पितृ सूक्त (ऋग्वेद 10.15)

pitṛ sūkta (ṛgveda 10.15)

Pitru Sukta (Rigveda 10.15)

समय
5–6 मिनट
जप संख्या
1
कठिनाई
कठिन
शुभ दिन
श्राद्ध, पितृ पक्ष व अमावस्या के पितृ-कर्म
उद्देश्य:पितृ स्मरण (Remembering Ancestors)कृतज्ञता (Gratitude)श्राद्ध कर्म (Shraddha Rites)
✓ संपूर्ण वैदिक मंत्र

पितृ सूक्त ऋग्वेद के दसवें मण्डल का पंद्रहवाँ सूक्त है — चौदह ऋचाओं का, जिसके ऋषि शङ्ख यामायन और देवता पितर हैं। इसमें पितरों को आदर से बुलाया जाता है, उनसे कृपा और भूलों की क्षमा माँगी जाती है, और अग्नि से प्रार्थना होती है कि वह हवि पितरों तक पहुँचाए।

परिचय

स्रोत: ऋग्वेद 10.15 — ऋषि शङ्ख यामायन, देवता पितर

एक नज़र में

मंत्र / पाठपितृ सूक्त (ऋग्वेद 10.15)
IASTpitṛ sūkta (ṛgveda 10.15)
प्रकारवैदिक मंत्र
मूल स्रोतऋग्वेद 10.15 — ऋषि शङ्ख यामायन, देवता पितर
जप संख्या1
माला— (सूक्त-पाठ)
शुभ दिनश्राद्ध, पितृ पक्ष व अमावस्या के पितृ-कर्म
पाठ समय5–6 मिनट
कठिनाईकठिन
छंदत्रिष्टुप् (ऋचा 11 जगती)

उद्भव / पृष्ठभूमि

यह सूक्त तीन हिस्सों में चलता है। पहली आठ ऋचाओं में पितरों को बुलाया जाता है — नीचे, ऊपर और मध्य के लोकों में रहने वाले सब पितर, जो पहले गए और जो बाद में गए। ऋचा 6 में एक बहुत मानवीय प्रार्थना है: "मनुष्य होने के कारण हमसे जो भूल हुई हो, उस पर हमसे रुष्ट न होना।" आठवीं ऋचा में यम भी पितरों के साथ हवि ग्रहण करने के लिए बुलाए जाते हैं।

ऋचा 9 से 12 में अग्नि से प्रार्थना है कि वे पितरों के साथ आएँ और हवि को सुगंधित करके उन तक पहुँचाएँ। अंतिम दो ऋचाएँ सबसे गहरी हैं। ऋचा 13 कहती है — "जो पितर यहाँ हैं और जो यहाँ नहीं हैं, जिन्हें हम जानते हैं और जिन्हें नहीं जानते" — उन सबकी गिनती अग्नि (जातवेदा) जानते हैं। ऋचा 14 उन पितरों को भी याद करती है जिनका दाह-संस्कार हुआ और जिनका नहीं हुआ।

कर्मकांड में इसका प्रयोग पुराना है। सायण के भाष्य के अनुसार अष्टका-श्राद्ध में पहली आठ ऋचाओं से होम होता है (आश्वलायन गृह्यसूत्र 2.4.6)। नारद पुराण (1.28.66) श्राद्ध में ब्राह्मण-भोजन के समय पितृ-संबंधी मंत्रों (पैतृक) के जप की बात कहता है, और मिताक्षरा श्राद्ध में ऋचा 14 का प्रयोग बताती है। इसकी कई ऋचाएँ अथर्ववेद (काण्ड 18) और शुक्ल यजुर्वेद (अध्याय 19) में भी आती हैं — यहाँ का पाठ उन्हीं से मिलाकर जाँचा गया है।

मंत्र

PDF डाउनलोड

उदीरतामवर उत्परास उन्मध्यमाः पितरः सोम्यासः । असुं य ईयुरवृका ऋतज्ञास्ते नोऽवन्तु पितरो हवेषु ॥१॥

