श्री गायत्री चालीसा

śrī gāyatrī cālīsā

Gayatri Chalisa

समय
8–10 मिनट
श्लोक/चौपाई
43
कठिनाई
सरल
शुभ दिन
नित्य प्रातः-संध्या; गायत्री जयंती
उद्देश्य:बुद्धि व विद्या (Wisdom)आध्यात्मिक उन्नति (Spiritual growth)मन की शांति (Peace)
✓ संपूर्ण (40/40 श्लोक)

श्री गायत्री चालीसा दो दोहों से आरंभ होकर चालीस चौपाइयों में चलती है और एक समापन दोहे पर समाप्त होती है। चौपाइयाँ "भूर्भुवः स्वः ॐ युत जननी, गायत्री नित कलिमल दहनी" से शुरू होती हैं। यह गायत्री मंत्र की स्तुति है — चौबीस अक्षरों की, जिनके बारे में चौपाई 2 कहती है — "इनमें बसें शास्त्र श्रुति गीता"।

परिचय

स्रोत: परंपरागत गायत्री चालीसा; गायत्री परिवार की उपासना-पुस्तकों में भी संकलित

एक नज़र में

मंत्र / पाठश्री गायत्री चालीसा
IASTśrī gāyatrī cālīsā
मूल स्रोतपरंपरागत गायत्री चालीसा; गायत्री परिवार की उपासना-पुस्तकों में भी संकलित
शुभ दिननित्य प्रातः-संध्या; गायत्री जयंती
पाठ समय8–10 मिनट
कठिनाईसरल

उद्भव / पृष्ठभूमि

इस चालीसा का ढाँचा तीन साफ़ हिस्सों में बँटा है।

पहला — रूप और स्वरूप (चौपाई 1–9). चौबीस अक्षरों की महिमा, फिर ध्यान का चित्र: हंस पर आरूढ़, श्वेत वस्त्र, स्वर्ण-कांति, हाथों में पुस्तक, पुष्प, कमण्डलु और माला (चौपाई 4–5)। यह वही ध्यान-श्लोक वाला रूप है जो गायत्री उपासना में बोला जाता है।

दूसरा — तत्त्व (चौपाई 10–25). यहाँ चालीसा एक बड़ी बात कहती है: सरस्वती, लक्ष्मी और काली — तीनों गायत्री ही हैं (9), और ब्रह्मा, विष्णु, रुद्र समेत सारे देवता अपना देवत्व उन्हीं से पाते हैं (15)। इसी हिस्से में वह पंक्ति आती है जो पूरे पाठ का सार है — "जानत तुमहिं तुमहिं ह्वै जाई, पारस परसि कुधातु सुहाई" (20): जो आपको जान लेता है वह आप ही हो जाता है, जैसे पारस छूकर कुधातु सोना हो जाती है।

तीसरा — फलश्रुति (चौपाई 26–40). रोग, दरिद्रता, गृह-क्लेश, संतान, भूत-पिशाच, सुहाग, कुमारी का वर, विधवा का सत्य-व्रत — बहुत ठोस, बहुत सांसारिक सूची। और अंत में सबसे खुली पंक्ति: "जो जो शरण तुम्हारी आवें, सो सो मन वांछित फल पावें" (38)।

एक बात ध्यान देने की है — इसमें कोई कथा नहीं है। न कोई असुर-वध, न कोई भक्त का प्रसंग। यह आद्योपांत मंत्र की स्तुति है, और यही इसे बाक़ी चालीसाओं से अलग करता है।

चालीसा गायत्री परिवार (शांतिकुंज, हरिद्वार) की उपासना-पुस्तकों में भी संकलित है, जहाँ लिखा है कि जप के बाद इसका पाठ करने का विधान है और एक बार का पाठ एक माला जप के बराबर कहा गया है।

संपूर्ण चालीसा

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ह्रीं श्रीं क्लीं मेधा प्रभा, जीवन ज्योति प्रचण्ड। शांति कांति जागृति प्रगति, रचना शक्ति अखण्ड॥

