कनकधारा स्तोत्रम्

kanakadhārā stotram

Kanakadhara Stotram

समय
5–7 मिनट
श्लोक
23
कठिनाई
कठिन (Advanced)
शुभ दिन
शुक्रवार; दीपावली
उद्देश्य:धन (Wealth)समृद्धि (Prosperity)सौभाग्य (Fortune)
✓ संपूर्ण (21/21 श्लोक)

कनकधारा स्तोत्रम् आदि शंकराचार्य की रची माँ लक्ष्मी की संस्कृत स्तुति है, जो "अङ्गं हरेः पुलकभूषणमाश्रयन्ती" से शुरू होती है। इसमें एक ध्यान-श्लोक, 21 श्लोक और फलश्रुति है। ज़्यादातर श्लोक लक्ष्मी की कृपा-दृष्टि माँगते हैं, और फलश्रुति कहती है कि तीनों संध्याओं में इसका पाठ करने वाला "कुबेरसमो भवेत्"।

परिचय

माँ लक्ष्मी धन, समृद्धि और सौभाग्य की अधिष्ठात्री देवी हैं — भगवान विष्णु की शक्ति।

स्रोत: आदि शंकराचार्य कृत (फलश्रुति: "यच्छङ्कराचार्य निर्मितम्") — ध्यान-श्लोक, 21 श्लोक और फलश्रुति

एक नज़र में

मंत्र / पाठकनकधारा स्तोत्रम्
IASTkanakadhārā stotram
देवतामाँ लक्ष्मी
मूल स्रोतआदि शंकराचार्य कृत (फलश्रुति: "यच्छङ्कराचार्य निर्मितम्") — ध्यान-श्लोक, 21 श्लोक और फलश्रुति
शुभ दिनशुक्रवार; दीपावली
पाठ समय5–7 मिनट
कठिनाईकठिन (Advanced)

उद्भव / पृष्ठभूमि

कनकधारा का अर्थ है सोने की धारा। स्तोत्र का लगभग हर श्लोक एक ही चीज़ माँगता है — लक्ष्मी की एक नज़र।

कथा. परंपरा के अनुसार बालक शंकर भिक्षा माँगने एक निर्धन ब्राह्मणी के घर गए; उसके पास देने को केवल एक सूखा आँवला था। उसकी दरिद्रता देखकर शंकर ने यह स्तुति गाई और लक्ष्मी ने सोने के आँवलों की वर्षा की। यह कथा परंपरा की है; स्तोत्र स्वयं अपने रचयिता को फलश्रुति में बताता है — "यच्छङ्कराचार्य निर्मितम्"।

दृष्टि की याचना (श्लोक 1–9). लक्ष्मी की दृष्टि विष्णु पर ऐसे टिकती है "भृङ्गाङ्गनेव मुकुलाभरणं तमालम्" — जैसे भौंरी तमाल के फूलों पर; और भक्त कहता है, वह दृष्टि क्षण भर, आधी ही सही, मुझ पर भी पड़े। श्लोक 9 में भक्त अपने को अकिञ्चन विहङ्ग-शिशु — एक दुखी, खाली हाथ चिड़िया का बच्चा — कहता है, जिस पर कृपा का बादल बरसे।

नमस्कार (श्लोक 10–15). "गीर्देवतेति गरुडध्वजसुन्दरीति" — सरस्वती, विष्णु-प्रिया, शाकंभरी, शिव-प्रिया — सब रूपों को नमस्कार; फिर पाँच श्लोक "नमोऽस्तु" से शुरू होते हैं।

फल (श्लोक 21 और फलश्रुति). जो इन स्तुतियों से प्रतिदिन रमा की स्तुति करते हैं, वे गुणवान और भाग्यवान होते हैं; और तीनों संध्याओं में पाठ करने वाला कुबेर के समान।

संपूर्ण स्तोत्र

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वन्दे वन्दारु मन्दारमिन्दिरानन्दकन्दलम्। अमन्दानन्दसन्दोह बन्धुरं सिन्धुराननम्॥

(ध्यान) इंदिरा (लक्ष्मी) के आनंद की कली, वंदना करने वालों के लिए कल्पवृक्ष जैसे, अपार आनंद से भरे सुंदर गजमुख (गणेश) की मैं वंदना करता हूँ।

