श्री लक्ष्मी चालीसा
पाठ
मातु लक्ष्मी करि कृपा, करो हृदय में वास। मनोकामना सिद्ध कर, पुरवहु मेरी आस॥
जय जय श्री महालक्ष्मी माता। तुम ही जग की पालनहाता॥
सिन्धु सुता विष्णुप्रिया कहलाई। नाम लेत सब विपदा जाई॥
कमल आसना कमल कर धारी। सुख-सम्पत्ति दात्री सुखकारी॥
जिस घर थारो वास हो माता। रिद्धि-सिद्धि सब सुख की दाता॥
क्षीरसागर में तुम आई। विष्णु संग तुम सदा सुहाई॥
समुद्र मंथन में प्रगटाईं। देव दानव मन हरषाईं॥
गज राज शुंड सों नित न्हाई। श्वेत वस्त्र शोभा अधिकाई॥
श्री विष्णु के वक्षस्थल वासी। जय महालक्ष्मी मोद-प्रकाशी॥
जय लक्ष्मी माता तेरे पूजन से। मन-वांछित फल मिले पूजन से॥
तुम ही कुबेर-संपत्ति आधार। तुम से सब जग का व्यवहार॥
रात्रि रूप में तुम काली। दिन रूप में लक्ष्मी उजाली॥
श्वेत पद्म पर विराजमाना। हाथ में वर मुद्रा सुहाना॥
तव प्रताप उग्र नहिं होई। भक्त की आशा पूरे सोई॥
नरनारी नित तुम्हें मनावें। सेवत धन-धान्य-सुख पावें॥
इन्द्र सदा तुम्हें सुमिरत है। कुबेर निज धन तुमहिं अरपत है॥
धन्वन्तरि और सुरेश तुम हो। त्रिभुवन की विभव-धन-श्री तुम हो॥
जो नर तुमको भज लेत हैं। वे तुमसे सब वर मांगत हैं॥
तुमसे सुख-सम्पत्ति नित पावे। नाम तुम्हारो नित-नित गावे॥
सोने-चाँदी तुम ही हो माता। हीरा-पन्ना मोती दाता॥
तुमसे मिलत अन्न-धन भारी। मंगल करत लक्ष्मी महतारी॥
दीपावली माँ की जग मनाई। रात-रात दीपक जग जगाई॥
जो नर शुक्रवार को ध्यावें। लक्ष्मी कृपा वे नित पावें॥
कमला कमल-वासिनी देवी। विष्णु-वल्लभा पद-सेवी॥
जगत-जननी जगत-अधारी। श्री लक्ष्मी जय जगत-सहारी॥
तुम्हारो यश नित-नित गाते। दुःख दारिद्र सब भाग जाते॥
पद्म-पुराण में तव महिमा। श्रुति-शास्त्र में अपरिमिमा॥
धन तेरस को तुम्हें मनावें। धनवान सब तुमको पावें॥
सरोवर में कमल-विहारी। जय लक्ष्मी जय गृह-पालनहारी॥
ईश्वर के साथ नित रहती। भक्त की सब इच्छा पूर करती॥
तुम बिन यज्ञ न पूरण होई। तुम बिन धन न मिले कोई॥
तुम बिन जगत असार लगे। तुम्हीं शक्ति सार-सार जगे॥
उमा-रमा-ब्रह्माणी तुम हो। त्रिभुवन की शक्ति सुगम तुम हो॥
तुम्हारे भजन से दीन का उद्धार। मिटे दारिद्र का हो जगत-प्रसार॥
चालीसा पाठ मन से जो करे। लक्ष्मी कृपा सदा ताके परे॥
धूप-दीप-नैवेद्य चढ़ाई। कमल-पुष्प से पूजन गाई॥
तुम्हारी शरण में जो कोई आवें। धन-धान्य-समृद्धि सब पावें॥
जय लक्ष्मी सुखदा वरदायिनी। तुम ही परमेश्वरी हितकारिणी॥
नवधा-भक्ति से जो पूजे। लक्ष्मी-कृपा तुरंत ही ऊजे॥
यह चालीसा भक्ति से गावें। सम्पत्ति-सुख-वैभव नित पावें॥
जय लक्ष्मी महालक्ष्मी माता। सदा करो जगत का पालन-त्राता॥
मातु लक्ष्मी करि कृपा, करो हृदय में वास। मनोकामना सिद्ध कर, पुरवहु मेरी आस॥
अर्थ (हिन्दी)
- हे माता लक्ष्मी, कृपा कर मेरे हृदय में निवास कीजिए; मेरी मनोकामनाएँ सिद्ध कर मेरी आशा पूर्ण कीजिए।
- हे महालक्ष्मी माता, आपकी बारंबार जय हो; आप ही समस्त जगत की पालनकर्ता हैं।
- आप समुद्र की पुत्री और विष्णु की प्रिया कहलाती हैं; आपका नाम लेने मात्र से सब विपत्तियाँ दूर हो जाती हैं।
- आप कमल पर विराजमान, हाथ में कमल धारण करने वाली; सुख-सम्पत्ति की दात्री और सुखकारी माता हैं।
- हे माता, जिस घर में आपका वास होता है, वहाँ ऋद्धि-सिद्धि और समस्त सुखों की प्राप्ति होती है।
- क्षीरसागर से आप प्रकट हुईं; भगवान विष्णु के साथ आप सदा सुशोभित हैं।