इदं पितृभ्यो नमो अस्त्वद्य ये पूर्वासो य उपरास ईयुः । ये पार्थिवे रजस्या निषत्ता ये वा नूनं सुवृजनासु विक्षु ॥२॥

आहं पितॄन्त्सुविदत्राँ अवित्सि नपातं च विक्रमणं च विष्णोः । बर्हिषदो ये स्वधया सुतस्य भजन्त पित्वस्त इहागमिष्ठाः ॥३॥

बर्हिषदः पितर ऊत्यर्वागिमा वो हव्या चकृमा जुषध्वम् । त आ गतावसा शंतमेनाथा नः शं योररपो दधात ॥४॥

उपहूताः पितरः सोम्यासो बर्हिष्येषु निधिषु प्रियेषु । त आ गमन्तु त इह श्रुवन्त्वधि ब्रुवन्तु तेऽवन्त्वस्मान् ॥५॥

आच्या जानु दक्षिणतो निषद्येमं यज्ञमभि गृणीत विश्वे । मा हिंसिष्ट पितरः केन चिन्नो यद्व आगः पुरुषता कराम ॥६॥

आसीनासो अरुणीनामुपस्थे रयिं धत्त दाशुषे मर्त्याय । पुत्रेभ्यः पितरस्तस्य वस्वः प्र यच्छत त इहोर्जं दधात ॥७॥

ये नः पूर्वे पितरः सोम्यासोऽनूहिरे सोमपीथं वसिष्ठाः । तेभिर्यमः संरराणो हवींष्युशन्नुशद्भिः प्रतिकाममत्तु ॥८॥

ये तातृषुर्देवत्रा जेहमाना होत्राविदः स्तोमतष्टासो अर्कैः । आग्ने याहि सुविदत्रेभिरर्वाङ्सत्यैः कव्यैः पितृभिर्घर्मसद्भिः ॥९॥

ये सत्यासो हविरदो हविष्पा इन्द्रेण देवैः सरथं दधानाः । आग्ने याहि सहस्रं देववन्दैः परैः पूर्वैः पितृभिर्घर्मसद्भिः ॥१०॥

अग्निष्वात्ताः पितर एह गच्छत सदःसदः सदत सुप्रणीतयः । अत्ता हवींषि प्रयतानि बर्हिष्यथा रयिं सर्ववीरं दधातन ॥११॥

त्वमग्न ईळितो जातवेदोऽवाड्ढव्यानि सुरभीणि कृत्वी । प्रादाः पितृभ्यः स्वधया ते अक्षन्नद्धि त्वं देव प्रयता हवींषि ॥१२॥

ये चेह पितरो ये च नेह याँश्च विद्म याँ उ च न प्रविद्म । त्वं वेत्थ यति ते जातवेदः स्वधाभिर्यज्ञं सुकृतं जुषस्व ॥१३॥

ये अग्निदग्धा ये अनग्निदग्धा मध्ये दिवः स्वधया मादयन्ते । तेभिः स्वराळसुनीतिमेतां यथावशं तन्वं कल्पयस्व ॥१४॥

लिपि बदलने के लिए ऊपर देवनागरी / IAST / Roman चुनें।

उच्चारण (Pronunciation)

उदीरतामवर उत्परास उन्मध्यमाः पितरः सोम्यासः । असुं य ईयुरवृका ऋतज्ञास्ते नोऽवन्तु पितरो हवेषु ॥१॥

udīratāmavara utparāsa unmadhyamāḥ pitaraḥ somyāsaḥ | asuṃ ya īyuravṛkā ṛtajñāste no'vantu pitaro haveṣu ||१||

Udeerataamavara utparaasa unmadhyamaah pitarah somyaasah, Asum ya eeyuravrikaa ritajnaaste no'vantu pitaro haveshu.१.

इदं पितृभ्यो नमो अस्त्वद्य ये पूर्वासो य उपरास ईयुः । ये पार्थिवे रजस्या निषत्ता ये वा नूनं सुवृजनासु विक्षु ॥२॥

idaṃ pitṛbhyo namo astvadya ye pūrvāso ya uparāsa īyuḥ | ye pārthive rajasyā niṣattā ye vā nūnaṃ suvṛjanāsu vikṣu ||२||

Idam pitribhyo namo astvadya ye poorvaaso ya uparaasa eeyuh, Ye paarthive rajasyaa nishattaa ye vaa noonam suvrijanaasu vikshu.२.