अङ्गं हरेः पुलकभूषणमाश्रयन्ती भृङ्गाङ्गनेव मुकुलाभरणं तमालम्। अङ्गीकृताखिलविभूतिरपाङ्गलीला माङ्गल्यदास्तु मम मङ्गलदेवतायाः॥

जैसे भ्रमरी मुकुलित तमाल वृक्ष का आश्रय लेती है, वैसे ही श्रीहरि के पुलकित अंग का आश्रय लेने वाली, समस्त विभूतियों से युक्त माँ लक्ष्मी की कटाक्ष-लीला मुझे मंगल प्रदान करे।

मुग्धा मुहुर्विदधती वदने मुरारेः प्रेमत्रपाप्रणिहितानि गतागतानि। माला दृशोर्मधुकरीव महोत्पले या सा मे श्रियं दिशतु सागरसम्भवायाः॥

जो माँ लक्ष्मी का नेत्र-कटाक्ष श्रीहरि (मुरारि) के मुख की ओर प्रेम व लज्जा से बार-बार आता-जाता है, मानो विशाल कमल पर भ्रमरी मँडरा रही हो — समुद्र से प्रकट हुई वे देवी मुझे श्री (समृद्धि) प्रदान करें।

आमीलिताक्षमधिगम्य मुदा मुकुन्दम्- आनन्दकन्दमनिमेषमनङ्गतन्त्रम्। आकेकरस्थितकनीनिकपक्ष्मनेत्रं भूत्यै भवेन्मम भुजङ्गशयाङ्गनायाः॥

आनंद-कंद और अनंग-तंत्र (प्रेम) के आश्रय विष्णु को प्रसन्नतापूर्वक देखते हुए, लक्ष्मी की अर्ध-निमीलित, कोण-स्थित पुतली वाली कटाक्ष-दृष्टि मेरे कल्याण हेतु हो।

बाह्वन्तरे मधुजितः श्रितकौस्तुभे या हारावलीव हरिनीलमयी विभाति। कामप्रदा भगवतोऽपि कटाक्षमाला कल्याणमावहतु मे कमलालयायाः॥

जो लक्ष्मी विष्णु के वक्षस्थल पर कौस्तुभ मणि के पास नीलम-माला की भाँति शोभायमान हैं और जिनके कटाक्ष विष्णु की इच्छाएँ भी पूर्ण करते हैं — वे कमलालया मेरा कल्याण करें।

कालाम्बुदालिललितोरसि कैटभारेः धाराधरे स्फुरति या तटिदङ्गनेव। मातुस्समस्तजगतां महनीयमूर्तिः भद्राणि मे दिशतु भार्गवनन्दनायाः॥

कैटभ के शत्रु (विष्णु) के काले बादलों जैसे सुंदर वक्षस्थल पर जो बिजली की तरह चमकती हैं — समस्त जगत की माता, पूजनीय मूर्ति वाली वे भार्गवी (लक्ष्मी) मुझे कल्याण दें।

प्राप्तं पदं प्रथमतः खलु यत्प्रभावात् माङ्गल्यभाजि मधुमाथिनि मन्मथेन। मय्यापतेत्तदिह मन्थरमीक्षणार्धं मन्दालसं च मकरालयकन्यकायाः॥

जिनकी कृपा से ही कामदेव ने मंगलमय मधुसूदन (विष्णु) पर पहला स्थान पाया — समुद्र की उस कन्या की मंद, अलसाई अधखुली दृष्टि यहाँ मुझ पर पड़े।

विश्वामरेन्द्रपदविभ्रमदानदक्षं आनन्दहेतुरधिकं मुरविद्विषोऽपि। ईषन्निषीदतु मयि क्षणमीक्षणार्थं इन्दीवरोदरसहोदरमिन्दिरायाः॥

जो (दृष्टि) सारे देवताओं को इंद्र-पद का वैभव देने में समर्थ है, और मुर के शत्रु (विष्णु) को भी अधिक आनंद देती है — नील कमल के भीतर जैसी इंदिरा की वह दृष्टि क्षण भर, आधी ही सही, मुझ पर टिके।

