शिव तांडव स्तोत्रम्

śiva tāṇḍava stotram

Shiv Tandav Stotram

समय
6–8 मिनट
श्लोक
16
कठिनाई
कठिन (Advanced)
शुभ दिन
सोमवार, प्रदोष व महाशिवरात्रि
उद्देश्य:ऊर्जा (Energy)भय नाश (Fearlessness)भक्ति (Devotion)
✓ संपूर्ण (16/16 श्लोक)

परिचय

महादेव शिव त्रिदेवों में संहारक और कल्याणकारी देव हैं — योग, ध्यान और मोक्ष के अधिपति।

स्रोत: लंकापति रावण कृत — सम्पूर्ण 16 श्लोक

उद्भव / पृष्ठभूमि

शिव तांडव स्तोत्र की रचना लंकापति रावण ने की थी, जो शिव के परम भक्त एवं प्रकांड विद्वान थे। मान्यता है कि जब रावण ने कैलाश पर्वत उठाने का प्रयास किया, तब शिव ने अपने अंगूठे से पर्वत दबाया; पीड़ा से मुक्ति हेतु रावण ने इस स्तोत्र की रचना कर शिव की स्तुति की।

यह स्तोत्र शार्दूलविक्रीडित/पंचचामर जैसे ओजपूर्ण छंदों में रचित है और इसकी लयबद्ध ध्वनि शिव के तांडव नृत्य का भाव जागृत करती है।

संपूर्ण स्तोत्र

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जटाटवीगलज्जलप्रवाहपावितस्थले गलेऽवलम्ब्य लम्बितां भुजङ्गतुङ्गमालिकाम्। डमड्डमड्डमड्डमन्निनादवड्डमर्वयं चकार चण्डताण्डवं तनोतु नः शिवः शिवम्॥

जिनकी जटारूपी वन से प्रवाहित गंगाजल से पवित्र हुए कंठ में लम्बी सर्पमाला लटक रही है, और जो डमरू की डमड्-डमड् ध्वनि के साथ प्रचंड तांडव करते हैं — वे शिव हमारा कल्याण करें।

जटाकटाहसम्भ्रमभ्रमन्निलिम्पनिर्झरी विलोलवीचिवल्लरीविराजमानमूर्धनि। धगद्धगद्धगज्ज्वलल्ललाटपट्टपावके किशोरचन्द्रशेखरे रतिः प्रतिक्षणं मम॥

जिनके मस्तक पर वेगवती गंगा की लहरें सुशोभित हैं और जिनके ललाट पर धधकती अग्नि प्रज्वलित है — ऐसे बाल-चंद्र को धारण करने वाले शिव में मेरा अनुराग प्रतिक्षण बना रहे।

धराधरेन्द्रनन्दिनीविलासबन्धुबन्धुर स्फुरद्दिगन्तसन्ततिप्रमोदमानमानसे। कृपाकटाक्षधोरणीनिरुद्धदुर्धरापदि क्वचिद्दिगम्बरे मनो विनोदमेतु वस्तुनि॥

जिनके मन में पार्वती (पर्वतराज-नंदिनी) को संगिनी बनाने का उल्लास है; जिनकी कृपाकटाक्ष-धारा से कठिन विपत्तियाँ दूर होती हैं — ऐसे दिगम्बर शिव में मेरा मन आनंदित हो।

जटाभुजङ्गपिङ्गलस्फुरत्फणामणिप्रभा कदम्बकुङ्कुमद्रवप्रलिप्तदिग्वधूमुखे। मदान्धसिन्धुरस्फुरत्त्वगुत्तरीयमेदुरे मनो विनोदमद्भुतं बिभर्तु भूतभर्तरि॥

जिनकी जटाओं में पिंगल रंग के सर्पों की मणि-प्रभा से दिक्-वधुओं के मुख कदम्ब-कुंकुम-रंग से रंजित हो जाते हैं; जो मतवाले हाथी की खाल ओढ़े हैं — ऐसे भूत-भर्तृ (शिव) में मेरा मन अद्भुत आनंद धारण करे।

सहस्रलोचनप्रभृत्यशेषलेखशेखर प्रसूनधूलिधोरणी विधूसराङ्घ्रिपीठभूः। भुजङ्गराजमालया निबद्धजाटजूटकः श्रियै चिराय जायतां चकोरबन्धुशेखरः॥

जिनके चरण-पीठ इंद्र आदि समस्त देवों के पुष्पों की पराग-धारा से पीतवर्ण हैं; जिन्होंने सर्पराज की माला से अपनी जटाएँ बाँधी हैं — ऐसे चंद्रशेखर शिव हमें चिरकाल तक समृद्धि प्रदान करें।