ह्रीं, श्रीं, क्लीं — ये बीजमंत्र मेधा (धारण-शक्ति), प्रभा (तेज) और जीवन की प्रचण्ड ज्योति हैं। शांति, कांति, जागृति, प्रगति और सृजन की अखण्ड शक्ति — ये सब गायत्री ही हैं।

जगत जननि मंगल करनि, गायत्री सुखधाम। प्रणवों सावित्री स्वधा, स्वाहा पूरन काम॥

जगत को जन्म देने वाली, मंगल करने वाली गायत्री सुख का धाम हैं। ॐ, सावित्री, स्वधा और स्वाहा — इन सबके रूप में वही समस्त कामनाएँ पूर्ण करती हैं।

भूर्भुवः स्वः ॐ युत जननी। गायत्री नित कलिमल दहनी॥

भूः, भुवः, स्वः — इन तीन व्याहृतियों और ॐ से युक्त हे जननी, गायत्री नित्य कलियुग के मल को जला देती हैं।

अक्षर चौबीस परम पुनीता। इनमें बसें शास्त्र श्रुति गीता॥

आपके मंत्र के चौबीस अक्षर परम पवित्र हैं; इन्हीं में शास्त्र, श्रुति और गीता बसी हुई हैं।

शाश्वत सतोगुणी सतरूपा। सत्य सनातन सुधा अनूपा॥

आप शाश्वत हैं, सतोगुण-स्वरूपा हैं; सत्य और सनातन हैं, अनुपम अमृत हैं।

हंसारूढ़ सिताम्बर धारी। स्वर्ण कान्ति शुचि गगन बिहारी॥

आप हंस पर आरूढ़ हैं और श्वेत वस्त्र धारण किए हैं; स्वर्ण जैसी कांति वाली, पवित्र और आकाश में विचरने वाली हैं।

पुस्तक पुष्प कमण्डलु माला। शुभ्र वर्ण तनु नयन विशाला॥

आपके हाथों में पुस्तक, पुष्प, कमण्डलु और माला हैं; शरीर का वर्ण श्वेत और नेत्र विशाल हैं।

ध्यान धरत पुलकित हिय होई। सुख उपजत दुःख दुरमति खोई॥

आपका ध्यान धरते ही हृदय पुलकित हो उठता है; सुख उपजता है और दुःख तथा दुर्बुद्धि मिट जाती है।

कामधेनु तुम सुर तरु छाया। निराकार की अद्भुत माया॥

आप कामधेनु हैं, कल्पवृक्ष की छाया हैं; निराकार ब्रह्म की अद्भुत माया आप ही हैं।

तुम्हरी शरण गहै जो कोई। तरै सकल संकट सों सोई॥

जो कोई आपकी शरण ले लेता है, वह सब संकटों से तर जाता है।

सरस्वती लक्ष्मी तुम काली। दिपै तुम्हारी ज्योति निराली॥

सरस्वती, लक्ष्मी और काली — तीनों आप ही हैं; आपकी ज्योति सबसे निराली दीप्त होती है।

तुम्हरी महिमा पार न पावैं। जो शारद शत मुख गुन गावैं॥

आपकी महिमा का पार कोई नहीं पाता — शारदा भी सौ मुखों से गुण गाएँ तो भी नहीं।

चार वेद की मातु पुनीता। तुम ब्रह्माणी गौरी सीता॥

आप चारों वेदों की पवित्र माता हैं; आप ही ब्रह्माणी हैं, गौरी हैं और सीता हैं।

महामन्त्र जितने जग माहीं। कोउ गायत्री सम नाहीं॥

जगत में जितने भी महामंत्र हैं, उनमें कोई गायत्री के समान नहीं है।

सुमिरत हिय में ज्ञान प्रकासै। आलस पाप अविद्या नासै॥

आपका स्मरण करते ही हृदय में ज्ञान प्रकाशित हो जाता है, और आलस्य, पाप तथा अविद्या नष्ट हो जाते हैं।