इष्टा विशिष्टमतयोऽपि यया दयार्द्र दृष्ट्या त्रिविष्टपपदं सुलभं लभन्ते। दृष्टिः प्रहृष्टकमलोदरदीप्ति-रिष्टां पुष्टिं कृषीष्ट मम पुष्करविष्टरायाः॥

जिनकी दया-भरी दृष्टि से श्रेष्ठ बुद्धि वाले लोग स्वर्ग का पद भी सहज पा लेते हैं — कमल पर विराजने वाली उन लक्ष्मी की, खिले कमल के भीतर जैसी चमकती दृष्टि मुझे मनचाही पुष्टि (समृद्धि) दे।

दद्याद्दयानुपवनो द्रविणाम्बुधारा- मस्मि-न्नकिञ्चन विहङ्गशिशौ विषण्णे। दुष्कर्मघर्ममपनीय चिराय दूरं नारायणप्रणयिनीनयनाम्बुवाहः॥

जो नारायण की प्रियतमा हैं, उनकी दयामयी दृष्टिरूपी मेघ धन की वर्षा करे; मेरे पाप-ताप को दूर कर इस अकिंचन पक्षी-शिशु (मुझ पर) जो विषण्ण है, समृद्धि दे।

गीर्देवतेति गरुडध्वजसुन्दरीति शाकम्भरीति शशिशेखरवल्लभेति। सृष्टिस्थितिप्रलयकेलिषु संस्थितायै तस्यै नमस्त्रिभुवनैकगुरोस्तरुण्यै॥

जिन्हें वाणी की देवी (सरस्वती), गरुड़ध्वज (विष्णु) की सुंदरी, शाकंभरी और चंद्रशेखर (शिव) की प्रिया कहा जाता है, जो सृष्टि, पालन और प्रलय की लीला में स्थित हैं — तीनों लोकों के एकमात्र गुरु (विष्णु) की उस तरुणी को नमस्कार।

श्रुत्यै नमोऽस्तु शुभकर्मफलप्रसूत्यै रत्यै नमोऽस्तु रमणीयगुणार्णवायै। शक्त्यै नमोऽस्तु शतपत्रनिकेतनायै पुष्ट्यै नमोऽस्तु पुरुषोत्तमवल्लभायै॥

शुभ कर्मों का फल देने वाली श्रुति (वेद-रूपा) को नमस्कार; सुंदर गुणों की सागर रति को नमस्कार; कमल में रहने वाली शक्ति को नमस्कार; पुरुषोत्तम की प्रिया पुष्टि को नमस्कार।

नमोऽस्तु नालीकनिभाननायै नमोऽस्तु दुग्धोदधिजन्मभूम्यै। नमोऽस्तु सोमामृतसोदरायै नमोऽस्तु नारायणवल्लभायै॥

कमल जैसे मुख वाली को नमस्कार; क्षीर-सागर में जन्मी को नमस्कार; चंद्रमा और अमृत की बहन को नमस्कार; नारायण की प्रिया को नमस्कार।

नमोऽस्तु हेमाम्बुजपीठिकायै नमोऽस्तु भूमण्डलनायिकायै। नमोऽस्तु देवादिदयापरायै नमोऽस्तु शार्ङ्गायुधवल्लभायै॥

सोने के कमल के आसन वाली को नमस्कार; भूमंडल की स्वामिनी को नमस्कार; देवताओं पर दया करने वाली को नमस्कार; शार्ङ्ग धनुषधारी (विष्णु) की प्रिया को नमस्कार।

नमोऽस्तु देव्यै भृगुनन्दनायै नमोऽस्तु विष्णोरुरसिस्थितायै। नमोऽस्तु लक्ष्म्यै कमलालयायै नमोऽस्तु दामोदरवल्लभायै॥

भृगु की पुत्री देवी को नमस्कार; विष्णु के वक्षस्थल पर रहने वाली को नमस्कार; कमल में रहने वाली लक्ष्मी को नमस्कार; दामोदर की प्रिया को नमस्कार।

नमोऽस्तु कान्त्यै कमलेक्षणायै नमोऽस्तु भूत्यै भुवनप्रसूत्यै। नमोऽस्तु देवादिभिरर्चितायै नमोऽस्तु नन्दात्मजवल्लभायै॥

