श्री नवग्रह चालीसा

śrī navagraha cālīsā

Navgrah Chalisa

समय
8–10 मिनट
श्लोक/चौपाई
44
कठिनाई
सरल
शुभ दिन
प्रातः नित्य; शनिवार, अमावस्या व ग्रह-शांति
उद्देश्य:ग्रह-शांति (Planetary peace)बाधा-निवारण (Obstacle removal)मन की शांति (Peace)
✓ संपूर्ण (40/40 श्लोक)

श्री नवग्रह चालीसा नौ ग्रहों की अलग-अलग स्तुति है — सूर्य, चन्द्र, मंगल, बुध, बृहस्पति, शुक्र, शनि, राहु और केतु, हर एक के लिए ठीक चार चौपाइयाँ। अंत में फलश्रुति की चार चौपाइयाँ जोड़कर कुल चालीस होती हैं। समापन दोहे में रचयिता की छाप है — "यह चालीसा नवोग्रह, विरचित सुन्दरदास"।

परिचय

स्रोत: प्रचलित हिन्दी नवग्रह चालीसा; प्रयाग के निकट ककरा-दुर्वासा क्षेत्र

एक नज़र में

मंत्र / पाठश्री नवग्रह चालीसा
IASTśrī navagraha cālīsā
मूल स्रोतप्रचलित हिन्दी नवग्रह चालीसा; प्रयाग के निकट ककरा-दुर्वासा क्षेत्र
शुभ दिनप्रातः नित्य; शनिवार, अमावस्या व ग्रह-शांति
पाठ समय8–10 मिनट
कठिनाईसरल

उद्भव / पृष्ठभूमि

बाक़ी चालीसाओं से यह रचना ढाँचे में ही अलग है — यह एक देवता की स्तुति नहीं, नौ अलग स्तुतियों का संग्रह है।

हर ग्रह को ठीक चार चौपाइयाँ मिली हैं, और हर खंड का काम एक जैसा है: पहले उस ग्रह के नाम गिनाना, फिर उसका स्वरूप, और अंत में प्रार्थना। यही समानता इसे याद रखने और पाठ करने में आसान बनाती है।

नामों की गिनती इस चालीसा की सबसे उपयोगी बात है — ज्योतिष में जो पर्याय रोज़ काम आते हैं, वे यहाँ पद्य में बँधे मिल जाते हैं:

· सूर्य — आदित्य, दिवाकर, भानु, दिनकर, दिनेश, भास्कर, प्रभाकर, अर्क, मित्र (चौपाई 1–4) · चन्द्र — शशि, मयंक, रजनीपति, कलानिधि, राकापति, हिमांशु, राकेश, सोम, इन्दु, विधु, सुधाकर, निशाकर (5–8) · मंगल — लोहित, भौम, अंगारक, कुज, महीसुत, क्षितिसुत, लोहितांग (9–12) · बुध — शशिनंदन, तारासुत, रोहिणीनंदन, चन्द्रसुवन (13–16) · बृहस्पति — देवाचार्य, इन्द्र-पुरोहित, वाचस्पति, वागीश, जीव, अंगिरा (17–20) · शुक्र — उशना, भार्गव, भृगुनंदन, दैत्य-पुरोहित (21–24) · शनि — रविनंदन, कृष्ण, सौरि, पिंगल, मंद, रौद्र, यम, छाया-पुत्र (25–28) · राहु — स्वर्भानु, सैंहिकेय, शिखी, अर्धकाय (29–32) · केतु — शिखी, तारिका-ग्रह, ध्वजयुत, रुण्ड-रूप (33–36)

शनि वाले खंड में वह पंक्ति है जो अकेले भी बहुत उद्धृत होती है — "वक्र दृष्टि पिप्पल तन साजा, क्षण महं करत रंक क्षण राजा" (27)।

