

वे सब सुख भोगकर परम पद पाते हैं, और जन्म-मरण के चक्र से मुक्त हो जाते हैं।

धनि मइया सुरसरि सुख दैनि। धनि धनि तीरथ राज त्रिवेणी॥

हे सुख देने वाली देवनदी मैया, आप धन्य हैं; धन्य है तीर्थराज त्रिवेणी।

ककरा ग्राम ऋषि दुर्वासा। सुन्दरदास गंगा कर दासा॥

ककरा ग्राम, ऋषि दुर्वासा का क्षेत्र — वहाँ का सुन्दरदास गंगा का दास है। (यही रचयिता की छाप है।)

जो यह पढ़े गंगा चालीसा। मिली भक्ति अविरल वागीसा॥

जो यह गंगा चालीसा पढ़ता है, उसे वाणी के स्वामी की अविरल भक्ति प्राप्त होती है।

नित नए सुख सम्पति लहैं, धरें गंगा का ध्यान। अंत समाई सुर पुर बसल, सदर बैठी विमान॥

फलश्रुति: जो गंगा का ध्यान धरता है, वह नित नए सुख और सम्पत्ति पाता है; अंत समय में आदरपूर्वक विमान पर बैठकर देवलोक में निवास करता है।

सम्वत भुज नभ दिशि, राम जन्म दिन चैत्र। पुरण चालीसा किया, हरि भक्तन हित नैत्र॥

रचना-काल का संकेत देता समापन दोहा — चैत्र मास के रामजन्म-दिवस पर यह चालीसा पूर्ण किया गया, हरि-भक्तों के हित की दृष्टि से।

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शब्द-अर्थ (Word-by-Word)

देवसरिदेवनदी — गंगा
भगीरथीभगीरथ के तप से उतरीं, इसलिए यह नाम
जह्नु सुताजह्नु ऋषि की पुत्री — जाह्नवी
कलिमलकलियुग का मल, पाप
मकरगंगा का वाहन — मगरमच्छ
अमिय कलशअमृत का कलश
त्रय तापतीन कष्ट — आध्यात्मिक, आधिभौतिक, आधिदैविक
अक्षयवटप्रयाग का वह वट-वृक्ष जो कभी नष्ट नहीं होता
काशी करवटकाशी में गंगा का उत्तरवाहिनी होकर मुड़ना
प्रभावतीपाताल में बहने वाली गंगा का नाम
मंदाकिनीआकाश-गंगा
जाह्नवीमृत्युलोक की गंगा
अश्वमेध फलअश्वमेध यज्ञ करने के बराबर पुण्य
वागीसावाणी के स्वामी

अर्थ (हिन्दी)