कमल जैसे नेत्रों वाली कांति को नमस्कार; जगत को जन्म देने वाली भूति (ऐश्वर्य) को नमस्कार; देवताओं आदि से पूजित को नमस्कार; नंद के पुत्र (कृष्ण) की प्रिया को नमस्कार।

सम्पत्कराणि सकलेन्द्रियनन्दनानि साम्राज्यदानविभवानि सरोरुहाक्षि। त्वद्वन्दनानि दुरितोद्धरणोद्यतानि मामेव मातरनिशं कलयन्तु मान्ये॥

हे कमल-नयनी, हे पूजनीय माता! संपत्ति देने वाली, सब इंद्रियों को आनंद देने वाली, साम्राज्य और वैभव देने वाली और पापों को हरने को तत्पर आपकी वंदनाएँ सदा मुझे ही अपनाएँ।

यत्कटाक्षसमुपासनाविधिः सेवकस्य सकलार्थसम्पदः। सन्तनोति वचनाङ्गमानसैः त्वां मुरारिहृदयेश्वरीं भजे॥

जिनके कटाक्ष की उपासना-विधि भक्त को समस्त अर्थ-सम्पदा देती है — मैं वचन, शरीर और मन से उन मुरारि-हृदय-ईश्वरी (विष्णु-हृदयेश्वरी) लक्ष्मी को भजता हूँ।

सरसिजनिलये सरोजहस्ते धवलतमांशुकगन्धमाल्यशोभे। भगवति हरिवल्लभे मनोज्ञे त्रिभुवनभूतिकरि प्रसीद मह्यम्॥

हे कमल-निवासिनी! हे कमल-हस्ता! श्वेत-उज्ज्वल वस्त्र, सुगंध व माला से सुशोभित! हे विष्णु-वल्लभा, मनोज्ञ भगवती! तीनों लोकों का कल्याण करने वाली! मुझ पर प्रसन्न होइए।

दिग्घस्तिभिः कनककुम्भमुखावसृष्ट स्वर्वाहिनीविमलचारुजलप्लुताङ्गीम्। प्रातर्नमामि जगतां जननीमशेष लोकाधिनाथ-गृहिणीम्-अमृताब्धिपुत्रीम्॥

दिशाओं के हाथियों द्वारा सोने के कलशों के मुख से उँडेले गए आकाश-गंगा के निर्मल, सुंदर जल से जिनका अभिषेक होता है — जगत की माता, सब लोकों के स्वामी (विष्णु) की गृहिणी, अमृत-सागर की पुत्री को मैं प्रातःकाल नमस्कार करता हूँ।

कमले कमलाक्षवल्लभे त्वं करुणापूरतरङ्गितैरपाङ्गैः। अवलोकय मामकिञ्चनानां प्रथमं पात्रमकृत्रिमं दयायाः॥

हे कमला, हे कमल-नयन (विष्णु) की प्रिया! करुणा से भरी लहराती दृष्टि से मुझे देखिए — मैं अकिंचनों (दीनों) में आपकी दया का पहला, सच्चा पात्र हूँ।

स्तुवन्ति ये स्तुतिभिरमूभिरन्वहं त्रयीमयीं त्रिभुवनमातरं रमाम्। गुणाधिका गुरुतर-भाग्य-भागिनो भवन्ति ते भुवि बुधभाविताशयाः॥

जो तीनों वेदों की रूप, तीन लोकों की माता, लक्ष्मी की इन स्तुतियों से नित्य स्तवन करते हैं — वे बुद्धिमान जन पृथ्वी पर गुणशाली और परम सौभाग्यशाली होते हैं।

सुवर्णधारास्तोत्रं यच्छङ्कराचार्य निर्मितम्। त्रिसन्ध्यं यः पठेन्नित्यं स कुबेरसमो भवेत्॥

(फलश्रुति) शंकराचार्य का रचा यह सुवर्णधारा (कनकधारा) स्तोत्र जो तीनों संध्याओं में नित्य पढ़ता है, वह कुबेर के समान हो जाता है।

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अर्थ (हिन्दी)