राहु की स्तुति में एक बात ध्यान देने की है — चालीसा उन्हें शत्रु कहकर छोड़ती नहीं, बल्कि प्रार्थना करती है: "यदि ग्रह समय पाय हिं आवहु, सदा शान्ति और सुख उपजावहु" (32)। यही भाव पूरे पाठ का है — ग्रहों से डरना नहीं, उनसे अनुग्रह माँगना।

अंतिम चार चौपाइयाँ रचयिता की हैं। वे अपना पता तक दे जाते हैं — तीर्थराज प्रयाग, ककरा ग्राम का पुरे-तिवारी मोहल्ला, दुर्वासा का आश्रम (37–38) — और समापन दोहे में नाम: सुन्दरदास। यही छाप हमारे यहाँ की गणेश चालीसा ("भजत रामसुन्दर प्रभुदासा, जग प्रयाग, ककरा, दुर्वासा") और गंगा चालीसा ("ककरा ग्राम ऋषि दुर्वासा, सुन्दरदास") में भी मिलती है। तीनों एक ही कवि की जान पड़ती हैं — पर यह पाठ के भीतर का संकेत है, बाहरी प्रमाण नहीं।

संपूर्ण चालीसा

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श्री गणपति गुरुपद कमल, प्रेम सहित सिरनाय। नवग्रह चालीसा कहत, शारद होत सहाय॥

श्री गणपति के चरण-कमलों में प्रेम सहित सिर नवाकर यह नवग्रह चालीसा कहता हूँ — शारदा (सरस्वती) सहायक हों।

जय जय रवि शशि सोम बुध, जय गुरु भृगु शनि राज। जयति राहु अरु केतु ग्रह, करहुं अनुग्रह आज॥

रवि, शशि (चन्द्र), सोम, बुध की जय; गुरु (बृहस्पति), भृगु (शुक्र) और शनिराज की जय; राहु और केतु ग्रहों की भी जय — आप सब आज अनुग्रह कीजिए।

॥ श्री सूर्य स्तुति ॥

यहाँ से सूर्य की स्तुति आरंभ होती है (चौपाई 1–4)।

प्रथमहि रवि कहं नावौं माथा। करहुं कृपा जनि जानि अनाथा॥

सबसे पहले रवि को माथा नवाता हूँ — अनाथ जानकर कृपा कीजिए।

हे आदित्य दिवाकर भानू। मैं मति मन्द महा अज्ञानू॥

हे आदित्य, हे दिवाकर, हे भानु — मैं मंद बुद्धि और महा अज्ञानी हूँ।

अब निज जन कहं हरहु कलेषा। दिनकर द्वादश रूप दिनेशा॥

अब अपने जन के क्लेश हर लीजिए, हे बारह रूपों वाले दिनकर, हे दिनेश।

नमो भास्कर सूर्य प्रभाकर। अर्क मित्र अघ मोघ क्षमाकर॥

हे भास्कर, सूर्य, प्रभाकर — आपको नमस्कार; हे अर्क, हे मित्र, आप पापों को क्षमा करने वाले हैं।

॥ श्री चन्द्र स्तुति ॥

यहाँ से चन्द्र की स्तुति आरंभ होती है (चौपाई 5–8)।

शशि मयंक रजनीपति स्वामी। चन्द्र कलानिधि नमो नमामि॥

हे शशि, हे मयंक, हे रजनीपति स्वामी; हे चन्द्र, हे कलानिधि — आपको नमस्कार।

राकापति हिमांशु राकेशा। प्रणवत जन तन हरहुं कलेशा॥

हे राकापति, हे हिमांशु, हे राकेश — प्रणाम करने वाले जन के क्लेश हर लीजिए।

सोम इन्दु विधु शान्ति सुधाकर। शीत रश्मि औषधि निशाकर॥

हे सोम, इन्दु, विधु — आप शांति के सुधाकर हैं; शीतल किरणों वाले, औषधियों के स्वामी निशाकर हैं।

