विशेष दिन दो तरह के हैं
यह अंतर समझ लेने से बाक़ी सब आसान हो जाता है।
तिथि वाले दिन — जैसे नवमी, द्वादशी और चतुर्दशी। ये हर साल पितृ पक्ष में अपने क्रम पर ही आते हैं, क्योंकि पूरा पक्ष तिथियों से ही चलता है।
नक्षत्र वाले दिन — महा भरणी और मघा श्राद्ध। ये तिथि से नहीं, उस दिन चल रहे नक्षत्र से तय होते हैं। नक्षत्र तिथि के साथ नहीं चलता, इसलिए ये हर साल अलग दिन पड़ते हैं।
और इसी कारण नक्षत्र वाला दिन किसी तिथि-श्राद्ध के साथ एक ही दिन आ सकता है। यह चूक नहीं — दोनों अलग गणना से निकलते हैं।
महा भरणी
पितृ पक्ष में जिस दिन भरणी नक्षत्र पड़ता है, वह महा भरणी कहलाता है।
माध्व परंपरा के विवरण में इस दिन किए गए श्राद्ध का फल गया श्राद्ध के समान बताया गया है। यह एक मान्यता है, और हम इसे मान्यता कहकर ही रख रहे हैं।
इतना कहना पर्याप्त है कि परंपरा इस दिन को बहुत ऊँचा मानती है। जिनके लिए गया जाना संभव न हो, उनके लिए यह दिन विशेष माना जाता रहा है।
मध्याष्टमी
पक्ष की अष्टमी को मध्याष्टमी कहा गया है।
माध्व विवरण में इसे महा भरणी के समान महत्व का बताया गया है। यानी दो दिन ऐसे हैं जिन्हें परंपरा विशेष ऊँचाई देती है — एक नक्षत्र से तय, एक तिथि से।
यति (संन्यासी) द्वादशी
द्वादशी का दिन उनके लिए है जिन्होंने संन्यास लिया था।
परंपरा में इसी दिन को बालकों के लिए भी बताया गया है। दोनों में एक साझी बात है — दोनों ही गृहस्थ-क्रम से बाहर माने जाते हैं, इसलिए उनका दिन अलग रखा गया।
मघा श्राद्ध
पितृ पक्ष में जिस दिन मघा नक्षत्र पड़ता है, वह मघा श्राद्ध कहलाता है।
मघा को यह स्थान क्यों मिला — इसका उत्तर नक्षत्र में ही है। मघा नक्षत्र के देवता पितर देवता हैं। सत्ताईस नक्षत्रों में यही एक है जिसका सीधा संबंध पूर्वजों से है।
इसीलिए मघा का दिन पितृ पक्ष में अपने आप विशेष हो जाता है। यह जोड़ किसी ने बाद में नहीं बनाया — वह नक्षत्र की अपनी पहचान है।
मघा नक्षत्र पर विस्तार से /nakshatra/magha पर पढ़ सकते हैं।
घात चतुर्दशी
चतुर्दशी का दिन उनके लिए बताया गया है जिनकी मृत्यु अकाल हुई हो।
माध्व विवरण में इसमें दुर्घटना, शस्त्र, अग्नि, जल और विष जैसे कारण गिनाए गए हैं। इसे घात या घायल चतुर्दशी भी कहा जाता है।
यह दिन अलग रखा जाना अपने आप में एक संवेदनशील बात है। परंपरा ने माना कि जो अचानक चले गए, उनके लिए अलग से एक दिन होना चाहिए।
यदि किसी की मृत्यु स्वाभाविक रूप से चतुर्दशी तिथि को हुई हो, तो उनका श्राद्ध भी अपनी तिथि पर ही होता है। इस पर अपने पुरोहित से पूछ लेना बेहतर है।
और अंत में सर्वपितृ अमावस्या
ऊपर के किसी दिन में आपकी स्थिति न आती हो, या कोई दिन छूट जाए। तो पक्ष का अंतिम दिन सबके लिए है।
सर्वपितृ अमावस्या पर उन सब का श्राद्ध किया जा सकता है जिनकी तिथि मालूम नहीं, और जिनका कोई दिन रह गया।