ललाटचत्वरज्वलद्धनञ्जयस्फुलिङ्गभा निपीतपञ्चसायकं नमन्निलिम्पनायकम्। सुधामयूखलेखया विराजमानशेखरं महाकपालिसम्पदे शिरोजटालमस्तु नः॥

जिनके ललाट-मण्डल में प्रचंड अग्नि की चिंगारियों से कामदेव (पाँच बाण) भस्म हुए; जिन्हें इंद्र प्रमुख देव नमन करते हैं; जो चंद्र-किरण से सुशोभित हैं — ऐसे महाकपाली शिव की जटाएँ हमें समृद्धि दें।

करालभालपट्टिकाधगद्धगद्धगज्ज्वलद् धनञ्जयाहुतीकृतप्रचण्डपञ्चसायके। धराधरेन्द्रनन्दिनीकुचाग्रचित्रपत्रक प्रकल्पनैकशिल्पिनि त्रिलोचने रतिर्मम॥

जिनके भयंकर ललाट-पट्टिका पर धधकती अग्नि में काम-देव (धनंजय) आहुति बनकर प्रचंड भस्म हुए; जो पार्वती के वक्षस्थल पर चित्रकारी करने वाले एकमात्र शिल्पी हैं — ऐसे त्रिनेत्र शिव में मेरी आसक्ति है।

नवीनमेघमण्डलीनिरुद्धदुर्धरस्फुरत् कुहूनिशीथिनीतमःप्रबन्धबद्धकन्धरः। निलिम्पनिर्झरीधरस्तनोतु कृत्तिसिन्धुरः कलानिधानबन्धुरः श्रियं जगद्धुरन्धरः॥

जिनका कंठ नवीन मेघ-मंडली से घिरी अमावस्या की रात्रि के घोर अंधकार के समान (नीलकंठ) है; जो गंगा धारण करते हैं, हाथी की खाल ओढ़े हैं, चंद्रमा से सुशोभित हैं — ऐसे जगद्-धुरंधर शिव हमें समृद्धि प्रदान करें।

प्रफुल्लनीलपङ्कजप्रपञ्चकालिमप्रभा वलम्बिकण्ठकन्दलीरुचिप्रबद्धकन्धरम्। स्मरच्छिदं पुरच्छिदं भवच्छिदं मखच्छिदं गजच्छिदान्धकच्छिदं तमन्तकच्छिदं भजे॥

जिनके कण्ठ की नीलिमा पूर्ण खिले नीलकमल की शोभा से भी गहरी है; मैं उन शिव को भजता हूँ जिन्होंने काम, त्रिपुर, संसार (भव), यज्ञ, गज (गजासुर), अंधक और मृत्यु (यम) का संहार किया।

अखर्वसर्वमङ्गलाकलाकदम्बमञ्जरी रसप्रवाहमाधुरी विजृम्भणामधुव्रतम्। स्मरान्तकं पुरान्तकं भवान्तकं मखान्तकं गजान्तकान्धकान्तकं तमन्तकान्तकं भजे॥

जो समस्त मंगल-कलाओं के रसप्रवाह की मधुरता पर मंडराने वाले भ्रमर के समान हैं; मैं काम, त्रिपुर, संसार, यज्ञ, गज, अंधक और मृत्यु के अंत करने वाले शिव को भजता हूँ।

जयत्वदभ्रविभ्रमभ्रमद्भुजङ्गमश्वास द्विनिर्गमत्क्रमस्फुरत्करालभालहव्यवाट्। धिमिद्धिमिद्धिमिद्ध्वनन्मृदङ्गतुङ्गमङ्गल ध्वनिक्रमप्रवर्तितप्रचण्डताण्डवः शिवः॥

"धिमिद् धिमिद् धिमिद्" — मृदंग की ऊँची मंगलध्वनि से प्रेरित होकर प्रचंड तांडव करते हुए, जटाओं में लिपटे सर्पों की साँसों से ललाट-अग्नि को प्रज्वलित करते शिव विजयशाली हों।

दृषद्विचित्रतल्पयोर्भुजङ्गमौक्तिकस्रजोर् गरिष्ठरत्नलोष्ठयोः सुहृद्विपक्षपक्षयोः। तृणारविन्दचक्षुषोः प्रजामहीमहेन्द्रयोः समप्रवृत्तिकः कदा सदाशिवं भजाम्यहम्॥

पथरीले बिस्तर और विचित्र सुंदर शय्या को, सर्प की माला और मोतियों की माला को, श्रेष्ठ रत्न और मिट्टी के ढेले को, मित्र और शत्रु को, तिनके और कमल-नेत्र को, प्रजा और सम्राट को एक समान देखते हुए मैं सदाशिव को कब भजूँगा?

