कनकधारा स्तोत्रम्
पाठ
अङ्गं हरेः पुलकभूषणमाश्रयन्ती भृङ्गाङ्गनेव मुकुलाभरणं तमालम्। अङ्गीकृताखिलविभूतिरपाङ्गलीला माङ्गल्यदास्तु मम मङ्गलदेवतायाः॥
मुग्धा मुहुर्विदधती वदने मुरारेः प्रेमत्रपाप्रणिहितानि गतागतानि। माला दृशोर्मधुकरीव महोत्पले या सा मे श्रियं दिशतु सागरसम्भवायाः॥
विश्वामरेन्द्रपदविभ्रमदानदक्षम् आनन्दहेतुरधिकं मुरविद्विषोऽपि। ईषन्निषीदतु मयि क्षणमीक्षणार्धम् इन्दीवरोदरसहोदरमिन्दिरायाः॥
आमीलिताक्षमधिगम्य मुदा मुकुन्दम् आनन्दकन्दमनिमेषमनङ्गतन्त्रम्। आकेकरस्थितकनीनिकपक्ष्मनेत्रं भूत्यै भवेन्मम भुजङ्गशयाङ्गनायाः॥
बाह्वन्तरे मधुजितः श्रितकौस्तुभे या हारावलीव हरिनीलमयी विभाति। कामप्रदा भगवतोऽपि कटाक्षमाला कल्याणमावहतु मे कमलालयायाः॥
कालाम्बुदालिललितोरसि कैटभारेर् धाराधरे स्फुरति या रमणीयरत्नम्। श्रद्धाभिशेकतिलकोज्ज्वलनीलकण्ठ श्रेणीवलेव सदसद्विभवाय मे स्यात्॥
दद्याद्दयानुपवनो द्रविणाम्बुधारां अस्मिन्नकिञ्चनविहङ्गशिशौ विषण्णे। दुष्कर्मघर्ममपनीय चिराय दूरं नारायणप्रणयिनीनयनाम्बुवाहः॥
इष्टाविशिष्टमतयोऽपि यया दयार्द्र- दृष्ट्या त्रिविष्टपगुणाः दधतीर्दयां ये। दृष्टिः प्रहृष्टकमलोदरदीप्तिरिष्टां पुष्टिं कृषीष्ट मम पुष्करविष्टरायाः॥
गीर्देवते गिरिशवल्लभचेलखेला- मर्यादयाहरमनन्तपदोन्नमन्ताम्। किं त्वत्परं न विदुषां प्रतिभाति लक्ष्मि कस्त्वां स्तुवन्निह न लब्धनिजाभिलाषः॥
कन्दर्पकोटिकमनीयतराश्रुतीनां किञ्चित्कलावधिकमाश्रितपुण्डरीकम्। विष्णोस्तुतिः सकलभक्तिभरप्रभूत- प्रेमाम्बुपूरपरिपूरितचित्तवृत्तिः॥
लक्ष्मीपदं तेऽखिलकारणस्य लक्ष्म्यास्तु तत्पादमहत्त्वमूहे। सद्भक्तिभावावलिभिर्विशुद्धैः सदा स्तुवन्तं मम पाहि देवि॥
स्तुवन्ति ये स्तुतिभिरमूभिरन्वहं त्रयीमयीं त्रिभुवनमातरं रमाम्। गुणाधिका गुरुतरभाग्यभागिनो भवन्ति ते भुवि बुधभाविताशयाः॥
क्षणं क्षणं यत्करणे न सिध्यति स्मरामि लक्ष्मीं प्रतिदिनं मनोहराम्। मनोगतं पूर्णमनोरथं दिश प्रसीद माता जगदम्बिके शुभे॥
सरोजपत्रे सरसी तु या स्थिता प्रसन्नवक्त्रा जगतां प्रसन्नदा। प्रसाधनार्था जगदम्बिके शुभे प्रसीद माता जगदम्बिके शुभे॥
धनं देहि कुलं देहि भाग्यं देहि सुखं देहि। रूपं देहि जयं देहि वैरिनाशं च देहि मे॥
पद्मानने पद्मविपद्मपत्रे पद्मप्रिये पद्मदलायताक्षि। विश्वप्रिये विश्वमनोनुकूले त्वत्पादपद्मं मयि सन्निधत्स्व॥
यत्कटाक्षसमुपासनाविधिः सेवकस्य सकलार्थसम्पदः। संतनोति वचनाङ्गमानसैः त्वां मुरारिहृदयेश्वरीं भजे॥
सरसिजनिलये सरोजहस्ते धवलतमांशुकगन्धमाल्यशोभे। भगवति हरिवल्लभे मनोज्ञे त्रिभुवनभूतिकरि प्रसीद मह्यम्॥
अर्थ (हिन्दी)
- जैसे भ्रमरी मुकुलित तमाल वृक्ष का आश्रय लेती है, वैसे ही श्रीहरि के पुलकित अंग का आश्रय लेने वाली, समस्त विभूतियों से युक्त माँ लक्ष्मी की कटाक्ष-लीला मुझे मंगल प्रदान करे।
- जो माँ लक्ष्मी का नेत्र-कटाक्ष श्रीहरि (मुरारि) के मुख की ओर प्रेम व लज्जा से बार-बार आता-जाता है, मानो विशाल कमल पर भ्रमरी मँडरा रही हो — समुद्र से प्रकट हुई वे देवी मुझे श्री (समृद्धि) प्रदान करें।
- जो कटाक्ष इंद्र आदि देवों को स्वर्गीय सुख देने में समर्थ है और जो विष्णु को भी आनंद देता है — लक्ष्मी का वह नील-कमल के समान नेत्र-कटाक्ष क्षण-भर के लिए मुझ पर पड़े।
