श्री लक्ष्मी चालीसा

śrī lakṣmī cālīsā

Lakshmi Chalisa

समय
7–9 मिनट
श्लोक/चौपाई
43
कठिनाई
सरल
शुभ दिन
दीपावली, शुक्रवार व कोजागरी पूर्णिमा
उद्देश्य:समृद्धि (Prosperity)भक्ति (Devotion)मन की शांति (Peace)
✓ संपूर्ण (39/39 श्लोक)

श्री लक्ष्मी चालीसा एक दोहे और एक सोरठे से आरंभ होकर उनतालीस चौपाइयों में चलती है, और दो दोहों पर पूर्ण होती है। इसका आरंभ "मातु लक्ष्मी करि कृपा, करो हृदय में वास" से होता है। चौपाइयाँ समुद्र-मंथन और सीता-रूप में माता के अवतरण की कथा कहती हैं।

परिचय

माँ लक्ष्मी धन, समृद्धि और सौभाग्य की अधिष्ठात्री देवी हैं — भगवान विष्णु की शक्ति।

स्रोत: परंपरागत लक्ष्मी चालीसा; समापन दोहे में "रामदास" की छाप

एक नज़र में

मंत्र / पाठश्री लक्ष्मी चालीसा
IASTśrī lakṣmī cālīsā
देवतामाँ लक्ष्मी
मूल स्रोतपरंपरागत लक्ष्मी चालीसा; समापन दोहे में "रामदास" की छाप
शुभ दिनदीपावली, शुक्रवार व कोजागरी पूर्णिमा
पाठ समय7–9 मिनट
कठिनाईसरल

उद्भव / पृष्ठभूमि

इस चालीसा की पहचान इसका कथा-भाग है। चौपाई 10 से समुद्र-मंथन आता है — क्षीरसागर मथने पर चौदह रत्न निकले, और उन्हीं में लक्ष्मी जी "सुखरासी" के रूप में प्रकट हुईं (10–11)।

फिर वह भाव आता है जो इस चालीसा को विशेष बनाता है: जब-जब प्रभु ने अवतार लिया, माता ने भी रूप बदलकर उनकी सेवा की (12)। विष्णु जी ने जब अवधपुरी में राम-रूप धरा, तब माता जनकपुर में सीता-रूप में प्रकट हुईं (13–14)।

बीच का बड़ा हिस्सा फलश्रुति का है (19–31) — जो पाठ करे, कराए या ध्यान से सुने; पुत्रहीन, निर्धन, अंधे, बधिर और रोगी तक के लिए। यहाँ एक बात ध्यान देने योग्य है: चौपाई 26 "पाठ करावै दिन चालीसा" कहती है — चालीस दिन तक पाठ का नियम, जो इस चालीसा की अपनी परंपरा है।

अंतिम दोहे में रचयिता की छाप है — "रामदास धरि ध्यान नित, विनय करत कर जोर"। कौन-से रामदास, यह किसी प्रामाणिक स्रोत में नहीं मिलता, इसलिए यहाँ कोई परिचय नहीं गढ़ा गया।

संपूर्ण चालीसा

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मातु लक्ष्मी करि कृपा, करो हृदय में वास। मनोकामना सिद्ध करि, पुरवहु मेरी आस॥

हे माता लक्ष्मी, कृपा करके मेरे हृदय में निवास कीजिए; मेरी मनोकामना सिद्ध करके मेरी आशा पूर्ण कीजिए।

यही मोर अरदास, हाथ जोड़ विनती करुं। सब विधि करौ सुवास, जय जननि जगदम्बिका॥

सोरठा: यही मेरी अरदास है — हाथ जोड़कर विनती करता हूँ। हर प्रकार से मेरा घर सुवासित कीजिए। हे जगदम्बिका जननी, आपकी जय हो।

सिन्धु सुता मैं सुमिरौ तोही। ज्ञान बुद्धि विद्या दो मोही॥

हे समुद्र की पुत्री, मैं आपका स्मरण करता हूँ; मुझे ज्ञान, बुद्धि और विद्या दीजिए।