आहं पितॄन्त्सुविदत्राँ अवित्सि नपातं च विक्रमणं च विष्णोः । बर्हिषदो ये स्वधया सुतस्य भजन्त पित्वस्त इहागमिष्ठाः ॥३॥

āhaṃ pitṝntsuvidatrām̐ avitsi napātaṃ ca vikramaṇaṃ ca viṣṇoḥ | barhiṣado ye svadhayā sutasya bhajanta pitvasta ihāgamiṣṭhāḥ ||३||

Aaham pitrintsuvidatraan avitsi napaatam cha vikramanam cha vishnoh, Barhishado ye svadhayaa sutasya bhajanta pitvasta ihaagamishthaah.३.

बर्हिषदः पितर ऊत्यर्वागिमा वो हव्या चकृमा जुषध्वम् । त आ गतावसा शंतमेनाथा नः शं योररपो दधात ॥४॥

barhiṣadaḥ pitara ūtyarvāgimā vo havyā cakṛmā juṣadhvam | ta ā gatāvasā śaṃtamenāthā naḥ śaṃ yorarapo dadhāta ||४||

Barhishadah pitara ootyarvaagimaa vo havyaa chakrimaa jushadhvam, Ta aa gataavasaa shantamenaathaa nah sham yorarapo dadhaata.४.

उपहूताः पितरः सोम्यासो बर्हिष्येषु निधिषु प्रियेषु । त आ गमन्तु त इह श्रुवन्त्वधि ब्रुवन्तु तेऽवन्त्वस्मान् ॥५॥

upahūtāḥ pitaraḥ somyāso barhiṣyeṣu nidhiṣu priyeṣu | ta ā gamantu ta iha śruvantvadhi bruvantu te'vantvasmān ||५||

Upahootaah pitarah somyaaso barhishyeshu nidhishu priyeshu, Ta aa gamantu ta iha shruvantvadhi bruvantu te'vantvasmaan.५.

आच्या जानु दक्षिणतो निषद्येमं यज्ञमभि गृणीत विश्वे । मा हिंसिष्ट पितरः केन चिन्नो यद्व आगः पुरुषता कराम ॥६॥

ācyā jānu dakṣiṇato niṣadyemaṃ yajñamabhi gṛṇīta viśve | mā hiṃsiṣṭa pitaraḥ kena cinno yadva āgaḥ puruṣatā karāma ||६||

Aachyaa jaanu dakshinato nishadyemam yajnamabhi grineeta vishve, Maa hinsishta pitarah kena chinno yadva aagah purushataa karaama.६.

आसीनासो अरुणीनामुपस्थे रयिं धत्त दाशुषे मर्त्याय । पुत्रेभ्यः पितरस्तस्य वस्वः प्र यच्छत त इहोर्जं दधात ॥७॥

āsīnāso aruṇīnāmupasthe rayiṃ dhatta dāśuṣe martyāya | putrebhyaḥ pitarastasya vasvaḥ pra yacchata ta ihorjaṃ dadhāta ||७||

Aaseenaaso aruneenaamupasthe rayim dhatta daashushe martyaaya, Putrebhyah pitarastasya vasvah pra yachchhhata ta ihorjam dadhaata.७.

ये नः पूर्वे पितरः सोम्यासोऽनूहिरे सोमपीथं वसिष्ठाः । तेभिर्यमः संरराणो हवींष्युशन्नुशद्भिः प्रतिकाममत्तु ॥८॥

ye naḥ pūrve pitaraḥ somyāso'nūhire somapīthaṃ vasiṣṭhāḥ | tebhiryamaḥ saṃrarāṇo havīṃṣyuśannuśadbhiḥ pratikāmamattu ||८||

Ye nah poorve pitarah somyaaso'noohire somapeetham vasishthaah, Tebhiryamah sanraraano haveenshyushannushadbhih pratikaamamattu.८.

