श्री नवग्रह चालीसा

śrī navagraha cālīsā

Navgrah Chalisa

समय
8–10 मिनट
श्लोक/चौपाई
42
कठिनाई
सरल
शुभ दिन
प्रातः; शनिवार व ग्रह-शांति काल
✓ संपूर्ण (40/40 श्लोक)

परिचय

स्रोत: पारंपरिक नवग्रह चालीसा

संपूर्ण चालीसा

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श्री गणपति गुरु पद कमल, प्रेम सहित धरि माथ। नवग्रह चालीसा कहूँ, राखहु जन की लाज नाथ॥

गणपति व गुरु के चरण-कमल को प्रेमपूर्वक माथे पर धरकर मैं नवग्रह चालीसा कहता हूँ; हे नाथ, भक्तों की लाज रखिए।

जय जय रवि-शशि नवग्रह देवा। करूँ सदा तुम सबकी सेवा॥

हे रवि-शशि आदि नवग्रह देवो, आपकी जय हो; मैं सदा आप सबकी सेवा करता हूँ।

सूर्यदेव तेज के स्वामी। आरोग्य-यश-बल अनुगामी॥

सूर्यदेव तेज के स्वामी हैं; वे आरोग्य, यश व बल देने वाले हैं।

जो जन सूर्य को नित ध्यावै। तेज-यश-आरोग्य वह पावै॥

जो जन सूर्य का नित्य ध्यान करता है, वह तेज, यश व आरोग्य पाता है।

चन्द्रदेव मन के अधिकारी। शीतलता-शान्ति के दानहारी॥

चन्द्रदेव मन के अधिपति हैं; वे शीतलता व शांति के दाता हैं।

जो जन चन्द्र को नित ध्यावै। मन की शान्ति सहज वह पावै॥

जो जन चन्द्र का नित्य ध्यान करता है, वह सहज ही मन की शांति पाता है।

मंगल भौम साहस के दाता। ऋण-रोग-शत्रु से तुम त्राता॥

मंगल (भौम) साहस के दाता हैं; वे ऋण, रोग व शत्रु से रक्षा करने वाले हैं।

जो जन मंगल को नित ध्यावै। साहस-बल-पराक्रम पावै॥

जो जन मंगल का नित्य ध्यान करता है, वह साहस, बल व पराक्रम पाता है।

बुधदेव बुद्धि के दाता। वाणी-व्यापार के विधाता॥

बुधदेव बुद्धि के दाता हैं; वे वाणी व व्यापार के विधाता हैं।

जो जन बुध को नित ध्यावै। बुद्धि-विद्या-व्यापार वह पावै॥

जो जन बुध का नित्य ध्यान करता है, वह बुद्धि, विद्या व व्यापार में सफलता पाता है।

गुरु बृहस्पति ज्ञान-सागर। धन-विद्या-सुख के आगर॥

गुरु बृहस्पति ज्ञान के सागर हैं; वे धन, विद्या व सुख के भण्डार हैं।

जो जन गुरु को नित ध्यावै। ज्ञान-धन-समृद्धि वह पावै॥

जो जन गुरु का नित्य ध्यान करता है, वह ज्ञान, धन व समृद्धि पाता है।

शुक्रदेव वैभव के दाता। प्रेम-कला-सुख के विधाता॥

शुक्रदेव वैभव के दाता हैं; वे प्रेम, कला व सुख के विधाता हैं।

जो जन शुक्र को नित ध्यावै। प्रेम-वैभव-सुख वह पावै॥

जो जन शुक्र का नित्य ध्यान करता है, वह प्रेम, वैभव व सुख पाता है।

शनिदेव न्याय के दाता। कर्मफल देते जग-त्राता॥

शनिदेव न्याय के दाता हैं; वे कर्म के अनुसार फल देते व जगत की रक्षा करते हैं।

जो जन शनि को नित ध्यावै। साढ़ेसाती की पीड़ा जावै॥

जो जन शनि का नित्य ध्यान करता है, उसकी साढ़ेसाती की पीड़ा दूर हो जाती है।

राहु छाया-ग्रह बलधारी। भ्रम-बाधा हर तुम हितकारी॥

