श्राद्ध में क्या बनता है
दो चीज़ें सबसे ऊपर आती हैं — हविष्य और खीर।
हविष्य वह सादा भोजन है जो पवित्र माना गया — चावल, घी में सना हुआ, प्रायः किसी सादे व्यंजन के साथ। गेहूँ और गाय का दूध भी हविष्य में गिने गए हैं।
खीर को पुराणों में पायस कहा गया है। गाय के दूध से बनी खीर का विशेष उल्लेख है।
बाक़ी भोजन घर में बना, सादा और बिना तामझाम का होता है। बड़े आयोजन इन दिनों नहीं किए जाते।
कौन से अनाज उपयुक्त कहे गए
पुराणों में जो अनाज और सामग्री उपयुक्त बताई गई है, उसमें ये आते हैं।
| सामग्री | टिप्पणी |
|---|---|
| चावल | मुख्य; हविष्य और पिंड दोनों में |
| जौ | अर्पण और भोजन दोनों में |
| गेहूँ | हविष्य में गिना गया |
| तिल | तर्पण और भोजन दोनों में |
| मूँग | उपयुक्त दालों में |
| सरसों | उपयुक्त कही गई |
| गाय का दूध व उससे बनी चीज़ें | खीर (पायस) सहित |
| जंगली व स्वतः उगे अनाज | श्यामाक, नीवार आदि — दोनों पाठों में |
क्या वर्जित कहा गया है
यह सूची ध्यान से पढ़िए, क्योंकि इसमें कुछ ऐसी चीज़ें हैं जो आजकल की सूचियों में प्रायः नहीं मिलतीं।
| वर्जित | दोनों पाठों में? |
|---|---|
| प्याज और लहसुन | हाँ — दोनों में |
| मसूर | हाँ — दोनों में |
| राजमाष | हाँ — दोनों में |
| अतिरिक्त नमक | हाँ — दोनों में |
| गाजर, कुम्हड़ा (लौकी-वर्ग) | एक-एक पाठ में |
| रात में भरा या बासी जल; दुर्गंध वाला जल | हाँ — दोनों में |
| हाल ही ब्याई गाय का दूध; भेड़, ऊँट व हिरणी का दूध | मार्कण्डेय पुराण |
ध्यान दीजिए — प्याज-लहसुन की मनाही केवल आजकल का चलन नहीं है। यह दोनों पुराण-पाठों में दर्ज है। और मसूर तथा अतिरिक्त नमक की मनाही तो आजकल की अधिकांश सूचियों से ग़ायब ही रहती है।
पंचबलि — पाँच का हिस्सा
भोजन बन जाने के बाद परंपरा में उसमें से पहले कुछ हिस्से अलग निकाले जाते हैं। इसे पंचबलि कहते हैं।
यह इस कर्म का सबसे सुंदर भाग है। भोजन पहले उनके लिए निकलता है जो माँग नहीं सकते।
- गाय का हिस्सा
- कौआ का हिस्सा
- कुत्ता का हिस्सा
- चींटी का हिस्सा
- देव का हिस्सा — कुछ परंपराओं में इसके स्थान पर ब्राह्मण का
पाँचवें हिस्से पर विवरण अलग-अलग मिलते हैं — कहीं देव, कहीं ब्राह्मण। अपने परिवार की परंपरा देख लीजिए। और कौआ न दिखे तो उसका हिस्सा किसी पक्षी के लिए रख देना ही चलन है।
आज की प्रथा
आज घरों में जो बनता है, वह प्रायः यह है — खीर, पूरी, सादी सब्ज़ी और दाल, बिना प्याज-लहसुन के।
कुछ घरों में वह व्यंजन भी बनाया जाता है जो दिवंगत को प्रिय था। यह शास्त्र में लिखा नियम नहीं, पर स्मरण का बहुत मानवीय तरीक़ा है।
और सबसे बड़ी बात वही रहती है — जो बना, उसमें से ज़रूरतमंदों का हिस्सा निकले। परंपरा में भोजन कराना ही इस पक्ष का सबसे बड़ा कर्म कहा गया है।
