प्रदोष व्रत का उद्भव
स्कंद पुराण के अनुसार जब देवताओं व असुरों ने मिलकर समुद्र-मंथन किया, तो उसमें से चौदह रत्न निकले। किंतु अमृत से पूर्व समुद्र से "हलाहल" नामक भयंकर विष प्रकट हुआ, जिसकी ज्वाला से तीनों लोक जलने लगे।
व्याकुल देवता व असुर — दोनों भगवान शिव की शरण में गए। करुणामय शिव ने समस्त सृष्टि की रक्षा हेतु वह विष स्वयं ग्रहण कर लिया और उसे कंठ में ही रोक लिया, जिससे उनका कंठ नीला पड़ गया — तभी से वे "नीलकंठ" कहलाए।
मान्यता है कि यह घटना त्रयोदशी तिथि के प्रदोष काल में घटी। इसी उपकार के लिए देवताओं ने उसी संध्या-काल में भगवान शिव की स्तुति व पूजन किया — और तभी से प्रदोष काल में शिव-आराधना की परंपरा चली।
यह भी कहा जाता है कि प्रदोष काल में भगवान शिव कैलाश पर्वत पर आनंदमग्न होकर नृत्य करते हैं और समस्त देवगण उनकी स्तुति गाते हैं। इसीलिए इस काल में की गई प्रार्थना शीघ्र स्वीकार होती है।
विक्रमपुर की विधवा ब्राह्मणी
स्कंद पुराण में वर्णित कथा के अनुसार प्राचीन काल में विक्रमपुर नाम के नगर में एक ब्राह्मण परिवार रहता था। अकस्मात् उस परिवार के मुखिया की मृत्यु हो गई और उसकी पत्नी विधवा हो गई।
उसके पास जीविका का कोई साधन न था। वह अपने छोटे पुत्र को साथ लेकर प्रतिदिन नगर में भिक्षा माँगती और उसी से दोनों का पेट पालती। कठिन दिन थे, किंतु उसने अपनी श्रद्धा व सदाचार नहीं छोड़ा।
एक संध्या भिक्षा लेकर लौटते समय उसने नदी-तट पर एक घायल युवक को पीड़ा से तड़पते देखा। उसका हृदय करुणा से भर गया। वह उसे अपने घर ले आई, उसकी सेवा-सुश्रुषा की और अपने ही पुत्र के समान वात्सल्य से उसका पालन करने लगी।
वह युवक वस्तुतः विदर्भ का राजकुमार धर्मगुप्त था — किंतु ब्राह्मणी को उसके राजवंशी होने का कोई ज्ञान न था।
ऋषि शांडिल्य का रहस्योद्घाटन
कुछ समय पश्चात एक दिन वह ब्राह्मणी दोनों बालकों को साथ लेकर मंदिर गई। वहाँ उसकी भेंट महर्षि शांडिल्य से हुई।
ऋषि ने धर्मगुप्त को देखकर अपनी दिव्य दृष्टि से उसका सारा अतीत जान लिया और ब्राह्मणी को बताया — "हे देवी! यह बालक साधारण नहीं है। यह विदर्भ देश के राजा का पुत्र धर्मगुप्त है।"
"शत्रुओं ने आक्रमण कर इसके राज्य पर अधिकार कर लिया। युद्ध में इसके पिता वीरगति को प्राप्त हुए और माता पुत्र-शोक व वियोग में प्राण त्याग बैठीं। यह राजकुमार राज्य से निकाला जाकर अनाथ भटक रहा था — तब तूने इसे आश्रय दिया।"
ब्राह्मणी की आँखें भर आईं। उसने विनम्रता से पूछा — "हे महर्षि! हम तीनों दुःख के भार से दबे हैं। कोई ऐसा उपाय बताइए जिससे यह संकट दूर हो।"