तुम्हीं शोभित सुन्दर भाल महेशा। शरण शरण जन हरहुं कलेशा॥

आप महेश (शिव) के सुंदर भाल पर शोभित हैं; शरण में आए जन के क्लेश हर लीजिए।

॥ श्री मंगल स्तुति ॥

यहाँ से मंगल की स्तुति आरंभ होती है (चौपाई 9–12)।

जय जय जय मंगल सुखदाता। लोहित भौमादिक विख्याता॥

हे सुख देने वाले मंगल, आपकी जय हो; आप लोहित और भौम आदि नामों से विख्यात हैं।

अंगारक कुज रुज ऋणहारी। करहुं दया यही विनय हमारी॥

हे अंगारक, हे कुज — आप रोग और ऋण हरने वाले हैं; दया कीजिए, यही हमारी विनती है।

हे महिसुत छितिसुत सुखराशी। लोहितांग जय जन अघनाशी॥

हे महीसुत, हे क्षितिसुत, हे सुख की राशि; हे लोहितांग, पापों का नाश करने वाले, आपकी जय हो।

अगम अमंगल अब हर लीजै। सकल मनोरथ पूरण कीजै॥

अब दुर्गम अमंगल हर लीजिए और सारे मनोरथ पूरे कीजिए।

॥ श्री बुध स्तुति ॥

यहाँ से बुध की स्तुति आरंभ होती है (चौपाई 13–16)।

जय शशि नन्दन बुध महाराजा। करहु सकल जन कहं शुभ काजा॥

हे चन्द्रनंदन बुध महाराज, आपकी जय हो; सब जनों के काम शुभ कीजिए।

दीजै बुद्धि बल सुमति सुजाना। कठिन कष्ट हरि करि कल्याणा॥

बुद्धि, बल और अच्छी समझ दीजिए; कठिन कष्ट हरकर कल्याण कीजिए।

हे तारासुत रोहिणी नन्दन। चन्द्रसुवन दुख द्वन्द्व निकन्दन॥

हे तारा के पुत्र, हे रोहिणी के नंदन; हे चन्द्र-पुत्र, आप दुख और द्वंद्व का नाश करने वाले हैं।

पूजहिं आस दास कहुं स्वामी। प्रणत पाल प्रभु नमो नमामी॥

हे स्वामी, यह दास आपकी पूजा की आस रखता है; हे शरणागत के पालक प्रभु, आपको बार-बार नमस्कार।

॥ श्री बृहस्पति स्तुति ॥

यहाँ से बृहस्पति की स्तुति आरंभ होती है (चौपाई 17–20)।

जयति जयति जय श्री गुरुदेवा। करूं सदा तुम्हरी प्रभु सेवा॥

हे श्री गुरुदेव, आपकी जय हो, जय हो; मैं सदा आपकी सेवा करूँ।

देवाचार्य तुम देव गुरु ज्ञानी। इन्द्र पुरोहित विद्यादानी॥

आप देवाचार्य हैं, देवताओं के ज्ञानी गुरु; इन्द्र के पुरोहित और विद्या के दाता।

वाचस्पति बागीश उदारा। जीव बृहस्पति नाम तुम्हारा॥

आप वाचस्पति हैं, उदार वागीश हैं; जीव और बृहस्पति आपके नाम हैं।

विद्या सिन्धु अंगिरा नामा। करहुं सकल विधि पूरण कामा॥

आप विद्या के सिंधु हैं, आपका नाम अंगिरा भी है; हर प्रकार से मेरे काम पूरे कीजिए।

॥ श्री शुक्र स्तुति ॥

यहाँ से शुक्र की स्तुति आरंभ होती है (चौपाई 21–24)।

शुक्र देव पद तल जल जाता। दास निरन्तन ध्यान लगाता॥

हे शुक्रदेव, आपके चरण-कमलों में यह दास निरंतर ध्यान लगाता है।

हे उशना भार्गव भृगु नन्दन। दैत्य पुरोहित दुष्ट निकन्दन॥

हे उशना, हे भार्गव, हे भृगुनंदन; आप दैत्यों के पुरोहित और दुष्टों का नाश करने वाले हैं।

