श्री काली माता आरती

śrī kālī mātā āratī

Kali Mata Aarti (Mangal Ki Seva Sun Meri Deva)

समय
7–8 मिनट
श्लोक/चौपाई
16
कठिनाई
मध्यम
शुभ दिन
मंगलवार; नवरात्रि; अमावस्या
उद्देश्य:रक्षा (Protection)संकट-निवारण (Relief from troubles)कल्याण (Well-being)
✓ संपूर्ण

"मंगल की सेवा सुन मेरी देवा, हाथ जोड़ तेरे द्वार खड़े" माँ काली की लंबी और प्रचलित आरती है, जिसके सोलह पद हैं। यह सात वारों पर बनी है — मंगल से आरंभ होकर रविवार तक हर वार का नाम आता है, और पद 13 स्वयं कहता है: "सात बार की महिमा बरनी, सब गुण कौन बखान करे"।

परिचय

माँ दुर्गा आदिशक्ति का स्वरूप हैं — दुष्टों का संहार करने वाली और भक्तों की रक्षक।

स्रोत: "मंगल की सेवा सुन मेरी देवा" — सात वारों पर बनी काली माता की परंपरागत आरती

एक नज़र में

मंत्र / पाठश्री काली माता आरती
IASTśrī kālī mātā āratī
देवतामाँ दुर्गा
मूल स्रोत"मंगल की सेवा सुन मेरी देवा" — सात वारों पर बनी काली माता की परंपरागत आरती
शुभ दिनमंगलवार; नवरात्रि; अमावस्या
पाठ समय7–8 मिनट
कठिनाईमध्यम

उद्भव / पृष्ठभूमि

यह आरती माँ काली को सप्ताह के हर दिन की देवी के रूप में गाती है, और बीच-बीच में एक ही टेक दोहराती है — "संतन-प्रतिपाली, सदा खुशहाली, जय काली कल्याण करे"।

सात वार (पद 1, 5, 6, 8, 10, 13). पहली पंक्ति "मंगल की सेवा" मंगलवार से आरंभ करती है। फिर "गुरु के वार सकल जग मोहयो" (गुरुवार), "शुक्र सुखदायी, सदा सहाई" (शुक्रवार), "वार शनिश्चर कुंकुम बरणो" (शनिवार) और "आदित वारी आदि भवानी" (रविवार) आते हैं; पद 3 का "बुद्धि विधाता" और पद 12 का "सौम्य स्वभाव" संभवतः बुध और सोम की ओर संकेत करते हैं। अंत में आरती स्वयं कहती है — "सात बार की महिमा बरनी"।

युद्ध (पद 9, 11). हाथ में खड्ग, खप्पर और त्रिशूल; रक्तबीज भस्म, शुम्भ-निशुम्भ क्षण भर में मारे गए, महिषासुर पकड़कर कुचला गया, और चण्ड-मुण्ड चूर किए गए। पर उसी पद में — "जब तुम देखी दया रूप हो, पल में संकट दूर करे"।

माँ के अनेक रूप (पद 5). "माता होकर पुत्र खिलावे, कहीं भार्या भोग करे" — एक ही शक्ति कहीं माँ बनकर पुत्र को खिलाती है, कहीं पत्नी बनकर।

दरबार (पद 7, 15). ब्रह्मा, विष्णु और महेश फल लेकर भेंट देने द्वार पर खड़े हैं; ब्रह्मा वेद पढ़ते हैं, शिव ध्यान धरते हैं, इन्द्र और कृष्ण आरती करते हैं और कुबेर चँवर डुलाते हैं।

आरती (लिरिक्स)

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मंगल की सेवा, सुन मेरी देवा, हाथ जोड़ तेरे द्वार खड़े। पान सुपारी, ध्वजा, नारियल, ले ज्वाला तेरी भेंट धरे॥