  1. (ध्यान) इंदिरा (लक्ष्मी) के आनंद की कली, वंदना करने वालों के लिए कल्पवृक्ष जैसे, अपार आनंद से भरे सुंदर गजमुख (गणेश) की मैं वंदना करता हूँ।
  2. जैसे भ्रमरी मुकुलित तमाल वृक्ष का आश्रय लेती है, वैसे ही श्रीहरि के पुलकित अंग का आश्रय लेने वाली, समस्त विभूतियों से युक्त माँ लक्ष्मी की कटाक्ष-लीला मुझे मंगल प्रदान करे।
  3. जो माँ लक्ष्मी का नेत्र-कटाक्ष श्रीहरि (मुरारि) के मुख की ओर प्रेम व लज्जा से बार-बार आता-जाता है, मानो विशाल कमल पर भ्रमरी मँडरा रही हो — समुद्र से प्रकट हुई वे देवी मुझे श्री (समृद्धि) प्रदान करें।
  4. आनंद-कंद और अनंग-तंत्र (प्रेम) के आश्रय विष्णु को प्रसन्नतापूर्वक देखते हुए, लक्ष्मी की अर्ध-निमीलित, कोण-स्थित पुतली वाली कटाक्ष-दृष्टि मेरे कल्याण हेतु हो।
  5. जो लक्ष्मी विष्णु के वक्षस्थल पर कौस्तुभ मणि के पास नीलम-माला की भाँति शोभायमान हैं और जिनके कटाक्ष विष्णु की इच्छाएँ भी पूर्ण करते हैं — वे कमलालया मेरा कल्याण करें।
  6. कैटभ के शत्रु (विष्णु) के काले बादलों जैसे सुंदर वक्षस्थल पर जो बिजली की तरह चमकती हैं — समस्त जगत की माता, पूजनीय मूर्ति वाली वे भार्गवी (लक्ष्मी) मुझे कल्याण दें।
  7. जिनकी कृपा से ही कामदेव ने मंगलमय मधुसूदन (विष्णु) पर पहला स्थान पाया — समुद्र की उस कन्या की मंद, अलसाई अधखुली दृष्टि यहाँ मुझ पर पड़े।
  8. जो (दृष्टि) सारे देवताओं को इंद्र-पद का वैभव देने में समर्थ है, और मुर के शत्रु (विष्णु) को भी अधिक आनंद देती है — नील कमल के भीतर जैसी इंदिरा की वह दृष्टि क्षण भर, आधी ही सही, मुझ पर टिके।
  9. जिनकी दया-भरी दृष्टि से श्रेष्ठ बुद्धि वाले लोग स्वर्ग का पद भी सहज पा लेते हैं — कमल पर विराजने वाली उन लक्ष्मी की, खिले कमल के भीतर जैसी चमकती दृष्टि मुझे मनचाही पुष्टि (समृद्धि) दे।
  10. जो नारायण की प्रियतमा हैं, उनकी दयामयी दृष्टिरूपी मेघ धन की वर्षा करे; मेरे पाप-ताप को दूर कर इस अकिंचन पक्षी-शिशु (मुझ पर) जो विषण्ण है, समृद्धि दे।
  11. जिन्हें वाणी की देवी (सरस्वती), गरुड़ध्वज (विष्णु) की सुंदरी, शाकंभरी और चंद्रशेखर (शिव) की प्रिया कहा जाता है, जो सृष्टि, पालन और प्रलय की लीला में स्थित हैं — तीनों लोकों के एकमात्र गुरु (विष्णु) की उस तरुणी को नमस्कार।
  12. शुभ कर्मों का फल देने वाली श्रुति (वेद-रूपा) को नमस्कार; सुंदर गुणों की सागर रति को नमस्कार; कमल में रहने वाली शक्ति को नमस्कार; पुरुषोत्तम की प्रिया पुष्टि को नमस्कार।
  13. कमल जैसे मुख वाली को नमस्कार; क्षीर-सागर में जन्मी को नमस्कार; चंद्रमा और अमृत की बहन को नमस्कार; नारायण की प्रिया को नमस्कार।
  14. सोने के कमल के आसन वाली को नमस्कार; भूमंडल की स्वामिनी को नमस्कार; देवताओं पर दया करने वाली को नमस्कार; शार्ङ्ग धनुषधारी (विष्णु) की प्रिया को नमस्कार।
  15. भृगु की पुत्री देवी को नमस्कार; विष्णु के वक्षस्थल पर रहने वाली को नमस्कार; कमल में रहने वाली लक्ष्मी को नमस्कार; दामोदर की प्रिया को नमस्कार।
  16. कमल जैसे नेत्रों वाली कांति को नमस्कार; जगत को जन्म देने वाली भूति (ऐश्वर्य) को नमस्कार; देवताओं आदि से पूजित को नमस्कार; नंद के पुत्र (कृष्ण) की प्रिया को नमस्कार।
  17. हे कमल-नयनी, हे पूजनीय माता! संपत्ति देने वाली, सब इंद्रियों को आनंद देने वाली, साम्राज्य और वैभव देने वाली और पापों को हरने को तत्पर आपकी वंदनाएँ सदा मुझे ही अपनाएँ।
  18. जिनके कटाक्ष की उपासना-विधि भक्त को समस्त अर्थ-सम्पदा देती है — मैं वचन, शरीर और मन से उन मुरारि-हृदय-ईश्वरी (विष्णु-हृदयेश्वरी) लक्ष्मी को भजता हूँ।
  19. हे कमल-निवासिनी! हे कमल-हस्ता! श्वेत-उज्ज्वल वस्त्र, सुगंध व माला से सुशोभित! हे विष्णु-वल्लभा, मनोज्ञ भगवती! तीनों लोकों का कल्याण करने वाली! मुझ पर प्रसन्न होइए।
  20. दिशाओं के हाथियों द्वारा सोने के कलशों के मुख से उँडेले गए आकाश-गंगा के निर्मल, सुंदर जल से जिनका अभिषेक होता है — जगत की माता, सब लोकों के स्वामी (विष्णु) की गृहिणी, अमृत-सागर की पुत्री को मैं प्रातःकाल नमस्कार करता हूँ।
  21. हे कमला, हे कमल-नयन (विष्णु) की प्रिया! करुणा से भरी लहराती दृष्टि से मुझे देखिए — मैं अकिंचनों (दीनों) में आपकी दया का पहला, सच्चा पात्र हूँ।
  22. जो तीनों वेदों की रूप, तीन लोकों की माता, लक्ष्मी की इन स्तुतियों से नित्य स्तवन करते हैं — वे बुद्धिमान जन पृथ्वी पर गुणशाली और परम सौभाग्यशाली होते हैं।
  23. (फलश्रुति) शंकराचार्य का रचा यह सुवर्णधारा (कनकधारा) स्तोत्र जो तीनों संध्याओं में नित्य पढ़ता है, वह कुबेर के समान हो जाता है।

