तर्पण क्या है
तर्पण का अर्थ है तृप्त करना। यानी जल अर्पित करके यह भाव रखना कि जिनके लिए यह किया जा रहा है, वे तृप्त हों।
यह श्राद्ध का एक अंग है। पूरे श्राद्ध में तर्पण, पिंडदान और भोजन — तीनों आते हैं, और तर्पण प्रायः अंत में किया जाता है।
तर्पण अकेले भी किया जा सकता है, और यही कारण है कि यह सबसे अधिक निभाया जाने वाला कर्म है। पूरी विधि न हो पाए, तब भी लोग जल तो दे ही देते हैं।
तर्पण किसे दिया जाता है
यहाँ एक बात अक्सर छूट जाती है। तर्पण केवल पितरों का नहीं होता — यह तीन को दिया जाता है।
- देव तर्पण — देवताओं के निमित्त।
- ऋषि तर्पण — ऋषियों के निमित्त।
- पितृ तर्पण — पूर्वजों के निमित्त। पितृ पक्ष में मुख्यतः यही किया जाता है।
तीनों के लिए हाथ की मुद्रा अलग बताई गई है। उस पर स्रोत एकमत नहीं हैं — नीचे देखिए।
सामग्री और दिशा
तर्पण में जो चाहिए, वह बहुत थोड़ा है — और यही इसकी ख़ूबी है।
| सामग्री | भूमिका |
|---|---|
| जल | मुख्य अर्पण |
| काले तिल | पितृ-तर्पण के जल में डाले जाते हैं |
| जौ | जल में; कुछ परंपराओं में देव-तर्पण के लिए |
| कुश (दर्भ) | हाथ में पवित्री के रूप में |
पितृ-तर्पण दक्षिण दिशा की ओर मुख करके किया जाता है। तिल सहित किए जाने वाले तर्पण को तिल-तर्पण कहते हैं।
हाथ की मुद्रा — यहाँ स्रोत अलग-अलग कहते हैं
तर्पण में जल हाथ के किस हिस्से से छोड़ा जाए — इसे तीर्थ कहते हैं, और हर वर्ग के लिए अलग तीर्थ बताया गया है।
पर यहाँ हम आपसे सीधे कह देना चाहते हैं: इस विवरण पर स्रोत एकमत नहीं हैं।
| तीर्थ | एक विवरण | दूसरा विवरण |
|---|---|---|
| पितृ तीर्थ | बाएँ हाथ की हथेली के बाईं ओर व अंगूठे से | अंगूठे और तर्जनी के बीच से |
| ऋषि तीर्थ | दोनों हथेलियों के बीच से | कनिष्ठा की जड़ की ओर से |
| देव तीर्थ | अंगूठे को छोड़कर अंगुलियों के अग्र भाग से | लगभग यही |
कुश की पवित्री किस अंगुली में पहनी जाए — इस पर भी विवरण अलग-अलग मिलते हैं।
तो फिर क्या करें
अगर आपने दो जगह दो अलग बातें पढ़ी हैं, तो आपकी उलझन जायज़ है। दोनों जगह ग़लत नहीं लिखा — परंपराएँ सचमुच अलग हैं।
ऐसे में सबसे अच्छा यही है कि अपने परिवार में जो चला आ रहा है, वही कीजिए। और कोई परंपरा याद न हो तो किसी जानकार या पुरोहित से पूछ लीजिए।
हम यहाँ कोई एक मुद्रा नियम बनाकर नहीं लिख रहे, क्योंकि हमारे सामने के स्रोत एक बात नहीं कहते। जो पक्का है वही ऊपर लिखा है — जल, काले तिल, कुश और दक्षिण दिशा।
और यह याद रखिए कि इस कर्म का नाम ही श्रद्धा से जुड़ा है। भाव सही हो तो रास्ता निकल आता है।
तर्पण कब किया जाता है
पितृ पक्ष के दिनों में तो किया ही जाता है, पर केवल तभी नहीं।
- पितृ पक्ष के दिनों में, श्राद्ध के साथ।
- हर अमावस्या को — परंपरा में यह पितरों का दिन है।
- संक्रांति के दिनों पर।
- ग्रहण के समय भी इसका विधान बताया गया है।
दिन में समय दोपहर का है। कुतुप व रोहिण मुहूर्त के बाद अपराह्न काल मुख्य माना जाता है, और तर्पण प्रायः श्राद्ध के अंत में होता है।