ये तातृषुर्देवत्रा जेहमाना होत्राविदः स्तोमतष्टासो अर्कैः । आग्ने याहि सुविदत्रेभिरर्वाङ्सत्यैः कव्यैः पितृभिर्घर्मसद्भिः ॥९॥

ye tātṛṣurdevatrā jehamānā hotrāvidaḥ stomataṣṭāso arkaiḥ | āgne yāhi suvidatrebhirarvāṅsatyaiḥ kavyaiḥ pitṛbhirgharmasadbhiḥ ||९||

Ye taatrishurdevatraa jehamaanaa hotraavidah stomatashtaaso arkaih, Aagne yaahi suvidatrebhirarvaansatyaih kavyaih pitribhirgharmasadbhih.९.

ये सत्यासो हविरदो हविष्पा इन्द्रेण देवैः सरथं दधानाः । आग्ने याहि सहस्रं देववन्दैः परैः पूर्वैः पितृभिर्घर्मसद्भिः ॥१०॥

ye satyāso havirado haviṣpā indreṇa devaiḥ sarathaṃ dadhānāḥ | āgne yāhi sahasraṃ devavandaiḥ paraiḥ pūrvaiḥ pitṛbhirgharmasadbhiḥ ||१०||

Ye satyaaso havirado havishpaa indrena devaih saratham dadhaanaah, Aagne yaahi sahasram devavandaih paraih poorvaih pitribhirgharmasadbhih.१०.

अग्निष्वात्ताः पितर एह गच्छत सदःसदः सदत सुप्रणीतयः । अत्ता हवींषि प्रयतानि बर्हिष्यथा रयिं सर्ववीरं दधातन ॥११॥

agniṣvāttāḥ pitara eha gacchata sadaḥsadaḥ sadata supraṇītayaḥ | attā havīṃṣi prayatāni barhiṣyathā rayiṃ sarvavīraṃ dadhātana ||११||

Agnishvaattaah pitara eha gachchhhata sadahsadah sadata supraneetayah, Attaa haveenshi prayataani barhishyathaa rayim sarvaveeram dadhaatana.११.

त्वमग्न ईळितो जातवेदोऽवाड्ढव्यानि सुरभीणि कृत्वी । प्रादाः पितृभ्यः स्वधया ते अक्षन्नद्धि त्वं देव प्रयता हवींषि ॥१२॥

tvamagna īḷito jātavedo'vāḍḍhavyāni surabhīṇi kṛtvī | prādāḥ pitṛbhyaḥ svadhayā te akṣannaddhi tvaṃ deva prayatā havīṃṣi ||१२||

Tvamagna eelito jaatavedo'vaaddhavyaani surabheeni kritvee, Praadaah pitribhyah svadhayaa te akshannaddhi tvam deva prayataa haveenshi.१२.

ये चेह पितरो ये च नेह याँश्च विद्म याँ उ च न प्रविद्म । त्वं वेत्थ यति ते जातवेदः स्वधाभिर्यज्ञं सुकृतं जुषस्व ॥१३॥

ye ceha pitaro ye ca neha yām̐śca vidma yām̐ u ca na pravidma | tvaṃ vettha yati te jātavedaḥ svadhābhiryajñaṃ sukṛtaṃ juṣasva ||१३||

Ye cheha pitaro ye cha neha yaanshcha vidma yaan u cha na pravidma, Tvam vettha yati te jaatavedah svadhaabhiryajnam sukritam jushasva.१३.

ये अग्निदग्धा ये अनग्निदग्धा मध्ये दिवः स्वधया मादयन्ते । तेभिः स्वराळसुनीतिमेतां यथावशं तन्वं कल्पयस्व ॥१४॥

ye agnidagdhā ye anagnidagdhā madhye divaḥ svadhayā mādayante | tebhiḥ svarāḷasunītimetāṃ yathāvaśaṃ tanvaṃ kalpayasva ||१४||

Ye agnidagdhaa ye anagnidagdhaa madhye divah svadhayaa maadayante, Tebhih svaraalasuneetimetaam yathaavasham tanvam kalpayasva.१४.

