FAQ
प्रदोष व्रत — सामान्य प्रश्न
प्रदोष व्रत त्रयोदशी तिथि, शुक्ल व कृष्ण पक्ष, प्रत्येक माह को मनाया जाता है। यह पर्व वर्ष में एक से अधिक बार आता है। सटीक तिथि हर वर्ष पंचांग के अनुसार बदलती है — इसी संग्रह का पंचांग पृष्ठ देखें।
प्रदोष व्रत त्रयोदशी तिथि को भगवान शिव की आराधना का दिन है और यह प्रत्येक माह दो बार — शुक्ल तथा कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी को — आता है। "प्रदोष काल" अर्थात् सूर्यास्त के आसपास का समय, जो शिव-पूजन हेतु सर्वाधिक शुभ माना जाता है। इस व्रत की विशेषता यही है कि इसका पूजन दिन में नहीं, अपितु संध्या के प्रदोष काल में किया जाता है।
प्रदोष व्रत मुख्यतः श्री शिव की आराधना का पर्व माना जाता है। इसी पृष्ठ पर उनसे जुड़े आरती, चालीसा व मंत्र भी दिए गए हैं।
परंपरा में इस दिन दिनभर उपवास तथा प्रदोष काल में शिव पूजन, शिवलिंग पर जल, कच्चा दूध व पंचामृत से अभिषेक, बेलपत्र, धतूरा, आक व सफेद पुष्प का अर्पण, शिव चालीसा, प्रदोष व्रत कथा व आरती पाठ का विधान बताया जाता है। ये परंपरागत मान्यताएँ हैं; क्षेत्र और परिवार के अनुसार विधि में अंतर मिलता है।
हाँ। प्रदोष व्रत से जुड़ी व्रत कथा इसी संग्रह में उपलब्ध है और इस पृष्ठ से जुड़ी हुई है। कथा हिन्दी, IAST व रोमन तीनों लिपियों में पढ़ी जा सकती है।
अनुशंसित पाठ
प्रदोष व्रत के लिए अनुशंसित आरती, चालीसा, मंत्र व स्तोत्र
आराध्य देव