सृष्टि बीज जग जननि भवानी। कालरात्रि वरदा कल्याणी॥

आप सृष्टि का बीज हैं, जगत को जन्म देने वाली भवानी हैं; कालरात्रि और वर देने वाली कल्याणी भी आप ही हैं।

ब्रह्मा विष्णु रुद्र सुर जेते। तुम सों पावें सुरता तेते॥

ब्रह्मा, विष्णु, रुद्र और जितने देवता हैं — वे सब अपना देवत्व आपसे ही पाते हैं।

तुम भक्तन की भक्त तुम्हारे। जननिहिं पुत्र प्राण ते प्यारे॥

आप भक्तों की हैं और भक्त आपके हैं; जैसे माता को पुत्र प्राणों से प्यारे होते हैं, वैसे ही आपको आपके भक्त।

महिमा अपरम्पार तुम्हारी। जै जै जै त्रिपदा भयहारी॥

आपकी महिमा अपरम्पार है; हे त्रिपदा, हे भय हरने वाली — आपकी जय हो, जय हो, जय हो।

पूरित सकल ज्ञान विज्ञाना। तुम सम अधिक न जग में आना॥

सारा ज्ञान और विज्ञान आपसे ही पूर्ण होता है; जगत में आपके समान या आपसे बढ़कर कोई नहीं आया।

तुमहिं जानि कछु रहै न शेषा। तुमहिं पाय कछु रहै न क्लेशा॥

आपको जान लेने पर जानने को कुछ शेष नहीं रहता; आपको पा लेने पर कोई क्लेश नहीं रहता।

जानत तुमहिं तुमहिं ह्वै जाई। पारस परसि कुधातु सुहाई॥

जो आपको जान लेता है, वह आप ही हो जाता है — जैसे पारस के स्पर्श से कुधातु भी सुंदर (स्वर्ण) हो जाती है।

तुम्हरी शक्ति दिपै सब ठाई। माता तुम सब ठौर समाई॥

आपकी शक्ति सब जगह दीप्त है; हे माता, आप हर स्थान पर समाई हुई हैं।

ग्रह नक्षत्र ब्रह्माण्ड घनेरे। सब गतिवान तुम्हारे प्रेरे॥

अनगिनत ग्रह, नक्षत्र और ब्रह्माण्ड — सब आपकी ही प्रेरणा से गतिमान हैं।

सकल सृष्टि की प्राण विधाता। पालक पोषक नाशक त्राता॥

समस्त सृष्टि के प्राणों की विधाता आप हैं; पालन करने वाली, पोषण करने वाली, नाश करने वाली और रक्षा करने वाली भी आप ही हैं।

मातेश्वरी दया व्रत धारी। तुम सन तरे पातकी भारी॥

हे मातेश्वरी, आप दया का व्रत धारण किए हुए हैं; आपसे बड़े-बड़े पापी भी तर गए।

जापर कृपा तुम्हारी होई। तापर कृपा करें सब कोई॥

जिस पर आपकी कृपा हो जाती है, उस पर सब कोई कृपा करने लगते हैं।

मन्द बुद्धि ते बुधि बल पावें। रोगी रोग रहित ह्वै जावें॥

मंद बुद्धि वाले भी आपसे बुद्धि-बल पा लेते हैं; रोगी रोग से मुक्त हो जाते हैं।

दारिद मिटै कटै सब पीरा। नाशै दुःख हरै भव भीरा॥

दरिद्रता मिट जाती है और सब पीड़ा कट जाती है; दुःख नष्ट होता है और भव-सागर का भय हर लिया जाता है।