हे मेरी देवी, मंगल (मंगलवार) की यह सेवा सुनो — हम हाथ जोड़कर तेरे द्वार पर खड़े हैं; पान, सुपारी, ध्वजा, नारियल और ज्योति लेकर तेरी भेंट रखते हैं।

सुन जगदम्बे, कर न विलम्बे, संतन के भण्डार भरे। संतन-प्रतिपाली, सदा खुशहाली, जय काली कल्याण करे॥

हे जगदम्बे, सुनो, देर मत करो — तुम संतों के भंडार भरती हो; हे संतों का पालन करने वाली, सदा खुशहाली देने वाली काली, तुम्हारी जय हो, तुम कल्याण करती हो।

बुद्धि विधाता, तू जग माता, मेरा कारज सिद्ध करे। चरण कमल का लिया आसरा, शरण तुम्हारी आन पड़े॥

तू बुद्धि देने वाली, जगत की माता है — मेरा काम सिद्ध कर; मैंने तेरे चरण-कमलों का आसरा लिया है, तेरी शरण में आ पड़ा हूँ।

जब-जब भीड़ पड़ी भक्तन पर, तब तब आप सहाय करें। संतन-प्रतिपाली, सदा खुशहाली, जय काली कल्याण करे॥

जब-जब भक्तों पर संकट पड़ा, तब-तब तुमने सहायता की; हे संतों का पालन करने वाली काली, तुम्हारी जय हो।

गुरु के वार सकल जग मोहयो, तरुणी रूप अनूप धरे। माता होकर पुत्र खिलावे, कहीं भार्या भोग करे॥

गुरुवार को तुमने अनुपम तरुणी का रूप धरकर सारे जगत को मोह लिया; तुम कहीं माता होकर पुत्र को खिलाती हो, कहीं पत्नी बनकर भोग करती हो।

शुक्र सुखदायी, सदा सहाई, संत खड़े जयकार करें। संतन-प्रतिपाली, सदा खुशहाली, जय काली कल्याण करे॥

शुक्रवार को तुम सुख देने वाली और सदा सहायता करने वाली हो — संत खड़े होकर तुम्हारी जयकार करते हैं।

ब्रह्मा विष्णु महेश फल लिए, भेंट देन तेरे द्वार खड़े। अटल सिंहासन बैठी मेरी माता, सिर सोने का छत्र फिरे॥

ब्रह्मा, विष्णु और महेश फल लेकर भेंट देने तेरे द्वार पर खड़े हैं; मेरी माता अटल सिंहासन पर बैठी हैं और सिर पर सोने का छत्र घूम रहा है।

वार शनिश्चर कुंकुम बरणो, जब लुंकड़ पर हुकुम करे। संतन-प्रतिपाली, सदा खुशहाली, जय काली कल्याण करे॥

शनिवार को तुम कुंकुम-वर्ण (लाल रंग) की होती हो, जब तुम लुंकड़ पर हुक्म चलाती हो। ("लुंकड़" शब्द प्रतियों में ऐसा ही है; उसका अर्थ प्रतियों से स्पष्ट नहीं।)

खड्ग खप्पर त्रिशुल हाथ लिए, रक्त बीज को भस्म करे। शुम्भ निशुम्भ को क्षण में मारे, महिषासुर को पकड़ दले॥

हाथ में खड्ग, खप्पर और त्रिशूल लेकर तुमने रक्तबीज को भस्म किया; शुम्भ-निशुम्भ को क्षण भर में मार डाला और महिषासुर को पकड़कर कुचल दिया।

आदित वारी आदि भवानी, जन अपने का कष्ट हरे। संतन-प्रतिपाली, सदा खुशहाली, जय काली कल्याण करे॥

आदित (रविवार) के दिन तुम आदि भवानी हो, और अपने जनों का कष्ट हरती हो।

कुपित होय दानव मारे, चण्ड मुण्ड सब चूर करे। जब तुम देखी दया रूप हो, पल में संकट दूर करे॥