कदा निलिम्पनिर्झरी निकुञ्जकोटरे वसन् विमुक्तदुर्मतिः सदा शिरःस्थमञ्जलिं वहन्। विमुक्तलोललोचनो ललामभाललग्नकः शिवेति मन्त्रमुच्चरन् कदा सुखी भवाम्यहम्॥

गंगा के किनारे की गुफा में निवास कर, दुर्मति से मुक्त होकर, सदा शीश पर अंजलि बाँधे, चंचल आँखें बंद कर, शिव के सुंदर ललाट चिह्न में चित्त लगाए, "शिव" मंत्र का उच्चारण करते हुए — मैं कब सुखी होऊँगा?

इमं हि नित्यमेव मुक्तमुत्तमोत्तमं स्तवं पठन् स्मरन् ब्रुवन्नरो विशुद्धिमेति संततम्। हरे गुरौ सुभक्तिमाशु याति नान्यथा गतिं विमोहनं हि देहिनां सुशंकरस्य चिंतनम्॥

इस उत्तम-से-उत्तम, मुक्तिदायक स्तोत्र को नित्य पढ़ने, स्मरण करने और उच्चारण करने से मनुष्य निरंतर पवित्र होता है; शिव (हर) में सच्ची भक्ति शीघ्र प्राप्त होती है। शंकर का चिंतन प्राणियों के मोह को दूर करता है।

पूजावसानसमये दशवक्त्रगीतं यः शम्भुपूजनपरं पठति प्रदोषे। तस्य स्थिरां रथगजेन्द्रतुरङ्गयुक्तां लक्ष्मीं सदैव सुमुखिं प्रददाति शम्भुः॥

जो सायंकाल शम्भु-पूजा के अंत में दश-मुखी (रावण) द्वारा रचित इस शम्भु-पूजा-परायण स्तोत्र का पाठ करता है — शम्भु उसे रथ, गज और अश्व सहित स्थिर लक्ष्मी (समृद्धि) सदा प्रसन्नतापूर्वक प्रदान करते हैं।

सदाशिवं भावयतो मनो यदा स्थलेषु सर्वेषु शिवं प्रपश्यति। तदा न जन्मादि-भयं भवेत् क्वचित् नमोऽस्तु श्री रावणकृत-शम्भवे॥

जब शिव का चिंतन करने वाला मन सर्वत्र शिव को ही देखता है, तब जन्म-मृत्यु का भय कहीं नहीं रहता। ऐसे रावण-रचित शम्भु-स्तोत्र को नमस्कार है।

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अर्थ (हिन्दी)