तुम समान नहिं कोई उपकारी। सब विधि पुरवहु आस हमारी॥

आपके समान उपकार करने वाला कोई नहीं; हर प्रकार से हमारी आशा पूर्ण कीजिए।

जय जय जगत जननि जगदम्बा। सबकी तुम ही हो अवलम्बा॥

हे जगत की जननी जगदम्बा, आपकी जय हो; आप ही सबका सहारा हैं।

तुम ही हो सब घट घट वासी। विनती यही हमारी खासी॥

आप ही हर हृदय में निवास करती हैं; हमारी यही विशेष विनती है।

जगजननी जय सिन्धु कुमारी। दीनन की तुम हो हितकारी॥

हे जगजननी, हे समुद्र की कुमारी, जय हो; आप दीनों का हित करने वाली हैं।

विनवौं नित्य तुमहिं महारानी। कृपा करौ जग जननि भवानी॥

हे महारानी, मैं नित्य आपसे विनती करता हूँ; हे जगजननी भवानी, कृपा कीजिए।

केहि विधि स्तुति करौं तिहारी। सुधि लीजै अपराध बिसारी॥

किस प्रकार आपकी स्तुति करूँ? मेरे अपराध भुलाकर मेरी सुध लीजिए।

कृपा दृष्टि चितववो मम ओरी। जगजननी विनती सुन मोरी॥

कृपा-दृष्टि से मेरी ओर देखिए; हे जगजननी, मेरी विनती सुनिए।

ज्ञान बुद्धि जय सुख की दाता। संकट हरो हमारी माता॥

आप ज्ञान, बुद्धि, विजय और सुख देने वाली हैं; हे माता, हमारे संकट हरिए।

क्षीरसिन्धु जब विष्णु मथायो। चौदह रत्न सिन्धु में पायो॥

जब विष्णु जी ने क्षीरसागर का मंथन कराया, तब समुद्र से चौदह रत्न प्राप्त हुए।

चौदह रत्न में तुम सुखरासी। सेवा कियो प्रभु बनि दासी॥

उन चौदह रत्नों में आप सुख की राशि थीं; और आपने दासी बनकर प्रभु की सेवा की।

जब जब जन्म जहां प्रभु लीन्हा। रुप बदल तहं सेवा कीन्हा॥

जब-जब और जहाँ-जहाँ प्रभु ने जन्म लिया, वहाँ आपने रूप बदलकर उनकी सेवा की।

स्वयं विष्णु जब नर तनु धारा। लीन्हेउ अवधपुरी अवतारा॥

जब स्वयं विष्णु ने मनुष्य शरीर धारण किया और अवधपुरी में अवतार लिया।

तब तुम प्रगट जनकपुर माहीं। सेवा कियो हृदय पुलकाहीं॥

तब आप जनकपुर में (सीता-रूप में) प्रकट हुईं और पुलकित हृदय से सेवा की।

अपनाया तोहि अन्तर्यामी। विश्व विदित त्रिभुवन की स्वामी॥

अन्तर्यामी प्रभु ने आपको अपनाया; आप विश्व-विख्यात और तीनों लोकों की स्वामिनी हैं।

तुम सम प्रबल शक्ति नहीं आनी। कहं लौ महिमा कहौं बखानी॥

आपके समान प्रबल कोई दूसरी शक्ति नहीं; आपकी महिमा कहाँ तक बखान करूँ।

मन क्रम वचन करै सेवकाई। मन इच्छित वांछित फल पाई॥

जो मन, कर्म और वचन से आपकी सेवा करता है, वह मनचाहा फल पाता है।

तजि छल कपट और चतुराई। पूजहिं विविध भांति मनलाई॥

छल, कपट और चतुराई छोड़कर जो मन लगाकर नाना प्रकार से पूजा करता है —

और हाल मैं कहौं बुझाई। जो यह पाठ करै मन लाई॥

आगे का हाल भी समझाकर कहता हूँ — जो यह पाठ मन लगाकर करता है।

ताको कोई कष्ट नोई। मन इच्छित पावै फल सोई॥

उसे कोई कष्ट नहीं रहता, और वह मनचाहा फल पाता है।

त्राहि त्राहि जय दुःख निवारिणि। त्रिविध ताप भव बंधन हारिणी॥

त्राहि-त्राहि! हे दुःख दूर करने वाली, आपकी जय हो; आप तीनों तापों और भव-बंधन को हरने वाली हैं।