  1. हे जगत को पवित्र करने वाली, आपकी जय-जय-जय हो; हे देवनदी गंगा, जय हो। हे शिव की जटा में निवास करने वाली, अनुपम और ऊँची तरंगों वाली — जय हो।
  2. हे जननी, आपकी जय हो; आप पापों की खान को हर लेने वाली और आनंद देने वाली गंगा महारानी हैं।
  3. हे भगीरथी, हे देवनदी माता, जय हो; आप कलियुग के मल को जड़ से उखाड़ने वाली विख्यात हैं।
  4. हे जह्नु ऋषि की पुत्री, पाप नाश करने वाली, जय हो; आप भीष्म की माता और जगत की जननी हैं।
  5. श्वेत कमल-दल जैसा आपका शरीर सुशोभित है; उसे देखकर सौ शरद-चंद्रमाओं की छवि भी लजा जाती है।
  6. वहाँ निर्मल और पवित्र मकर सुशोभित है; हाथ में अमृत-कलश देखकर मन मोहित हो जाता है।
  7. रत्नजड़ित स्वर्ण-आभूषण हैं; हृदय पर मणियों का हार है, जो अंधकार और दोष हर लेता है।
  8. आप जगत को पवित्र करने वाली और तीनों तापों को नष्ट करने वाली हैं; आपकी चंचल और ऊँची तरंगें मन को भाती हैं।
  9. गणपति यद्यपि सबसे पहले पूज्य हैं, फिर भी उनसे भी पहले गंगा-स्नान किया जाता है।
  10. आप ब्रह्मा के कमंडल में निवास करने वाली देवी हैं; प्रभु के चरण-कमलों की सुखपूर्वक सेवा करने वाली।
  11. आपने सगर के साठ हज़ार पुत्रों को तार दिया; वहीं गंगासागर तीर्थ स्थापित हुआ।
  12. अगम तरंगें मन को भाती हुई उठीं; और हरिद्वार तीर्थ सुहावना दिखाई दिया।
  13. तीर्थराज प्रयाग का अक्षयवट, और फिर हे माता, आपने काशी में करवट ली।
  14. धन्य हैं आप, देवनदी — स्वर्ग की सीढ़ी; अनगिनत पितरों की पीढ़ियों को तारने वाली।
  15. भगीरथ ने अपार तप किया; तब ब्रह्मा ने आपकी देवनदी-धारा प्रदान की।
  16. जब जगजननी वेग से हहराती हुई चलीं, तब वे शिव की जटा में समा गईं।
  17. वर्ष भर गंगा महारानी शिव की जटा में भूली-सी रहीं।
  18. फिर भगीरथ ने शिव का ध्यान किया, तब जटा से एक बूँद प्राप्त हुई।
  19. उसी से, हे माता, आप तीन धाराओं में बँट गईं — मृत्युलोक, आकाश और पाताल।
  20. पाताल में जाकर आप "प्रभावती" कहलाईं; आकाश में शोभायमान "मंदाकिनी" हुईं।
  21. मृत्युलोक में आप सुहावनी "जाह्नवी" हैं — कलियुग का मल हरने वाली और जगत को पवित्र करने वाली।
  22. हे मैया, आप धन्य हैं; आपकी महिमा बड़ी है। आप धर्म की धुरी और कलियुग के कलुष पर कुल्हाड़ी हैं।
  23. हे माता प्रभावती, हे मंदाकिनी, आप धन्य हैं; हे देवनदी, आप समस्त भय नष्ट करने वाली हैं।
  24. निर्मल गंगाजल का पान करने से मन-इच्छित अनंत फल प्राप्त होते हैं।
  25. जब पूर्वजन्म का पुण्य जागता है, तभी मन गंगा के ध्यान में लगता है।
  26. जो भी क़दम गंगा की ओर उठाया जाता है, उससे संसार में अश्वमेध यज्ञ का फल प्राप्त होता है।
  27. जिन महा-पतितों को कहीं किसी ने नहीं तारा, उन्हें आपके एक नाम ने तार दिया।
  28. जो सौ योजन दूर से भी आपका ध्यान करते हैं, वे निश्चय ही विष्णुलोक का पद पाते हैं।
  29. आपका नाम भजने से अनगिनत पाप नष्ट होते हैं; निर्मल ज्ञान, बल और बुद्धि प्रकाशित होती है।
  30. जैसे धन का मूल धर्म और दान है, वैसे ही धर्म का मूल गंगाजल का पान है।
  31. आपके गुणों का गुणगान करने से दुःख भाग जाते हैं; घर-घर में सम्पत्ति और सुमति विराजती है।
  32. जो नियम सहित नित्य गंगा का ध्यान करता है, वह दुर्जन होकर भी सज्जन का पद पा लेता है।
  33. बुद्धिहीन को विद्या का बल मिलता है; रोगी रोग से मुक्त हो जाता है।
  34. जो मनुष्य "गंगा-गंगा" कहता रहता है, वह कभी भूखा-नंगा नहीं रहता।
  35. मुख से "गंगा माई" निकलते ही यमदूत कान दबाकर भाग जाते हैं।
  36. बड़े-बड़े अधमों को भी आपने तार दिया; इससे नरक के किवाड़ ही बंद हो गए।
  37. जो मनुष्य गंगा के सौ नाम जपता है, उसकी सब सिद्धियाँ और कामनाएँ पूर्ण हो जाती हैं।
  38. वे सब सुख भोगकर परम पद पाते हैं, और जन्म-मरण के चक्र से मुक्त हो जाते हैं।
  39. हे सुख देने वाली देवनदी मैया, आप धन्य हैं; धन्य है तीर्थराज त्रिवेणी।
  40. ककरा ग्राम, ऋषि दुर्वासा का क्षेत्र — वहाँ का सुन्दरदास गंगा का दास है। (यही रचयिता की छाप है।)
  41. जो यह गंगा चालीसा पढ़ता है, उसे वाणी के स्वामी की अविरल भक्ति प्राप्त होती है।
  42. फलश्रुति: जो गंगा का ध्यान धरता है, वह नित नए सुख और सम्पत्ति पाता है; अंत समय में आदरपूर्वक विमान पर बैठकर देवलोक में निवास करता है।
  43. रचना-काल का संकेत देता समापन दोहा — चैत्र मास के रामजन्म-दिवस पर यह चालीसा पूर्ण किया गया, हरि-भक्तों के हित की दृष्टि से।

