ह्रीं श्रीं क्लीं मेधा प्रभा,
जीवन ज्योति प्रचण्ड।
शांति कांति जागृति प्रगति,
रचना शक्ति अखण्ड॥
ह्रीं, श्रीं, क्लीं — ये बीजमंत्र मेधा (धारण-शक्ति), प्रभा (तेज) और जीवन की प्रचण्ड ज्योति हैं। शांति, कांति, जागृति, प्रगति और सृजन की अखण्ड शक्ति — ये सब गायत्री ही हैं।
जगत जननि मंगल करनि,
गायत्री सुखधाम।
प्रणवों सावित्री स्वधा,
स्वाहा पूरन काम॥
जगत को जन्म देने वाली, मंगल करने वाली गायत्री सुख का धाम हैं। ॐ, सावित्री, स्वधा और स्वाहा — इन सबके रूप में वही समस्त कामनाएँ पूर्ण करती हैं।
1भूर्भुवः स्वः ॐ युत जननी।
गायत्री नित कलिमल दहनी॥
भूः, भुवः, स्वः — इन तीन व्याहृतियों और ॐ से युक्त हे जननी, गायत्री नित्य कलियुग के मल को जला देती हैं।
2अक्षर चौबीस परम पुनीता।
इनमें बसें शास्त्र श्रुति गीता॥
आपके मंत्र के चौबीस अक्षर परम पवित्र हैं; इन्हीं में शास्त्र, श्रुति और गीता बसी हुई हैं।
3शाश्वत सतोगुणी सतरूपा।
सत्य सनातन सुधा अनूपा॥
आप शाश्वत हैं, सतोगुण-स्वरूपा हैं; सत्य और सनातन हैं, अनुपम अमृत हैं।
4हंसारूढ़ सिताम्बर धारी।
स्वर्ण कान्ति शुचि गगन बिहारी॥
आप हंस पर आरूढ़ हैं और श्वेत वस्त्र धारण किए हैं; स्वर्ण जैसी कांति वाली, पवित्र और आकाश में विचरने वाली हैं।
5पुस्तक पुष्प कमण्डलु माला।
शुभ्र वर्ण तनु नयन विशाला॥
आपके हाथों में पुस्तक, पुष्प, कमण्डलु और माला हैं; शरीर का वर्ण श्वेत और नेत्र विशाल हैं।
6ध्यान धरत पुलकित हिय होई।
सुख उपजत दुःख दुरमति खोई॥
आपका ध्यान धरते ही हृदय पुलकित हो उठता है; सुख उपजता है और दुःख तथा दुर्बुद्धि मिट जाती है।
7कामधेनु तुम सुर तरु छाया।
निराकार की अद्भुत माया॥
आप कामधेनु हैं, कल्पवृक्ष की छाया हैं; निराकार ब्रह्म की अद्भुत माया आप ही हैं।
8तुम्हरी शरण गहै जो कोई।
तरै सकल संकट सों सोई॥
जो कोई आपकी शरण ले लेता है, वह सब संकटों से तर जाता है।
9सरस्वती लक्ष्मी तुम काली।
दिपै तुम्हारी ज्योति निराली॥
सरस्वती, लक्ष्मी और काली — तीनों आप ही हैं; आपकी ज्योति सबसे निराली दीप्त होती है।
10तुम्हरी महिमा पार न पावैं।
जो शारद शत मुख गुन गावैं॥
आपकी महिमा का पार कोई नहीं पाता — शारदा भी सौ मुखों से गुण गाएँ तो भी नहीं।
11चार वेद की मातु पुनीता।
तुम ब्रह्माणी गौरी सीता॥
आप चारों वेदों की पवित्र माता हैं; आप ही ब्रह्माणी हैं, गौरी हैं और सीता हैं।
12महामन्त्र जितने जग माहीं।
कोउ गायत्री सम नाहीं॥
जगत में जितने भी महामंत्र हैं, उनमें कोई गायत्री के समान नहीं है।
13सुमिरत हिय में ज्ञान प्रकासै।
आलस पाप अविद्या नासै॥
आपका स्मरण करते ही हृदय में ज्ञान प्रकाशित हो जाता है, और आलस्य, पाप तथा अविद्या नष्ट हो जाते हैं।
14सृष्टि बीज जग जननि भवानी।
कालरात्रि वरदा कल्याणी॥
आप सृष्टि का बीज हैं, जगत को जन्म देने वाली भवानी हैं; कालरात्रि और वर देने वाली कल्याणी भी आप ही हैं।
15ब्रह्मा विष्णु रुद्र सुर जेते।
तुम सों पावें सुरता तेते॥
ब्रह्मा, विष्णु, रुद्र और जितने देवता हैं — वे सब अपना देवत्व आपसे ही पाते हैं।
16तुम भक्तन की भक्त तुम्हारे।
जननिहिं पुत्र प्राण ते प्यारे॥
आप भक्तों की हैं और भक्त आपके हैं; जैसे माता को पुत्र प्राणों से प्यारे होते हैं, वैसे ही आपको आपके भक्त।
17महिमा अपरम्पार तुम्हारी।
जै जै जै त्रिपदा भयहारी॥
आपकी महिमा अपरम्पार है; हे त्रिपदा, हे भय हरने वाली — आपकी जय हो, जय हो, जय हो।
18पूरित सकल ज्ञान विज्ञाना।
तुम सम अधिक न जग में आना॥
सारा ज्ञान और विज्ञान आपसे ही पूर्ण होता है; जगत में आपके समान या आपसे बढ़कर कोई नहीं आया।
19तुमहिं जानि कछु रहै न शेषा।