उच्चारण मार्गदर्शन: यह वैदिक सूक्त है। यहाँ पाठ बिना स्वर-चिह्नों के दिया है; उदात्त-अनुदात्त-स्वरित के साथ सस्वर पाठ परंपरा में गुरु से ही सीखा जाता है। "पितॄन्" में दीर्घ ॠ, "स्वराळ्" में वैदिक ळ, और "सुविदत्राँ", "याँश्च" में अनुनासिक (चंद्रबिंदु) स्पष्ट रखें। जो सस्वर पाठ न जानते हों, वे अर्थ समझते हुए शांत, स्पष्ट पाठ या श्रवण करें।

शब्द-अर्थ (Word-by-Word)

पितरःपितर — दिवंगत पूर्वज
सोम्यासःसोम के अधिकारी, सौम्य
ऋतज्ञाःऋत (सत्य-नियम) को जानने वाले
बर्हिषदःकुश (बर्हि) पर बैठने वाले
स्वधापितरों को अर्पित अन्न / अर्पण का शब्द
अग्निष्वात्ताःपितरों का एक वर्ग — अग्नि द्वारा आस्वादित
जातवेदःहे जातवेदा — सब जन्मे हुओं को जानने वाले अग्नि
कव्यपितरों को अर्पित हवि
असुनीतिप्राण-लोक, आत्मा की गति

अर्थ (हिन्दी)

  1. नीचे, ऊपर और मध्य लोकों में रहने वाले, सोम के अधिकारी पितर (हमारी ओर) उठें। जो प्राण-लोक (आत्मा के जीवन) को पा चुके हैं, जो कोमल और ऋत (सत्य-नियम) को जानने वाले हैं — वे पितर पुकारने पर हमारी रक्षा करें।
  2. आज यह नमस्कार उन पितरों को हो, जो पहले चले गए और जो उनके बाद गए; जो पृथ्वी-लोक में बसे हैं, और जो अब उत्तम प्रजाओं के बीच रहते हैं।
  3. मैंने कृपालु पितरों को पा लिया है, और विष्णु से वंश की संतति और उनका विक्रम भी। जो कुश पर बैठकर स्वधा के साथ सोमरस का भाग लेते हैं, वे यहाँ बार-बार आएँ।
  4. हे कुश पर बैठने वाले पितरो! हमारी सहायता के लिए आओ; ये हवियाँ हमने तुम्हारे लिए तैयार की हैं, इन्हें स्वीकार करो। अपनी सबसे कल्याणकारी कृपा के साथ आओ, और हमें बिना किसी कष्ट के सुख और आरोग्य दो।
  5. सोम के योग्य पितर कुश पर रखी अपनी प्रिय हवियों के लिए बुलाए गए हैं। वे यहाँ आएँ, हमारी बात सुनें, हमारे पक्ष में बोलें और हमारी रक्षा करें।
  6. हे पितरो! घुटने मोड़कर, दक्षिण दिशा में बैठकर तुम सब हमारे इस यज्ञ को प्रेम से स्वीकार करो। मनुष्य होने के कारण हमसे तुम्हारे प्रति जो भी भूल हुई हो, उस पर हमसे रुष्ट न होना।
  7. लाल-सुनहरी उषाओं की गोद में बैठे हुए तुम हवि देने वाले मनुष्य को धन दो। हे पितरो! अपने पुत्रों को उस धन का भाग दो, और यहाँ उपस्थित होकर उन्हें बल दो।
  8. हमारे जो प्राचीन पितर सोम के अधिकारी हैं, और जो श्रेष्ठ पितर सोमपान के लिए आए — उनके साथ प्रसन्न यम, उन्हीं की तरह चाह रखते हुए, हमारी हवियाँ अपनी इच्छा से ग्रहण करें।
  9. हे अग्नि! उन कृपालु, सच्चे, कव्य-भोजी पितरों के साथ हमारे पास आओ, जो प्रकाश में रहते हैं; जो देवताओं के बीच (हवि के लिए) प्यासे रहे, जो यज्ञ-विधि के ज्ञाता हैं और स्तुतियों से प्रशंसित हैं।
  10. हे अग्नि! हज़ारों प्राचीन पितरों के साथ आओ — जो प्रकाश में रहने वाले, आदि-काल के, देवताओं की वंदना करने वाले, हवि खाने-पीने वाले और सत्यवादी हैं, और जो इन्द्र व देवताओं के साथ एक रथ में चलते हैं।
  11. हे अग्निष्वात्त पितरो! यहाँ आओ, और हे उत्तम मार्गदर्शको, अपने-अपने आसन पर बैठो। कुश पर रखी हुई हवियाँ ग्रहण करो, और हमें वीर संतानों से भरा धन दो।
  12. हे जातवेदा अग्नि! प्रार्थना किए जाने पर तुमने हवियों को सुगंधित करके पहुँचाया और स्वधा के साथ पितरों को दिया; उन्होंने उन्हें ग्रहण किया। हे देव! अब तुम भी हमारी अर्पित हवियाँ ग्रहण करो।
  13. हे जातवेदा! जो पितर यहाँ हैं और जो यहाँ नहीं हैं, जिन्हें हम जानते हैं और जिन्हें नहीं जानते — वे कितने हैं, यह तुम जानते हो। स्वधा के साथ भली-भाँति तैयार किए गए इस यज्ञ को स्वीकार करो।
  14. जिनका दाह-संस्कार अग्नि से हुआ और जिनका नहीं हुआ, जो आकाश के बीच स्वधा से आनंदित होते हैं — हे स्वराट् (स्वामी), उनके साथ यह प्राण-लोक और उनका शरीर अपनी इच्छा के अनुसार रचो।