गृह क्लेश चित चिन्ता भारी। नासै गायत्री भय हारी॥

घर का क्लेश और चित्त की भारी चिंता — भय हरने वाली गायत्री उसे नष्ट कर देती हैं।

सन्तति हीन सुसन्तति पावें। सुख सम्पति युत मोद मनावें॥

संतानहीन को सुसंतति मिलती है; वे सुख-सम्पत्ति के साथ आनंद मनाते हैं।

भूत पिशाच सबै भय खावें। यम के दूत निकट नहिं आवें॥

भूत-पिशाच सब भय खाते हैं; यम के दूत निकट नहीं आते।

जो सधवा सुमिरें चित लाई। अछत सुहाग सदा सुखदाई॥

जो सुहागिन चित्त लगाकर आपका स्मरण करती है, उसका सुहाग अक्षत रहता है और सदा सुख देता है।

घर वर सुख प्रद लहैं कुमारी। विधवा रहें सत्य व्रत धारी॥

कुमारियों को अच्छा घर और अच्छा वर मिलता है; विधवाएँ सत्य-व्रत धारण करके रहती हैं।

जयति जयति जगदम्ब भवानी। तुम सम और दयालु न दानी॥

हे जगदम्बा भवानी, आपकी जय हो, जय हो; आपके समान दयालु और दानी कोई नहीं।

जो सद्गुरु सों दीक्षा पावें। सो साधन को सफल बनावें॥

जो सद्गुरु से दीक्षा पाता है, वह अपनी साधना को सफल बना लेता है।

सुमिरन करें सुरुचि बड़भागी। लहैं मनोरथ गृही विरागी॥

जो सुरुचि से आपका स्मरण करते हैं, वे बड़भागी हैं; गृहस्थ हों या विरागी — दोनों अपना मनोरथ पा लेते हैं।

अष्ट सिद्धि नवनिधि की दाता। सब समर्थ गायत्री माता॥

आप आठों सिद्धियों और नौ निधियों की दाता हैं; गायत्री माता सब कुछ करने में समर्थ हैं।

ऋषि मुनि यती तपस्वी योगी। आरत अर्थी चिन्तित भोगी॥

ऋषि, मुनि, यती, तपस्वी, योगी — और दुखी, याचक, चिंतित तथा भोगी भी,

जो जो शरण तुम्हारी आवें। सो सो मन वांछित फल पावें॥

जो-जो आपकी शरण में आता है, वह-वह मनचाहा फल पा जाता है।

बल बुद्धि विद्या शील स्वभाऊ। धन वैभव यश तेज उछाऊ॥

बल, बुद्धि, विद्या, शील और अच्छा स्वभाव; धन, वैभव, यश और तेज की वृद्धि —

सकल बढ़ें उपजें सुख नाना। जो यह पाठ करै धरि ध्याना॥

ये सब बढ़ते हैं और अनेक सुख उपजते हैं — उसके लिए जो ध्यान धरकर यह पाठ करता है।

यह चालीसा भक्ति युत, पाठ करे जो कोय। तापर कृपा प्रसन्नता, गायत्री की होय॥

जो कोई भक्तिपूर्वक इस चालीसा का पाठ करता है, उस पर गायत्री की कृपा और प्रसन्नता होती है।

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अर्थ (हिन्दी)