क्रोधित होकर तुमने दानवों को मारा और चण्ड-मुण्ड को चूर कर दिया; पर जब तुम दया-रूप में देखती हो, तो पल भर में संकट दूर कर देती हो।

सौम्य स्वभाव धरयो मेरी माता, जन की अर्ज कबूल करे। संतन-प्रतिपाली, सदा खुशहाली, जय काली कल्याण करे॥

हे मेरी माता, तुमने सौम्य स्वभाव धारण किया है और अपने जन की अर्ज़ी स्वीकार करती हो।

सात बार की महिमा बरनी, सब गुण कौन बखान करे। सिंह पीठ पर चढ़ी भवानी, अटल भवन में राज्य करे॥

सातों वारों की महिमा का वर्णन किया — (पर तुम्हारे) सब गुणों का बखान कौन कर सकता है? सिंह की पीठ पर चढ़ी भवानी अटल भवन में राज करती हैं।

दर्शन पावें मंगल गावें, सिद्ध साधक तेरी भेंट धरे। संतन-प्रतिपाली, सदा खुशहाली, जय काली कल्याण करे॥

भक्त दर्शन पाते हैं और मंगल-गीत गाते हैं; सिद्ध और साधक तुम्हारी भेंट रखते हैं।

ब्रह्मा वेद पढ़े तेरे द्वारे, शिव शंकर तेरा ध्यान धरे। इन्द्र कृष्ण तेरी करे आरती, चँवर कुबेर डुलाय रहे॥

ब्रह्मा तुम्हारे द्वार पर वेद पढ़ते हैं, शिव-शंकर तुम्हारा ध्यान करते हैं; इन्द्र और कृष्ण तुम्हारी आरती करते हैं और कुबेर चँवर डुला रहे हैं।

जय जननी जय मातु भवानी, अटल भवन में राज करे। संतन प्रतिपाली सदा खुशहाली, जय काली कल्याण करे॥

हे जननी, हे माता भवानी, तुम्हारी जय हो — तुम अटल भवन में राज करती हो; हे संतों का पालन करने वाली, सदा खुशहाली देने वाली काली, तुम्हारी जय हो।

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अर्थ (हिन्दी)