राहु छाया-ग्रह व बलधारी हैं; भ्रम व बाधा हरकर वे हितकारी होते हैं।

जो जन राहु को नित ध्यावै। भ्रम-बाधा सब दूर भगावै॥

जो जन राहु का नित्य ध्यान करता है, वह भ्रम व बाधा सब दूर भगा देता है।

केतु मोक्ष-ज्ञान के दानी। गुप्त-बाधा हर सुख-खानी॥

केतु मोक्ष व ज्ञान के दाता हैं; गुप्त बाधाएँ हरकर वे सुख की खान हैं।

जो जन केतु को नित ध्यावै। गुप्त-बाधा सब दूर भगावै॥

जो जन केतु का नित्य ध्यान करता है, वह गुप्त बाधाएँ सब दूर भगा देता है।

नवग्रह सब मिलि कृपा बरसावैं। भक्तन के सब संकट टावैं॥

नवग्रह सब मिलकर कृपा बरसाते हैं और भक्तों के सब संकट टालते हैं।

जो जन इन सबको नित ध्यावै। ग्रह-पीड़ा सब दूर भगावै॥

जो जन इन सबका नित्य ध्यान करता है, वह ग्रह-पीड़ा सब दूर भगा देता है।

नवग्रह शान्ति-हवन जो करते। जीवन-संतुलन वे सब भरते॥

जो नवग्रह शांति-हवन करते हैं, वे जीवन में संतुलन से भर जाते हैं।

सात वार में पूजन कीजै। नित प्रति ग्रह की कृपा लीजै॥

सातों वारों में (उस दिन के ग्रह का) पूजन कीजिए और नित्य ग्रह-कृपा प्राप्त कीजिए।

जो जन इन्हें शीश नवावै। ग्रह-दोष से मुक्ति पावै॥

जो जन इन्हें शीश नवाता है, वह ग्रह-दोष से मुक्ति पाता है।

दीन-दुखी की सुनत पुकारा। पल में करते बेड़ा पारा॥

नवग्रह दीन-दुखियों की पुकार सुनते ही पल भर में उनका बेड़ा पार कर देते हैं।

जो यह नवग्रह चालीसा गावै। ग्रह-पीड़ा सब दूर नसावै॥

जो यह नवग्रह चालीसा गाता है, उसकी ग्रह-पीड़ा सब दूर नष्ट हो जाती है।

नित प्रति पाठ करे जो कोई। ता पर कृपा नवग्रह की होई॥

जो कोई नित्य पाठ करता है, उस पर नवग्रह की कृपा होती है।

मन-इच्छित फल सब जन पावैं। जीवन-संतुलन-सुख लावैं॥

सब जन मन-इच्छित फल पाते हैं और जीवन में संतुलन व सुख लाते हैं।

नवग्रह-कृपा जिन पर होई। ता को कष्ट सतावे न कोई॥

जिन पर नवग्रह की कृपा होती है, उन्हें कोई कष्ट नहीं सताता।

दान-पुण्य जो विधि से करते। ग्रह-दोष सब वे हर लेते॥

जो विधिपूर्वक दान-पुण्य करते हैं, वे ग्रह-दोष सब हर लेते हैं।

सूर्य को गुड़, चन्द्र को खीरा। मंगल को गुड़ हरे पीरा॥

सूर्य को गुड़, चन्द्र को (श्वेत वस्तु) व मंगल को गुड़ अर्पित करने से पीड़ा हरती है।

बुध को हरी मूँग चढ़ावैं। गुरु को पीत-वस्त्र भावैं॥

बुध को हरी मूँग चढ़ाएँ और गुरु को पीला वस्त्र प्रिय है।

शुक्र को श्वेत-मिष्ठान चढ़ावैं। शनि को तेल-तिल जन लावैं॥

शुक्र को श्वेत मिष्ठान्न चढ़ाएँ और शनि को तेल-तिल अर्पित करें।

राहु-केतु को उड़द चढ़ावैं। विधिवत पूजन ग्रह मनावैं॥

राहु-केतु को उड़द चढ़ाएँ और विधिवत पूजन कर ग्रहों को मनाएँ।

जो सत भाव करे यह सेवा। रीझत तुरत नवग्रह देवा॥

जो सच्चे भाव से यह सेवा करता है, उस पर नवग्रह देव तुरंत रीझ (प्रसन्न हो) जाते हैं।