  1. ह्रीं, श्रीं, क्लीं — ये बीजमंत्र मेधा (धारण-शक्ति), प्रभा (तेज) और जीवन की प्रचण्ड ज्योति हैं। शांति, कांति, जागृति, प्रगति और सृजन की अखण्ड शक्ति — ये सब गायत्री ही हैं।
  2. जगत को जन्म देने वाली, मंगल करने वाली गायत्री सुख का धाम हैं। ॐ, सावित्री, स्वधा और स्वाहा — इन सबके रूप में वही समस्त कामनाएँ पूर्ण करती हैं।
  3. भूः, भुवः, स्वः — इन तीन व्याहृतियों और ॐ से युक्त हे जननी, गायत्री नित्य कलियुग के मल को जला देती हैं।
  4. आपके मंत्र के चौबीस अक्षर परम पवित्र हैं; इन्हीं में शास्त्र, श्रुति और गीता बसी हुई हैं।
  5. आप शाश्वत हैं, सतोगुण-स्वरूपा हैं; सत्य और सनातन हैं, अनुपम अमृत हैं।
  6. आप हंस पर आरूढ़ हैं और श्वेत वस्त्र धारण किए हैं; स्वर्ण जैसी कांति वाली, पवित्र और आकाश में विचरने वाली हैं।
  7. आपके हाथों में पुस्तक, पुष्प, कमण्डलु और माला हैं; शरीर का वर्ण श्वेत और नेत्र विशाल हैं।
  8. आपका ध्यान धरते ही हृदय पुलकित हो उठता है; सुख उपजता है और दुःख तथा दुर्बुद्धि मिट जाती है।
  9. आप कामधेनु हैं, कल्पवृक्ष की छाया हैं; निराकार ब्रह्म की अद्भुत माया आप ही हैं।
  10. जो कोई आपकी शरण ले लेता है, वह सब संकटों से तर जाता है।
  11. सरस्वती, लक्ष्मी और काली — तीनों आप ही हैं; आपकी ज्योति सबसे निराली दीप्त होती है।
  12. आपकी महिमा का पार कोई नहीं पाता — शारदा भी सौ मुखों से गुण गाएँ तो भी नहीं।
  13. आप चारों वेदों की पवित्र माता हैं; आप ही ब्रह्माणी हैं, गौरी हैं और सीता हैं।
  14. जगत में जितने भी महामंत्र हैं, उनमें कोई गायत्री के समान नहीं है।
  15. आपका स्मरण करते ही हृदय में ज्ञान प्रकाशित हो जाता है, और आलस्य, पाप तथा अविद्या नष्ट हो जाते हैं।
  16. आप सृष्टि का बीज हैं, जगत को जन्म देने वाली भवानी हैं; कालरात्रि और वर देने वाली कल्याणी भी आप ही हैं।
  17. ब्रह्मा, विष्णु, रुद्र और जितने देवता हैं — वे सब अपना देवत्व आपसे ही पाते हैं।
  18. आप भक्तों की हैं और भक्त आपके हैं; जैसे माता को पुत्र प्राणों से प्यारे होते हैं, वैसे ही आपको आपके भक्त।
  19. आपकी महिमा अपरम्पार है; हे त्रिपदा, हे भय हरने वाली — आपकी जय हो, जय हो, जय हो।
  20. सारा ज्ञान और विज्ञान आपसे ही पूर्ण होता है; जगत में आपके समान या आपसे बढ़कर कोई नहीं आया।
  21. आपको जान लेने पर जानने को कुछ शेष नहीं रहता; आपको पा लेने पर कोई क्लेश नहीं रहता।
  22. जो आपको जान लेता है, वह आप ही हो जाता है — जैसे पारस के स्पर्श से कुधातु भी सुंदर (स्वर्ण) हो जाती है।
  23. आपकी शक्ति सब जगह दीप्त है; हे माता, आप हर स्थान पर समाई हुई हैं।
  24. अनगिनत ग्रह, नक्षत्र और ब्रह्माण्ड — सब आपकी ही प्रेरणा से गतिमान हैं।
  25. समस्त सृष्टि के प्राणों की विधाता आप हैं; पालन करने वाली, पोषण करने वाली, नाश करने वाली और रक्षा करने वाली भी आप ही हैं।
  26. हे मातेश्वरी, आप दया का व्रत धारण किए हुए हैं; आपसे बड़े-बड़े पापी भी तर गए।
  27. जिस पर आपकी कृपा हो जाती है, उस पर सब कोई कृपा करने लगते हैं।
  28. मंद बुद्धि वाले भी आपसे बुद्धि-बल पा लेते हैं; रोगी रोग से मुक्त हो जाते हैं।
  29. दरिद्रता मिट जाती है और सब पीड़ा कट जाती है; दुःख नष्ट होता है और भव-सागर का भय हर लिया जाता है।
  30. घर का क्लेश और चित्त की भारी चिंता — भय हरने वाली गायत्री उसे नष्ट कर देती हैं।
  31. संतानहीन को सुसंतति मिलती है; वे सुख-सम्पत्ति के साथ आनंद मनाते हैं।
  32. भूत-पिशाच सब भय खाते हैं; यम के दूत निकट नहीं आते।
  33. जो सुहागिन चित्त लगाकर आपका स्मरण करती है, उसका सुहाग अक्षत रहता है और सदा सुख देता है।
  34. कुमारियों को अच्छा घर और अच्छा वर मिलता है; विधवाएँ सत्य-व्रत धारण करके रहती हैं।
  35. हे जगदम्बा भवानी, आपकी जय हो, जय हो; आपके समान दयालु और दानी कोई नहीं।
  36. जो सद्गुरु से दीक्षा पाता है, वह अपनी साधना को सफल बना लेता है।
  37. जो सुरुचि से आपका स्मरण करते हैं, वे बड़भागी हैं; गृहस्थ हों या विरागी — दोनों अपना मनोरथ पा लेते हैं।
  38. आप आठों सिद्धियों और नौ निधियों की दाता हैं; गायत्री माता सब कुछ करने में समर्थ हैं।
  39. ऋषि, मुनि, यती, तपस्वी, योगी — और दुखी, याचक, चिंतित तथा भोगी भी,
  40. जो-जो आपकी शरण में आता है, वह-वह मनचाहा फल पा जाता है।
  41. बल, बुद्धि, विद्या, शील और अच्छा स्वभाव; धन, वैभव, यश और तेज की वृद्धि —
  42. ये सब बढ़ते हैं और अनेक सुख उपजते हैं — उसके लिए जो ध्यान धरकर यह पाठ करता है।
  43. जो कोई भक्तिपूर्वक इस चालीसा का पाठ करता है, उस पर गायत्री की कृपा और प्रसन्नता होती है।

