समय
1 मिनट
जप संख्या
108
कठिनाई
मध्यम
शुभ दिन
नित्य (विशेषकर रविवार)
उद्देश्य:ज्ञान (Knowledge)आध्यात्मिक उन्नति (Spiritual Growth)
✓ संपूर्ण गायत्री मंत्र
गायत्री मंत्र ऋग्वेद (3.62.10) का मंत्र है, जिसके ऋषि विश्वामित्र हैं। इसमें सविता (सूर्य) देव के श्रेष्ठ तेज का ध्यान किया जाता है, और प्रार्थना है — "धियो यो नः प्रचोदयात्" — वे हमारी बुद्धि को सही राह पर चलाएँ। इसका जप प्रायः 108 बार, यानी एक माला, किया जाता है।
FAQ
गायत्री मंत्र — सामान्य प्रश्न
गायत्री मंत्र ऋग्वेद (मंडल 3, सूक्त 62, मंत्र 10) से लिया गया है और इसके ऋषि विश्वामित्र माने जाते हैं।
सामान्यतः प्रतिदिन कम से कम 108 बार (एक माला) जप करना उत्तम माना जाता है; इसे प्रातः, मध्याह्न व संध्या तीनों समय किया जा सकता है।
गायत्री मंत्र में "सवितृ" अर्थात् सूर्य देव के दिव्य तेज का ध्यान किया जाता है, इसलिए यह सूर्य/सविता देव से संबंधित है।
मंत्र के पदों का अर्थ इस प्रकार है — ॐ — प्रणव — परब्रह्म का प्रतीक; भूः — भूलोक (पृथ्वी); भुवः — अंतरिक्ष लोक; स्वः — स्वर्ग लोक; तत् — वह (परमात्मा); सवितुः — सविता — सृष्टि के प्रेरक सूर्य; वरेण्यम् — श्रेष्ठ, वरण करने योग्य; भर्गः — दिव्य तेज, प्रकाश; देवस्य — देव का; धीमहि — हम ध्यान करते हैं; धियः — बुद्धि; यः — जो; नः — हमारी; प्रचोदयात् — प्रेरित करे, सन्मार्ग पर चलाए। पूरे मंत्र का भाव यह है: हम उस सविता (सूर्य) देव के श्रेष्ठ, वरण करने योग्य दिव्य तेज का ध्यान करते हैं, जो भूः, भुवः और स्वः — तीनों लोकों में व्याप्त है; वह देव हमारी बुद्धि को सन्मार्ग की ओर प्रेरित करे।
यह गायत्री मंत्र है, जिसमें स्वर तथा छंद का भी विधान होता है। परंपरा में ऐसे मंत्रों को गुरु के मुख से शुद्ध उच्चारण सहित सीखना श्रेष्ठ कहा जाता है। श्रद्धापूर्वक श्रवण तथा भावपूर्ण पाठ पर रोक नहीं बताई जाती।
"ॐ" को दीर्घ (ओ…म्) उच्चारित करें। "भूर्-भुवः-स्वः" तीन व्याहृतियाँ स्पष्ट रुककर बोलें। "धीमहि" में "धी" दीर्घ है और "प्रचोदयात्" के अंत का "त्" हल्का हलन्त (आधा) उच्चारित होता है। प्रत्येक पद को शांत व सम स्वर में बोलें। परंपरा में मंत्र-जप में शुद्ध उच्चारण का विशेष महत्व कहा जाता है, इसलिए आरंभ में धीरे-धीरे व स्पष्ट बोलकर अभ्यास करें और गति बाद में बढ़ाएँ।
पर्व