महर्षि शांडिल्य बोले — "हे देवी! तुम प्रदोष व्रत करो। प्रत्येक त्रयोदशी को उपवास रखकर प्रदोष काल में भगवान शिव की आराधना करो। भगवान शंकर आशुतोष हैं — वे शीघ्र प्रसन्न होते हैं और तुम्हारे समस्त दुःखों का नाश करेंगे।"
तीनों का प्रदोष व्रत
ब्राह्मणी ने महर्षि के वचन को शिरोधार्य किया। उसने नियमपूर्वक प्रदोष व्रत आरंभ किया और उसके साथ दोनों बालक — उसका अपना पुत्र तथा राजकुमार धर्मगुप्त — भी श्रद्धापूर्वक व्रत करने लगे।
तीनों प्रत्येक त्रयोदशी को उपवास रखते, प्रदोष काल में शिवलिंग का अभिषेक करते, बेलपत्र अर्पित करते और "ॐ नमः शिवाय" का जप करते।
दरिद्रता के बीच भी उनकी श्रद्धा अटूट रही और धीरे-धीरे भगवान शिव की कृपा का प्रभाव प्रकट होने लगा।
गंधर्व कन्या अंशुमती से भेंट
एक दिन दोनों बालक वन में विहार कर रहे थे। वहाँ उन्हें कुछ गंधर्व कन्याएँ दिखाई दीं। ब्राह्मणी का पुत्र भयभीत होकर घर लौट आया, किंतु राजकुमार धर्मगुप्त वहीं रुक गया।
उन कन्याओं में अंशुमती नाम की एक अत्यंत रूपवती गंधर्व-कन्या थी। धर्मगुप्त से उसका वार्तालाप हुआ और दोनों एक-दूसरे के प्रति आकृष्ट हो गए।
अंशुमती ने अपने पिता — गंधर्वराज — से इस भेंट की चर्चा की। गंधर्वराज स्वयं धर्मगुप्त के समक्ष प्रकट हुए और उसका तेज देखकर पहचान लिया कि यह कोई साधारण युवक नहीं, अपितु राजवंशी है।
उसी रात्रि भगवान शिव ने गंधर्वराज को स्वप्न में दर्शन देकर आदेश दिया — "यह विदर्भ का राजकुमार धर्मगुप्त है और मेरा भक्त है। तुम अपनी पुत्री अंशुमती का विवाह इसी से करो।"
राज्य की पुनर्प्राप्ति
भगवान शिव की आज्ञा शिरोधार्य करते हुए गंधर्वराज ने विधिपूर्वक अपनी पुत्री अंशुमती का विवाह राजकुमार धर्मगुप्त से कर दिया।
तत्पश्चात गंधर्वराज ने अपनी विशाल गंधर्व-सेना धर्मगुप्त को सौंप दी। उस सेना की सहायता से धर्मगुप्त ने शत्रुओं पर आक्रमण कर उन्हें पराजित किया और अपना विदर्भ राज्य पुनः प्राप्त कर लिया।
राजा बनने पर धर्मगुप्त ने उस उपकार को नहीं भुलाया जो उस निर्धन ब्राह्मणी ने उस पर किया था। उसने ब्राह्मणी को माता का सम्मान दिया और उसके पुत्र को अपना प्रधानमंत्री नियुक्त किया।
इस प्रकार प्रदोष व्रत के प्रभाव से तीनों के दुःख दूर हुए — ब्राह्मणी की दरिद्रता समाप्त हुई, उसके पुत्र को उच्च पद मिला और राजकुमार धर्मगुप्त को पत्नी तथा खोया राज्य — दोनों प्राप्त हुए।
कथा का सार यह है कि प्रदोष व्रत श्रद्धा से करने पर भगवान शिव दरिद्रता, संकट, शत्रु-बाधा व दुखों का नाश कर सुख-समृद्धि प्रदान करते हैं। साथ ही यह कथा यह भी सिखाती है कि एक अपरिचित की निःस्वार्थ सेवा ही आगे चलकर उस ब्राह्मणी के उद्धार का कारण बनी।
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