समय
30 सेकंड
जप संख्या
108
कठिनाई
सरल
शुभ दिन
सोमवार, प्रदोष व महाशिवरात्रि
उद्देश्य:आरोग्य व दीर्घायु (Health)रक्षा (Protection)संकट मोचन (Relief from Crisis)
✓ संपूर्ण साधना मंत्र
ॐ मृत्युञ्जय महादेव त्राहि मां शरणागतम् — यह शिव का साधना मंत्र है, जिसमें साधक जन्म, मृत्यु, जरा, रोग और कर्म-बंधन से पीड़ित होकर शरण माँगता है। यह महामृत्युञ्जय स्तोत्रम् का श्लोक है और ऋग्वेद वाली “त्र्यम्बकं यजामहे” ऋचा से भिन्न है।
FAQ
ॐ मृत्युञ्जय महादेव — शिव साधना मंत्र — सामान्य प्रश्न
नहीं। महामृत्युंजय मंत्र ऋग्वेद 7.59.12 की "ॐ त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम्…" ऋचा है — एक वैदिक मंत्र। यह उससे भिन्न, महामृत्युञ्जय स्तोत्रम् का श्लोक है। नाम की समानता से दोनों को एक मान लेना बहुत आम भूल है; इस संग्रह में दोनों के अलग पृष्ठ हैं।
"हे मृत्यु को जीतने वाले महादेव, मेरी रक्षा कीजिए — मैं आपकी शरण में हूँ। मैं जन्म, मृत्यु, बुढ़ापा और रोग से पीड़ित हूँ, तथा कर्म-बंधनों में जकड़ा हूँ।" इसमें साधक वरदान नहीं, केवल शरण माँगता है।
चार पीड़ाएँ और एक बंधन — जन्म, मृत्यु, जरा (बुढ़ापा) और रोग; तथा कर्म-बंधन। परंपरा में इन्हें मनुष्य-जीवन की मूल पीड़ाएँ माना जाता है।
परंपरा में सोमवार, प्रदोष काल और महाशिवरात्रि विशेष माने जाते हैं। रोग, शल्य-चिकित्सा या संकट के समय स्वयं या परिजन के लिए पाठ प्रचलित है, और महामृत्युंजय जप के साथ पूरक प्रार्थना के रूप में भी।
परंपरा में इस मंत्र का जप 108 बार — अर्थात एक माला — करने का विधान कहा जाता है, और इसके लिए रुद्राक्ष माला का प्रयोग बताया जाता है। जप का सुझाया गया समय प्रातः व प्रदोष काल है। संख्या से अधिक महत्व नियमितता तथा शुद्ध उच्चारण का माना गया है — प्रतिदिन एक माला, बीच-बीच में छोड़कर की गई अधिक संख्या से श्रेष्ठ कही जाती है।
यह साधना मंत्र है, सामान्य नाम-जप नहीं। परंपरा में इस श्रेणी के मंत्रों के लिए गुरु-दीक्षा को श्रेष्ठ माना गया है, क्योंकि इनमें उच्चारण, संख्या तथा नियम का विशेष विधान बताया जाता है। जिन्हें दीक्षा प्राप्त न हो, उनके लिए परंपरा इष्ट के नाम-जप, स्तुति व आरती का मार्ग सुझाती है — वह सर्वथा खुला कहा गया है।
"मृत्युञ्जय" में ऋ-कार और "ञ्ज" संयुक्ताक्षर दोनों हैं — इसे "मृत्युंजय" (अनुस्वार सहित) लिखना भी प्रचलित है और उच्चारण एक ही है। परंपरा में कहा जाता है कि मंत्र-जप में शुद्ध उच्चारण का विशेष महत्व है, इसलिए आरंभ में धीरे-धीरे व स्पष्ट बोलकर अभ्यास करें और गति बाद में बढ़ाएँ।
पर्व
