मूल नियम — मृत्यु की तिथि
नियम एक ही है, और आसान है। जिस तिथि को किसी का देहांत हुआ, हर साल पितृ पक्ष में उसी तिथि पर उनका श्राद्ध होता है।
ध्यान रखने की बात यह है कि यह तिथि से चलता है, अंग्रेज़ी तारीख़ से नहीं। मान लीजिए किसी का देहांत कृष्ण पक्ष की सप्तमी को हुआ था। तो उनका श्राद्ध हर साल पितृ पक्ष की सप्तमी को होगा, अंग्रेज़ी तारीख़ चाहे कोई भी पड़े।
इसीलिए हर साल तारीख़ बदलती रहती है। यह गड़बड़ी नहीं है — पंचांग ऐसे ही चलता है।
मृत्यु किस पक्ष में हुई थी, यह भी देख लीजिए। शुक्ल पक्ष की सप्तमी और कृष्ण पक्ष की सप्तमी अलग तिथियाँ हैं।
तिथि याद न हो तो क्या करें
यह सवाल सबसे ज़्यादा पूछा जाता है, और इसका जवाब सीधा है। अगर मृत्यु की तिथि मालूम नहीं, तो सर्वपितृ अमावस्या पर श्राद्ध कीजिए।
यह पितृ पक्ष का आख़िरी दिन है और परंपरा में इसे सब पितरों का दिन कहा गया है। जिनकी तिथि मालूम नहीं, जिनका कोई दिन छूट गया, और जिनके लिए अलग से कुछ नहीं हो पाया — सबके लिए यही दिन रखा गया है।
तो इस बात की चिंता मत कीजिए। पुराने समय में भी सबको हर तिथि याद नहीं रहती थी, इसीलिए यह रास्ता रखा गया।
विशेष तिथियाँ — किसके लिए
कुछ तिथियाँ ख़ास परिस्थितियों के लिए बताई गई हैं। इनमें दो दिन तिथि से नहीं, नक्षत्र से तय होते हैं — इसीलिए वे किसी तिथि-श्राद्ध के साथ एक ही दिन आ सकते हैं।
| दिन | किसके लिए |
|---|---|
| पूर्णिमा श्राद्ध | पितृ पक्ष का पहला दिन; जिनका देहांत पूर्णिमा को हुआ |
| महा भरणी | भरणी नक्षत्र वाला दिन — परंपरा में विशेष फलदायी माना जाता है |
| मध्याष्टमी | अष्टमी का दिन, महा भरणी के समान महत्व बताया गया है |
| अविधवा नवमी | वे स्त्रियाँ जो सुहागिन रहते इस संसार से गईं |
| यति / संन्यासी द्वादशी | जिन्होंने संन्यास लिया था; परंपरा में बालकों के लिए भी |
| मघा श्राद्ध | मघा नक्षत्र वाला दिन — मघा का संबंध पितरों से माना गया है |
| घात चतुर्दशी | जिनकी मृत्यु अकाल हुई — दुर्घटना, शस्त्र, अग्नि, जल या विष से |
| सर्वपितृ अमावस्या | सब पितर; और वे सब जिनकी तिथि मालूम नहीं या जिनका दिन छूट गया |
महा भरणी और मघा श्राद्ध हर साल अलग तारीख़ पर पड़ते हैं, क्योंकि नक्षत्र तिथि के साथ नहीं चलता। इस वर्ष वे किस दिन हैं, यह मुख्य पृष्ठ की तालिका में देखिए।
कुछ आम परिस्थितियाँ
रोज़ के जीवन में जो सवाल सबसे ज़्यादा आते हैं, उनके जवाब ये रहे।
- माता या पिता का श्राद्ध — उसी तिथि को जिस तिथि पर उनका देहांत हुआ था। अलग से कोई विशेष दिन नहीं चाहिए।
- जो स्त्री सुहागिन रहते गईं — परंपरा में अविधवा नवमी का दिन उनके लिए बताया गया है।
- अकाल मृत्यु — दुर्घटना, आग, पानी या ज़हर से — के लिए घात चतुर्दशी का दिन है।
- संन्यासी — जिन्होंने संन्यास लिया था, उनके लिए द्वादशी का दिन बताया गया है।
- तिथि मालूम न हो — सर्वपितृ अमावस्या।
- कोई दिन छूट जाए — तब भी सर्वपितृ अमावस्या पर कर सकते हैं।
परंपराएँ जगह-जगह थोड़ी अलग हैं। अपने परिवार में जो चला आ रहा है, उसे प्राथमिकता दीजिए।
श्राद्ध कौन कर सकता है
इस पर परंपराएँ एक जैसी नहीं हैं, और हम आपसे यह सीधे कह देना चाहते हैं।
प्रचलित परंपरा यह कर्म पुत्र को देती है — प्रायः बड़े पुत्र को — या पिता-पक्ष के किसी पुरुष सदस्य को। यह बात कई स्रोतों में एक जैसी मिलती है, और यही आज सबसे अधिक निभाया जाता है।
पर यह मान लेना कि कर्म केवल पुरुषों का है, ठीक नहीं होगा। मार्कण्डेय पुराण के अध्ययन में अधिकारियों की जो सूची मिलती है, उसमें पुत्र और सपिंडों के साथ पत्नी का नाम भी है। विद्वानों का यह भी कहना है कि एकोद्दिष्ट श्राद्ध में स्त्रियाँ यह कर्म करती रही हैं।
इसके अलावा अनेक परिवारों और परंपराओं में पुत्री भी श्राद्ध करती है, विशेषकर जब पुत्र न हो। यह प्रचलन आज भी मौजूद है।
यानी दोनों बातें सच हैं — प्रचलन प्रायः पुत्र का है, और परंपरा में स्त्रियों के लिए भी जगह रही है। हम इनमें से किसी को नियम बनाकर नहीं रख रहे।
सबसे अच्छा यही रहता है कि अपने परिवार की परंपरा देख लीजिए, और किसी जानकार से पूछ लीजिए। भाव सही हो तो रास्ता निकल आता है।
