मनोजवं मारुततुल्यवेगम्

manojavaṃ mārutatulyavegam

Manojavam Marutatulyavegam

समय
40 सेकंड
जप संख्या
11
कठिनाई
मध्यम
शुभ दिन
मंगलवार व शनिवार
उद्देश्य:रक्षा (Protection)साहस (Courage)भक्ति (Devotion)
✓ संपूर्ण साधना मंत्र

मनोजवं मारुततुल्यवेगम् एक साधना मंत्र है — पारंपरिक हनुमान ध्यान श्लोक। मन के समान वेग वाले, वायु के तुल्य गतिमान, जितेन्द्रिय, बुद्धिमानों में श्रेष्ठ, पवनपुत्र, वानर-सेना के मुखिया, श्रीराम के दूत हनुमान की मैं शरण ग्रहण करता हूँ। परंपरा में इसे मुख्यतः रक्षा, साहस, भक्ति के भाव से जपा जाता है, प्रायः 11 बार।

परिचय

पवनपुत्र हनुमान भक्ति, बल और निर्भयता के प्रतीक हैं — श्रीराम के परम भक्त और संकटमोचन।

स्रोत: पारंपरिक हनुमान ध्यान श्लोक

एक नज़र में

मंत्र / पाठमनोजवं मारुततुल्यवेगम्
IASTmanojavaṃ mārutatulyavegam
प्रकारसाधना मंत्र
देवताश्री हनुमान
मूल स्रोतपारंपरिक हनुमान ध्यान श्लोक
जप संख्या11
मालाआवश्यक नहीं (ध्यान श्लोक)
शुभ दिनमंगलवार व शनिवार
पाठ समय40 सेकंड
कठिनाईमध्यम

उद्भव / पृष्ठभूमि

मनोजवं मारुततुल्यवेगम् पारंपरिक हनुमान ध्यान श्लोक के रूप में जाना जाता है। मन के समान वेग वाले, वायु के तुल्य गतिमान, जितेन्द्रिय, बुद्धिमानों में श्रेष्ठ, पवनपुत्र, वानर-सेना के मुखिया, श्रीराम के दूत हनुमान की मैं शरण ग्रहण करता हूँ।

मंत्र के प्रत्येक पद का अपना अर्थ है: मनोजवं — मन के समान वेग वाले; मारुततुल्यवेगम् — वायु के समान गतिमान; जितेन्द्रियं — इन्द्रियों को जीतने वाले; वातात्मजं — पवनपुत्र; श्रीरामदूतं शरणं प्रपद्ये — श्रीराम के दूत की शरण ग्रहण करता हूँ। इन्हीं पदों के मेल से पूरे मंत्र का भाव बनता है, इसलिए जप करते समय इनका स्मरण रखना उपयोगी कहा जाता है।

यह साधना मंत्र है, सामान्य नाम-जप नहीं। परंपरा में इस श्रेणी के मंत्रों के साथ संकल्प, नियम तथा निश्चित संख्या का विधान कहा जाता है, और गुरु-मार्गदर्शन को श्रेष्ठ माना जाता है।

परंपरा में इसका जप प्रायः 11 बार कहा जाता है, और इसके लिए माला आवश्यक नहीं (ध्यान श्लोक)। इसके लिए मंगलवार व शनिवार विशेष कहे जाते हैं। परंपरा में यह भी कहा जाता है कि संख्या से अधिक महत्व नियमितता का है।

मंत्र

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मनोजवं मारुततुल्यवेगं जितेन्द्रियं बुद्धिमतां वरिष्ठम्। वातात्मजं वानरयूथमुख्यं श्रीरामदूतं शरणं प्रपद्ये॥

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उच्चारण (Pronunciation)

मनोजवं मारुततुल्यवेगं जितेन्द्रियं बुद्धिमतां वरिष्ठम्। वातात्मजं वानरयूथमुख्यं श्रीरामदूतं शरणं प्रपद्ये॥

manojavaṃ mārutatulyavegaṃ jitendriyaṃ buddhimatāṃ variṣṭham | vātātmajaṃ vānarayūthamukhyaṃ śrīrāmadūtaṃ śaraṇaṃ prapadye ||

Manojavam Maruta-tulya-vegam Jitendriyam Buddhimatam Varishtham, Vatatmajam Vanara-yutha-mukhyam Shri-Rama-dutam Sharanam Prapadye.

उच्चारण मार्गदर्शन: "मनो-जवं", "मारुत-तुल्य-वेगं", "जितेन्द्रियं", "वातात्मजं", "श्री-राम-दूतं", "शरणं प्रपद्ये" को स्पष्ट रुककर व भक्तिभाव से पढ़ें।

शब्द-अर्थ (Word-by-Word)

मनोजवंमन के समान वेग वाले
मारुततुल्यवेगम्वायु के समान गतिमान
जितेन्द्रियंइन्द्रियों को जीतने वाले
वातात्मजंपवनपुत्र
श्रीरामदूतं शरणं प्रपद्येश्रीराम के दूत की शरण ग्रहण करता हूँ

अर्थ (हिन्दी)

  1. मन के समान वेग वाले, वायु के तुल्य गतिमान, जितेन्द्रिय, बुद्धिमानों में श्रेष्ठ, पवनपुत्र, वानर-सेना के मुखिया, श्रीराम के दूत हनुमान की मैं शरण ग्रहण करता हूँ।

लाभ

  • भय व संकट से रक्षा होती है।
  • मन एकाग्र होकर साहस व आत्मबल बढ़ता है।
  • हनुमान-भक्ति गहरी होती है।

अनुशंसित जप संख्या

जप संख्या: प्रतिदिन 11 बार (एक माला)।

माला: आवश्यक नहीं (ध्यान श्लोक)

उत्तम समय: प्रातः, संध्या व मंगलवार-शनिवार

जप का उत्तम समय

मंगलवार व शनिवार कोप्रातः व संध्याहनुमान चालीसा से पूर्व

जप विधि (चैंटिंग मेथड)

हनुमान जी का ध्यान करते हुए यह श्लोक श्रद्धापूर्वक पढ़ें; प्रायः हनुमान चालीसा/पूजा के आरंभ में इसका पाठ किया जाता है। मंगलवार-शनिवार को विशेष फलदायी।

प्रामाणिकता व स्रोत

स्थिति✓ संपूर्ण
स्रोत परंपराश्रीरामरक्षास्तोत्र, श्लोक 33 (परंपरागत रूप से इसी स्तोत्र का श्लोक) · shreehanumanchalisa.org — मनोजवम् मारुततुल्यवेगम्
अंतिम अद्यतनजून 2026

देव परिचय

श्री हनुमान

Lord Hanuman

पवनपुत्र हनुमान भक्ति, बल और निर्भयता के प्रतीक हैं — श्रीराम के परम भक्त और संकटमोचन।

देवता वर्गशक्ति · भक्ति · रक्षा · साहस · संकटमोचन
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मुख्य मंत्रॐ हं हनुमते नमः
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मनोजवं मारुततुल्यवेगम् — सामान्य प्रश्न

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