- आनंद-कंद और अनंग-तंत्र (प्रेम) के आश्रय विष्णु को प्रसन्नतापूर्वक देखते हुए, लक्ष्मी की अर्ध-निमीलित, कोण-स्थित पुतली वाली कटाक्ष-दृष्टि मेरे कल्याण हेतु हो।
- जो लक्ष्मी विष्णु के वक्षस्थल पर कौस्तुभ मणि के पास नीलम-माला की भाँति शोभायमान हैं और जिनके कटाक्ष विष्णु की इच्छाएँ भी पूर्ण करते हैं — वे कमलालया मेरा कल्याण करें।
- विष्णु (कैटभारि) के मेघ-श्याम वक्ष पर श्रीवत्स-चिह्न के निकट जो लक्ष्मी रमणीय रत्न की भाँति शोभती हैं — वे मुझे सत् और असत् दोनों प्रकार की सम्पदा प्रदान करें।
- जो नारायण की प्रियतमा हैं, उनकी दयामयी दृष्टिरूपी मेघ धन की वर्षा करे; मेरे पाप-ताप को दूर कर इस अकिंचन पक्षी-शिशु (मुझ पर) जो विषण्ण है, समृद्धि दे।
- जिनकी कमल-नेत्रों की दयामय दृष्टि स्वर्गीय गुणों को भी पोषित करती है — ऐसी कमल-आसना लक्ष्मी की प्रसन्न कमल-गर्भ-सी चमकती दृष्टि मुझे इष्ट पोषण प्रदान करे।
- हे सरस्वती-रूपा! हे लक्ष्मी! विद्वानों को आपसे परे क्या दिखता है? आपकी स्तुति करके कौन अपनी मनोकामना न पाए?
- करोड़ों कामदेवों से भी अधिक सुंदर विष्णु की स्तुति, जो कमल-निवासिनी लक्ष्मी की उपस्थिति में भक्ति और प्रेम-रस से भर जाती है — वह मेरी चित्त-वृत्ति को परिपूर्ण करे।
- हे देवी! समस्त कारणों के कारण विष्णु के चरणों में तुम्हारा वास है — तुम्हारे उन चरणों की महत्ता अपार है। शुद्ध भक्ति-भाव से सदा स्तुति करने वाले मुझे रक्षित करो।
- जो तीनों वेदों की रूप, तीन लोकों की माता, लक्ष्मी की इन स्तुतियों से नित्य स्तवन करते हैं — वे बुद्धिमान जन पृथ्वी पर गुणशाली और परम सौभाग्यशाली होते हैं।
- जो कार्य क्षण-प्रतिक्षण सफल नहीं होते — मैं प्रतिदिन मनोहर लक्ष्मी का स्मरण करता हूँ। हे जगत की माँ, हे शुभे! मेरी मनोकामनाएँ पूर्ण करो, प्रसन्न हो।
- जो सरोवर में कमल के पत्तों पर प्रसन्न मुख से विराजमान हैं और जगत को प्रसन्नता देती हैं — हे जगद-अम्बिके, हे शुभे माते! प्रसन्न होइए, मुझ पर कृपा करिए।
- हे माँ! धन दो, कुल-प्रतिष्ठा दो, भाग्य दो, सुख दो; रूप दो, विजय दो, और शत्रुओं का नाश करो।
- हे कमल-मुखी! कमल के पत्तों पर विराजमान! कमल-प्रिया! कमल-दल-नेत्री! हे विश्वप्रिया! सबके मन के अनुकूल! अपने चरण-कमल मेरे पास स्थापित करो।
- जिनके कटाक्ष की उपासना-विधि भक्त को समस्त अर्थ-सम्पदा देती है — मैं वचन, शरीर और मन से उन मुरारि-हृदय-ईश्वरी (विष्णु-हृदयेश्वरी) लक्ष्मी को भजता हूँ।
- हे कमल-निवासिनी! हे कमल-हस्ता! श्वेत-उज्ज्वल वस्त्र, सुगंध व माला से सुशोभित! हे विष्णु-वल्लभा, मनोज्ञ भगवती! तीनों लोकों का कल्याण करने वाली! मुझ पर प्रसन्न होइए।
लाभ
- आर्थिक संकट व दरिद्रता दूर होती है।
- धन, समृद्धि और सौभाग्य की प्राप्ति होती है।
- मन में संतोष व सकारात्मकता बढ़ती है।
- शुक्रवार नित्य पाठ से विशेष फल मिलता है।
कब करें पाठ
शुक्रवार को · दीपावली व धनतेरस पर · प्रातः पूजा में
स्रोत
रचयिता: आदि शंकराचार्य. आदि शंकराचार्य कृत कनकधारा स्तोत्र · गीता प्रेस, गोरखपुर