भृगुकुल भूषण दूषण हारी। हरहुं नेष्ट ग्रह करहुं सुखारी॥

आप भृगु-कुल के भूषण और दोष हरने वाले हैं; अनिष्ट ग्रहों को हर लीजिए और सुखी कीजिए।

तुहि द्विजबर जोशी सिरताजा। नर शरीर के तुमही राजा॥

आप ही श्रेष्ठ द्विज और ज्योतिषियों के शिरोमणि हैं; मनुष्य-शरीर के राजा भी आप ही हैं।

॥ श्री शनि स्तुति ॥

यहाँ से शनि की स्तुति आरंभ होती है (चौपाई 25–28)।

जय श्री शनिदेव रवि नन्दन। जय कृष्णो सौरी जगवन्दन॥

हे श्री शनिदेव, सूर्य के पुत्र, आपकी जय हो; हे कृष्ण-वर्ण सौरि, जगत आपकी वंदना करता है।

पिंगल मन्द रौद्र यम नामा। वप्र आदि कोणस्थ ललामा॥

पिंगल, मंद, रौद्र और यम आपके नाम हैं; आप दिशाओं के कोण पर विराजते हैं।

वक्र दृष्टि पिप्पल तन साजा। क्षण महं करत रंक क्षण राजा॥

आपकी दृष्टि वक्र है और शरीर पीपल-सा श्याम; आप क्षण में राजा को रंक और रंक को राजा कर देते हैं।

ललत स्वर्ण पद करत निहाला। हरहुं विपत्ति छाया के लाला॥

आपके चरणों की कृपा से स्वर्ण-लाभ और निहाल होना मिलता है; हे छाया-पुत्र, विपत्ति हर लीजिए।

॥ श्री राहु स्तुति ॥

यहाँ से राहु की स्तुति आरंभ होती है (चौपाई 29–32)।

जय जय राहु गगन प्रविसइया। तुमही चन्द्र आदित्य ग्रसइया॥

हे राहु, आकाश में प्रवेश करने वाले, आपकी जय हो; चन्द्र और सूर्य को ग्रसने वाले आप ही हैं।

रवि शशि अरि स्वर्भानु धारा। शिखी आदि बहु नाम तुम्हारा॥

आप रवि और शशि के शत्रु हैं, स्वर्भानु धारा हैं; शिखी आदि आपके अनेक नाम हैं।

सैहिंकेय तुम निशाचर राजा। अर्धकाय जग राखहु लाजा॥

हे सिंहिका-पुत्र, आप निशाचरों के राजा हैं; आधे शरीर वाले होकर भी जगत की लाज रखिए।

यदि ग्रह समय पाय हिं आवहु। सदा शान्ति और सुख उपजावहु॥

यदि आप समय पाकर आएँ, तो सदा शांति और सुख उपजाइए।

॥ श्री केतु स्तुति ॥

यहाँ से केतु की स्तुति आरंभ होती है (चौपाई 33–36)।

जय श्री केतु कठिन दुखहारी। करहु सुजन हित मंगलकारी॥

हे श्री केतु, कठिन दुखों को हरने वाले, आपकी जय हो; सज्जनों का हित और मंगल कीजिए।

ध्वजयुत रुण्ड रूप विकराला। घोर रौद्रतन अघमन काला॥

ध्वजा से युक्त आपका धड़-रूप विकराल है; आपका तन घोर और रौद्र है, पापियों के लिए काल है।

शिखी तारिका ग्रह बलवान। महा प्रताप न तेज ठिकाना॥

हे शिखी, हे तारिका-ग्रह, आप बलवान हैं; आपके महा प्रताप और तेज का कोई ठिकाना नहीं।