जो चालीसा पढ़ै पढ़ावै। ध्यान लगाकर सुनै सुनावै॥

जो यह चालीसा पढ़ता या पढ़ाता है, ध्यान लगाकर सुनता या सुनाता है —

ताकौ कोई न रोग सतावै। पुत्र आदि धन सम्पत्ति पावै॥

उसे कोई रोग नहीं सताता; वह संतान, धन और सम्पत्ति पाता है।

पुत्रहीन अरु सम्पति हीना। अन्ध बधिर कोढ़ी अति दीना॥

जो संतानहीन हो, निर्धन हो, अंधा, बधिर, कोढ़ी या अत्यंत दीन हो —

विप्र बोलाय कै पाठ करावै। शंका दिल में कभी न लावै॥

वह ब्राह्मण को बुलाकर पाठ कराए, और मन में कभी संशय न लाए।

पाठ करावै दिन चालीसा। ता पर कृपा करैं गौरीसा॥

चालीस दिन तक पाठ कराए — उस पर गौरीश (शिव) भी कृपा करते हैं।

सुख सम्पत्ति बहुत सी पावै। कमी नहीं काहू की आवै॥

वह बहुत सुख और सम्पत्ति पाता है; किसी वस्तु की कमी नहीं रहती।

बारह मास करै जो पूजा। तेहि सम धन्य और नहिं दूजा॥

जो बारहों महीने पूजा करता है, उसके समान धन्य दूसरा कोई नहीं।

प्रतिदिन पाठ करै मन माही। उन सम कोइ जग में कहुं नाहीं॥

जो प्रतिदिन मन से पाठ करता है, उसके समान संसार में कोई नहीं।

बहुविधि क्या मैं करौं बड़ाई। लेय परीक्षा ध्यान लगाई॥

मैं कितनी बड़ाई करूँ — ध्यान लगाकर स्वयं परीक्षा कर लीजिए।

करि विश्वास करै व्रत नेमा। होय सिद्ध उपजै उर प्रेमा॥

जो विश्वास के साथ व्रत और नियम करता है, उसका कार्य सिद्ध होता है और हृदय में प्रेम उपजता है।

जय जय जय लक्ष्मी भवानी। सब में व्यापित हो गुण खानी॥

हे लक्ष्मी भवानी, आपकी जय हो; आप गुणों की खान हैं और सबमें व्याप्त हैं।

तुम्हरो तेज प्रबल जग माहीं। तुम सम कोउ दयालु कहुं नाहिं॥

जगत में आपका तेज प्रबल है; आपके समान दयालु कहीं कोई नहीं।

मोहि अनाथ की सुधि अब लीजै। संकट काटि भक्ति मोहि दीजै॥

मुझ अनाथ की अब सुध लीजिए; संकट काटकर मुझे भक्ति दीजिए।

भूल चूक करि क्षमा हमारी। दर्शन दजै दशा निहारी॥

हमारी भूल-चूक क्षमा कीजिए; हमारी दशा देखकर दर्शन दीजिए।

बिन दर्शन व्याकुल अधिकारी। तुमहि अछत दुःख सहते भारी॥

दर्शन बिना भक्त व्याकुल है; आपके होते हुए भी हम भारी दुःख सह रहे हैं।

नहिं मोहिं ज्ञान बुद्धि है तन में। सब जानत हो अपने मन में॥

मुझमें न ज्ञान है न बुद्धि — यह सब आप अपने मन में जानती ही हैं।

रुप चतुर्भुज करके धारण। कष्ट मोर अब करहु निवारण॥

चतुर्भुज रूप धारण करके अब मेरे कष्टों का निवारण कीजिए।

केहि प्रकार मैं करौं बड़ाई। ज्ञान बुद्धि मोहि नहिं अधिकाई॥

किस प्रकार आपकी बड़ाई करूँ — मुझमें इतनी ज्ञान-बुद्धि ही नहीं है।

त्राहि त्राहि दुख हारिणी, हरो वेगि सब त्रास। जयति जयति जय लक्ष्मी, करो शत्रु को नाश॥

त्राहि-त्राहि, हे दुःख हरने वाली! शीघ्र ही सब भय दूर कीजिए। हे लक्ष्मी, आपकी जय हो; शत्रुओं का नाश कीजिए।

रामदास धरि ध्यान नित, विनय करत कर जोर। मातु लक्ष्मी दास पर, करहु दया की कोर॥

रामदास नित्य ध्यान धरकर हाथ जोड़े विनती करता है — हे माता लक्ष्मी, इस दास पर दया की एक कोर (किरण) डालिए। (यही रचयिता की छाप है।)

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शब्द-अर्थ (Word-by-Word)