लाभ

  • गंगा-अवतरण की पूरी कथा क्रम से — भगीरथ का तप, शिव की जटा, और तीन धाराएँ।
  • तीर्थों का क्रम भी इसी में — गंगासागर, हरिद्वार, प्रयाग का अक्षयवट, काशी का करवट।
  • गंगा दशहरा, गंगा सप्तमी और स्नान-पर्वों पर पढ़ी जाने वाली चालीसा।
  • चौपाई 25 का भाव प्रसिद्ध है — गंगा की ओर उठाया हर क़दम अश्वमेध का फल देता है।

कब करें पाठ

गंगा दशहरा (ज्येष्ठ शुक्ल दशमी) परगंगा सप्तमी परपूर्णिमा व स्नान-पर्वों पर — विशेषकर कुंभ/माघ स्नान मेंगंगा-स्नान या गंगाजल से स्नान करते समय

पाठ विधि

गंगाजल पास रखकर, पूर्व दिशा की ओर मुख करके बैठें; दीप जलाकर पुष्प अर्पित करें। पहले दोहा पढ़ें, फिर चालीस चौपाइयाँ, और अंत में दोनों समापन दोहे। गंगा-तट पर पाठ करने की परंपरा है; घर पर हो तो जल-पात्र में थोड़ा गंगाजल रखकर पढ़ें। पाठ के बाद वही जल घर में छिड़कने की परंपरा है।

प्रामाणिकता व स्रोत

स्थिति✓ संपूर्ण (40/40 श्लोक)
स्रोत परंपराaartichalisa.com — गंगा चालीसा (आधार-पाठ; तीनों में सबसे साफ़ प्रति) · bhaktibharat.com — श्री गंगा चालीसा (चौपाइयाँ 4/8/…/40 अंकित) · dharmsaar.com — गंगा चालीसा (इन दोनों का आपसी शब्द-मिलान 98.1%) · ⚠️ भक्तिभारत व धर्मसार की प्रति में कई जगह छपाई बिगड़ी है ("जदिता रत्ना", "अक्षैवेता", "तरनी अमिता पितु पड़ पिरही") — इसलिए आधार आरतीचालीसा की प्रति बनी। पाठ फिर भी "सुधारा" नहीं गया: "जहानु", "निशचाई", "हरानितम", "पातारा", "अघिन" जैसे रूप प्रकाशित प्रतियों के ही हैं। · रचयिता की छाप — चौपाई 39 "ककरा ग्राम ऋषि दुर्वासा, सुन्दरदास गंगा कर दासा"
रचयिताअज्ञात (छाप: सुन्दरदास, ककरा-दुर्वासा क्षेत्र)
अंतिम अद्यतनसितंबर 2026

श्री गंगा चालीसा — सामान्य प्रश्न

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