वाहन मीन महा शुभकारी। दीजै शान्ति दया उर धारी॥

आपका वाहन मीन है और अत्यंत शुभकारी; हृदय में दया धरकर शांति दीजिए।

॥ नवग्रह शांति फल ॥

यहाँ से फलश्रुति आरंभ होती है (चौपाई 37–40)।

तीरथराज प्रयाग सुपासा। बसै राम के सुन्दर दासा॥

तीर्थराज प्रयाग के सुखद वास में राम का यह सुंदरदास बसता है।

ककरा ग्रामहिं पुरे-तिवारी। दुर्वासाश्रम जन दुख हारी॥

ककरा ग्राम के पुरे-तिवारी में, दुर्वासा के आश्रम के पास — जो जनों का दुख हरता है।

नवग्रह शान्ति लिख्यो सुख हेतु। जन तन कष्ट उतारण सेतू॥

यह नवग्रह-शांति सुख के लिए लिखी गई है; यह जन के तन का कष्ट उतारने का सेतु है।

जो नित पाठ करै चित लावै। सब सुख भोगि परम पद पावै॥

जो नित्य चित्त लगाकर पाठ करे, वह सब सुख भोगकर परम पद पाता है।

धन्य नवग्रह देव प्रभु, महिमा अगम अपार। चित नव मंगल मोद गृह, जगत जनन सुखद्वार॥

हे नवग्रह देव प्रभु, आप धन्य हैं; आपकी महिमा अगम और अपार है। नौ मंगल और आनंद से भरा आपका गृह जगत के लिए सुख का द्वार है।

यह चालीसा नवोग्रह, विरचित सुन्दरदास। पढ़त प्रेम सुत बढ़त सुख, सर्वानन्द हुलास॥

यह नवग्रह चालीसा सुंदरदास ने रची है; इसे प्रेम से पढ़ने पर सुख बढ़ता है और सर्वत्र आनंद तथा उल्लास होता है।

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अर्थ (हिन्दी)