  1. जिनकी जटारूपी वन से प्रवाहित गंगाजल से पवित्र हुए कंठ में लम्बी सर्पमाला लटक रही है, और जो डमरू की डमड्-डमड् ध्वनि के साथ प्रचंड तांडव करते हैं — वे शिव हमारा कल्याण करें।
  2. जिनके मस्तक पर वेगवती गंगा की लहरें सुशोभित हैं और जिनके ललाट पर धधकती अग्नि प्रज्वलित है — ऐसे बाल-चंद्र को धारण करने वाले शिव में मेरा अनुराग प्रतिक्षण बना रहे।
  3. जिनके मन में पार्वती (पर्वतराज-नंदिनी) को संगिनी बनाने का उल्लास है; जिनकी कृपाकटाक्ष-धारा से कठिन विपत्तियाँ दूर होती हैं — ऐसे दिगम्बर शिव में मेरा मन आनंदित हो।
  4. जिनकी जटाओं में पिंगल रंग के सर्पों की मणि-प्रभा से दिक्-वधुओं के मुख कदम्ब-कुंकुम-रंग से रंजित हो जाते हैं; जो मतवाले हाथी की खाल ओढ़े हैं — ऐसे भूत-भर्तृ (शिव) में मेरा मन अद्भुत आनंद धारण करे।
  5. जिनके चरण-पीठ इंद्र आदि समस्त देवों के पुष्पों की पराग-धारा से पीतवर्ण हैं; जिन्होंने सर्पराज की माला से अपनी जटाएँ बाँधी हैं — ऐसे चंद्रशेखर शिव हमें चिरकाल तक समृद्धि प्रदान करें।
  6. जिनके ललाट-मण्डल में प्रचंड अग्नि की चिंगारियों से कामदेव (पाँच बाण) भस्म हुए; जिन्हें इंद्र प्रमुख देव नमन करते हैं; जो चंद्र-किरण से सुशोभित हैं — ऐसे महाकपाली शिव की जटाएँ हमें समृद्धि दें।
  7. जिनके भयंकर ललाट-पट्टिका पर धधकती अग्नि में काम-देव (धनंजय) आहुति बनकर प्रचंड भस्म हुए; जो पार्वती के वक्षस्थल पर चित्रकारी करने वाले एकमात्र शिल्पी हैं — ऐसे त्रिनेत्र शिव में मेरी आसक्ति है।
  8. जिनका कंठ नवीन मेघ-मंडली से घिरी अमावस्या की रात्रि के घोर अंधकार के समान (नीलकंठ) है; जो गंगा धारण करते हैं, हाथी की खाल ओढ़े हैं, चंद्रमा से सुशोभित हैं — ऐसे जगद्-धुरंधर शिव हमें समृद्धि प्रदान करें।
  9. जिनके कण्ठ की नीलिमा पूर्ण खिले नीलकमल की शोभा से भी गहरी है; मैं उन शिव को भजता हूँ जिन्होंने काम, त्रिपुर, संसार (भव), यज्ञ, गज (गजासुर), अंधक और मृत्यु (यम) का संहार किया।
  10. जो समस्त मंगल-कलाओं के रसप्रवाह की मधुरता पर मंडराने वाले भ्रमर के समान हैं; मैं काम, त्रिपुर, संसार, यज्ञ, गज, अंधक और मृत्यु के अंत करने वाले शिव को भजता हूँ।
  11. "धिमिद् धिमिद् धिमिद्" — मृदंग की ऊँची मंगलध्वनि से प्रेरित होकर प्रचंड तांडव करते हुए, जटाओं में लिपटे सर्पों की साँसों से ललाट-अग्नि को प्रज्वलित करते शिव विजयशाली हों।
  12. पथरीले बिस्तर और विचित्र सुंदर शय्या को, सर्प की माला और मोतियों की माला को, श्रेष्ठ रत्न और मिट्टी के ढेले को, मित्र और शत्रु को, तिनके और कमल-नेत्र को, प्रजा और सम्राट को एक समान देखते हुए मैं सदाशिव को कब भजूँगा?
  13. गंगा के किनारे की गुफा में निवास कर, दुर्मति से मुक्त होकर, सदा शीश पर अंजलि बाँधे, चंचल आँखें बंद कर, शिव के सुंदर ललाट चिह्न में चित्त लगाए, "शिव" मंत्र का उच्चारण करते हुए — मैं कब सुखी होऊँगा?
  14. इस उत्तम-से-उत्तम, मुक्तिदायक स्तोत्र को नित्य पढ़ने, स्मरण करने और उच्चारण करने से मनुष्य निरंतर पवित्र होता है; शिव (हर) में सच्ची भक्ति शीघ्र प्राप्त होती है। शंकर का चिंतन प्राणियों के मोह को दूर करता है।
  15. जो सायंकाल शम्भु-पूजा के अंत में दश-मुखी (रावण) द्वारा रचित इस शम्भु-पूजा-परायण स्तोत्र का पाठ करता है — शम्भु उसे रथ, गज और अश्व सहित स्थिर लक्ष्मी (समृद्धि) सदा प्रसन्नतापूर्वक प्रदान करते हैं।
  16. जब शिव का चिंतन करने वाला मन सर्वत्र शिव को ही देखता है, तब जन्म-मृत्यु का भय कहीं नहीं रहता। ऐसे रावण-रचित शम्भु-स्तोत्र को नमस्कार है।

लाभ

  • मन में अपार ऊर्जा, उत्साह और निर्भयता का संचार होता है।
  • भय, नकारात्मकता व शत्रु-बाधा का नाश होता है।
  • शिव के प्रति गहन भक्ति व एकाग्रता बढ़ती है।
  • सायंकाल पाठ से स्थिर लक्ष्मी और समृद्धि मिलती है।

कब करें पाठ

सोमवार व प्रदोष काल मेंमहाशिवरात्रि परसंध्या आरती के समय

पाठ विधि

शिवलिंग के समक्ष बेलपत्र व जल अर्पित कर स्तोत्र का लयबद्ध पाठ करें। उच्चारण की कठिनता के कारण आरंभ में धीमे, फिर लय के साथ पाठ करें। शुद्ध उच्चारण पर ध्यान दें।

प्रामाणिकता व स्रोत

स्थिति✓ संपूर्ण (16/16 श्लोक)
स्रोत परंपरापारंपरिक शिव तांडव स्तोत्र (रावण कृत) · गीता प्रेस, गोरखपुर
रचयितारावण
अंतिम अद्यतनजून 2026

देव परिचय

श्री शिव

Lord Shiva

महादेव शिव त्रिदेवों में संहारक और कल्याणकारी देव हैं — योग, ध्यान और मोक्ष के अधिपति।

देवता वर्गसंहार · योग · ध्यान · कल्याण · मोक्ष
वाहननंदी (वृषभ)
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मुख्य मंत्रॐ नमः शिवाय
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