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लिपि:
॥ श्री ॥
करचरणकृतं — शिव क्षमा प्रार्थना
स्तोत्रम् · श्री शिव
पाठ
1
करचरणकृतं वाक्कायजं कर्मजं वा श्रवणनयनजं वा मानसं वापराधम्। विहितमविहितं वा सर्वमेतत्क्षमस्व जय जय करुणाब्धे श्रीमहादेव शम्भो॥
अर्थ (हिन्दी)
- हाथ-पैर से किया गया, वाणी व शरीर से हुआ, कर्म से हुआ, अथवा कानों-आँखों या मन से हुआ — मुझसे जो भी अपराध हुआ हो; विहित हो या अविहित — हे करुणा के सागर, श्री महादेव शम्भो, यह सब क्षमा कीजिए। आपकी जय हो, जय हो।
लाभ
- पूजा-पाठ में रह गई विधि-त्रुटियों की क्षमा-याचना का पारंपरिक श्लोक है।
- मन से अपराध-बोध व ग्लानि का भार हल्का होने की मान्यता है।
- विनम्रता व समर्पण-भाव जगाने वाला माना जाता है।
- किसी भी शिव-पूजा, व्रत या पाठ के समापन पर उपयुक्त कहा गया है।
कब करें पाठ
किसी भी पूजा, व्रत या पाठ के अंत में · प्रातः-संध्या नित्य वंदन के समापन पर · महाशिवरात्रि व सोमवार व्रत के अंत में · भूल या अपराध-बोध के समय
स्रोत
रचयिता: आदि शंकराचार्य. शिवापराधक्षमापन स्तोत्रम् — आदि शंकराचार्य · पारंपरिक पूजा-समापन क्षमा प्रार्थना परंपरा