  1. श्री गणपति के चरण-कमलों में प्रेम सहित सिर नवाकर यह नवग्रह चालीसा कहता हूँ — शारदा (सरस्वती) सहायक हों।
  2. रवि, शशि (चन्द्र), सोम, बुध की जय; गुरु (बृहस्पति), भृगु (शुक्र) और शनिराज की जय; राहु और केतु ग्रहों की भी जय — आप सब आज अनुग्रह कीजिए।
  3. यहाँ से सूर्य की स्तुति आरंभ होती है (चौपाई 1–4)।
  4. सबसे पहले रवि को माथा नवाता हूँ — अनाथ जानकर कृपा कीजिए।
  5. हे आदित्य, हे दिवाकर, हे भानु — मैं मंद बुद्धि और महा अज्ञानी हूँ।
  6. अब अपने जन के क्लेश हर लीजिए, हे बारह रूपों वाले दिनकर, हे दिनेश।
  7. हे भास्कर, सूर्य, प्रभाकर — आपको नमस्कार; हे अर्क, हे मित्र, आप पापों को क्षमा करने वाले हैं।
  8. यहाँ से चन्द्र की स्तुति आरंभ होती है (चौपाई 5–8)।
  9. हे शशि, हे मयंक, हे रजनीपति स्वामी; हे चन्द्र, हे कलानिधि — आपको नमस्कार।
  10. हे राकापति, हे हिमांशु, हे राकेश — प्रणाम करने वाले जन के क्लेश हर लीजिए।
  11. हे सोम, इन्दु, विधु — आप शांति के सुधाकर हैं; शीतल किरणों वाले, औषधियों के स्वामी निशाकर हैं।
  12. आप महेश (शिव) के सुंदर भाल पर शोभित हैं; शरण में आए जन के क्लेश हर लीजिए।
  13. यहाँ से मंगल की स्तुति आरंभ होती है (चौपाई 9–12)।
  14. हे सुख देने वाले मंगल, आपकी जय हो; आप लोहित और भौम आदि नामों से विख्यात हैं।
  15. हे अंगारक, हे कुज — आप रोग और ऋण हरने वाले हैं; दया कीजिए, यही हमारी विनती है।
  16. हे महीसुत, हे क्षितिसुत, हे सुख की राशि; हे लोहितांग, पापों का नाश करने वाले, आपकी जय हो।
  17. अब दुर्गम अमंगल हर लीजिए और सारे मनोरथ पूरे कीजिए।
  18. यहाँ से बुध की स्तुति आरंभ होती है (चौपाई 13–16)।
  19. हे चन्द्रनंदन बुध महाराज, आपकी जय हो; सब जनों के काम शुभ कीजिए।
  20. बुद्धि, बल और अच्छी समझ दीजिए; कठिन कष्ट हरकर कल्याण कीजिए।
  21. हे तारा के पुत्र, हे रोहिणी के नंदन; हे चन्द्र-पुत्र, आप दुख और द्वंद्व का नाश करने वाले हैं।
  22. हे स्वामी, यह दास आपकी पूजा की आस रखता है; हे शरणागत के पालक प्रभु, आपको बार-बार नमस्कार।
  23. यहाँ से बृहस्पति की स्तुति आरंभ होती है (चौपाई 17–20)।
  24. हे श्री गुरुदेव, आपकी जय हो, जय हो; मैं सदा आपकी सेवा करूँ।
  25. आप देवाचार्य हैं, देवताओं के ज्ञानी गुरु; इन्द्र के पुरोहित और विद्या के दाता।
  26. आप वाचस्पति हैं, उदार वागीश हैं; जीव और बृहस्पति आपके नाम हैं।
  27. आप विद्या के सिंधु हैं, आपका नाम अंगिरा भी है; हर प्रकार से मेरे काम पूरे कीजिए।
  28. यहाँ से शुक्र की स्तुति आरंभ होती है (चौपाई 21–24)।
  29. हे शुक्रदेव, आपके चरण-कमलों में यह दास निरंतर ध्यान लगाता है।
  30. हे उशना, हे भार्गव, हे भृगुनंदन; आप दैत्यों के पुरोहित और दुष्टों का नाश करने वाले हैं।
  31. आप भृगु-कुल के भूषण और दोष हरने वाले हैं; अनिष्ट ग्रहों को हर लीजिए और सुखी कीजिए।
  32. आप ही श्रेष्ठ द्विज और ज्योतिषियों के शिरोमणि हैं; मनुष्य-शरीर के राजा भी आप ही हैं।
  33. यहाँ से शनि की स्तुति आरंभ होती है (चौपाई 25–28)।
  34. हे श्री शनिदेव, सूर्य के पुत्र, आपकी जय हो; हे कृष्ण-वर्ण सौरि, जगत आपकी वंदना करता है।
  35. पिंगल, मंद, रौद्र और यम आपके नाम हैं; आप दिशाओं के कोण पर विराजते हैं।
  36. आपकी दृष्टि वक्र है और शरीर पीपल-सा श्याम; आप क्षण में राजा को रंक और रंक को राजा कर देते हैं।
  37. आपके चरणों की कृपा से स्वर्ण-लाभ और निहाल होना मिलता है; हे छाया-पुत्र, विपत्ति हर लीजिए।
  38. यहाँ से राहु की स्तुति आरंभ होती है (चौपाई 29–32)।
  39. हे राहु, आकाश में प्रवेश करने वाले, आपकी जय हो; चन्द्र और सूर्य को ग्रसने वाले आप ही हैं।
  40. आप रवि और शशि के शत्रु हैं, स्वर्भानु धारा हैं; शिखी आदि आपके अनेक नाम हैं।
  41. हे सिंहिका-पुत्र, आप निशाचरों के राजा हैं; आधे शरीर वाले होकर भी जगत की लाज रखिए।
  42. यदि आप समय पाकर आएँ, तो सदा शांति और सुख उपजाइए।
  43. यहाँ से केतु की स्तुति आरंभ होती है (चौपाई 33–36)।
  44. हे श्री केतु, कठिन दुखों को हरने वाले, आपकी जय हो; सज्जनों का हित और मंगल कीजिए।
  45. ध्वजा से युक्त आपका धड़-रूप विकराल है; आपका तन घोर और रौद्र है, पापियों के लिए काल है।
  46. हे शिखी, हे तारिका-ग्रह, आप बलवान हैं; आपके महा प्रताप और तेज का कोई ठिकाना नहीं।
  47. आपका वाहन मीन है और अत्यंत शुभकारी; हृदय में दया धरकर शांति दीजिए।
  48. यहाँ से फलश्रुति आरंभ होती है (चौपाई 37–40)।
  49. तीर्थराज प्रयाग के सुखद वास में राम का यह सुंदरदास बसता है।
  50. ककरा ग्राम के पुरे-तिवारी में, दुर्वासा के आश्रम के पास — जो जनों का दुख हरता है।
  51. यह नवग्रह-शांति सुख के लिए लिखी गई है; यह जन के तन का कष्ट उतारने का सेतु है।
  52. जो नित्य चित्त लगाकर पाठ करे, वह सब सुख भोगकर परम पद पाता है।
  53. हे नवग्रह देव प्रभु, आप धन्य हैं; आपकी महिमा अगम और अपार है। नौ मंगल और आनंद से भरा आपका गृह जगत के लिए सुख का द्वार है।
  54. यह नवग्रह चालीसा सुंदरदास ने रची है; इसे प्रेम से पढ़ने पर सुख बढ़ता है और सर्वत्र आनंद तथा उल्लास होता है।