  1. हे मेरी देवी, मंगल (मंगलवार) की यह सेवा सुनो — हम हाथ जोड़कर तेरे द्वार पर खड़े हैं; पान, सुपारी, ध्वजा, नारियल और ज्योति लेकर तेरी भेंट रखते हैं।
  2. हे जगदम्बे, सुनो, देर मत करो — तुम संतों के भंडार भरती हो; हे संतों का पालन करने वाली, सदा खुशहाली देने वाली काली, तुम्हारी जय हो, तुम कल्याण करती हो।
  3. तू बुद्धि देने वाली, जगत की माता है — मेरा काम सिद्ध कर; मैंने तेरे चरण-कमलों का आसरा लिया है, तेरी शरण में आ पड़ा हूँ।
  4. जब-जब भक्तों पर संकट पड़ा, तब-तब तुमने सहायता की; हे संतों का पालन करने वाली काली, तुम्हारी जय हो।
  5. गुरुवार को तुमने अनुपम तरुणी का रूप धरकर सारे जगत को मोह लिया; तुम कहीं माता होकर पुत्र को खिलाती हो, कहीं पत्नी बनकर भोग करती हो।
  6. शुक्रवार को तुम सुख देने वाली और सदा सहायता करने वाली हो — संत खड़े होकर तुम्हारी जयकार करते हैं।
  7. ब्रह्मा, विष्णु और महेश फल लेकर भेंट देने तेरे द्वार पर खड़े हैं; मेरी माता अटल सिंहासन पर बैठी हैं और सिर पर सोने का छत्र घूम रहा है।
  8. शनिवार को तुम कुंकुम-वर्ण (लाल रंग) की होती हो, जब तुम लुंकड़ पर हुक्म चलाती हो। ("लुंकड़" शब्द प्रतियों में ऐसा ही है; उसका अर्थ प्रतियों से स्पष्ट नहीं।)
  9. हाथ में खड्ग, खप्पर और त्रिशूल लेकर तुमने रक्तबीज को भस्म किया; शुम्भ-निशुम्भ को क्षण भर में मार डाला और महिषासुर को पकड़कर कुचल दिया।
  10. आदित (रविवार) के दिन तुम आदि भवानी हो, और अपने जनों का कष्ट हरती हो।
  11. क्रोधित होकर तुमने दानवों को मारा और चण्ड-मुण्ड को चूर कर दिया; पर जब तुम दया-रूप में देखती हो, तो पल भर में संकट दूर कर देती हो।
  12. हे मेरी माता, तुमने सौम्य स्वभाव धारण किया है और अपने जन की अर्ज़ी स्वीकार करती हो।
  13. सातों वारों की महिमा का वर्णन किया — (पर तुम्हारे) सब गुणों का बखान कौन कर सकता है? सिंह की पीठ पर चढ़ी भवानी अटल भवन में राज करती हैं।
  14. भक्त दर्शन पाते हैं और मंगल-गीत गाते हैं; सिद्ध और साधक तुम्हारी भेंट रखते हैं।
  15. ब्रह्मा तुम्हारे द्वार पर वेद पढ़ते हैं, शिव-शंकर तुम्हारा ध्यान करते हैं; इन्द्र और कृष्ण तुम्हारी आरती करते हैं और कुबेर चँवर डुला रहे हैं।
  16. हे जननी, हे माता भवानी, तुम्हारी जय हो — तुम अटल भवन में राज करती हो; हे संतों का पालन करने वाली, सदा खुशहाली देने वाली काली, तुम्हारी जय हो।

लाभ

  • मंगलवार की पूजा का पाठ — आरती "मंगल की सेवा" से ही आरंभ होती है।
  • संकट में सहायता का भाव — "जब-जब भीड़ पड़ी भक्तन पर, तब तब आप सहाय करें"।
  • उग्र और करुण दोनों रूपों का स्मरण — "जब तुम देखी दया रूप हो, पल में संकट दूर करे"।

कब करें पाठ

मंगलवार कोनवरात्रि मेंअमावस्या और काली पूजा पर

पाठ विधि

माँ काली के समक्ष दीपक जलाएँ और पान, सुपारी, ध्वजा और नारियल रखें — पहला ही पद यही भेंट गिनाता है। हर पद के बाद "मंगल की सेवा सुन मेरी देवा" दोहराएँ; बीच-बीच की टेक "संतन-प्रतिपाली, सदा खुशहाली, जय काली कल्याण करे" पद का ही भाग है।

प्रामाणिकता व स्रोत

स्थिति✓ संपूर्ण
स्रोत परंपराbhaktvatsal.com — श्री महाकाली मैया की आरती (आधार-पाठ) · aartichalisa.com — माँ काली की आरती : मंगल की सेवा सुन मेरी देवा · bhajandiary.com — मंगल की सेवा सुन मेरी देवा काली माता आरती · drikpanchang.com — श्री महाकाली माता जी की आरती
रचयिताअज्ञात (किसी प्रति में नाम नहीं)
अंतिम अद्यतनसितंबर 2026

यह भी देखें

देव परिचय

माँ दुर्गा

Goddess Durga

माँ दुर्गा आदिशक्ति का स्वरूप हैं — दुष्टों का संहार करने वाली और भक्तों की रक्षक।

देवता वर्गशक्ति · रक्षा · विजय · साहस
वाहनसिंह
मुख्य मंत्रॐ दुं दुर्गायै नमः
सभी पाठ देखें

श्री काली माता आरती — सामान्य प्रश्न

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