- समुद्र मंथन में आप प्रकट हुईं; देवता और दानव दोनों के मन हर्षित हुए।
- दो गजराजों की सूँड से नित्य अभिषेक होता है; श्वेत वस्त्र धारण किए आपकी शोभा अधिक है।
- आप श्री विष्णु के वक्षस्थल पर निवास करती हैं; हे आनंद-प्रकाशिनी महालक्ष्मी, जय हो।
- हे लक्ष्मी माता, आपके पूजन से मन-वांछित फल मिलता है।
- आप ही कुबेर की सम्पत्ति के आधार हैं; आपसे ही समस्त जगत का व्यवहार चलता है।
- रात्रि में आप काली का रूप धरती हैं; दिन में लक्ष्मी बनकर उजाला फैलाती हैं।
- श्वेत कमल पर विराजमान हैं; हाथ में वरमुद्रा सुंदर लगती है।
- आपका प्रताप कभी कठोर नहीं होता; भक्त की आशा आप पूर्ण करती हैं।
- नर-नारी नित्य आपको मनाते हैं; आपकी सेवा से धन, धान्य और सुख प्राप्त होता है।
- इन्द्र सदा आपका स्मरण करते हैं; कुबेर अपना धन आपको अर्पित करते हैं।
- आप धन्वन्तरि और इन्द्र की शक्ति हैं; तीनों लोकों की वैभव, धन और समृद्धि आप ही हैं।
- जो मनुष्य आपका भजन करते हैं, वे आपसे सभी वर माँगते हैं।
- आपसे नित्य सुख-सम्पत्ति पाते हैं; आपका नाम नित्य-नित्य गाते हैं।
- सोना-चाँदी आप ही हैं माता; हीरा, पन्ना और मोती की दात्री आप ही हैं।
- आपसे भरपूर अन्न-धन मिलता है; हे महतारी (माँ) लक्ष्मी, आप मंगल करती हैं।
- माँ लक्ष्मी की दीपावली पूरे जगत ने मनाई; रात-रात दीपक जगाकर उजाला किया।
- जो मनुष्य शुक्रवार को ध्यान करते हैं, वे लक्ष्मी कृपा नित्य पाते हैं।
- हे कमला, कमल में निवास करने वाली देवी; विष्णुप्रिया, आपके चरणों की सेवा करते हैं।
- हे जगत-जननी, जगत की आधार; श्री लक्ष्मी, जगत को सहारा देने वाली, आपकी जय।
- आपका यश नित्य-नित्य गाते हैं; दुःख और दरिद्रता सब भाग जाते हैं।
- पद्म-पुराण में आपकी महिमा वर्णित है; श्रुति-शास्त्र में आपकी महिमा अपरिमित है।
- धनतेरस को सब लोग आपको मनाते हैं; धनवान बनते हुए सब आपको पाते हैं।
- सरोवर में कमल पर विहार करने वाली; जय लक्ष्मी, जय घर की पालनकर्ता।
- ईश्वर के साथ नित्य रहती हैं; भक्त की सब इच्छाएँ पूर्ण करती हैं।
- आपके बिना यज्ञ पूर्ण नहीं होता; आपके बिना किसी को धन नहीं मिलता।
- आपके बिना जगत असार लगता है; आप ही सार-तत्त्व की शक्ति हैं।
- उमा, रमा और ब्रह्माणी — सब रूप आप ही हैं; तीनों लोकों की सुगम शक्ति आप ही हैं।
- आपके भजन से दीनों का उद्धार होता है; दरिद्रता मिटकर जगत में समृद्धि का प्रसार होता है।
- जो मन से चालीसा का पाठ करे, उस पर सदा लक्ष्मी कृपा बरसती रहती है।
- धूप, दीप, नैवेद्य चढ़ाएँ और कमल पुष्प से पूजन करें।
- जो कोई आपकी शरण में आता है, वह धन, धान्य और समृद्धि सब पाता है।
- हे सुखदायिनी, वरदायिनी लक्ष्मी, जय हो; आप ही परमेश्वरी और हित करने वाली हैं।
- जो नवधा-भक्ति से पूजन करता है, लक्ष्मी कृपा तुरंत उजागर होती है।
- इस चालीसा को भक्ति से गाएँ; सम्पत्ति, सुख और वैभव नित्य पाएँ।
- जय हो लक्ष्मी, महालक्ष्मी माता; सदा जगत का पालन और रक्षा करती रहिए।
- हे माता लक्ष्मी, कृपा कर हृदय में वास कीजिए; मनोकामनाएँ सिद्ध कर हमारी आशा पूर्ण कीजिए।
लाभ
- धन, समृद्धि और ऐश्वर्य की प्राप्ति होती है।
- घर में सुख-शांति और सौभाग्य आता है।
- आर्थिक संकट व दरिद्रता दूर होती है।
- शुक्रवार पाठ से लक्ष्मी कृपा विशेष रूप से मिलती है।
कब करें पाठ
शुक्रवार को · दीपावली व धनतेरस पर · संध्या पूजा में
स्रोत
पारंपरिक लक्ष्मी चालीसा · गीता प्रेस, गोरखपुर