लाभ

  • चौबीस अक्षरों की महिमा और गायत्री का ध्यान-रूप — दोनों एक ही पाठ में।
  • चौपाई 26–40 फलश्रुति की हैं: रोग, दरिद्रता, गृह-क्लेश, संतान और भय पर।
  • जप के बाद पाठ करने का विधान; गायत्री परिवार की उपासना-पुस्तकों में भी संकलित।
  • विद्यार्थियों के लिए विशेष — "बल बुद्धि विद्या शील स्वभाऊ" (चौपाई 39)।

कब करें पाठ

प्रातः व संध्या (संध्या-वंदन काल) मेंगायत्री जप के तुरंत बादगायत्री जयंती पर

पाठ विधि

स्नान कर पूर्व की ओर मुख करके स्वच्छ आसन पर बैठें। घी या तिल के तेल का दीप जलाएँ। पहले गायत्री मंत्र का जप करें, फिर दोनों दोहे पढ़कर चालीस चौपाइयाँ और समापन दोहा। परंपरा में जप के बाद ही चालीसा का विधान है — जप पहले, चालीसा बाद में। पाठ के अंत में गायत्री माता की आरती की जाती है।

प्रामाणिकता व स्रोत

स्थिति✓ संपूर्ण (40/40 श्लोक)
स्रोत परंपराdrikpanchang.com — गायत्री माता चालीसा (आधार-पाठ) · awgp.org — "गायत्री साधना की सर्वसुलभ विधि", अखिल विश्व गायत्री परिवार, शांतिकुंज · bhaktibharat.com — श्री गायत्री चालीसा · blocksinfotech.com — श्री गायत्री चालीसा · aartichalisa.com — गायत्री माता चालीसा · ⚠️ अंतिम तीन प्रतियाँ आपस में शब्दशः एक हैं और उनमें बुद्घि/सिद्घि/अविघा/ब्रहमा की कुंजी-भूलें हैं; वे यहाँ नहीं ली गईं।
रचयिताअज्ञात (किसी प्रति में छाप नहीं)
अंतिम अद्यतनसितंबर 2026

श्री गायत्री चालीसा — सामान्य प्रश्न