सिन्धु सुतासमुद्र की पुत्री — समुद्र-मंथन से प्रकट लक्ष्मी
अवलम्बासहारा, आश्रय
क्षीरसिन्धुक्षीरसागर, दूध का समुद्र
सुखरासीसुख की राशि
अवधपुरीअयोध्या
जनकपुरजनक की नगरी — जहाँ सीता प्रकट हुईं
सेवकाईसेवा
त्रिविध तापतीन कष्ट — आध्यात्मिक, आधिभौतिक, आधिदैविक
गौरीसागौरी के ईश — शिव
व्रत नेमाव्रत और नियम
अछतहोते हुए भी, विद्यमान रहते
कोरकिनारा; यहाँ "दया की एक किरण"

अर्थ (हिन्दी)

  1. हे माता लक्ष्मी, कृपा करके मेरे हृदय में निवास कीजिए; मेरी मनोकामना सिद्ध करके मेरी आशा पूर्ण कीजिए।
  2. सोरठा: यही मेरी अरदास है — हाथ जोड़कर विनती करता हूँ। हर प्रकार से मेरा घर सुवासित कीजिए। हे जगदम्बिका जननी, आपकी जय हो।
  3. हे समुद्र की पुत्री, मैं आपका स्मरण करता हूँ; मुझे ज्ञान, बुद्धि और विद्या दीजिए।
  4. आपके समान उपकार करने वाला कोई नहीं; हर प्रकार से हमारी आशा पूर्ण कीजिए।
  5. हे जगत की जननी जगदम्बा, आपकी जय हो; आप ही सबका सहारा हैं।
  6. आप ही हर हृदय में निवास करती हैं; हमारी यही विशेष विनती है।
  7. हे जगजननी, हे समुद्र की कुमारी, जय हो; आप दीनों का हित करने वाली हैं।
  8. हे महारानी, मैं नित्य आपसे विनती करता हूँ; हे जगजननी भवानी, कृपा कीजिए।
  9. किस प्रकार आपकी स्तुति करूँ? मेरे अपराध भुलाकर मेरी सुध लीजिए।
  10. कृपा-दृष्टि से मेरी ओर देखिए; हे जगजननी, मेरी विनती सुनिए।
  11. आप ज्ञान, बुद्धि, विजय और सुख देने वाली हैं; हे माता, हमारे संकट हरिए।
  12. जब विष्णु जी ने क्षीरसागर का मंथन कराया, तब समुद्र से चौदह रत्न प्राप्त हुए।
  13. उन चौदह रत्नों में आप सुख की राशि थीं; और आपने दासी बनकर प्रभु की सेवा की।
  14. जब-जब और जहाँ-जहाँ प्रभु ने जन्म लिया, वहाँ आपने रूप बदलकर उनकी सेवा की।
  15. जब स्वयं विष्णु ने मनुष्य शरीर धारण किया और अवधपुरी में अवतार लिया।
  16. तब आप जनकपुर में (सीता-रूप में) प्रकट हुईं और पुलकित हृदय से सेवा की।
  17. अन्तर्यामी प्रभु ने आपको अपनाया; आप विश्व-विख्यात और तीनों लोकों की स्वामिनी हैं।
  18. आपके समान प्रबल कोई दूसरी शक्ति नहीं; आपकी महिमा कहाँ तक बखान करूँ।
  19. जो मन, कर्म और वचन से आपकी सेवा करता है, वह मनचाहा फल पाता है।
  20. छल, कपट और चतुराई छोड़कर जो मन लगाकर नाना प्रकार से पूजा करता है —
  21. आगे का हाल भी समझाकर कहता हूँ — जो यह पाठ मन लगाकर करता है।
  22. उसे कोई कष्ट नहीं रहता, और वह मनचाहा फल पाता है।
  23. त्राहि-त्राहि! हे दुःख दूर करने वाली, आपकी जय हो; आप तीनों तापों और भव-बंधन को हरने वाली हैं।
  24. जो यह चालीसा पढ़ता या पढ़ाता है, ध्यान लगाकर सुनता या सुनाता है —
  25. उसे कोई रोग नहीं सताता; वह संतान, धन और सम्पत्ति पाता है।
  26. जो संतानहीन हो, निर्धन हो, अंधा, बधिर, कोढ़ी या अत्यंत दीन हो —
  27. वह ब्राह्मण को बुलाकर पाठ कराए, और मन में कभी संशय न लाए।
  28. चालीस दिन तक पाठ कराए — उस पर गौरीश (शिव) भी कृपा करते हैं।
  29. वह बहुत सुख और सम्पत्ति पाता है; किसी वस्तु की कमी नहीं रहती।
  30. जो बारहों महीने पूजा करता है, उसके समान धन्य दूसरा कोई नहीं।
  31. जो प्रतिदिन मन से पाठ करता है, उसके समान संसार में कोई नहीं।
  32. मैं कितनी बड़ाई करूँ — ध्यान लगाकर स्वयं परीक्षा कर लीजिए।
  33. जो विश्वास के साथ व्रत और नियम करता है, उसका कार्य सिद्ध होता है और हृदय में प्रेम उपजता है।
  34. हे लक्ष्मी भवानी, आपकी जय हो; आप गुणों की खान हैं और सबमें व्याप्त हैं।
  35. जगत में आपका तेज प्रबल है; आपके समान दयालु कहीं कोई नहीं।
  36. मुझ अनाथ की अब सुध लीजिए; संकट काटकर मुझे भक्ति दीजिए।
  37. हमारी भूल-चूक क्षमा कीजिए; हमारी दशा देखकर दर्शन दीजिए।
  38. दर्शन बिना भक्त व्याकुल है; आपके होते हुए भी हम भारी दुःख सह रहे हैं।
  39. मुझमें न ज्ञान है न बुद्धि — यह सब आप अपने मन में जानती ही हैं।
  40. चतुर्भुज रूप धारण करके अब मेरे कष्टों का निवारण कीजिए।
  41. किस प्रकार आपकी बड़ाई करूँ — मुझमें इतनी ज्ञान-बुद्धि ही नहीं है।
  42. त्राहि-त्राहि, हे दुःख हरने वाली! शीघ्र ही सब भय दूर कीजिए। हे लक्ष्मी, आपकी जय हो; शत्रुओं का नाश कीजिए।
  43. रामदास नित्य ध्यान धरकर हाथ जोड़े विनती करता है — हे माता लक्ष्मी, इस दास पर दया की एक कोर (किरण) डालिए। (यही रचयिता की छाप है।)