तुमहिं पाय कछु रहै न क्लेशा॥
आपको जान लेने पर जानने को कुछ शेष नहीं रहता; आपको पा लेने पर कोई क्लेश नहीं रहता।
20जानत तुमहिं तुमहिं ह्वै जाई।
पारस परसि कुधातु सुहाई॥
जो आपको जान लेता है, वह आप ही हो जाता है — जैसे पारस के स्पर्श से कुधातु भी सुंदर (स्वर्ण) हो जाती है।
21तुम्हरी शक्ति दिपै सब ठाई।
माता तुम सब ठौर समाई॥
आपकी शक्ति सब जगह दीप्त है; हे माता, आप हर स्थान पर समाई हुई हैं।
22ग्रह नक्षत्र ब्रह्माण्ड घनेरे।
सब गतिवान तुम्हारे प्रेरे॥
अनगिनत ग्रह, नक्षत्र और ब्रह्माण्ड — सब आपकी ही प्रेरणा से गतिमान हैं।
23सकल सृष्टि की प्राण विधाता।
पालक पोषक नाशक त्राता॥
समस्त सृष्टि के प्राणों की विधाता आप हैं; पालन करने वाली, पोषण करने वाली, नाश करने वाली और रक्षा करने वाली भी आप ही हैं।
24मातेश्वरी दया व्रत धारी।
तुम सन तरे पातकी भारी॥
हे मातेश्वरी, आप दया का व्रत धारण किए हुए हैं; आपसे बड़े-बड़े पापी भी तर गए।
25जापर कृपा तुम्हारी होई।
तापर कृपा करें सब कोई॥
जिस पर आपकी कृपा हो जाती है, उस पर सब कोई कृपा करने लगते हैं।
26मन्द बुद्धि ते बुधि बल पावें।
रोगी रोग रहित ह्वै जावें॥
मंद बुद्धि वाले भी आपसे बुद्धि-बल पा लेते हैं; रोगी रोग से मुक्त हो जाते हैं।
27दारिद मिटै कटै सब पीरा।
नाशै दुःख हरै भव भीरा॥
दरिद्रता मिट जाती है और सब पीड़ा कट जाती है; दुःख नष्ट होता है और भव-सागर का भय हर लिया जाता है।
28गृह क्लेश चित चिन्ता भारी।
नासै गायत्री भय हारी॥
घर का क्लेश और चित्त की भारी चिंता — भय हरने वाली गायत्री उसे नष्ट कर देती हैं।
29सन्तति हीन सुसन्तति पावें।
सुख सम्पति युत मोद मनावें॥
संतानहीन को सुसंतति मिलती है; वे सुख-सम्पत्ति के साथ आनंद मनाते हैं।
30भूत पिशाच सबै भय खावें।
यम के दूत निकट नहिं आवें॥
भूत-पिशाच सब भय खाते हैं; यम के दूत निकट नहीं आते।
31जो सधवा सुमिरें चित लाई।
अछत सुहाग सदा सुखदाई॥
जो सुहागिन चित्त लगाकर आपका स्मरण करती है, उसका सुहाग अक्षत रहता है और सदा सुख देता है।
32घर वर सुख प्रद लहैं कुमारी।
विधवा रहें सत्य व्रत धारी॥
कुमारियों को अच्छा घर और अच्छा वर मिलता है; विधवाएँ सत्य-व्रत धारण करके रहती हैं।
33जयति जयति जगदम्ब भवानी।
तुम सम और दयालु न दानी॥
हे जगदम्बा भवानी, आपकी जय हो, जय हो; आपके समान दयालु और दानी कोई नहीं।
34जो सद्गुरु सों दीक्षा पावें।
सो साधन को सफल बनावें॥
जो सद्गुरु से दीक्षा पाता है, वह अपनी साधना को सफल बना लेता है।
35सुमिरन करें सुरुचि बड़भागी।
लहैं मनोरथ गृही विरागी॥
जो सुरुचि से आपका स्मरण करते हैं, वे बड़भागी हैं; गृहस्थ हों या विरागी — दोनों अपना मनोरथ पा लेते हैं।
36अष्ट सिद्धि नवनिधि की दाता।
सब समर्थ गायत्री माता॥
आप आठों सिद्धियों और नौ निधियों की दाता हैं; गायत्री माता सब कुछ करने में समर्थ हैं।
37ऋषि मुनि यती तपस्वी योगी।
आरत अर्थी चिन्तित भोगी॥
ऋषि, मुनि, यती, तपस्वी, योगी — और दुखी, याचक, चिंतित तथा भोगी भी,
38जो जो शरण तुम्हारी आवें।
सो सो मन वांछित फल पावें॥
जो-जो आपकी शरण में आता है, वह-वह मनचाहा फल पा जाता है।
39बल बुद्धि विद्या शील स्वभाऊ।
धन वैभव यश तेज उछाऊ॥
बल, बुद्धि, विद्या, शील और अच्छा स्वभाव; धन, वैभव, यश और तेज की वृद्धि —
40सकल बढ़ें उपजें सुख नाना।
जो यह पाठ करै धरि ध्याना॥
ये सब बढ़ते हैं और अनेक सुख उपजते हैं — उसके लिए जो ध्यान धरकर यह पाठ करता है।
यह चालीसा भक्ति युत,
पाठ करे जो कोय।
तापर कृपा प्रसन्नता,
गायत्री की होय॥
जो कोई भक्तिपूर्वक इस चालीसा का पाठ करता है, उस पर गायत्री की कृपा और प्रसन्नता होती है।