लाभ

  • दरिद्रता में सहारा — "अवलोकय मामकिञ्चनानां प्रथमं पात्रमकृत्रिमं दयायाः" (श्लोक 20)।
  • गुण और भाग्य — "गुणाधिका गुरुतर-भाग्य-भागिनो भवन्ति ते" (श्लोक 21)।
  • फलश्रुति: "त्रिसन्ध्यं यः पठेन्नित्यं स कुबेरसमो भवेत्"।

कब करें पाठ

शुक्रवार कोदीपावली व धनतेरस परप्रातः पूजा में

पाठ विधि

माँ लक्ष्मी के समक्ष कमल पुष्प व पीले/लाल पुष्प अर्पित कर शुद्ध उच्चारण के साथ स्तोत्र का पाठ करें। शुक्रवार को नित्य पाठ विशेष फलदायी माना जाता है।

प्रामाणिकता व स्रोत

स्थिति✓ संपूर्ण (21/21 श्लोक)
स्रोत परंपराvignanam.org — कनकधारा स्तोत्रम् (आधार-पाठ) · vedadhara.com — कनकधारा स्तोत्र (हिन्दी अर्थ सहित)
रचयिताआदि शंकराचार्य
अंतिम अद्यतनसितंबर 2026

देव परिचय

माँ लक्ष्मी

Goddess Lakshmi

माँ लक्ष्मी धन, समृद्धि और सौभाग्य की अधिष्ठात्री देवी हैं — भगवान विष्णु की शक्ति।

देवता वर्गधन · समृद्धि · ऐश्वर्य · सौभाग्य
वाहनउल्लू
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मुख्य मंत्रॐ श्रीं महालक्ष्म्यै नमः
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