घर-घर ज्योति इनकी जागै। नर-नारी सब इनको पागै॥

घर-घर में इनकी ज्योति जगती है; नर-नारी सब इनमें अनुरक्त हो जाते हैं।

नवग्रह-वंदन जो जन गावै। इहलोक-परलोक सुख पावै॥

जो जन नवग्रह-वंदना गाता है, वह इस लोक व परलोक दोनों में सुख पाता है।

जो जन नवग्रह गुण गावै। पाप-ताप सब दूर भगावै॥

जो जन नवग्रह के गुण गाता है, वह समस्त पाप-ताप दूर भगा देता है।

सुख-समृद्धि घर में आवै। जीवन-संतुलन सब बढ़ावै॥

घर में सुख-समृद्धि आती है और जीवन में संतुलन बढ़ता है।

जय जय जय नवग्रह देवा। रक्षा करो सब शरण हमारा॥

हे नवग्रह देवो, आपकी जय हो; शरण में आए हम सबकी रक्षा कीजिए।

नवग्रह चालीसा पढ़त नित, मिटैं सकल ग्रह-दोष। जीवन-संतुलन-सुख मिलै, बढ़े सदा संतोष॥

नित्य नवग्रह चालीसा पढ़ने से समस्त ग्रह-दोष मिटते हैं; जीवन में संतुलन व सुख मिलता है और संतोष सदा बढ़ता है।

लिपि बदलने के लिए ऊपर देवनागरी / IAST / Roman चुनें।

अर्थ (हिन्दी)