लाभ

  • समुद्र-मंथन और सीता-रूप में अवतरण — दोनों कथाएँ इसी पाठ में आ जाती हैं।
  • दीपावली और कोजागरी पूर्णिमा की पूजा का प्रमुख पाठ; शुक्रवार को भी पढ़ा जाता है।
  • चालीसा स्वयं चालीस दिन के नियमित पाठ का नियम बताती है (चौपाई 26)।
  • भाषा सरल और चाल हनुमान चालीसा जैसी — कंठस्थ करना आसान।

कब करें पाठ

दीपावली पर — लक्ष्मी पूजन के समयशुक्रवार कोकोजागरी (शरद) पूर्णिमा परनित्य संध्या में; या संकल्प लेकर चालीस दिन तक

पाठ विधि

माता लक्ष्मी के चित्र या विग्रह के समक्ष घी का दीप जलाएँ, कमल या लाल पुष्प, अक्षत और खीर या बताशे का भोग अर्पित करें। पहले दोहा और सोरठा पढ़ें, फिर उनतालीस चौपाइयाँ, और अंत में दोनों समापन दोहे। दीपावली पर प्रदोष काल का पाठ विशेष कहा जाता है। पाठ के बाद आरती कर प्रसाद बाँटें।

प्रामाणिकता व स्रोत

स्थिति✓ संपूर्ण (39/39 श्लोक)
स्रोत परंपराaartichalisa.com — Lakshmi Chalisa (आधार-पाठ; वर्तनी शुद्ध) · bhaktibharat.com — श्री लक्ष्मी चालीसा (स्वतंत्र पुष्टि; शब्द-मिलान 96.2%, अंतर केवल वर्तनी के) · रचयिता की छाप — समापन दोहा "रामदास धरि ध्यान नित"
रचयिताअज्ञात (छाप: रामदास)
अंतिम अद्यतनसितंबर 2026

यह भी देखें

देव परिचय

माँ लक्ष्मी

Goddess Lakshmi

माँ लक्ष्मी धन, समृद्धि और सौभाग्य की अधिष्ठात्री देवी हैं — भगवान विष्णु की शक्ति।

देवता वर्गधन · समृद्धि · ऐश्वर्य · सौभाग्य
वाहनउल्लू
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मुख्य मंत्रॐ श्रीं महालक्ष्म्यै नमः
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