लाभ

  • नौ ग्रहों की अलग-अलग स्तुति एक ही पाठ में — हर ग्रह के लिए चार चौपाइयाँ।
  • हर ग्रह के प्रचलित पर्याय-नाम पद्य में बँधे मिलते हैं (आदित्य–भास्कर, लोहित–अंगारक, पिंगल–सौरि)।
  • ग्रह-शांति पूजन, शनिवार और अमावस्या का प्रमुख पाठ।
  • राहु-केतु से भी अनुग्रह की प्रार्थना है, भय का भाव नहीं (चौपाई 32, 36)।

कब करें पाठ

प्रातः नित्य पूजा मेंशनिवार व अमावस्या कोनवग्रह शांति-पूजन के पश्चातग्रह-गोचर या दशा-परिवर्तन के समय

पाठ विधि

नवग्रह यंत्र या नौ ग्रहों की प्रतिमाओं के समक्ष दीप जलाएँ। परंपरा में नौ प्रकार के अन्न और नौ रंगों के पुष्प अर्पित किए जाते हैं। पहले दोनों दोहे पढ़ें, फिर क्रम से नौ खंड — सूर्य से केतु तक — और अंत में फलश्रुति तथा दोनों समापन दोहे। यदि किसी एक ग्रह की शांति करनी हो, तो पूरा पाठ करके उस ग्रह के चार चौपाई-खंड को अलग से दोहराने की परंपरा है।

प्रामाणिकता व स्रोत

स्थिति✓ संपूर्ण (40/40 श्लोक)
स्रोत परंपराbhaktibharat.com — श्री नवग्रह चालीसा (आधार-पाठ) · dharmsaar.com — श्री नवग्रह चालीसा · hindunidhi.com — नवग्रह चालीसा · रचयिता की छाप — समापन दोहा "यह चालीसा नवोग्रह, विरचित सुन्दरदास"
रचयितासुन्दरदास (समापन दोहे की छाप)
अंतिम अद्यतनसितंबर 2026

श्री नवग्रह चालीसा — सामान्य प्रश्न