लाभ

  • पितरों के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने का सबसे प्राचीन वैदिक रूप है।
  • जाने-अनजाने सब पितरों का स्मरण इसमें है (ऋचा 13) — कोई छूटे नहीं, यह भाव।
  • भूलों की क्षमा-याचना (ऋचा 6) मन का भार हल्का करने वाली मानी जाती है।
  • श्राद्ध, अष्टका और पिण्डपितृयज्ञ में परंपरा से इसकी ऋचाएँ प्रयुक्त होती हैं।

अनुशंसित जप संख्या

जप संख्या: प्रतिदिन 1 बार (एक माला)।

माला: — (सूक्त-पाठ)

उत्तम समय: श्राद्ध-काल (दोपहर बाद, अपराह्न)

जप का उत्तम समय

पितृ पक्ष में श्राद्ध के समयश्राद्ध में ब्राह्मण-भोजन के समय (नारद पुराण 1.28)अमावस्या के पितृ-कर्म मेंपूर्वजों की पुण्यतिथि पर

जप विधि (चैंटिंग मेथड)

स्नान करके, शांत मन से पितरों का स्मरण करते हुए पाठ करें। वैदिक कर्मकांड में इसकी ऋचाएँ होम और श्राद्ध के विशेष अवसरों पर पुरोहित के मार्गदर्शन में पढ़ी जाती हैं। घर पर स्मरण के लिए अर्थ-सहित एक बार शांत पाठ या श्रवण पर्याप्त है — संख्या से अधिक महत्व भाव का है।

प्रामाणिकता व स्रोत

स्थिति✓ संपूर्ण
मूल ग्रंथऋग्वेद, मण्डल 10, सूक्त 15
स्रोत परंपराऋग्वेद 10.15 (संस्कृत विकिस्रोत — संहिता व सस्वर पाठ) · अथर्ववेद 18.1, 18.3 · शुक्ल यजुर्वेद 19 (मिलान) · सायण-भाष्य · आश्वलायन गृह्यसूत्र 2.4.6 · नारद पुराण 1.28 · R. T. H. Griffith, The Hymns of the Rigveda (1896)
रचयिताशङ्ख यामायन (ऋषि)
अंतिम अद्यतनजून 2026

पितृ सूक्त (ऋग्वेद 10.15) — सामान्य प्रश्न

संबंधित पर्व व व्रत