  1. गणपति व गुरु के चरण-कमल को प्रेमपूर्वक माथे पर धरकर मैं नवग्रह चालीसा कहता हूँ; हे नाथ, भक्तों की लाज रखिए।
  2. हे रवि-शशि आदि नवग्रह देवो, आपकी जय हो; मैं सदा आप सबकी सेवा करता हूँ।
  3. सूर्यदेव तेज के स्वामी हैं; वे आरोग्य, यश व बल देने वाले हैं।
  4. जो जन सूर्य का नित्य ध्यान करता है, वह तेज, यश व आरोग्य पाता है।
  5. चन्द्रदेव मन के अधिपति हैं; वे शीतलता व शांति के दाता हैं।
  6. जो जन चन्द्र का नित्य ध्यान करता है, वह सहज ही मन की शांति पाता है।
  7. मंगल (भौम) साहस के दाता हैं; वे ऋण, रोग व शत्रु से रक्षा करने वाले हैं।
  8. जो जन मंगल का नित्य ध्यान करता है, वह साहस, बल व पराक्रम पाता है।
  9. बुधदेव बुद्धि के दाता हैं; वे वाणी व व्यापार के विधाता हैं।
  10. जो जन बुध का नित्य ध्यान करता है, वह बुद्धि, विद्या व व्यापार में सफलता पाता है।
  11. गुरु बृहस्पति ज्ञान के सागर हैं; वे धन, विद्या व सुख के भण्डार हैं।
  12. जो जन गुरु का नित्य ध्यान करता है, वह ज्ञान, धन व समृद्धि पाता है।
  13. शुक्रदेव वैभव के दाता हैं; वे प्रेम, कला व सुख के विधाता हैं।
  14. जो जन शुक्र का नित्य ध्यान करता है, वह प्रेम, वैभव व सुख पाता है।
  15. शनिदेव न्याय के दाता हैं; वे कर्म के अनुसार फल देते व जगत की रक्षा करते हैं।
  16. जो जन शनि का नित्य ध्यान करता है, उसकी साढ़ेसाती की पीड़ा दूर हो जाती है।
  17. राहु छाया-ग्रह व बलधारी हैं; भ्रम व बाधा हरकर वे हितकारी होते हैं।
  18. जो जन राहु का नित्य ध्यान करता है, वह भ्रम व बाधा सब दूर भगा देता है।
  19. केतु मोक्ष व ज्ञान के दाता हैं; गुप्त बाधाएँ हरकर वे सुख की खान हैं।
  20. जो जन केतु का नित्य ध्यान करता है, वह गुप्त बाधाएँ सब दूर भगा देता है।
  21. नवग्रह सब मिलकर कृपा बरसाते हैं और भक्तों के सब संकट टालते हैं।
  22. जो जन इन सबका नित्य ध्यान करता है, वह ग्रह-पीड़ा सब दूर भगा देता है।
  23. जो नवग्रह शांति-हवन करते हैं, वे जीवन में संतुलन से भर जाते हैं।
  24. सातों वारों में (उस दिन के ग्रह का) पूजन कीजिए और नित्य ग्रह-कृपा प्राप्त कीजिए।
  25. जो जन इन्हें शीश नवाता है, वह ग्रह-दोष से मुक्ति पाता है।
  26. नवग्रह दीन-दुखियों की पुकार सुनते ही पल भर में उनका बेड़ा पार कर देते हैं।
  27. जो यह नवग्रह चालीसा गाता है, उसकी ग्रह-पीड़ा सब दूर नष्ट हो जाती है।
  28. जो कोई नित्य पाठ करता है, उस पर नवग्रह की कृपा होती है।
  29. सब जन मन-इच्छित फल पाते हैं और जीवन में संतुलन व सुख लाते हैं।
  30. जिन पर नवग्रह की कृपा होती है, उन्हें कोई कष्ट नहीं सताता।
  31. जो विधिपूर्वक दान-पुण्य करते हैं, वे ग्रह-दोष सब हर लेते हैं।
  32. सूर्य को गुड़, चन्द्र को (श्वेत वस्तु) व मंगल को गुड़ अर्पित करने से पीड़ा हरती है।
  33. बुध को हरी मूँग चढ़ाएँ और गुरु को पीला वस्त्र प्रिय है।
  34. शुक्र को श्वेत मिष्ठान्न चढ़ाएँ और शनि को तेल-तिल अर्पित करें।
  35. राहु-केतु को उड़द चढ़ाएँ और विधिवत पूजन कर ग्रहों को मनाएँ।
  36. जो सच्चे भाव से यह सेवा करता है, उस पर नवग्रह देव तुरंत रीझ (प्रसन्न हो) जाते हैं।
  37. घर-घर में इनकी ज्योति जगती है; नर-नारी सब इनमें अनुरक्त हो जाते हैं।
  38. जो जन नवग्रह-वंदना गाता है, वह इस लोक व परलोक दोनों में सुख पाता है।
  39. जो जन नवग्रह के गुण गाता है, वह समस्त पाप-ताप दूर भगा देता है।
  40. घर में सुख-समृद्धि आती है और जीवन में संतुलन बढ़ता है।
  41. हे नवग्रह देवो, आपकी जय हो; शरण में आए हम सबकी रक्षा कीजिए।
  42. नित्य नवग्रह चालीसा पढ़ने से समस्त ग्रह-दोष मिटते हैं; जीवन में संतुलन व सुख मिलता है और संतोष सदा बढ़ता है।

लाभ

  • नौ ग्रहों के दोष व पीड़ा शांत होती है।
  • जीवन में संतुलन, स्थिरता व सुख-शांति आती है।
  • कर्मफल अनुकूल होकर बाधाएँ दूर होती हैं।
  • आरोग्य, धन व मन की शांति की प्राप्ति होती है।

कब करें पाठ

प्रातः पूजा मेंशनिवार व अमावस्या कोग्रह-शांति/नवग्रह पूजन के पश्चात

पाठ विधि

नवग्रह यंत्र/मूर्तियों के समक्ष नौ प्रकार के अन्न/पुष्प अर्पित कर दीप जलाएँ और सभी ग्रहों का स्मरण करते हुए चालीसा का पाठ करें। नवग्रह शांति-पूजन के पश्चात इसका विशेष महत्व है।

प्रामाणिकता व स्रोत

स्थिति✓ संपूर्ण (40/40 श्लोक)
स्रोत परंपरापारंपरिक नवग्रह चालीसा · गीता प्रेस, गोरखपुर — चालीसा संग्रह
रचयितापारंपरिक
अंतिम अद्यतनजून 2026

श्री नवग्रह चालीसा — सामान्य प्रश्न